जल प्रशासन को जो पुराना तरीका था, उसने संघर्ष को बढ़ावा दिया. ऐसे में बेसिन इलाके में एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के ज़रिए हम 2024 के विश्व जल दिवस की ‘वॉटर फॉर पीस’ थीम का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं.
ये लेख निबंध श्रृंखला विश्व जल दिवस 2024: शांति के लिए जल, जीवन के लिए जल का हिस्सा है.
इस साल विश्व जल दिवस की थीम है 'वॉटर फॉर पीस'. इस थीम से ये साबित होता है कि वैश्विक स्तर पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में पानी की भूमिका कितनी अहम है. पीने के पानी की कमी, जल प्रदूषण, जल का असमान वितरण और नदियों के बहने की दिशा की वजह से पानी को लेकर अलग-अलग स्तरों पर विवाद पैदा होता रहता है. पानी एक अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है, इसलिए इस पर नियंत्रण के लिए वैश्विक से लेकर स्थानीय स्तर तक कई बार संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. संघर्ष तब और गंभीर हो जाता है जब नदियां एक देश से दूसरे देश में बहती हैं. ये तय करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि पानी पर किसका अधिकार होगा. इसे कौन इस्तेमाल करेगा. खास बात ये है कि सीमा पर करने वाली नदियों पर होने वाला ये विवाद देशों के स्तर पर ही नहीं होता. कई बार एक ही देश के अलग-अलग राज्यों या छोटे-छोटे समुदायों में भी इसे लेकर विवाद पैदा होता है. आजकल तो पानी को लेकर विवाद की स्थिति भौगोलिक और क्षेत्रीय सीमाओं को भी पार कर गई है. ज़ाहिर है पानी को लेकर पैदा होने वाली चुनौतियां बहुत जटिल हैं. पानी को लेकर जो सबसे नया विवाद सामने आया है वो ये कि कितना पानी इंसानी ज़रूरतों पर खर्च हो और कितना पानी प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बचाए रखने में इस्तेमाल किया जाए. ये चुनौती अब इसलिए और गंभीर हो गई है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की वजह से कई नदियों के प्रवाह की दिशा बदल रही है. इससे पारिस्थितिकी तंत्र तो प्रभावित हो ही रहा है साथ ही पीने के पानी और सिंचाई के पानी समेत जल से जुड़ी दूसरी सेवाओं पर भी असर पड़ रहा है. ज़ाहिर सी बात है कि पानी को लेकर जिस तरह संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है उसे देखते हुए विश्व जल दिवस के लिए 'वॉटर फॉर पीस' से बेहतर कोई और थीम नहीं हो सकती है. लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हम सबको मिलकर काम करना होगा. जो पानी मौजूद है उसके सही इस्तेमाल को लेकर बिल्कुल नए तरीके से सोचना होगा.
पानी की कमी या दुर्लभता शब्द में ही पानी को लेकर होने वाला संघर्ष जुड़ा है. दुनिया में पहले से ही पीने लायक पानी की कमी है. पानी का वितरण भी असमान है. यही वजह है कि पानी को लेकर होने वाले इस खेल में किसी को फायदा होता है तो किसी को घाटा. पानी की ये असमानता उन क्षेत्रों में साफ दिखती है जहां जल स्रोत प्रचुर मात्रा में होते हैं और जहां अक्सर सूखा पड़ता है. पानी में कमी के ये हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब किसी इलाके की जनसंख्या अचानक बढ़ जाती है. आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं. तेज़ी से औद्योगिकीकरण और शहरीकरण होता है. जहां तक पानी को लेकर दो देशों के बीच होने वाले विवाद की बात है तो जल स्रोतों में जो स्वभाविक बदलाव होते हैं, उससे ये तय करना मुश्किल हो जाता है कि पानी पर किस देश का अधिकार होगा. कई मामलों में नदी के प्रवाह की दिशा भी विवाद पैदा करने में और पानी पर अधिकार तय करने में अहम भूमिका निभाती है.
