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ऑस्टिन ने अपने दौरे में साफ़ किया कि क्वॉड और उस जैसी दूसरी व्यवस्थाएं आसियान की केंद्रीय भूमिका के पूरक के तौर पर हैं न कि प्रतिस्पर्धी के तौर पर.
हाल ही में अमेरिका के रक्षा मंत्री लॉयड जे. ऑस्टिन III ने दक्षिण पूर्व एशिया के तीन देशों– सिंगापुर, वियतनाम और फ़िलीपींस की यात्रा पूरी की. निश्चित तौर पर इस दौरे से दक्षिण पूर्व एशिया और आसियान क्षेत्र को बाइडेन प्रशासन द्वारा दिया जा रहा महत्व उभर कर सामने आया. दरअसल ये इलाक़ा हिंद–प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नीतियों की बनावट का अभिन्न हिस्सा है. रक्षा मंत्री ऑस्टिन की यात्रा से ठीक पहले जुलाई के महीने में ही अमेरिका के उपविदेश मंत्री वेंडी शेर्मन ने भी इस क्षेत्र का दौरा किया था. ऑस्टिन की यात्रा को लेकर पेंटागन के प्रेस सेक्रेटरी जॉन एफ़ किर्बी ने एक बयान जारी किया. बयान के मुताबिक, “इस दौरे से इस इलाक़े के प्रति अमेरिका की स्थायी वचनबद्धता सामने आएगी. इस क्षेत्र में नियम–आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में हमारी दिलचस्पी का भी इज़हार होगा. इसके साथ ही आसियान की केंद्रीय भूमिका को भी बढ़ावा मिलेगा.” वियतनाम में ऑस्टिन ने वियतनामी रक्षा मंत्री से मुलाकात कर दक्षिण चीन सागर में सुरक्षा को और मज़बूत बनाने की वक़ालत की. ऑस्टिन ने वियतनाम के राष्ट्रपति के साथ भी बैठक कर द्विपक्षीय संबंधों की मज़बूती पर बल दिया. सिंगापुर में अमेरिकी रक्षा मंत्री ऑस्टिन ने इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ (आईआईएसएस) में एक व्याख्यान भी दिया. मनीला में विज़िटिंग फ़ोर्सेज़ एग्रीमेंट (वीएफ़ए) को लेकर चर्चाएं हुईं और समझौते की प्रगति का जायज़ा लिया गया. ग़ौरतलब है कि 1998 में नई वार्ता प्रक्रियाओं की बदौलत नए सिरे से तैयार समझौते पर अमेरिका और फ़िलीपींस की ओर से दस्तख़त किए गए थे.
दक्षिणपूर्वएशियाई देशों के नेताओं केमन मेंएक धारणा घर करती जा रही है. उन्हें लगता है कि भले ही उनका इलाक़ा महाशक्तियों के बीच कीप्रतिस्पर्धा और चीन की जंगी करतूतों का केंद्र बन गया हो लेकिन इसके बावजूद पूर्ववर्ती ट्रंपप्रशासन और मौजूदा बाइडेन प्रशासन में उनके इलाक़े को अनदेखा और नज़रअंदाज़ कियाजाता रहा है.
राष्ट्रपति बाइडेन की कैबिनेट के किसी सदस्य द्वारा इस इलाक़े का पहला दौरा बेहद महत्वपूर्ण है. दरअसल दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के नेताओं के मन में एक धारणा घर करती जा रही है. उन्हें लगता है कि भले ही उनका इलाक़ा महाशक्तियों के बीच की प्रतिस्पर्धा और चीन की जंगी करतूतों का केंद्र बन गया हो लेकिन इसके बावजूद पूर्ववर्ती ट्रंप प्रशासन और मौजूदा बाइडेन प्रशासन में उनके इलाक़े को अनदेखा और नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. इतना ही नहीं अमेरिकी नीतियों के प्रति दक्षिण पूर्व एशिया में अब भी संदेह का माहौल है. इन देशों को अब भी पक्के तौर पर ये भरोसा नहीं है कि अमेरिका इस इलाक़े के प्रति गंभीर है या नहीं. इन देशों को लगता है कि अमेरिका ने अपनी हिंद–प्रशांत नीति में ‘आसियान की केंद्रीय भूमिका‘ को अब भी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया है. ये बात ख़ासतौर से बाइडेन प्रशासन द्वारा क्वॉड्रिलेट्रल अलायंस (क्वॉड) को दी जा रही अहमियत के संदर्भ में लागू होती है. कई लोगों को मानना है कि क्वॉड की व्यवस्था ‘आसियान की केंद्रीय भूमिका‘ से दूर निकलने का जुगाड़ है. इतना ही नहीं, उन्हें ये भी लगता है कि क्वॉड के ज़रिए हिंद–प्रशांत के क्षेत्रीय ढांचे में आसियान का दबदबा कम करने की कोशिशें की जा रही हैं.
