Author : Ramanath Jha

Published on Aug 01, 2023 Updated 0 Hours ago

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दुनिया के तमाम देशों और भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने के लिये कुछ सुझाव!
दुनिया के तमाम देशों और भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने के लिये कुछ सुझाव!

पिछले डेढ़ दशक में, उन देशों में जिन्हें लोकतांत्रिक सिद्धांतों का जामा ओढ़ने और लोकतान्त्रिक सरकार चलाने योग्य माना जाता था, वहाँ पर लोकतंत्र की गिरती गुणवत्ता चिंता का विषय बनती जा रही हैं. आश्चर्यजनक रूप से, इन वर्षों से पहले के हालात इसके
ठीक विपरीत थे. 1989 में, बर्लिन की दीवार ध्वस्त होने के बाद 1991 में सोवियत यूनियन का भी पतन हो गया. इन दोनों, के पतन के फलस्वरूप शीत युद्ध  का अंत हुआ और पूर्वी यूरोप में तानाशाही शासन का खात्मा हो चुका था. इन घटनाओं के प्रभाव काफी नाटकीय थे. उन्होंने ना सिर्फ़ पूर्वी यूरोप में, बल्कि अमेरिका के पूरे उपमहाद्वीप, उप- सहारा अफ्रीका, और एशिया में लोकतंत्रिकरण के ज्वार में तेज़ी लाई. 1988 से 2005 के बीच में दुनिया भर में स्वतंत्र देशों की भागीदारी 36 से बढ़कर 46 प्रतिशत  हो गई थी.

वैश्विक लोकतंत्र क्या ख़तरे में हैं?

दुर्भाग्यवश, 2005 के उपरांत साल दर साल  चिंतनीय रूप से, प्रख्य़ात वैश्विक लोकतान्त्रिक सर्वे (फ्रीडम हाउस की फ्रीडम इन द वर्ल्ड और द इकोनॉमिस्ट के द इकनॉमिक यूनिट डेमोक्रेसी इंडेक्स) द्वारा रिकार्ड किए गए सर्वेक्षण में,  वैश्विक स्वतंत्रता में गिरावट दर्ज की गई हैं. कई देशों में, राजनीतिक अधिकारों और नागरिक सुविधाओं में काफ़ी ख़तरनाक झटकों के साथ कमी आई है. आश्चर्यजनक ढंग से, वे देश जिन्होंने भारी गिरावट दर्ज़ की है, किसी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे कई उपमहाद्वीपों तक फैले हुए थे. उससे भी ज्य़ादा चिंताजनक तथ्य है कि मज़बूती से लंबे समय से सुचारू रूप चल रही लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देशों में भी एक अनदेखी लोकलुभावन राजनीतिक ताकतों  ने लोकतान्त्रिक शासन के स्थापित मूल्यों को बुरी तरह से हिला दिया था.

इन वैश्विक सर्वेक्षणों से व्यथित होकर, जहां वैश्विक स्तर पर विभिन्न लोकतान्त्रिक देशों ने इसे प्रजातांत्रिक राज्य व्यवस्था का प्रतिगमन समझा, पश्चिमी देशों के प्रमुख लेखकों और विचारकों ने इसकी वजहों को पहचानने की चेष्टा भी की है और लोकतान्त्रिक पतन के बढ़ते ट्रेंड को रोकने के लिए अपने विचार प्रस्तुत किए. 

इन प्रगति ने तानाशाहों में खुशी की लहर दौड़ा दी हैं. उन्होंने हर उन चीजों को चिन्हित करने का निर्णय लिया, जो उनकी नज़र में प्रजातंत्र की जन्मजात कमज़ोरियाँ थीं. इसने उन्हें आंतरिक असहमतियों का दमन करने का हौसला दिया, और सरहद के पार के देशों में उभरते तानाशाही के शासन को पुनः सहयोग देने का बल दिया. इन वैश्विक सर्वेक्षणों से व्यथित होकर, जहां वैश्विक स्तर पर विभिन्न लोकतान्त्रिक देशों ने इसे प्रजातांत्रिक राज्य व्यवस्था का प्रतिगमन समझा, पश्चिमी देशों के प्रमुख लेखकों और विचारकों ने इसकी वजहों को पहचानने की चेष्टा भी की है और लोकतान्त्रिक पतन के बढ़ते ट्रेंड को रोकने के लिए अपने विचार प्रस्तुत किए.

