Author : Akanksha Sharma

Published on Aug 27, 2021 Updated 0 Hours ago

ईएसजी के समर्थन को लेकर इन दिनों सबसे अनुकूल परिस्थितियां नज़र आ रही हैं लेकिन क्या ये कहानी का केवल एक पहलू है?

वैश्विक ईएसजी मानकों के लिए यही सबसे सही वक़्त है…वैश्विक ईएसजी मानकों के लिए यही सबसे सही वक़्त है…

कोविड महामारी के चलते पैदा परिस्थितियों ने दुनिया भर में समुदायों और अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है. ऐसे में सतत विकास को तत्काल अहमियत दिए जाने की बात पत्थर पर लिखी इबारत की तरह साफ हो गई है. हालांकि, कोरोना महामारी फैलने के कुछ साल पहले से ही पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन-प्रशासन से जुड़े प्रकाशनों के मुख्यधारा में आने की प्रक्रिया जारी थी. अलबत्ता उनकी रफ़्तार भले ही कम-ज़्यादा रहती थी. आज का निवेशक ज़्यादा से ज़्यादा पारदर्शिता की मांग करता है. नीति निर्माता भी अधिक से अधिक जवाबदेही पर ज़ोर दे रहे हैं. इतना ही नहीं आज का जागरूक उपभोक्ता हमेशा ही प्रभावी या मज़बूत ब्रांड की तलाश में रहता है. इन तमाम परिस्थितियों के चलते समुदायों और पर्यावरण के संदर्भ में कॉरपोरेट व्यवहार ने बोर्डरूम में होने वाली चर्चाओं में प्रमुख स्थान बना लिया है. आज हक़ीक़त ये है कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को हासिल किए जाने की समयसीमा अब एक दशक से भी कम की रह गई है. ऐसे में प्रकटीकरण और रिपोर्टिंग से जुड़े तंत्र का विषम स्वरूप  सतत विकास के बुनियादी लक्ष्यों को निरंतर कमज़ोर कर रहा है. पर्यावरणीय, सामाजिक और वैश्विक (ईएसजी) अनुपालन के पीछे यही बुनियादी लक्ष्य शामिल हैं.

आज हक़ीक़त ये है कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को हासिल किए जाने की समयसीमा अब एक दशक से भी कम की रह गई है. ऐसे में प्रकटीकरण और रिपोर्टिंग से जुड़े तंत्र का विषम स्वरूप  सतत विकास के बुनियादी लक्ष्यों को निरंतर कमज़ोर कर रहा है. पर्यावरणीय, सामाजिक और वैश्विक (ईएसजी) अनुपालन के पीछे यही बुनियादी लक्ष्य शामिल हैं. 

बदलाव का भ्रम

ईएसजी निवेशों के लिए साल 2020 बेहद तेज़ी वाला और शानदार रहा. वैश्विक महामारी के चलते निवेशकों में बढ़ी जागरूकता से 2020 में ईएसजी फंड्स ने 51 अरब अमेरिकी डॉलर की विशाल रकम जुटाने में कामयाबी पाई. 2019 में ये रकम 21.4 अरब अमेरिकी डॉलर थी जबकि 2018 में तो सिर्फ़ 5.4 अरब अमेरिकी डॉलर ही इकट्ठा की जा सकी थी. राष्ट्रपति जो बाइडेन की अगुवाई वाले उदारवादी प्रशासन ने जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे पर पूरी शिद्दत से निगाह जमा रखी है. ऐसे में ईएसजी से जुड़ी भावनाओं को सिरे चढ़ने में भी मदद मिलेगी. बहरहाल, ईएसजी के समर्थन को लेकर इन दिनों सबसे अनुकूल परिस्थितियां नज़र आ रही हैं लेकिन क्या ये कहानी का केवल एक पहलू है?