बाइडेन प्रशासन की दक्षिण पूर्व एशिया रणनीति अब तक खुले तौर पर सामने नहीं आई है. ख़ासतौर से इस इलाक़े से आर्थिक और व्यापारिक लेन–देन के साथ–साथ सैन्य जुड़ावों को लेकर अमेरिका के नए प्रशासन की सोच ज़ाहिर नहीं हुई है. यहां अमेरिकी रक्षा मंत्री ऑस्टिन के बयान का ही उदाहरण लिया जा सकता है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा है कि, “आप मुझे भागीदारियों और भागीदारियों से जुड़े नैतिक मूल्यों के बारे में काफ़ी कुछ बोलते हुए सुनेंगे. मेरा लक्ष्य रिश्तों में मज़बूती लाना है.” बहरहाल ऑस्टिन के दौरे से अमेरिका को दक्षिण पूर्वी एशियाई क्षेत्र को लेकर अपनी नीतियों और रणनीतियों को साफ़ करने का मौका मिला है. आसियान को अपने साथ लेना अमेरिका के नज़रिए से बेहद अहम है. ख़ासतौर से अमेरिका–चीन रिश्तों में बढ़ती प्रतिद्वंदिता के मद्देनज़र इस इलाक़े की अहमियत और बढ़ गई है. मौजूदा महामारी के दौरान चीन के साथ दक्षिण पूर्व एशिया के देशों का जुड़ाव बढ़ा है और दोनों के बीच के रिश्तों में क़रीबी आई है. 2017 में ट्रंप प्रशासन ने ट्रांस–पेसिफ़िक पार्टनरशिप (टीपीपी) से अपने हाथ खींचे लिए थे. सत्ता संभालने के बाद शुरुआती दिनों में राष्ट्रपति बाइडेन ने इन पहलों से दोबारा जुड़ने को लेकर अपनी सरकार का लक्ष्य ज़ाहिर किया था. हालांकि हक़ीक़त ये है कि इस मोर्चे पर अबतक कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पाई है. इन वजहों से दक्षिण पूर्व एशिया में अमेरिका के बारे में ग़लत संदेश जाता है. इन देशों को ऐसा लगता है कि अमेरिका का ध्यान केवल दक्षिण चीन सागर में चीन की अतिक्रमणकारी गतिविधियों पर ऊंगली उठाने और विवादित जल–क्षेत्र में गाहे–बगाहे फ़्रीडम ऑफ़ नेविगेशन ऑपरेशंस (एफ़ओएनओपी) को अंजाम देने में ही लगा है.
फिलीपींस के साथ एकजुटता दिखाने के मकसद से अमेरिकी विदेश विभाग ने जून 2021 में फिलीपींस को 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा मूल्य के सैन्य साजोसामान की संभावित बिक्री को मंज़ूरी दी थी. इनमें 10 लॉकहीड मार्टिन एफ़-16 लड़ाकू विमान भी शामिल हैं. ये सौदा फिलीपींस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
जैसा कि पहले बताया गया है पेंटागन द्वारा बयान में साफ़ तौर पर ‘नियम–आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था‘ का ज़िक्र किया गया. ऐसे में लाज़िमी तौर पर रक्षा मंत्री ऑस्टिन ने अपने दौरे में “दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रवैए की आलोचना करते हुए इस पूरे इलाक़े की आज़ादी और खुलापन बरकरार रखने” पर ज़ोर दिया. अमेरिका पहले से ही ताइवान के नज़दीक दक्षिण चीन सागर में एफ़ओएनओपी को अंजाम देता आ रहा है. हालांकि इसका चीन पर कोई ख़ास असर होता नहीं दिख रहा. अमेरिका दक्षिण पूर्व एशिया के तीन देशों सिंगापुर, वियतनाम और फिलीपींस के साथ सुरक्षा रिश्तों में नई गरमाहट लाना चाहता है. मनीला स्थित थिंक टैंक एशिया–पेसिफ़िक पाथवेज़ टू प्रोग्रेस की रिसर्च फ़ेलो और फ़िलीपींस काउंसिल फ़ॉर फ़ॉरेन रिलेशंस की सदस्य आरोन जेड राबेना ने ये बात रेखांकित की है. उनका कहना है कि सिंगापुर और वियतनाम का “अमेरिका के साथ राजनीतिक और रक्षा एजेंडे को लेकर क़रीबी तालमेल है.” हालांकि अमेरिका का सिंगापुर के साथ रक्षा के क्षेत्र में कोई औपचारिक करार नहीं है. इसके बावजूद अमेरिका के साथ सिंगापुर का मज़बूत रक्षा सहयोग और पहुंच से जुड़ा समझौता है. सिंगापुर नौसैनिक और हवाई परिसंपत्तियों में (प्रशिक्षण के लिए) अमेरिका को अहम पहुंच मुहैया कराता है. वियतनाम के साथ अमेरिका के रिश्ते भी काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं. वियतनाम आसियान के उन गिने–चुने देशों में से है जो दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रुख़ और चीनी द्वीपों के सुधार को लेकर मुखर रहे हैं. इतना ही नहीं, वियतनाम ने विवादित दक्षिण चीन सागर में चीनी हरकतों के मद्देनज़र विदेशी ताक़तों की मज़बूत उपस्थिति और सक्रिय भूमिका के विचार का समर्थन किया है. साफ़ है कि इस इलाक़े में सिंगापुर और वियतनाम राजनीतिक और सुरक्षा के मोर्चे पर अमेरिका के अहम भागीदार हैं.
