जंगलों की इकोसिस्टम सेवाओं के मूल्यांकन के दौरान छंटाई के साथ-साथ कार्बन के भंडारण का लेखा-जोखा बनाते वक़्त जैव-ईंधन से जुड़े तत्व को ध्यान में रखा जाना चाहिए.
इकोसिस्टम से जुड़ी सेवाओं का मूल्यांकन प्राकृतिक पूंजी (या नैट-कैप) के आकलन का मुख्य आधार है. बहरहाल, कुछ वैज्ञानिक प्रकाशनों में इसको लेकर दिखाई देने वाले विचार संतोषजनक नहीं हैं. इसका नीति-निर्माण से जुड़े दायरों पर भी असर पड़ता है. इसकी वजह यही है कि अक्सर इकोसिस्टम से जुड़े नुकसानों की भरपाई के लिए दिए जाने वाले हर्जानों में इसी मूल्यांकन तंत्र का इस्तेमाल किया जाता है. हाल ही में ये बात और उभर कर सामने आई. इकोसिस्टम सर्विस के तौर पर कार्बन स्टॉक और उसकी छंटाई को लेकर जो समझ बनी है उसकी परिकल्पना से जुड़ी कुछ बुनियादी दिक्कतें हैं. ये समस्या पिछले कुछ समय से बदस्तूर जारी है. आमतौर पर इकोसिस्टम सर्विस से जुड़े मौजूदा बहीखातों में ये दिक्कत दिखाई देती है. ख़ासतौर से कार्बन स्टॉक और उसकी छंटाई के सिलसिले में तो ये समस्या और भी गंभीर है.
दरअसल इस समस्या की मूल वजह इकोसिस्टम सेवाओं के बारे में पर्याप्त समझ का अभाव है. उसकी ठीक ढंग से व्याख्या नहीं की गई है. इकोसिस्टम सेवाएं वो सेवाएं हैं जो मानव समुदाय इकोसिस्टम से हासिल करता है. यहां ये बात समझनी होगी कि ये सेवाएं मानव समाज और प्राकृतिक इकोसिस्टम का सम्मिलन होने पर ही सामने आती है. इस मायने में इकोसिस्टम सेवा एक “मानव-केंद्रित” विचार है. मिलेनियम इकोसिस्टम एसेसमेंट 2005 में इकोसिस्टम से जुड़ी सेवाओं को कई वर्गों में रखा गया है. इसके मुताबिक इकोसिस्टम सेवाओं को प्रोविज़निंग, रेगुलेटिंग, सपोर्टिंग और कल्चरल जैसी श्रेणियों में रखा गया है. कार्बन का अवशोषण इकोसिस्टम की रेगुलेटिंग सर्विस के दायरे में आता है.
इकोसिस्टम सेवाओं के नज़रिए से स्टॉक का मतलब प्राकृतिक संसाधनों में समाहित उन मूल्यों से है जिनका अबतक मानव के हित में इस्तेमाल नहीं किया गया है. वहीं दूसरी ओर प्रवाह का संबंध इकोसिस्टम से जुड़़ी वस्तुओं और सेवाओं के वास्तविक प्रवाह से है. लिहाज़ा इकोसिस्टम के संभावित और इस्तेमाल में न लाई गई सुविधाओं को स्टॉक के दायरे में रखा जाना चाहिए.