जून 2020 में डॉड फ्रैंक एक्ट के तहत स्थापित इन्वेस्टर एडवाइज़री कमेटी ने चौंकाने वाले खुलासे किए थे. ये संस्था अमेरिकी सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) की तमाम कमेटियों में से एक है. इसका काम अमेरिकी बाज़ार नियंत्रक को उसकी प्रमुख निगरानी वरीयताओं, डिस्क्लोज़र इंटेग्रिटी, निवेशक सुरक्षा उपायों और दूसरे अहम हितों के बारे में सलाह देना है. ये तमाम प्रासंगिक किरदारों के समूह का प्रतिनिधित्व करती है. बाज़ार के तमाम भागीदारों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए इसने पाया कि ईएसजी विमर्श के बारे में एकीकृत मानकों के अभाव और टुकड़ों में बंटे रुख़ ने थर्ड-पार्टी इकाइयों के लिए अनुकूल माहौल मुहैया कराया है. मानदंडों में बढ़ोतरी, रिसर्च की  नामुनासिब मैथोडोलॉजी और हवा-हवाई तुलनाओं ने रिपोर्टिंग से जुड़े परिदृश्य में ख़ामियां पैदा कर दी हैं. इसकी वजह से ईएसजी के प्राथमिक विचार आसानी से छिटक कर निकल जाते हैं. 2019 में द जर्नल ऑफ़ अप्लायड कॉरपोरेट फ़ाइनेंस  ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें बाज़ार में फैली इन्हीं विसंगतियों का ज़िक्र किया गया था. ये आज प्रयोग में आने वाले ईएसजी मानकों की विश्वसनीयता को कमज़ोर करते हैं.

ज़ाहिर है कि वैश्विक ईएसजी मानकों को परिभाषित करने को लेकर तो गतिविधियां दिखाई दे रही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक और मोर्चे पर तत्परता से काम किए जाने की ज़रूरत है. दरअसल प्रयास ये होने चाहिए कि इस कथित ख़तरे से दशकों के प्रयास से हासिल प्रगति धूमिल न पड़े.

क्षितिज के पार उम्मीदें

वैसे ये किस्मत की बात है कि तमाम किरदारों के बीच इन बातों को लेकर बढ़ती आशंकाओं के चलते उनकी समझ में भारी इज़ाफ़ा हो रहा है. वो ईएसजी रिपोर्टिंग के विकेंद्रीकृत और संदिग्ध तौर-तरीक़ों के प्रति सचेत हो गए हैं. लिहाज़ा वैश्विक रूप से स्वीकार्य और मानकीकृत ईइसजी रिपोर्टिंग की मांग तेज़ हो गई है. सिंगापुर एक्सचेंज ने लिस्टेड इकाइयों द्वारा ईएसजी के प्रकाशनों पर एक सर्वेक्षण किया. इस सर्वे से सिक्योरिटी जारी करने वाली इकाइयों की कई सुस्पष्ट चिंताएं सामने आईं. ये चिंताएं ईएसजी से जुड़ी जोख़िमों के आकलन के मानदंडों और ढांचों के बारे में थी. ख़ासतौर से ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन से जुड़े मानदंडों को लेकर ये चिंताएं प्रमुख रूप से उभर कर सामने आईं.  इन रिपोर्टों से साबित होता है कि ख़तरों की ये परिकल्पनाएं पूरी तरह से वास्तविक हैं. इसके साथ ही इन चिंताओं को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास भी बेहद सकारात्मक रहे हैं. शायद इसी का नतीजा है कि पिछले साल इस मोर्चे पर काफ़ी प्रगति हुई.

द चार्टर्ड फ़ाइनेंसियल एनालिसिस इंस्टीट्यूट ने ईएसजी वित्तीय उत्पादों की व्याख्या और मानकीकरण की पड़ताल के लिए एक फ़ीज़िबिलिटी स्टडी की शुरुआत की. इसके तहत सतत या टिकाऊ विकास को लेकर संगठनों के प्रदर्शनों और मूल्य निर्माण के बीच के आंतरिक संबंधों को स्वीकार किया गया. इस पड़ताल में इकट्ठा हुए संगठनों में सतत विकास की रिपोर्टिंग करने वाले कई अग्रणी समूह शामिल हैं. इनमें कार्बन डिस्क्लोज़र प्रोजेक्ट (सीडीपी), द क्लाइमेट डिस्क्लोज़र स्टैंडर्ड्स बोस्ट (सीडीएसबी), द ग्लोबल रिपोर्टिंग इनिशिएटिव (जीआरआई), द इंटरनेशनल इंटीग्रल रिपोर्टिंग काउंसिल (आईआईआरसी) और द सस्टेनेबिलिटी अकाउंटिंग स्टैंडर्ड्स बोर्ड (एसएएसबी) शामिल हैं. देशों की सीमाओं से परे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व आर्थिक मंच की अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस परिषद दुनिया के चार विशालतम संगठनों (Deloitte, Ernst and Young, KPMG, and PwC) को एक मंच पर लेकर आई. इस  संगठित प्रयास का मकसद ईएसजी प्रदर्शनों के इर्द गिर्द कॉरपोरेट रिपोर्टिंग में तालमेल लाना और उनको कूट भाषा में तैयार करना है. इसी प्रकार इंटरनेशनल फ़ाइनेंसियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स फ़ाउंडेशन (आईएफआरएस फ़ाउंडेशन) ने भी टिकाऊ या सतत विकास के प्रयासों के तुलनात्मक और जुड़ाव वाले मानक तय करने की दिशा में पहल की है. इस पहल का मकसद ऐसे मानक तय करना है जो हर जगह स्वीकार्य और वैध हों.

