Published on Nov 26, 2021 Updated 0 Hours ago

COP26 में यातायात से जुड़ी चर्चा पूरी तरह से इलेक्ट्रिक गाड़ियों और मेट्रो रेल से जुड़ी रही और इसमें यातायात के बेहद अहम साधनों, सार्वजनिक परिवहन और ग़ैर मोटर परिवहन (NMT) को बिल्कुल भी शामिल नहीं किया गया.

COP26 की यातायात से जुड़ी घोषणा: भारत के हाथ से निकला एक मौक़ा      Promit Mookherjee

दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन (Corbon Emissions) में परिवहन क्षेत्र का योगदान क़रीब 23 फ़ीसद है और अन्य सेक्टर की तुलना में इसमें सबसे ज़्यादा तेज़ी से इज़ाफ़ा होने की उम्मीद है. इस संदर्भ में ग्लासगो जलवायु सम्मेलन (COP26) के दसवें दिन को परिवहन क्षेत्र पर चर्चा का दिन तय किया गया था. उस दिन का एजेंडा, आवाजाही के दौरान कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अलग अलग भागीदारों के बीच सहयोग को बढ़ाने के तरीक़े तलाशने का था.

ग्लासगो सम्मेलन (COP26) की तमाम घोषणाओं में से सबसे अहम ये एलान था कि कारों और गाड़ियों को 100 प्रतिशत शून्य कार्बन उत्सर्जन बनाने का लक्ष्य हासिल करने की रफ़्तार तेज़ की जाए. इस एलान में कहा गया है कि 2040 तक पूरी दुनिया में बिकने वाली कारें और वैन शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली होंगी. विकसित देशों के लिए ये समयसीमा 2035 तय की गई है. हालांकि, ये समझौता बाध्यकारी नहीं है. लेकिन, इसमें सरकारों, गाड़ियों के निर्माताओं, वित्तीय संस्थानों और नागरिक संगठनों ने मिलकर दस्तख़त किए हैं. समझौते में 33 देशों की सरकारों ने हस्ताक्षर किए हैं. भारत की ओर से नीति आयोग ने इस समझौते पर दस्तख़त किए और दुपहिया और तिपहिया वाहनों को शून्य कार्बन उत्सर्जन बनाने पर ख़ास ज़ोर दिया है. हैरान करने वाली बात ये रही कि दुनिया के दो सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों अमेरिका और चीन इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं. हालांकि, इन देशों के कुछ शहर ज़रूर गाड़ियों का उत्सर्जन कम करने के समझौते में भागीदार बने हैं. जलवायु सम्मेलन के परिवहन दिवस का जो अन्य अहम पहलू रहा, वो ये था कि उद्योग और बड़ी कंपनियों ने जहाज़ और विमान उद्योग में कम कार्बन वाले ईंधन को बढ़ावा देने का वादा किया है.

शून्य कार्बन उत्सर्जन करने वाली गाड़ियों पर ज़ोर देने से विकसित देशों को ये फ़ायदा होगा कि वो आगे चलकर कम प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों का निर्माण करके, प्रगति के अपने मौजूदा रास्ते पर ही चलते रहेंगे.

गाड़ियों से कार्बन उत्सर्जन शून्य करने में सबसे ज़्यादा ज़ोर, उनके चलने के दौरान निकलने वाले धुएं को कम करने पर है, जिससे 2050 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य हासिल किया जा सके. इस साल पूरा ज़ोर इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV) पर था. इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि ज़्यादातर विकसित देशों में लोग बड़े पैमाने पर निजी गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं. मिसाल के तौर पर अमेरिका और ब्रिटेन में हर एक हज़ार लोगों पर क्रमश: 816 और 491 लोगों के पास गाड़ियां हैं. इन देशों में प्रति व्यक्ति आमदनी ज़्यादा होने, अच्छी सड़कों पर अधिक निवेश और ऑटोमोबाइल उद्योग को बढ़ावा देने के चलते प्रति व्यक्ति निजी गाड़ियों की संख्या बहुत अधिक है. शून्य कार्बन उत्सर्जन करने वाली गाड़ियों पर ज़ोर देने से विकसित देशों को ये फ़ायदा होगा कि वो आगे चलकर कम प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों का निर्माण करके, प्रगति के अपने मौजूदा रास्ते पर ही चलते रहेंगे.