इकोसिस्टम सेवाओं को अक्सर स्टॉक और प्रवाह की श्रेणियों में बांटा गया है. अर्थशास्त्र और वित्त के सिद्धांतों में किसी ख़ास समय पर किसी परिसंपत्ति की क़ीमत को “स्टॉक” की संज्ञा दी गई है. जबकी उसी कालखंड में ख़रीद और बिक्री यानी लेन-देन के कुल मूल्य, आमदनियों, उत्पादनों, उपभोगों और निवेश से जुड़े खर्चों को “प्रवाह” के तौर पर जाना जाता है. स्टॉक में आगे होने वाले किसी भी तरह के जुड़ाव को उस मियाद के दौरान प्रवाह के रूप में ही दर्शाया जाता है. मसलन सड़कों, पुलों या इमारतों जैसे बुनियादी ढांचे पर होने वाले निवेश से नए भौतिक निर्माणों को प्रवाह के तौर पर ही दिखाया जाता है. इकोसिस्टम सेवाओं के नज़रिए से स्टॉक का मतलब प्राकृतिक संसाधनों में समाहित उन मूल्यों से है जिनका अबतक मानव के हित में इस्तेमाल नहीं किया गया है. वहीं दूसरी ओर प्रवाह का संबंध इकोसिस्टम से जुड़़ी वस्तुओं और सेवाओं के वास्तविक प्रवाह से है. लिहाज़ा इकोसिस्टम के संभावित और इस्तेमाल में न लाई गई सुविधाओं को स्टॉक के दायरे में रखा जाना चाहिए. यहां इसकी सबसे बढ़िया मिसाल किसी जंगल के भीतर लकड़ियों का स्टॉक है. जंगल अनेक प्रकार की सेवाएं प्रस्तुत करता है. इनमें प्रोविज़निंग (जैसे काटी गई लकड़ियां, लकड़ियों के अलावा जंगल के दूसरे उत्पाद आदि), रेगुलेटिंग (मसलन कार्बन का भंडारण और छंटाई), सपोर्टिंग (जैसे बायोलॉजिकल कंट्रोल, जीन-पूल प्रोटेक्शन), और कल्चरल (मसलन पर्यटन, आध्यात्म) सेवाएं शामिल हैं. एक खड़ा या ज़िंदा पेड़ सामान्य अर्थों में मूल्यों का भंडार है. मानव हितों के दायरे में वो तबतक प्रवेश नहीं करता जबतक कि उसे काटकर गिरा न दिया जाए. लिहाज़ा मानव समुदाय द्वारा मौद्रिक रूप से हासिल फ़ायदों के रूप में इकोसिस्टम सेवाओं की क़ीमत लगाते वक़्त हम किसी ख़ास वर्ष में प्रवाह का मूल्यांकन कर रहे होते हैं. ये बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि मानव समुदाय को होने वाले फ़ायदे हमेशा प्रवाह की शक्ल में होते हैं. हालांकि इस बात की संभावना हो सकती है कि इस प्रवाह का जन्म स्टॉक से हुआ हो. मिसाल के तौर पर “प्राकृतिक पूंजी” (जैव-विविधता और प्राकृतिक संपत्तियां) एक स्टॉक है जिसके ज़रिए हमें इकोसिस्टम सेवाओं के तौर पर फ़ायदों का प्रवाह हासिल होता है. लिहाज़ा इकोसिस्टम सेवाएं स्टॉक न होकर, प्रवाह होती हैं!
जंगलों के इकोसिस्टम सेवाओं से जुड़े कुछ वैज्ञानिक रिपोर्टों में कार्बन स्टॉक को स्टॉक बेनिफ़िट के तौर पर मूल्यांकित किया जाता है. इसे लकड़ियों के स्टॉक के साथ जोड़कर देखा जाता है. दोनों को विचारों के लिहाज़ से एक समान माना जाता है. इकोसिस्टम के स्टॉक मूल्य की जानकारी पाने के लिए इन्हें जोड़़ा जाता है. दरअसल समस्याएं यहीं से पैदा होती हैं! जैसा कि पहले ही बताया गया है, लकड़ियों का स्टॉक मूल्य (कुल घनमीटर लकड़ियों और उनके बाज़ार मूल्य का गुणक) शुद्ध रूप से मूल्य का भंडार है. इसका किसी दूसरे कालखंड में संभावित इस्तेमाल हो सकता है. हालांकि कार्बन स्टॉक मूल्य का भंडार नहीं है. वो तो मूल्य का प्रवाह मुहैया कराता है. वातावरण में स्थित CO2 मानवता के लिए कोई फ़ायदेमंद वस्तु (या सेवा) नहीं है. दरअसल ये तो लागत (क्षति) है. ग्लोबल वॉर्मिंग के नज़रिए से देखें तो इसके चलते अर्थव्यवस्था पर कई तरह के नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं. इसके साथ-साथ स्वास्थ्य से जुड़ी क़ीमत भी चुकानी होती है. वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड के ऊंचे स्तर की क़ीमत पूरी अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है. इससे उत्पादकताओं का स्तर गिरता है, जीडीपी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. लिहाज़ा इसकी कोई क़ीमत नहीं हो सकती (ऐसा इसलिए क्योंकि ये कोई “अच्छाई” नहीं है जो “सीमांत उपयोगिता” प्रदान करे. इसके विपरीत ये तो एक किस्म की लागत है जो समाज पर डाली गई है.
अगर हम एक ऐसी परिस्थिति की कल्पना करें जिसमें हमारे ग्रह की सतह से जंगल पूरी तरह से ग़ायब हो जाएं तो इससे जैव-ईंधन के कुल स्टॉक का नुकसान हो जाएगा.