ज़ाहिर है कि वैश्विक ईएसजी मानकों को परिभाषित करने को लेकर तो गतिविधियां दिखाई दे रही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक और मोर्चे पर तत्परता से काम किए जाने की ज़रूरत है. दरअसल प्रयास ये होने चाहिए कि इस कथित ख़तरे से दशकों के प्रयास से हासिल प्रगति धूमिल न पड़े. साथ ही ईएसजी की वक़ालत करने वाले प्रयास भी कमज़ोर न हों. कुल मिलाकर ये सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इस मोर्चे पर जो भी क़दम उठाए जाएं उनसे कोई न कोई अपेक्षित बदलाव हासिल हो.

वैसे तो ये व्यवहार्य है, लेकिन इसके लिए ज्ञान के हस्तांतरण और तकनीक के रूप में महत्वपूर्ण निवेश की ज़रूरत पड़ेगी. इसके साथ ही इलाक़ों की भू-राजनीतिक ख़ासियतों, आर्थिक हालातों और  सांस्कृतिक बारीकियों को भी मद्देनज़र रखना होगा. ईएसजी से जुड़े प्रकाशनों को दुनियाभर में विशेष संदर्भों में पेश किए जाने के लिए ये ज़रूरी है. 

वित्तीय अहमियतों के आरपार निगाहें

प्रासंगिक और समग्र स्वरूप वाले ईएसजी रिपोर्टिंग के साझा मानक तय करते समय हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि हमारी नज़र वित्तीय अहमियतों के पारंपरिक क्षेत्र से कहीं आगे टिकी हो. इस सिलसिले में मानकों को गरमागरम चर्चाओं वाले ‘दोहरी अहमियत’ के दायरे से गुज़रना होगा. इसमें न सिर्फ़ वित्तीय रूप से अहम मुद्दों में संगठन के दायित्वों की पहचान होती है, बल्कि समुदायों और समूची धरती को प्रभावित करने वाले मसलों की भी पड़ताल होती है. दूसरे, पैमानों के निर्माण और तुलनाओं को प्रभावी बनाने के लिए मानदंडों को सतत रूप से महत्वपूर्ण कई मानकों समेत सार्वभौम रूप से स्वीकार्य ईएसजी रिपोर्टिंग मेट्रिक्स के साथ मिलाना होगा. वैसे तो ये व्यवहार्य है, लेकिन इसके लिए ज्ञान के हस्तांतरण और तकनीक के रूप में महत्वपूर्ण निवेश की ज़रूरत पड़ेगी. इसके साथ ही इलाक़ों की भू-राजनीतिक ख़ासियतों, आर्थिक हालातों और  सांस्कृतिक बारीकियों को भी मद्देनज़र रखना होगा. ईएसजी से जुड़े प्रकाशनों को दुनियाभर में विशेष संदर्भों में पेश किए जाने के लिए ये ज़रूरी है.