आजकल तो पानी को लेकर विवाद की स्थिति भौगोलिक और क्षेत्रीय सीमाओं को भी पार कर गई है. ज़ाहिर है पानी को लेकर पैदा होने वाली चुनौतियां बहुत जटिल हैं.
अगर नदी से प्रवाह की दिशा के आधार पर पानी पर अधिकार तय करने की बात करें तो इसे लेकर तीन तरह की व्यवस्थाएं हैं. हिस्ट्री, हारमोन और हॉब्स. हारमोन सिद्धांत के मुताबिक "अगर पानी मेरी छत पर गिरता है तो फिर उस पर मेरा अधिकार है". हारमोन व्यवस्था के तहत उस देश का फायदा होता है जहां जलस्रोत का उद्गम स्थल होता है. अगर हिस्ट्री सिद्धांत की बात करें तो इसमें पानी पर उसका अधिकार माना जाता है, जो पहले इसका इस्तेमाल करता है. फिर चाहे जलस्रोत का उद्गम स्थल कोई भी देश हो. हॉब्स सिद्धांत के मुताबिक जो भी राज्य या देश उस नदी के तट पर होते हैं, वो सभी आपसी बातचीत से पानी पर अधिकार तय करते हैं. पानी की कमी के जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव होते हैं. इससे जो संघर्ष की स्थिति पैदा होती है उसने प्रोफेशनल्स और शोधकर्ताओं को पानी के सही इस्तेमाल के नए तौर-तरीकों पर विचार करने पर मजबूर किया है. वैश्विक स्तर पर भी इसे लेकर एक नई बहस शुरू हुई है. पानी के पारम्परिक स्रोतों से नए स्रोतों में आने की बात की जा रही है. इसे लेकर ऐसे तरीके खोजे जा रहे हैं जो नए भी हों. दीर्घकालीक और स्थायी भी हों
पानी की कमी को लेकर नया माल्थुशियन सिद्धांत जल संसाधन को एक बिल्कुल नए तरीके से देखता है. इस सिद्धांत के तहत पानी को एक ऐसे संसाधन के तौर पर देखा जाता है, जिसे इक्ट्ठा करके रखा जा सकता है और इंसान की ज़रूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जा सकता है. पानी के प्रशासन के जो पारम्परिक तरीके हैं, उसे अमूमन अर्थेमेटिक हाइड्रोलॉजी (अंकगणितीय जल विज्ञान) के तौर पर पेश किया जाता था. इसे अर्थेमेटिक हाइड्रोलॉजी इसलिए कहते हैं क्योंकि इसके तहत पानी की कमी की समस्या को सिर्फ नंबरों तक सीमित कर दिया जाता है. प्रकृति से हमें लगातार ये संकेत मिल रहे हैं कि सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि दूसरे प्राकृतिक संसाधन भी धीरे-धीरे कम हो रहे हैं. इससे इंसानों के बीच तो संघर्ष बढ़ेगा ही, साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचेगा. लेकिन जिस बात पर अभी तक कम चर्चा हुई है, वो ये है कि इंसान अपने अल्पकालिक फायदों के लिए जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ कर रहा है, विकास के नाम पर जिस तरह प्राकृतिक जल चक्र में बदलाव लाने की कोशिश कर रहा है, उसके दूरगामी नतीजे बहुत नुकसानदायक होंगे. यानी इससे हमें शुरूआत में भले ही कुछ आर्थिक लाभ हों लेकिन भविष्य में ये लोगों के जीवन पर बुरा प्रभाव डालेगा. इससे प्राकृतिक परिस्थिति तंत्र भी खराब होगा.
पानी की कमी के जो सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव होते हैं. इससे जो संघर्ष की स्थिति पैदा होती है उसने प्रोफेशनल्स और शोधकर्ताओं को पानी के सही इस्तेमाल के नए तौर-तरीकों पर विचार करने पर मजबूर किया है.