जंगल एक प्रक्रिया के तहत कार्बन की छंटाई करते हैं. इससे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड दूर होता है. फ़ोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया के ज़रिए कार्बन डाई ऑक्साइड का कार्बन तत्व (माना जाता है कि वो CO2 का 27 प्रतिशत है) जंगल द्वारा भंडारित कर लिया जाता है. बाक़ी का 73 प्रतिशत (जो कि ऑक्सीजन या O2 है), वातावरण में छोड़ दिया जाता है. ये कार्बन जंगल में ज़िंदा जैव ईंधनों, मिट्टी और भूसे या जंगली कूड़े के भीतर संरक्षित हो जाता है. ये जंगल के कार्बन स्टॉक में जुड़ जाता है. ये एक मियादी प्रक्रिया है जो बार-बार घटित होती है. इकोसिस्टम सेवाओं के मूल्यांकन से जुड़े ज़्यादातर अध्ययनों में अलग किए गए कार्बन को प्रवाह लाभ के तौर पर जोड़ा जाता है. इस लेखे-जोखे में पूरे तौर पर कार्बन के भंडारण को शामिल नहीं किया जाता. बहरहाल, यहां ग़ौर करने वाली बात ये है कि कुल कार्बन भंडारण की तरह ही नया या ताज़ा तौर पर छांटा गया कार्बन भी प्रवाह लाभ में शामिल होता है! अगर जंगलों से ये कार्बन भंडार बाहर छोड़ दिया जाए तो वो हमारे बीच मौजूद “अनुपयोगी” पदार्थों के भंडार में ही जुड़ जाएगा. लिहाज़ा हर पल या हर साल, जंगल हमें भंडारित कार्बन के साथ-साथ छांटे गए कार्बन का भी लाभ मुहैया कराता है. अगर जंगल नहीं होते तो ये कार्बन हमारे वातावरण में शामिल हो जाता. जंगल हमें इसी कार्बन और मानव स्वास्थ्य पर होने वाले उसके संभावित प्रभावों से बचाकर हमारा लागत कम करता है.
कार्बन की सामाजिक लागत (एससीसी) के ज़रिए प्रत्येक टन CO2 के अतिरिक्त उत्सर्जन की संभावित कुल लागत के मौद्रिक आकलन का प्रयास किया जाता है. ये मूल्य इस मायने में लागत में बचत करने के नज़रिए से वातावरण में मौजूद कार्बन के स्तर में हुई गिरावट के फ़ायदों को दर्शाता है. इस प्रकार प्रति वर्ष जंगल (जो कार्बन को नियंत्रित करता है) मानव समुदाय को नियमित तौर पर दिए जाने वाली सेवा के प्रवाह के तौर पर ये मूल्य प्रदान करता है. जंगल हर क्षण वातावरण में कार्बन उत्सर्जन पर एक नियामक भंडार के तौर पर कार्य करता है. इस तरह वो समाज को कार्बन की अनचाही लागत से बचाता है. हर साल जंगल द्वारा अवशोषित कार्बन और कार्बन को छांटकर जैव ईंधनों आदि के रूप में भंडारित करने की प्रक्रिया के ज़रिए मानव समाज को प्रवाही लाभ प्राप्त होते हैं. दूसरे शब्दों में मौजूदा स्टॉक की रखवाली और छंटाई के ज़रिए कार्बन के भंडार में बढ़ोतरी के रूप में हर साल जंगलों की वजह से कार्बन का नकारात्मक मूल्य सकारात्मक मूल्य में तब्दील हो जाता है. दोनों ही इकोसिस्टम सेवाओं का प्रवाह तय करते हैं. इस तथ्य को कंचन चोपड़ा समिति की रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया था. इस समिति ने जंगली भूमि को ग़ैर-जंगल इस्तेमाल में लाने के लिए शुद्ध मौजूदा मूल्य (एनपीवी) के आकलन के सिद्धांत तय किए थे.