बिना मोटर के चलने वाली गाड़ियों को बढ़ावा

 

बेहतर होगा कि हम COP26 में परिवहन दिवस को ‘इलेक्ट्रिक गाड़ियों का दिन’ कहें. लेकिन, अगर हमें परिवहन क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन कम करना है, तो केवल मोटर गाड़ियों को बेहतर और कम प्रदूषण वाली बनाने से आगे की सोच अपनानी होगी. इसके लिए ‘किसी अन्य तकनीक को अपनाने और सुधार’ की रणनीति के अलावा अन्य नीतियों पर भी विचार करने की ज़रूरत है. मोटर गाड़ियों के ज़रिए परिवहन से बचने या इसे कम करके हम कार्बन उत्सर्जन को ज़्यादा असरदार तरीक़े से कम कर सकते हैं. इसके लिए कॉम्पैक्ट शहरों की ज़रूरत होगी. बिना मोटर के चलने वाली गाड़ियों को बढ़ावा देना होगा, और यातायात पर केंद्रित विकास पर ज़ोर देना होगा. रेल और बस जैसे कम ऊर्जा की खपत वाले आवाजाही के साधनों को बढ़ावा देना भी काफ़ी अहम है. लेकिन, COP26 में इन बातों को लेकर न तो चर्चा हुई और न ही किसी ने कोई वादा किया. क्योंकि, पूरी चर्चा पर शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली गाड़ियां ही हावी रहीं. नागरिक संगठनों ने इसी वजह से COP26 सम्मेलन स्थल के बाहर एक प्रदर्शन भी आयोजित किया था. इन संगठनों ने मांग की कि साइकिल और सार्वजनिक परिवहन पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाना चाहिए.

भारत का नज़रिया

इसमें कोई दो राय नहीं कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ाना ज़रूरी है. भारत दुनिया में दोपहिया और तिपहिया गाड़ियों का सबसे बड़ा बाज़ार है. इस वर्ग में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ाना आसान है. पिछले दो दशकों में भारत में निजी कारों और हल्के कारोबारी वाहनों की बिक्री में भी ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है, और ये बिक्री आगे भी जारी रहने की संभावना है. इन वर्गों के लिए भी इलेक्ट्रिक गाड़ियां अहम रहेंगी. द एनर्जी ऐंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (TERI) के एक अध्ययन में कहा गया है कि जिन वर्गों में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का उपयोग आसानी से बढ़ाया जा सकता है, वो कुल कार्बन उत्सर्जन में से 25 प्रतिशत के लिए ज़िम्मेदार हैं. भारत में पहले से ही इलेक्ट्रिक गाड़ियों को बढ़ावा देने की  बढ़िया नीतियां है, जो केंद्र के साथ साथ राज्यों के स्तर पर भी लागू हैं. ग्लासगो सम्मेलन की घोषणा का हिस्सा बनकर हमने इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ाने की अपनी महत्वाकांक्षा को और भी मज़बूत कर लिया है. विकासशील देशों के बीच भारत, इलेक्ट्रिक गाड़ियों को अपनाने में सबसे आगे चल रहा है.

ग्लासगो सम्मेलन की घोषणा का हिस्सा बनकर हमने इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ाने की अपनी महत्वाकांक्षा को और भी मज़बूत कर लिया है. विकासशील देशों के बीच भारत, इलेक्ट्रिक गाड़ियों को अपनाने में सबसे आगे चल रहा है.

