Published on Oct 21, 2023 Updated 22 Days ago

एक न्यायसंगत और हरित बदलाव को ग्लोबल साउथ की आर्थिक और श्रम प्रणाली के मुताबिक ज़रूर प्रतिक्रिया देनी चाहिए. इससे हरित रोज़गार उत्पन्न करने की असली क्षमता खुल सकती है. 

श्रम बाज़ार को पर्यावरण के लिए बेहतर बनाना: ग्लोबल साउथ में सतत रोज़गार

पर्यावरण के हिसाब से बेहतर नौकरियां (ग्रीन जॉब) सतत विकास हासिल करने के तौर-तरीके और एक न्यायसंगत हरित बदलाव के लिए तैयार नीतियों के नतीजे- दोनों के रूप में काम करती हैं. ये जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का समाधान करने के लिए बेहद ज़रूरी आर्थिक परिवर्तन को भी बढ़ावा देती हैं. जलवायु परिवर्तन अब एक अमूर्त धारणा (एब्सट्रैक्ट नोशन) नहीं रह गया है बल्कि एक मूर्त बल (टैंजिबल फोर्स) है जो पूरी दुनिया में अर्थव्यवस्थाओं और समाजों को नया आकार दे रहा है. इसके महत्वपूर्ण प्रभावों में श्रम बाज़ार में कायापलट शामिल हैं. 

श्रम बाज़ार पर जलवायु परिवर्तन की नीतियों के असर, “ग्रीन जॉब” को परिभाषित करने के जटिल स्वरूप और ग्लोबल साउथ में सतत रोज़गार के लिए एक तैयार दृष्टिकोण को अपनाने की ज़रूरत पर गहराई से विचार करना अनिवार्य है.

जलवायु परिवर्तन की नीतियों और रोज़गार की गतिशीलता का मिलना एक गंभीर चिंता का विषय है, ख़ास तौर पर ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) और उसकी अनूठी चुनौतियों के संदर्भ में. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का अनुमान है कि हरित बदलाव से 2030 तक 10 करोड़ से अधिक नौकरियां उत्पन्न होंगी “जो पूरी तरह उनके सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखती है”. स्किल काउंसिल फॉर ग्रीन जॉब्स का दावा है कि भारत के पास 2047 तक 3.5 करोड़ ग्रीन जॉब के निर्माण की क्षमता है. 

श्रम बाज़ार पर जलवायु परिवर्तन की नीतियों के असर, “ग्रीन जॉब” को परिभाषित करने के जटिल स्वरूप और ग्लोबल साउथ में सतत रोज़गार के लिए एक तैयार दृष्टिकोण को अपनाने की ज़रूरत पर गहराई से विचार करना अनिवार्य है. 

“हरित नौकरियों” की परिभाषा

पर्यावरण स्थिरता को बढ़ावा देने में शामिल अलग-अलग गतिविधियों की वजह से ग्रीन जॉब या हरित नौकरियों को परिभाषित करना एक मुश्किल चुनौती है. इन गतिविधियों में प्रदूषण को कम करना, संसाधनों के संरक्षण से लेकर ऊर्जा दक्षता में सुधार करना शामिल हैं. ILO की परिभाषा के मुताबिक ग्रीन जॉब एक ‘साफ-सुथरा’ और पर्यावरण के हिसाब से ज़िम्मेदार भूमिका है जो पर्यावरण के संरक्षण या बहाली में योगदान करती है. एक दूसरा दृष्टिकोण, जिसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) बढ़ावा देता है, क्षेत्रवार और व्यावसायिक नज़रिया अपनाता है. इसकी वजह ये है कि वो पर्यावरण के संरक्षण और कुछ ख़ास क्षेत्रों जैसे कि कूड़ा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) और नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) में उद्धार के लिए प्रत्यक्ष योगदान को शामिल करना चाहता है.

एक और दृष्टिकोण उत्पादन की प्रक्रिया पर नज़र डालता है. उदाहरण के तौर पर, यूरोपियन यूनियन और अमेरिका सोलर ऊर्जा की प्रणाली, जैव ईंधन या इलेक्ट्रिक गाड़ियों के उत्पादन में शामिल कामगारों को ग्रीन वर्कर (हरित कामगार) मानता है. ये दृष्टिकोण अंतिम उत्पाद के पर्यावरण पर प्रभाव की समीक्षा करता है और किसी ख़ास सेक्टर पर ध्यान देने से आगे बढ़ता है. 

जैसे-जैसे दुनिया में हरित नौकरियों का निर्माण होगा, वैसे-वैसे ऊपर बताए गए तीनों पहलू ज़्यादा उत्सर्जन वाली नौकरियों को बदलते जाएंगे और पर्यावरण के हिसाब से अस्थिर नौकरियों की कमी की तरफ ले जाएंगे.