फ़िलीपींस दक्षिण पूर्व एशिया का ऐसा देश है जो रक्षा के क्षेत्र में अमेरिका के सबसे पुराने सहयोगियों में से एक है. 1998 के विज़िटिंग फ़ोर्सेज़ एग्रीमेंट के तहत अमेरिकी फ़ौजी टुकड़ियों के साथ–साथ उनके वाहनों और साजोसामानों को फिलीपींस की सरहद में आने–जाने की छूट मिली हुई है. 2020 की शुरुआत में फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटेर्टे ने चीन के प्रति अपनी वफ़ादारी जताने और अमेरिका से अपना अलगाव दिखाने के लिए इस समझौते को रद्द करने की चेतावनी दी थी. बहरहाल, अमेरिकी रक्षा मंत्री की यात्रा के दौरान फ़िलीपींस की सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस करार को बहाल करने के अपने इरादे की घोषणा की. ज़ाहिर है इससे अमेरिकी फ़ौज को इस क्षेत्र में अपनी कार्रवाइयों को अंजाम देने में सहूलियत होगी. अमेरिका ने अपने स्तर से इस समझौते की बहाली या नवीकरण को लेकर डुटेर्टे की रज़ामंदी हासिल करने के लिए कोई कोर–कसर बाक़ी नहीं रखी थी. इसी कड़ी में फिलीपींस के साथ एकजुटता दिखाने के मकसद से अमेरिकी विदेश विभाग ने जून 2021 में फिलीपींस को 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा मूल्य के सैन्य साजोसामान की संभावित बिक्री को मंज़ूरी दी थी. इनमें 10 लॉकहीड मार्टिन एफ़-16 लड़ाकू विमान भी शामिल हैं. ये सौदा फिलीपींस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ग़ौरतलब है कि फिलीपींस के विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईज़ेड) के भीतर चीनी लड़ाकू दस्ते, कोस्ट गार्ड और नौसैनिक जहाज़ों की मौजूदगी दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है.
पिछले कई वर्षों से अमेरिकी रक्षा नीति के केंद्र में चीन का प्रतिवाद करने से जुड़ी रणनीति ही रही है. लिहाज़ा सुरक्षा और रक्षा से जुड़ी वार्ताएं अमेरिका के लिए हमेशा से ही अहम रही हैं. बाइडेन प्रशासन ने बीजिंग के साथ प्रतिस्पर्धा को “भू–राजनीति के क्षेत्र में सदी की सबसे बड़ी परीक्षा” करार दिया है. बहरहाल इन तमाम बातों के साथ–साथ अमेरिकी रक्षा मंत्री के दौरे में इस इलाक़े के साथ आर्थिक और व्यापारिक नीतियों पर ध्यान देकर नए सिरे से उनका खाका तैयार किए जाने पर भी ज़ोर दिया गया. नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के हिंद–प्रशांत को–ऑर्डिनेटर कर्ट कैंपबेल ने एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में हाल ही में कहा था कि, “एक प्रभावी एशियाई रणनीति के लिए, एक कारगर हिंद–प्रशांत रुख़ के लिए, आपको दक्षिण पूर्व एशिया में और ज़्यादा काम करना होगा.”
