टेलीमेडिसिन के ज़रिए मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे में काफी हद तक सुधार किया जा सकता है, अगर उचित नियमों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को सुनिश्चित किया जाए.

यह लेख इंडो-पैसिफिक में सतत विकास नामक हमारी श्रृंखला का हिस्सा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, टेलीमेडिसिन को स्वास्थ्य देखभाल की एक ऐसी वितरण व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, “जहां भौगोलिक दूरी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, और प्रत्येक स्वास्थ्यकर्मी इस व्यवस्था के अंतर्गत सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से निदान, उपचार, रोग और चोटों की रोकथाम, अनुसंधान, मूल्यांकन और स्वास्थ्यसेवा प्रदाताओं की शिक्षा जारी रखने जैसी सुविधाएं प्रदान करते हैं ताकि वैयक्तिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित किया जा सके.” टेलीमेडिसिन व्यवस्था अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बैठे विभिन्न उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य संसाधनों से जोड़ने के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करती है, ताकि मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे से जुड़ी भौगोलिक बाधाओं को दूर किया जा सके और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार लाया जा सके. हालांकि टेलीमेडिसिन की अवधारणा नई नहीं है, लेकिन कोरोना महामारी के कारण कई देशों में इसके उपयोग को बढ़ावा मिला है.
टेलीमेडिसिन व्यवस्था अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बैठे विभिन्न उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य संसाधनों से जोड़ने के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करती है, ताकि मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे से जुड़ी भौगोलिक बाधाओं को दूर किया जा सके और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार लाया जा सके.
पारंपरिक चिकित्सा की तुलना में टेलीमेडिसिन जैसी व्यवस्था से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण लाभ हैं: विशेषज्ञों तक आसान पहुंच, सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएं, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव वाले क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं का प्रसार, रोगाणुओं के संपर्क में आने का कम ख़तरा, और स्वास्थ्य ढांचे की लागत संबंधी खर्च में कटौती आदि. टेलीमेडिसिन एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य) लक्ष्य 3 हासिल करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपकरण सिद्ध हो सकता है, जो “प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों के स्वास्थ्य एवं उनकी खुशहाली को सुनिश्चित करने” से जुड़ा है. इसके अलावा, टेलीमेडिसिन के ज़रिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एसडीजी लक्ष्य 5: “लैंगिक समानता हासिल करना और सभी महिलाओं एवं लड़कियों को सशक्त बनाना”, एसडीजी लक्ष्य 10: “अलग-अलग देशों में आंतरिक एवं उनके बीच आपसी असमानता के स्तर में कमी लाना”, एसडीजी 12: “उपभोग के स्तर और उत्पादन के स्वरूप को संवहनीय बनाना”, एसडीजी 13: “जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों का सामना करने के लिये तत्काल कार्रवाई करना” भी हासिल किए जा सकते हैं.
टेलीमेडिसिन के ज़रिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एसडीजी लक्ष्य 5: “लैंगिक समानता हासिल करना और सभी महिलाओं एवं लड़कियों को सशक्त बनाना”, एसडीजी लक्ष्य 10: “अलग-अलग देशों में आंतरिक एवं उनके बीच आपसी असमानता के स्तर में कमी लाना”, एसडीजी 12: “उपभोग के स्तर और उत्पादन के स्वरूप को संवहनीय बनाना”, एसडीजी 13: “जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों का सामना करने के लिये तत्काल कार्रवाई करना” भी हासिल किए जा सकते हैं.
हालांकि ऐसे कई कारक हैं जो किसी देश में टेलीमेडिसिन के विकास को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन अनुकूल नियामकों की उपस्थिति इसके प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों ने विशेष रूप से महामारी के दौरान अपने स्वास्थ्य सेवा ढांचे के भीतर इसकी उपस्थिति को और मज़बूत बनाने और उसे बढ़ावा देने के लिए अनुकूल नियमों को लागू किया है. उदाहरण के लिए, भारत में, कोरोना महामारी से पहले टेलीमेडिसिन को वृहद स्तर पर लागू नहीं किया गया था और मार्च 2020 में उचित दिशानिर्देश के लिए
टेलीमेडिसिन प्रैक्टिस गाइडलाइंस लागू किए जाने से पहले इसे कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थी. ठीक इसी तरह, जापान ने महामारी के दौरान टेलीमेडिसिन सेवा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई नीतिगत फ़ैसले किए और स्वास्थ्य ढांचे को विनियमित किया.