हालांकि, साइमन डाल्बी ने माल्थुशियन सिद्धांत पर ये कहते हुए सवाल उठाए कि प्राकृतिक संसाधनों में कमी से संघर्ष होने को लेकर कोई सामाजिक-वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं. कोपेनहेगन स्कूल के शोधकर्ताओं ने भी माल्थुशियन सिद्धांत पर व्यापक रिसर्च करने के बाद इसकी आलोचना की है. हालांकि, प्राकृतिक संसाधनों में कमी से होने वाले संघर्ष के सबूत हमें कई बार दिखते हैं. बिहार में गंगा में आने वाली बाढ़ को लेकर विवाद पैदा होता है. असम की ब्रह्मपुत्र नदी में कई बार ज़रूरत से ज्यादा पानी हो जाता है और फिर कभी पानी की कमी की विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न होती है. ऐसे में जल प्रशासन के पारम्परिक मानक यहां लागू नहीं किए जा सकते क्योंकि चुनौतियों का स्वरूप बदलता रहता है. इसने पानी के क्षेत्र में काम कर रहे प्रोफेशनल्स और शोधकर्ताओं को जल प्रशासन के ऐसे नए तौर-तरीकों पर काम करने पर मजबूर किया, जो पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दे.
अब दुनिया भर में इस बात पर व्यापक सहमति बन गई है कि अगर नदी या किसी जलस्रोत के एक छोर पर इंसान कोई कार्रवाई करता है तो उसके गंभीर प्रभाव नदी के दूसरे छोर पर, नदी घाटी के पारिस्थितिक तंत्र पर दिखेंगे. इसके नुकसान देखने के बाद अमेरिका और यूरोपीयन यूनियन ने अपने यहां बांधों पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी. यहां तक कि पानी के प्रवाह को बनाए रखने के लिए संस्थागत कोशिशें और कई तरह के उपकरणों का इस्तेमाल किया जाने लगा है.ऑस्ट्रेलिया में मुर्रे-डार्लिंग बेसिन प्राधिकरण ने एक अनूठा प्रयोग किया है. मुर्रे-डार्लिंग बेसिन में एक जल बाज़ार यानी वॉटर मार्केट बनाया गया है, जिसके ज़रिए खेती का काम करने वालों को ये बताया जाता है कि वो कम पानी में अधिकतम सिंचाई क्षमता कैसे हासिल करें. ये स्थायी जल प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण है. पानी को लेकर अनिश्चितता की स्थिति को कम करने के लिए दिसबंर 2019 में कैलिफॉर्निया के शिकागो मर्केन्टाइल एक्सचेंज में वॉटर डेरिवेटिव्स का कारोबार शुरू किया गया.
बिहार में गंगा में आने वाली बाढ़ को लेकर विवाद पैदा होता है. असम की ब्रह्मपुत्र नदी में कई बार ज़रूरत से ज्यादा पानी हो जाता है और फिर कभी पानी की कमी की विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न होती है. ऐसे में जल प्रशासन के पारम्परिक मानक यहां लागू नहीं किए जा सकते क्योंकि चुनौतियों का स्वरूप बदलता रहता है.
अगर पानी की व्यवस्था को सुधारना है तो बेसिन के पारिस्थितिकी तंत्र को जल प्रशासन की केंद्रीय ईकाई के तौर पर अहमितय देना ज़रूरी है. काम का आधार एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) होना चाहिए. आईवीआरएम के बाद अगला चरण एकीकृत नदी बेसिन प्रशासन (IRBG) का होगा. हालांकि आईवीआरएम और आईआरबीजी को लेकर कोई ठोस नियम या कानून नहीं बने हैं लेकिन इस नई रूपरेखा की व्यवस्था निम्नलिखित प्रकार की हो सकती है.
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Dr Nilanjan Ghosh heads Development Studies at the Observer Research Foundation (ORF) and serves as the operational and executive head of ORF’s Kolkata Centre. He ...
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