Democratic recession या ‘लोकतांत्रिक मंदी’ के महत्वपूर्ण कारक जो इन विचारकों ने सूचिबद्ध किए, और जिन्हें ‘पूंजीवाद के ज़रिये निगरानी’ कहा गया है. इस सर्विलांस कैपिटलिज़्म को निष्पादित गूगल, फेसबुक, एमेज़ॉन, माइक्रोसॉफ्ट और एप्पल जैसी प्रमुख और दिग्गज टेक्नॉलजी कंपनियां करती हैं जो मनुष्यों के सभी क्रिया-कलापों और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं और संचार सिस्टम संबंधी सूचनाओं को कंट्रोल करती हैं. और उसके बावजूद, वे देशों के न्यायिक व्यवस्था के प्रति काफी हद तक किसी भी ज़वाबदेही से परे हैं. ये देखने- समझने योग्य बात है कि जिस निगरानी केंद्रित समाज का जन्म और उद्भव हुआ है वो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विकास को लेकर काफी नुक़सानदेह साबित हो रहा है. इसके उपरांत, पश्चिम में श्वेत जनसंख्या के प्रतिशत में आयी गिरावट, और उसकी स्थान पर बड़े पैमाने पर अश्वेत लोगों के प्रवासन में दर्ज वृद्धि, नस्लीय धार के साथ पश्चिमी समाज में ध्रुवीकरण की आग को भड़का रही थी. इस बंटवारे की अग्नि को और हवा देने में इंटरनेट और सोशल मीडिया ने काफी अहम् और उल्लेखनीय भूमिका निभाई है, और दुर्भाग्यवश इसने समावेशी नागरिकता के विचार को पूरी तरह से तोड़ दिया.

लेखकों ने ये भी चेतावनी दी है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश द्वारा, ग़ैर-लोकतंत्रिक जोड़ को रोकने की किसी भी तरह का असंबद्ध प्रयास, काफी नहीं होगा. ये कोशिश पूर्ण रूप से निर्धारित एवं एकजुट होनी चाहिए, ताकि अगर किसी तानाशाही शासन द्वारा अगर किसी एक प्रजातांत्रिक देश पर आक्रमण हो तो, सम्पूर्ण लोकतान्त्रिक विश्व को आरोपी देश के खिलाफ़ दंडात्मक कार्यवाही करनी पड़ेगी, जिससे वो हमलावर देश को रोक सके 

इसके अलावा, वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए स्थापित की गई, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) जैसी वर्तमान वैश्विक संस्था में भी काफी कमियां पायी गईं, जिस कारण वे लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा कर पाने में असमर्थ पाये गये. ऐसी दुर्बल और लाचार स्थिति में, तानाशाही शासन व्यवस्थाओं द्वारा चुनाव, सरकारी अधिकारियों के काम-काज में अनावश्यक दख़ल, और आक्रामक निवेश के ज़रिए संघर्षरत लोकतंत्र का अवैध शिकार करने का दुस्साहस किया जाता रहा और उसका उन्मुक्त प्रदर्शन भी किया जा रहा है. लोकतंत्र में बढ़ती असमानता और युवाओं में खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर निर्णय लेने की विकृत प्रक्रिया की वजह से भी मोहभंग हो रहा है. जिस वेग से तानाशाह फ़ैसला लेकर उसे लागू करते हैं, उससे लोकतांत्रिक दुनिया के युवा वर्ग में,समाजवाद के प्रति प्रशंसा के भाव उत्पन्न कर दिए हैं.