दृष्टिकोण चाहे जो भी हो लेकिन ग्रीन जॉब को परिभाषित करते समय समानता, सुरक्षा और वेतन जैसे कारकों (फैक्टर) पर विचार करना महत्वपूर्ण है. उद्देश्य केवल पर्यावरण के अनुकूल रोज़गार नहीं है बल्कि कामगारों के लिए स्वच्छ और न्यायसंगत रोज़गार की शर्तें भी हैं. नौकरियों के निर्माण में इन पहलुओं को शामिल करने से साफ-सुथरे काम, निष्पक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर पारिस्थितिक स्थिरता (इकोलॉजिकल सस्टेनेबिलिटी) को बढ़ावा मिलता है.  

श्रम बाज़ार के लिए अर्थ

हरित परिवर्तन की नीतियां तीन पहलुओं के माध्यम से श्रम बाज़ार पर असर डालेंगी. पहला, स्वच्छ उत्पादों के लिए बढ़ती मांग की वजह से उपभोक्ताओं की बदलती आदत किसी सेक्टर के विस्तार या उसके सिकुड़ने की तरफ ले जा सकती है. दूसरा, ये सीधे तौर पर प्राकृतिक और निर्मित पर्यावरण पर प्रभाव डालते हैं, श्रम बल (वर्क फोर्स) की उपलब्धता पर असर डालते हैं, ख़ास तौर पर कृषि पर निर्भर क्षेत्रों में. साथ ही उद्योगों जैसे कि पर्यटन, बीमा, वानिकी (फॉरेस्ट्री), मत्स्य पालन (फिशरीज़), इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा की कमज़ोरी को बढ़ाते हैं. तीसरा, जलवायु परिवर्तन का समाधान करने वाले नियामक ढांचे (रेगुलेटरी फ्रेमवर्क) आपदा के लिए लचीले इंफ्रास्ट्रक्चर और तटीय रक्षा में निवेश जैसे जलवायु अनुकूलन से जुड़े क्षेत्रों में रोज़गार पैदा करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि, रोज़गार के निर्माण का असर जटिल है जो कि सार्वजनिक खर्च और दूसरी आर्थिक गतिविधियों के साथ समझौते पर निर्भर करते हैं. जैसे-जैसे दुनिया में हरित नौकरियों का निर्माण होगा, वैसे-वैसे ऊपर बताए गए तीनों पहलू ज़्यादा उत्सर्जन वाली नौकरियों को बदलते जाएंगे और पर्यावरण के हिसाब से अस्थिर नौकरियों की कमी की तरफ ले जाएंगे. हालांकि, अनुमान है कि श्रम बाज़ार पर ये असर तकनीक़ी प्रगति और भौगोलिक पाबंदियों की अन्य सभी चीज़ों को स्थिर रखेंगे. 

मददगार श्रम बाज़ार की नीतियां और अनूठी स्थानीय सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का ध्यान रखना जोखिम को कम करने और सार्थक बदलाव को हासिल करने के लिए आवश्यक है.

इस बदलाव के दौरान रोज़गार निर्माण की अनुमानित दर 0.5-2.0 है जबकि नौकरियों में नुकसान की दर 1 प्रतिशत. ये अनुमान औपचारिक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में है जो अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाली दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी, जो कि अलग-थलग प्रोडक्शन लाइन, खराब होती काम-काज की स्थिति और बढ़ती वेतन असमानता के हालात में काम करते हैं, को छोड़ देता है. इन्हें शामिल नहीं करने से नौकरी के निर्माण और रोज़गार पर वास्तविक असर को लेकर महत्वपूर्ण चिंताएं खड़ी होती हैं. ग्लोबल साउथ के श्रम बाज़ार में व्यापक रूप से अनौपचारिक नौकरियां हैं जो कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया में एक केंद्रीय भूमिका निभाती हैं. इसलिए सतत और समावेशी विकास के लिए अनौपचारिकता के स्वरूप और प्रेरकों को समझना महतवपूर्ण है. 