अनुपालन की सहयोगपूर्ण संस्कृति

आज वक़्त का तकाज़ा है कि नियामक मंज़ूरियों, कॉरपोरेट इच्छापत्रों और सामाजिक  निगरानियों को एक ही छत के नीचे लाया जाए. अनुपालन को प्रोत्साहित करने और प्रगतिशील ईएसजी से जुड़ी संस्कृति सुनिश्चित करने के लिए इन्हें राष्ट्रों की सीमाओं से परे अंतरराष्ट्रीय इकाई के संरक्षण में आगे बढ़ाया जाना चाहिए. व्यापक-आधार पर ईएसजी का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए बारीक़ निगरानी ज़रूरी है. इतना ही नहीं तालमेल को बढ़ावा देने वाली समुचित उत्प्रेरक शक्ति पैदा करने के लिए संप्रभु नेतृत्व और वैधानिक तौर पर सहारा दिया जाना बेहद अहम है.

राष्ट्रीय सरकारें ईएसजी के अनुपालन को महज़ हरित-स्वरूप देने की प्रक्रियाओं से आगे बढ़ाने के लिए लक्ष्य तय करती हैं. साथ ही इसके लिए ज़रूरी सुविधाएं भी मुहैया कराती हैं. इसके ज़रिए इन प्रयासों को टिकाऊ भविष्य के लिए प्रदर्शन किए जाने योग्य और प्रामाणिक नतीजे की ओर ले जाया जाता है. 

मिसाल के तौर पर अमेरिका और यूरोप में जिस तरीके से ईएसजी संस्कृति को आगे बढ़ाया जा रहा है वो अनेक-किरदारों वाले मॉडल को सामने लाता है. हालांकि, यहां ये मॉडल स्थानीय स्वभाव वाला है. राष्ट्रीय सरकारें ईएसजी के अनुपालन को महज़ हरित-स्वरूप देने की प्रक्रियाओं से आगे बढ़ाने के लिए लक्ष्य तय करती हैं. साथ ही इसके लिए ज़रूरी सुविधाएं भी मुहैया कराती हैं. इसके ज़रिए इन प्रयासों को टिकाऊ भविष्य के लिए प्रदर्शन किए जाने योग्य और प्रामाणिक नतीजे की ओर ले जाया जाता है. ऐसी संस्कृतियों को अब सहायता और ज्ञान के हस्तांतरण के ज़रिए ऊंचा उठाने और वैश्विक स्तर पर संगठित करने की आवश्यकता है. इससे विकासशील देशों को एक तय समयसीमा के भीतर परिवर्तनों से गुज़रने में मदद मिलेगी. इस कड़ी में ये व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों से जुड़ी कामयाबी का किस्सा दोहरा सकती है. इस व्यवस्था के तहत सरकारें आईएलओ के सम्मेलनों में पारित प्रस्तावों को संसदीय मंज़ूरी देते हुए उनमें ज़रूरी वैधानिक सामंजस्य लाकर अपनी सरहदों के भीतर अमल में लाती है. सामाजिक-आर्थिक दायरे में कारोबार जगत सापेक्षिक नीतियों में बदलावों को संचालित करते हैं ताकि वो उनका अनुपालन सुनिश्चित कर सकें. इसमें सिविल सोसाइटी उनकी मदद करती है. दरअसल वो सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के लिए नैतिक मानदंड के तौर पर कार्य करती है.

निष्कर्ष

निश्चित तौर पर टिकाऊ भविष्य की ओर प्रभावपूर्ण तरीके से छलांग लगाने की सुविधआ मुहैया कराने वाला ईएसजी एक क्रांतिकारी साधन है. ईएसजी के ज़रिए ऐसे परिवर्तन की ओर मुड़ने की गारंटी हो जाती है. हालांकि खंडित प्रकाशनों की वजह से प्राथमिक तौर पर इसकी संभावनाओं और क्षमताओं की पूरी पड़ताल नहीं हो सकी है. बहरहाल एक ऐसी दुनिया में जहां अपरिवर्तनीय जलवायु बदलाव, आर्थिक विषमताएं और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं हक़ीक़त हैं, वहां निकम्मेपन और आत्मतुष्टि के लिए कोई जगह नहीं हो सकती. आज साझा और सद्भावनापूर्ण ईएसजी सिद्धातों को आगे बढ़ाने की सख़्त ज़रूरत है. इसके लिए उसी जोश और जज़्बे की दरकार है जो दुनिया ने मानव अधिकारों पर सार्वभौम घोषणापत्र को स्वीकारते वक़्त दिखाई थी. निश्चित तौर पर आज इस ओर क़दम उठाए जाने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.

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