मौजूदा महामारी के दौर में आर्थिक और वैक्सीन की ज़रूरतों के लिए इन देशों की चीन पर निर्भरता और ज़्यादा बढ़ गई है. यहां की अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कोविड-19 की बड़ी मार पड़ी है. इस संकट से पार पाने के लिए इस इलाक़े में चीन को एक अनिवार्य साथी के तौर पर देखा जाने लगा है. वैसे तो चीन की बढ़ती ताक़त और आक्रामकता के प्रति इन देशों में चिंता भी है, लेकिन लगता है जैसे चीन से मिलने वाले आर्थिक और व्यापारिक फ़ायदों के मद्देनज़र ये चिंताएं हवा हो जाती हैं. क्वॉड नेताओं के शिखर सम्मेलन में वैक्सीन से जुड़ी कूटनीति का खाका तय करने पर चर्चा हुई थी. इसमें ये तय किया गया था कि वैक्सीन कूटनीति का प्रसार दक्षिण पूर्व एशिया तक किया जाएगा. इन बातों को सही ढंग से दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंचाने की दरकार है. रक्षा मंत्री ऑस्टिन ने वियतनाम दौरे में वहां के नेताओं के साथ कोविड-19 से निपटने पर सहयोग को लेकर अहम चर्चा की. ऑस्टिन के दौरे से पहले ही अमेरिका की ओर से वियतनाम को मॉडर्ना वैक्सीन की 50 लाख डोज़ मुहैया कराई जा चुकी थी. इन क़वायदों से इन देशों में अमेरिका के प्रति भरोसा मज़बूत करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा अमेरिका द्वारा समर्थित सहयोग की दूसरी व्यवस्थाओं जैसे क्वॉड के प्रति भी हिंद–प्रशांत क्षेत्र में विश्वास बढ़ेगा. अपने स्तर पर अमेरिका को भी क्वॉड सहयोगियों के साथ मिलकर दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं में फिर से जान फूंकने की योजना के लिए एक कार्यकारी समूह के साथ सामने आना चाहिए. इस प्रस्ताव के लिए क्वॉड देशों का समर्थन जुटाना कोई मुश्किल काम नहीं होगा. दरअसल क्वॉड से जुड़े तमाम देश हिंद–प्रशांत क्षेत्र से जुड़ी अपनी रणनीतियों में आसियान की केंद्रीय भूमिका पर ज़ोर देते रहे हैं. ऑस्टिन ने अपने दौरे में साफ़ किया कि क्वॉड और उस जैसी दूसरी व्यवस्थाएं आसियान की केंद्रीय भूमिका के पूरक के तौर पर हैं न कि प्रतिस्पर्धी के तौर पर.
वैसे तो चीन की बढ़ती ताक़त और आक्रामकता के प्रति इन देशों में चिंता भी है, लेकिन लगता है जैसे चीन से मिलने वाले आर्थिक और व्यापारिक फ़ायदों के मद्देनज़र ये चिंताएं हवा हो जाती हैं.
चीन द्वारा जलमार्गों, विशाल तटरक्षा क्षेत्रों और मछुआरा बेड़े के सैन्यीकरण के संदर्भ में अमेरिकी मौजूदगी और अमेरिकी एफ़ओएनओपी को लेकर आसियान देशों के रुख़ में अब भी आम राय नहीं है. निश्चित तौर पर अमेरिका को ये बात ध्यान में रखनी होगी. दक्षिण पूर्व एशिया को लेकर मौजूदा अमेरिकी रणनीति को अमेरिका के नज़रिए से और फ़ायदेमंद बनाने के लिए आर्थिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र (वैक्सीन कूटनीति) पर ज़्यादा ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. अगर टीपीपी में अमेरिका द्वारा फिर से प्रवेश करने को लेकर खुले तौर पर एक निश्चित समयसीमा के साथ कार्यक्रम तय कर दिया जाए तो ये अमेरिका की ओर से सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय क़दम होगा. इस बात को पूर्वी एशिया क्षेत्र के लिए पूर्व सहायक उप रक्षा मंत्री अब्राहम डेनमार्क ने सटीक तरीक़े से पेश किया है. उनके मुताबिक “चीन से प्रतिस्पर्धा को लेकर वॉशिंगटन अब तक तमाम तरह की उचित बातें करता आ रहा था. हालांकि वो कथनी को करनी में कैसे बदलेगा और निवेश कैसे सुनिश्चित करेगा, इसको लेकर कई सवाल उठाए जाते रहे हैं.” दक्षिण पूर्व एशिया में अमेरिका द्वारा सावधानी पूर्वक संतुलित रुख़ अपनाए जाने की ज़रूरत है. इसके तहत चीनी ख़तरों के बारे में खुले तौर पर और खरी–खरी बातें सामने रखने की नीति के साथ–साथ अमेरिका पर भरोसा बढ़ाने वाला संदेश भी स्पष्ट तौर पर पेश करना होगा. अमेरिका को ऐसी जुगत लगानी होगी कि दक्षिण पूर्वी एशिया के देश उस पर सैन्य और रक्षा के साथ–साथ आर्थिक भागीदारी के संदर्भ में भी भरोसा कर सकें.
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Premesha Saha was a Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. Her research focuses on Southeast Asia, East Asia, Oceania and the emerging dynamics of the ...
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