हालांकि, भारत में परिवहन के विकास की मौजूदा राह विकसित देशों की तुलना में बिल्कुल अलग है. कार्बन उत्सर्जन कम करने के किसी भी प्रयास में इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाना चाहिए. अन्य देशों की तुलना में भारत में गाड़ियों के आधुनिकीकरण की दर बहुत कम है. भारत में प्रति एक हज़ार लोगों पर लगभग 32 गाड़ियां ही हैं. आज भी भारत की आम जनता आवाजाही के लिए ग़ैर प्राइवेट गाड़ियों पर ज़्यादा निर्भर है. आवाजाही की ज़रूरतें पूरी करने में सार्वजनिक परिवहन बहुत बड़ी भूमिका निभाता है. मुंबई जैसे शहरों में तो कुल यातायात में सार्वजनिक परिवहन का हिस्सा, 50 प्रतिशत से भी ज़्यादा है. भारत के ज़्यादातर शहरों में काम पर जाने आने की औसत दूरी छह किलोमीटर से कम ही है, जो बिना मोटर वाली गाड़ियों के इस्तेमाल के लिए आदर्श दूरी है. इसका नतीजा ये है कि पैदल चलना और साइकिल से सफ़र करना भी भारत में काफ़ी आम है. लेकिन, इन क्षेत्रों में क्षमता का निर्माण करने में अपर्याप्त निवेश के चलते हाल के वर्षों में परिवहन के इन साधनों के मुक़ाबले निजी गाड़ियों का इस्तेमाल ज़्यादा बढ़ा है.

COP26 सममेलन ने भारत को एक मौक़ा दिया था कि वो इन अहम ज़रूरतों पर आवाज़ बुलंद करे, जिससे कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों के साथ-साथ, सबके लिए न्यायोचित और समान परिवहन की दिशा में आगे बढ़ा जा सके. भारत में सार्वजनिक परिवहन और बिना मोटर वाली गाड़ियों परिवहन (NMT) का इस्तेमाल करने वाले लोग मजबूरी वाले हैं. वो कहीं आने-जाने के लिए किसी और साधन का ख़र्च नहीं उठा सकते हैं. इसके अलावा, जैसे-जैसे प्रति व्यक्ति आमदनी बढ़ रही है, वैसे वैसे अगर सस्ता और इस्तेमाल करने वालों के लिए मुफ़ीद परिवहन विकसित नहीं किया जाता, तो निजी गाड़ियों का इस्तेमाल भी बढ़ेगा. ऐसे में पर्यावरण और सामाजिक स्थिरता के दोहरे मक़सद हासिल करने के लिए सार्वजनिक परिवहन और बिना मोटर वाले परिवहन में सुधार बहुत आवश्यक है. मगर इसके बजाय, आज इलेक्ट्रिक गाड़ियों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, जिससे ज़्यादा आमदनी वाले उन लोगों को ही फ़ायदा हो रहा है, जो पर्याप्त रूप से पूंजी हासिल कर सकते हैं.

सार्वजनिक परिवहन

नीति आयोग की स्टडी के मुताबिक़, भारत में बसों की उपलब्धता बहुत कम है. एक हज़ार लोगों पर महज़ 1.2 बसें मौजूद हैं. ये अन्य विकासशील देशों की तुलना में बहुत कम है. जैसे कि थाईलैंड (1000 लोगों पर 8.6) और दक्षिण अफ्रीका (1000 लोगों पर 6.5 बसें). इसके अलावा देश में चल रही कुल बसों में से 25 प्रतिशत तो बहुत पुरानी हो चुकी हैं. इसके चलते मुसाफ़िरों का सफ़र का अनुभव ख़राब होता है और ईंधन भी ज़्यादा लगता है. ऐसे में सार्वजनिक परिवहन सेवा में सुधार के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की ज़रूरत है. 2016 में इन्वेस्टमेंट इन्फॉर्मेशन ऐंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (ICRA) लिमिटेड द्वारा किए गए एक अध्ययन में ये अनुमान लगाया गया था कि डेढ़ लाख नई बसें ख़रीदने के लिए 15.4 अरब डॉलर रक़म की ज़रूरत होगी. अगर ये बसें इलेक्ट्रिक होंगी, तो फिर उसमें और अधिक पूंजी निवेश की ज़रूरत होगी क्योंकि इलेक्ट्रिक और डीज़ल से चलने वाली बसों के दाम में बहुत अंतर है. जनाग्रह सेंटर फॉर सिटिज़नशिप ऐंड डेमोक्रेसी द्वारा किए गए एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि अगर कर्नाटक राज्य परिवहन निगम, डीज़ल बसों की जगह इलेक्ट्रिक बसें ख़रीदने का महत्वाकांक्षी फ़ैसला करता है, तो उसे चार गुना अधिक पूंजी लगानी पड़ेगी.