समाधान की तलाश में…

समाधान की तलाश में, लेखकों ने ये भी चेतावनी दी है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश द्वारा, ग़ैर-लोकतंत्रिक जोड़ को रोकने की किसी भी तरह का असंबद्ध प्रयास, काफी नहीं होगा. ये कोशिश पूर्ण रूप से निर्धारित एवं एकजुट होनी चाहिए, ताकि अगर किसी तानाशाही शासन द्वारा अगर किसी एक प्रजातांत्रिक देश पर आक्रमण हो तो, सम्पूर्ण लोकतान्त्रिक विश्व को आरोपी देश के खिलाफ़ दंडात्मक कार्यवाही करनी पड़ेगी, जिससे वो हमलावर देश को रोक सके और आक्रमण झेल रहे देश को, सकारात्मक सहयोग की मदद द्वारा सुरक्षा प्रदान कर उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें.

चौकानें वाली रिपोर्ट तो एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की है जहां ये पता चला कि 2009 में लोकसभा के कुल 543 में से 76 सांसदों पर हत्या, बलात्कार और डकैती जैसे जघन्य आरोप लगे हुए थे. राज्यों की स्थिति भी कमोबेश इससे बेहतर नहीं हैं. 

इसके अलावे, देशों के कानूनी व्यवस्था में बदलाव करते हुए, कानून को पुनःलिखा जाना चाहिए, ताकि सूचना के संचार के ऊपर कॉरपोरेट के कंट्रोल को ख़त्म किया जा सके. उन्हे बिज़नेस और राजनीति में एक कट्टरपंथी पारदर्शिता भी लागू करना चाहिए, और उनका सख्त़ी से पालन किया जाना चाहिए. लेखक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि अगर पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया, भ्रष्ट पैसों के बहाव को बंद करने हेतु इच्छुक नहीं है तो, लोकतंत्र हमेशी पीड़ित ही बनी रहेगी. ऐसी नीति जो ज्य़ादा से ज्य़ादा नागरिकों तक आर्थिक समृद्धि पहुंचा सके और उनकी सामाजिक इज्ज़त में इज़ाफ़ा हो सके, उदार लोकतंत्र में ऐसी ही नीतियों को सुनिश्चित किया जाना चाहिए. लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को इंटेलिजेंस ग्रेड सॉफ्टवेयर और अन्य टेक्नॉलजी जो कि जासूसी और हैकिंग सिस्टम को प्रायोजित करती हैं, ऐसे सभी कमर्शियल मार्केट से बाहर निकाल जाना चाहिए. उन्हें किसी भी ऐसी कंपनियों को लोकतांत्रिक देशों में अत्याचार के प्रमुख समर्थक और कारक के रूप में काम करने से रोका जाना चाहिए.