वहीं दूसरी तरफ़ सिंगापुर इस क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता देश के रूप में उभरा है, जिसने 2015 में नेशनल टेलीमेडिसिन गाइडलाइंस के निर्माण, 2016 में सिंगापुर मेडिकल काउंसिल के एथिकल कोड और एथिकल गाइडलाइंस की धारा A6 में टेलीमेडिसिन को शामिल करने, 2017 में टेलीहेल्थ उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विज्ञान प्राधिकरण द्वारा नियामक दिशानिर्देशों के निर्माण और 2018 में लाइसेंसिंग एक्सपेरिमेंटेशन एंड एडेप्टेशन प्रोग्राम (एलईएपी) के शुभारंभ जैसे नीतिगत फ़ैसलों को लागू किया है. यहां तक कि सिंगापुर ने जनवरी 2020 में नई हेल्थकेयर सेवा अधिनियम को पेश किया, जिसके तहत 2022 तक टेलीमेडिसिन सेवा का लाइसेंस दिया जायेगा. इसके अलावा, महामारी के दौरान, मई 2020 में छोटे एवं मध्यम आकार के व्यवसायों (एसएमई) को सहायता प्रदान करने के लिए पूर्व-अनुमोदित टेलीकंसल्टेशन डिजिटल समाधानों का विस्तार किया गया. इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया में महामारी से पहले ही टेलीमेडिसिन क्षेत्र का विस्तार हो रहा था लेकिन एक प्रतिबंधित तरीके से. क्योंकि चिकित्सा लाभ योजना (मेडिकेयर बेनिफिट्स स्कीम) वीडियो–आधारित परामर्श सेवा के लिए विशेषज्ञों को बेहद सीमित भुगतान का प्रावधान करती थी. हालांकि, मार्च 2020 में, ऑस्ट्रेलिया की संघीय सरकार ने सार्वभौमिक टेलीमेडिसिन सेवा की शुरुआत की, जिससे इसका उपयोग काफी हद तक बढ़ गया. इसी तरह, अन्य देशों ने भी इस तेजी से उभरते हुए क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए नियमों में ढिलाई की है. इन देशों में टेलीमेडिसिन के विस्तार और उसको अपनाने के पीछे सामाजिक दूरी और तालाबंदी जैसे स्वास्थ्य-नियम ज़िम्मेदार हैं.
चूंकि टेलीमेडिसिन किसी राज्य, देश या अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से बाधित नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर आम अंतरराष्ट्रीय समझ विकसित करने की आवश्यकता है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिए इसे और सुगम बनाया जा सकता है. उदाहरण के लिए, भारत इस क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने और सुविधा प्रदान करने के लिए पैन-अफ्रीकी ई-नेटवर्क प्रोजेक्ट और साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन (सार्क) टेलीमेडिसिन नेटवर्क प्रोजेक्ट्स जैसी कई अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं का हिस्सा है. इसी तरह, भारत ने 2014 में टेलीमेडिसिन और टेली-एजुकेशन के लिए पैन पैसिफिक आइलैंड्स प्रोजेक्ट के विकास का भी प्रस्ताव रखा था. इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय संस्थागत पहलों की स्थापना की जा सकती है. उदाहरण के लिए जेआईपीएमईआर-बिम्सटेक टेलीमेडिसिन नेटवर्क (जेबीटीएन) जवाहरलाल स्नातकोत्तर
चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (जेआईपीएमईआर) और बिम्सटेक (बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिये बंगाल की खाड़ी पहल) के बीच एक नेटवर्क है.
इस तरह की पहलें चिकित्सा-उपचार में सहायता के लिए दूरसंचार के उपयोग की सुविधा प्रदान करने के साथ-साथ मोबाइल स्वास्थ्य कार्यक्रमों के उपयोग को बढ़ावा दे सकती हैं. इसके अतिरिक्त, अन्य हिंद-प्रशांत देशों में ज़मीनी स्तर पर जन-केंद्रित परियोजनाओं को लागू करने के लिए निजी कंपनियों को भी शामिल किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, निजी क्षेत्र के भारतीय अस्पताल समूह, अपोलो हॉस्पिटल्स, ने 2013 में फिजी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में एक टेलीमेडिसिन सुविधा केंद्र की स्थापना की थी.
चूंकि टेलीमेडिसिन किसी राज्य, देश या अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से बाधित नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर आम अंतरराष्ट्रीय समझ विकसित करने की आवश्यकता है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिए इसे और सुगम बनाया जा सकता है.
टेलीमेडिसिन क्षेत्र में भारत-प्रशांत के साथ-साथ दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे में काफी हद तक सुधार करने की क्षमता है. टेलीमेडिसिन के विकास के लिए एक व्यापक नियामक ढांचे को विकसित करने की आवश्यकता है. मौजूदा हालातों को देखते हुए तात्कालिक एवं दीर्घकालिक, दोनों तरह से टेलीमेडिसिन क्षेत्र की क्षमता के पूर्ण दोहन के लिए यह ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ-साथ सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों की सम्मिलित भागीदारी वाली परियोजनाओं या पहलों को विकसित किया जाए. इस तरह की पहलों को अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं का हिस्सा होना चाहिए ताकि अन्य देशों की संस्थाओं के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किया जा सके. टेलीमेडिसिन के ज़रिए मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे में काफी हद तक सुधार किया जा सकता है, अगर उचित नियमों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को सुनिश्चित किया जाए.
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Basu Chandola is an Associate Fellow. His areas of research include competition law, interface of intellectual property rights and competition law, and tech policy. Basu has ...
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