सिफारिशें- रणनीतिक रास्ते 

हरित नौकरियों को परिभाषित करने में संकीर्ण दायरे और सामंजस्य ने ग्लोबल साउथ के लिए प्रतिकूल स्थितियां पैदा की हैं. हरित परिवर्तन की असली क्षमता को हासिल करने के लिए ‘हरित’ को ग्लोबल साउथ यानी यहां के श्रम प्रधान और बंटे हुए श्रम बाज़ार की वास्तविकता के संदर्भ मे प्रासंगिक बनाने की आवश्यकता है. इसके लिए जिन रणनीतिक रास्तों पर विचार करने की आवश्यकता है वो ये हैं: 

ग्लोबल साउथ का विशेष वर्गीकरण: वैसे तो जलवायु लचीलेपन के लिए राहत की नीतियों पर ध्यान देने की आवश्यकता को लेकर आम राय है लेकिन रोज़गार के सामाजिक पहलू का समाधान करने के लिए अनुकूलन ज़रूरी है. ये अनुकूलता कामगारों को हरित नौकरियों के लिए हुनरमंद बनाकर और ग्लोबल साउथ के लिए हरित वर्गीकरण को फिर से परिभाषित करके हासिल की जा सकती है. ग्लोबल साउथ के लिए विशेष रूप से वर्गीकरण कम उत्सर्जन के लिए संसाधनों के प्रभावी उपयोग में योगदान करेगा. ये सतत संसाधन के प्रबंधन और संरक्षण पर आधारित क्षेत्रों में रोज़गार के अवसरों को भी बढ़ाएगा. ये औपचारिकता के माध्यम से ग्रीन सेक्टर और नौकरियों के निर्माण के लिए लक्षित (टारगेटेड) निवेश का मार्गदर्शन करेगा. 

न्यायसंगत बदलाव के लिए योजना: न्यायसंगत बदलाव उन कामगारों को फिर से जोड़ने पर निर्भर करता है जो दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में कार्बन ख़त्म करने की वजह से बेरोज़गार हो गए हैं. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सुझाव के मुताबिक बेहद हुनरमंद और शहरी कामगारों की प्रवृत्ति होती है कि वो कम हुनर वाले ग्रामीण कामगारों की तुलना में हरित प्रधान व्यवसायों में ज़्यादा काम करते हैं. इसलिए नीतिगत सामंजस्य हासिल करने के लिए विकास से जुड़े क्षेत्र की कंपनियों और सरकार के बीच सहयोग वाली साझेदारी की आवश्यकता होती है जो एकीकरण की प्रक्रिया को सुलभ बना सके. एक न्यायसंगत परिवर्तन भविष्य पर केंद्रित कौशल विकास, संस्थागत निर्माण और क्षमता बढ़ोतरी पर ध्यान देना आवश्यक बनाता है. 

साउथ-साउथ सहयोग: विकासशील देशों के बीच सहयोग हरित श्रम के बाज़ारों और हरित नौकरियों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए गतिशील रास्ते की पेशकश करता है. इसे बहुत से वास्तविक मामलों के ज़रिए दिखाया गया है. भारत, ब्राज़ील और चीन जैसे देशों के बीच सहयोग की कोशिशों ने नवीकरणीय ऊर्जा, सतत कृषि और इको-टूरिज़्म में विशेषज्ञता के आदान-प्रदान को आसान बनाया है. वैसे तो कई मौजूदा बातचीत का दायरा हरित सुधार और वित्त तक सीमित है लेकिन ये परस्पर क्रिया न केवल उद्योगों को पर्यावरण के हिसाब से बदलने के लिए जानकारी को साझा करने की क्षमता का उदाहरण देती हैं बल्कि हरित रोज़गार के अवसरों को भी पैदा करती हैं. मिल-जुल कर ऐसी कोशिशें साझा अनुभवों और सामूहिक प्रयासों का लाभ उठाती हैं और इस तरह अधिक सतत श्रम बाज़ारों की तरफ़ रास्ते को मज़बूत करती हैं. 

निष्कर्ष 

हरित अर्थव्यवस्था को हासिल करने से अपने आप समावेशिता और सामाजिक स्थिरता सुनिश्चित नहीं हो जाती है, ख़ास तौर पर ग्लोबल साउथ के दृष्टिकोण से. मददगार श्रम बाज़ार की नीतियां और अनूठी स्थानीय सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का ध्यान रखना जोखिम को कम करने और सार्थक बदलाव को हासिल करने के लिए आवश्यक है. नीतिगत समन्वय, सक्रिय तौर पर योजना तैयार करना और लक्ष्य बनाकर कौशल का विकास ग्लोबल साउथ को हरित अर्थव्यवस्था से सफलतापूर्वक जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण हैं. ग्लोबल साउथ की आर्थिक और श्रम प्रणाली के मुताबिक प्रतिक्रिया देने वाले एक हरित ढांचे को अपनाने से बाज़ार में सरप्लस श्रम को फिर से प्रभावी ढंग से जोड़ने में हरित रोज़गार पैदा करने के लिए वास्तविक क्षमता खुल सकती है.


राधिका पुरोहित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के मुंबई सेंटर में इंटर्न हैं.

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