भारत में सार्वजनिक परिवहन और बिना मोटर वाली गाड़ियों परिवहन (NMT) का इस्तेमाल करने वाले लोग मजबूरी वाले हैं. वो कहीं आने-जाने के लिए किसी और साधन का ख़र्च नहीं उठा सकते हैं. 

राज्य परिवहन संस्थानों के लिए (STUs) इतने बड़े पैमाने पर रक़म जुटा पाना बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि इनके पास पहले से ही पूंजी की कमी है. इस वक़्त सभी राज्य परिवहन निगमों का साझा घाटा सालाना क़रीब 14 हज़ार करोड़ रुपए है. इसके अलावा, नई बसें ख़रीदने की रक़म को किराए के अलावा किसी अन्य माध्यम से जुटाना होगा, क्योंकि किराया बढ़ाने का विकल्प बहुत सीमित है. इसके लिए पूंजी जुटाने के बिल्कुल ही नए तरीक़े अपनाने होंगे. इसमें से कुछ मदद तो केंद्र और राज्यों की सरकारें दे सकती हैं. लेकिन, ऐसा कोई तरीक़ा निकालने की ज़रूरत है, जिसके ज़रिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाले ग्रीन फंड को राज्य परिवहन निगमों को उपलब्ध कराया जा सके. ये रक़म या तो बेहद कम ब्याज दर पर दिलाई जा सकती है या फिर बस संचालकों और निर्माताओं के साथ साझेदारी करके हासिल की जा सकती है. इसके अलावा इलेक्ट्रिक गाड़ियों की भारी क़ीमत को देखते हुए तरल प्राकृतिक गैस (LNG) और सीएनजी (CNG) जैसे कम प्रदूषण फैलाने वाले विकल्पों पर भी विचार किए जाने की ज़रूरत है. ऐसे ईंधन से चलने वाली बसें उन राज्यों के लिए ख़ास तौर से मुफ़ीद साबित होंगी, जहां बाहर से आने वाली प्राकृतिक गैस आसानी से बंदरगाहों से हासिल की जा सके. जैसे कि गुजरात और केरल. अगर ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में इस बात को मज़बूती से उठाया जाता, तो अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियां बसों को निवेश के एक प्राथमिक अवसर के तौर पर देखतीं.

बिना मोटर के (NMT) होने वाला परिवहन

NMT के दायरे में मोटे तौर पर हर वो वाहन आता है, जिनसे शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है. जैसे कि पैदल चलना, साइकिल से चलना और साइकिल रिक्शॉ का इस्तेमाल करना. कम आदमनी वाले घर ज़्यादातर ऐसे ही परिवहन पर निर्भर होते हैं. शहरों को ऐसे परिवहन के लिए मुफ़ीद बनाना बहुत ज़रूरी है, जिससे कि समाज के सबसे ग़रीब तबक़े के लिए सुरक्षित रूप से आवाजाही को सुनिश्चित किया जा सके. इसके लिए घर से आख़िरी मंज़िल को जोड़ने वाले यातायात के सबसे सस्ते विकल्प ग़रीबों को मुहैया कराने होंगे. इनकी बड़ी अहमियत के बावजूद, नीति निर्माता इसी विकल्प की सबसे ज़्यादा अनदेखी करते हैं. परिक्सर संरक्षण संवर्धन संस्था द्वारा परिवहन के बजट के एक विश्लेषण में पाया गया था कि परिवहन के कुल बजट का महज़ दो प्रतिशत NMT के हिस्से में आता है. इसके अलावा, केंद्रीय सड़क परिवहन और हाइवे मंत्रालय (MoRTH) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में होने वाले कुल सड़क हादसों में से 20 फ़ीसद ग़ैर मोटर वाहन (NMT) के होते हैं.

राज्य परिवहन संस्थानों के लिए (STUs) इतने बड़े पैमाने पर रक़म जुटा पाना बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि इनके पास पहले से ही पूंजी की कमी है. इस वक़्त सभी राज्य परिवहन निगमों का साझा घाटा सालाना क़रीब 14 हज़ार करोड़ रुपए है. 

कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों में NMT को काफ़ी अहमियत  दी गई है. जैसे कि राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति. हालांकि, क्षमता और पूंजी की कमी के चलते इन नीतियों को ज़मीनी स्तर पर लागू करना एक बड़ा मसला रहा है. इस समय ग़ैर मोटर परिवहन की योजना बनाने की ज़िम्मेदारी स्थानीय शहरी निकायों  की है. इन संस्थाओं के पास NMT के मूलभूत ढांचे को लागू करने के लिए ज़रूरी ख़ास शहरी योजना बनाने की विशेषज्ञता की कमी होती है. इन संस्थाओं के लिए फंडिंग भी एक समस्या होती है क्योंकि शहर के अधिकारी अक्सर सड़कें और फ्लाईओवर बनाने के बड़े प्रोजेक्ट में निवेश को तरज़ीह देते हैं. ऐसे में, शहरी स्तर पर योजना बनाने वालों के बीच, ख़ास NMT प्रकोष्ठ बनाने की है ज़रूरत है. इन प्रकोष्ठों को पैदल और साइकिल से चलने वालों के लिए मूलभूत ढांचा बनाने की योजना तैयार करने और उन्हें लागू करने के लिए ख़ास तौर से फंड उपलब्ध कराया जाना चाहिए. ये प्रकोष्ठ निजी क्षेत्र के साथ सहयोग करके बाइक शेयरिंग और छोटे स्तर पर आवाजाही के साधन जैसे की ई-बाइक को मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा बना सकते हैं. ग्लासगो सम्मेलन में भारत के पास अच्छा मौक़ा था कि वो ग़ैर मोटर परिवहन की अहमियत को मज़बूती से पेश करता और इसके मूलभूत ढांचे में सुधार लाने की अपनी महत्वाकांक्षा को भी सामने रखता. इससे शहरों के अधिकारियों को भी ग़ैर मोटर परिवहन पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहन मिल पाता.

हाथ से निकला मौक़ा

शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली गाड़ियों को बढ़ावा देने का वादा करके, भारत ने अन्य विकासशील देशों की तुलना में कहीं अधिक महत्वाकांक्षा का संकेत दिया है. हालांकि हमने सबके लिए समान और न्यायोचित परिवहन का एक बड़ा नज़रिया सामने रखने का एक ऐसा मौक़ा गंवा दिया है, जिसमें हम विकसित और विकासशील देशों की यातायात व्यवस्था के बुनियादी अंतर को उजागर करके, उसी हिसाब से कम कार्बन उत्सर्जन की दिशा में बढ़ने की योजना बना सकते.

भारत में कम कार्बन उत्सर्जन वाले न्यायोचित और सबके लिए बराबर परिवहन की दिशा में बढ़ने के लिए सार्वजनिक परिवहन और ग़ैर मोटर परिवहन को मज़बूत स्तंभ बनाया जाना चाहिए. 

भारत में कम कार्बन उत्सर्जन वाले न्यायोचित और सबके लिए बराबर परिवहन की दिशा में बढ़ने के लिए सार्वजनिक परिवहन और ग़ैर मोटर परिवहन को मज़बूत स्तंभ बनाया जाना चाहिए. COP26 जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में किए गए वादे अक्सर राष्ट्रीय नीतियों और अंतरराष्ट्रीय पूंजी निवेश की दशा-दिशा तय करते हैं. इस समय अंतरराष्ट्रीय हरित पूंजी का ज़ोर इलेक्ट्रिक गाड़ियों और मेट्रो रेल तक सीमित है. इसकी एक मिसाल 94.4 करोड़ डॉल का ग्रीन ग्रोथ इक्विटी फंड है. ये फंड केवल इलेक्ट्रिक गाड़ियों की चार्जिंग का बुनियादी ढांचा विकसित करने पर केंद्रित है. आज ज़रूरत परिवहन की व्यापक चुनौतियों को चर्चा के केंद्र में लाने की है, जिससे पूंजी निवेश को सार्वजनिक बस सेवा और NMT जैसे अहम क्षेत्रों की तरफ़ मोड़ा जा सके.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.