भारतीय लोकतंत्र को ख़तरा

वैश्विक चिंता के तौर पर लोकतंत्र के स्वास्थ्य के परिप्रेक्ष्य में, उन ख़तरों को देखा जाना सार्थक कदम होगा जो भारतीय लोकतंत्र को सता रही हैं. ऐसे कई ख़तरे जिसका सामना विश्व के दूसरे लोकतांत्रिक देश कर रहे हैं, उसका सामना भारत भी किसी हद तक कर रहा है. भारत सरकार की वैश्विक संचार संस्थानों के संग की हालिया वार्ता इस दिशा में एक केस है. भारतीय संचार व्यवस्था द्वारा सामना किए जाने वाली चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में, भारतीय कानून व्यवस्था को निस्संदेह एक गंभीर चिंतन, निरीक्षण और कसे जाने की ज़रूरत हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल में और ज़िम्मेदारियों का संपोषण किया जाना आवश्यक हैं. समावेशी नागरिकता के संदर्भ में और भी काम किए जाने की ज़रूरत हैं. किसी अन्य देशों की तुलना में भारत में सामाजिक मुद्दों की विभिन्नता अतुलनीय हैं. इनमें से कुछ को तो लंबे समय से अप्राप्य छोड़ दिया गया है. किसी नियत समय तक इन मुद्दों को सुलझा लिया जाना आवश्यक होगा और उन्हें सड़ने से भी रोका जाना होगा. देश के भीतर घट रहे दो बेहद अप्रिय घटनाक्रम काफी महत्वपूर्ण हैं. देश के लोकतंत्र पर पड़ने वाले इनके प्रभाव काफी चिंता का विषय हैं. पहली है राजनीति का अपराधीकरण. एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान लोकसभा में लगभग 50 प्रतिशत वाले सासंद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेता हैं. इससे 2009 के उपरांत घोषित आपराधिक केस वाले लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़कर 44 प्रतिशत हो गई है. इससे भी ज्य़ादा चौकानें वाली रिपोर्ट तो एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की है जहां ये पता चला कि 2009 में लोकसभा के कुल 543 में से 76 सांसदों पर हत्या, बलात्कार और डकैती जैसे जघन्य आरोप लगे हुए थे. राज्यों की स्थिति भी कमोबेश इससे बेहतर नहीं हैं. ये एक काफ़ी खतरनाक चलन है, चूंकि राजनीति का अपराधीकरण लोगों का अपने प्रतिनिधियों के साथ किसी भी प्रकार के सार्थक जुड़ाव और संवाद की संभावना को ख़त्म कर देता है और लोकतंत्र से उनका मोहभंग हो जाता है. किसी अच्छे लोकतांत्रिक शासन के जड़ पर प्रहार करता है. इस दुख़द स्थिति को फिर दयनीय न्यायिक प्रक्रिया, लंबित कानूनी मामले और दोष सिद्धि के इर्द गिर्द कमजोर कानून और जनप्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने से रोकने को और भी प्रोत्साहित करती है.

चंद वैश्विक चिंताओं को उठाए जाने के अलावा, भारत को अपनी आंतरिक दुर्बलताओं पर काम करने की आवश्यकता है, ताकि वो अपने सालों पुराने लोकतंत्र की गुणवत्ता की रक्षा कर सके.   

दूसरा है चुने गए जनप्रतिनिधियों द्वारा, अपने प्रमुख उत्तरदायित्वों के निर्वाहन और संसद एवं राज्य असेंबली में बेहतर समय बिताने को लेकर उनका उदासीन रवैया. आशा की जाती हैं कि वे उन मुद्दों का अध्ययन करेंगे और फिर उस पर अपनी आवाज़ भी उठायेंगे, जो देश और राज्य के लिए बेहतर होगी. बिलों को ड्राफ्ट करते वक्त़ उन पर विचार-विमर्श के करने का साथ उचित समय एवं ध्यान दिया जाना चाहिए, जो कि दुर्भाग्यवश तरीके से पिछले दशक में देखा गया है कि राज्य विधानसभाओं में सालाना, मात्र  30 सिटिंग का ही अनुपात रहा है, जिसमें कि दिल्ली, पंजाब और हरियाणा और उनका अनुसरण करते हुए आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य मुख्य रूप से दोषी पाए गए हैं. लोकसभा का रिकार्ड भी कोई बहुत बेहतर नहीं था.

पिछले दशक में, वहाँ भी मात्र 63 प्रतिशत सिटिंग  ही हो पायी है. साफ़-तौर पर, कानून संबंधी किसी भी मुद्दे पर समुचित ध्यानाकर्षण नहीं हो पा रहा है जैसा कि होना चाहिए. जिसके फलस्वरूप, कानुन अधिनियम की गुणवत्ता में से एक कारक, जिसका भारत के प्रमुख न्यायाधीश ने अपने उल्लेख में वर्णन किया था, वो पूर्णतयाः मिट गया है. ये भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता में गिरावट को इंगित करता हैं जो शुभ संकेत नहीं दे रहा है. चंद वैश्विक चिंताओं को उठाए जाने के अलावा, भारत को अपनी आंतरिक दुर्बलताओं पर काम करने की आवश्यकता है, ताकि वो अपने सालों पुराने लोकतंत्र की गुणवत्ता की रक्षा कर सके.

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Ramanath Jha

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Dr. Ramanath Jha is Distinguished Fellow at Observer Research Foundation, Mumbai. He works on urbanisation — urban sustainability, urban governance and urban planning. Dr. Jha belongs ...

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