ग्लोबल वॉर्मिंग के नज़रिए से देखें तो इसके चलते अर्थव्यवस्था पर कई तरह के नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं. इसके साथ-साथ स्वास्थ्य से जुड़ी क़ीमत भी चुकानी होती है. वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड के ऊंचे स्तर की क़ीमत पूरी अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है. इससे उत्पादकताओं का स्तर गिरता है, जीडीपी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. लिहाज़ा इसकी कोई क़ीमत नहीं हो सकती
अक्सर मूल्यांकन के लिए कुछ रिपोर्टों और अध्ययनों में कार्बन क्रेडिट के बाज़ार मूल्य पर ही ग़ौर किया गया है. हालांकि, उससे कहीं बेहतर मूल्य व्यवस्था के रूप में एससीसी उभर कर सामने आया है. सर्टिफ़ाइड एमिशन रिडक्शन (सीईआर) या वेरिफ़ाइड एमिशन रिडक्शन (वीईआर) क़ीमतें बाज़ार में आने वाले उतार-चढ़ावों से प्रभावित होती हैं. 2007 से पहले के आर्थिक तेज़ी वाले माहौल में सीईआर क़ीमतें अपने शिखर पर पहुंच गई थीं. हालांकि अमेरिका में आए सब-प्राइम संकट और यूरोपीय संघ में आई आर्थिक सुस्ती के बाद इनकी हवा निकल गई. ये हालात औद्योगिक गतिविधियों में आई मंदी का नतीजा था. इस वजह से कार्बन क्रेडिट्स की मांग में गिरावट आ गई थी. हालांकि इसका ये मतलब नहीं है कि कार्बन उत्सर्जन से होने वाले नुकसान कम हो गए या जंगलों द्वारा कार्बन की छंटाई का प्रति यूनिट मोल बदल गया. बाज़ार क़ीमतें सूचना के बेहतर तंत्र के ज़रिए हासिल होती हैं. कार्बन बाज़ार मोटे तौर पर अधूरे और दोषपूर्ण हैं. लिहाज़ा अगर हम जंगली कार्बन की अवसर लागत के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो इसके लिए एससीसी से जुड़ी व्यवस्था का ही सहारा लेना होगा.
यहां एक अहम बात फिर से याद दिलाना ज़रूरी है. जंगलों की इकोसिस्टम सेवाओं के मूल्यांकन के दौरान छंटाई के साथ-साथ कार्बन के भंडारण का लेखा-जोखा बनाते वक़्त जैव-ईंधन से जुड़े तत्व को ध्यान में रखा जाना चाहिए. जंगलों के पतन की अवसर लागत को दर्शाने की वजह से ऐसा होता है. आमतौर पर कार्बन का भंडार कुल जैव-ईंधन (धरती के ऊपर स्थित जैव-ईंधन यानी एजीबी और धरती के नीचे स्थित जैव-ईंधन यानी बीजीबी), मृत लकड़ियों, भूसे और मिट्टी में स्थित ऑर्गेनिक कार्बन से बना होता है. आमतौर पर सालाना मूल्यांकन के वक़्त कार्बन की छंटाई को ध्यान में रखा जाता है. इसकी वजह ये है कि यही इकलौता प्रवाह लाभ होता है. बहरहाल जंगल इकोसिस्टम सेवा के सालाना मोल को मापने का इससे अधिक वैज्ञानिक तरीका सामान्य रूप से यही है कि हम इससे जुड़े अवसर लागत पर ध्यान दें. मृत लकड़ी और भूसों से जड़ा तत्व आम तौर पर कुल कार्बन भंडार का बेहद मामूली हिस्सा (0.5 फ़ीसदी से भी कम) होता है. अगर हम एक ऐसी परिस्थिति की कल्पना करें जिसमें हमारे ग्रह की सतह से जंगल पूरी तरह से ग़ायब हो जाएं तो इससे जैव-ईंधन के कुल स्टॉक का नुकसान हो जाएगा. इसमें ताज़ा छांटे गए कार्बन का तत्व भी शामिल होगा. बहरहाल जंगलों की तबाही से मिट्टी में स्थित ऑर्गेनिक कार्बन पर किसी तरह का प्रभाव पड़ने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं. लिहाज़ा एक नियामक सेवा के तौर पर कार्बन भंडार के मूल्यांकन के लिए एजीबी और बीजीबी का कुल योग निकालकर उसे एससीसी से गुणा करना होता है.
कार्बन बाज़ार मोटे तौर पर अधूरे और दोषपूर्ण हैं. लिहाज़ा अगर हम जंगली कार्बन की अवसर लागत के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो इसके लिए एससीसी से जुड़ी व्यवस्था का ही सहारा लेना होगा.
ऊपर दिए गए तर्कों से हम ये तथ्य स्थापित करते हैं कि: (क) इकोसिस्टम सेवाएं स्टॉक न होकर प्रवाह हैं. कार्बन के भंडार से हर क्षण लाभ का प्रवाह होता है. (ख) फ़ायदों के मूल्यांकन के लिए कार्बन की सामाजिक लागत को आधार बनाया जाना चाहिए, और (ग) कार्बन भंडारण से जंगलों की इकोसिस्टम सेवाओं के मूल्यांकन के लिए मिट्टी में स्थित कार्बन को अलग कर कुल जैव-ईंधनों को शामिल किया जाना चाहिए. नैट-कैप के आकलन के हमारे मौजूदा तरीक़ों में ऊपर बताए गए तीन पहलुओं के हिसाब से तत्काल सुधार लाने की आवश्यकता है.
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Dr Nilanjan Ghosh heads Development Studies at the Observer Research Foundation (ORF) and serves as the operational and executive head of ORF’s Kolkata Centre. He ...
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