मालदीव में सितंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों पर शायद अनिश्चितता की तलवार लटक गई है. क्योंकि, अपने ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे संसद के स्पीकर मोहम्मद नशीद ने चुनाव आयोग के नए सदस्यों का चुनाव करने के लिए संसद सत्र को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया. ख़ुद मालदीव के चुनाव आयोग में भी इसके अध्यक्ष फवाद तक़फ़ीक़ के ख़िलाफ़ 3-2 से गतिरोध बना हुआ है. अब ये ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह या फिर मालदीव के सुप्रीम कोर्ट पर आ पड़ी है कि वो इन दोहरे गतिरोधों को ख़त्म करने की पहल करें. ख़ास तौर से इसलिए और क्योंकि नशीद ने, 87 सदस्यों वाली संसद में अपने 13 वफ़ादार सांसदों के समूह में शामिल होने के लिए सत्ताधारी मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) का साथ औपचारिक तौर पर छोड़ दिया है. नशीद समर्थक सांसदों ने कुछ हफ़्ते पहले ‘दि डेमोक्रेट्स’ के नाम से एक नई पार्टी बनाई है. नशीद के साथ एक और सांसद के MDP छोड़ने के बाद, 87 सदस्यों वाली संसद में ‘दि डेमोक्रेट्स’ के सांसदों की संख्या 15 हो गई है.
नशीद समर्थक सांसदों ने कुछ हफ़्ते पहले ‘दि डेमोक्रेट्स’ के नाम से एक नई पार्टी बनाई है. नशीद के साथ एक और सांसद के MDP छोड़ने के बाद, 87 सदस्यों वाली संसद में ‘दि डेमोक्रेट्स’ के सांसदों की संख्या 15 हो गई है.
नशीद सबसे लंबे वक़्त तक MDP के अध्यक्ष रहे हैं, और वो मालदीव के दूसरे ऐसे नेता हैं, जिन्हें अपनी स्थापित की हुई पार्टी को उस वक़्त छोड़ना पड़ा जब वो पार्टी को भीतर से नियंत्रित करने का अपना मुख्य लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहे. पार्टी के अध्यक्ष और आर्थिक विकास मंत्री फय्याज़ इस्माइल ने कहा कि नशीद के छोड़ने के बाद अब पार्टी आगे बढ़ सकती है.
अगर इतिहास के पन्नों में झांकें, तो मालदीव के इतिहास में सबसे लंबे समय यानी 30 साल तक राष्ट्रपति रहे मौमून अब्दुल ग़यूम (1978-2008), जिन्हें मोहम्मद नशीद ने ही 2008 में देश के पहले बहुदलीय चुनावों में हराया था, ने धिवेही रायथुंगे पार्टी (DRP) को पहले छोड़ा था, और उसके बाद उन्होंने प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (PPM) बनाई थी, उसे भी उन्हें कोर्ट के फ़ैसले के बाद, अपने सौतेले भाई, अब्दुल्ला यामीन के हाथों गंवाना पड़ा था, क्योंकि दोनों के बीच मतभेद हो गए थे.
दस साल के भीतर मौमून अब्दुल गयूम ने मौमून रिफॉर्म मूवमेंट (MRM) के नाम से तीसरी पार्टी बनाई थी. एक समय में वो MPD के सहयोगी रहे थे. हालांकि, जब दूसरे सांसद उनके साथ आ गए तो, राष्ट्रपति सोलिह ने MRM के जूनियर मंत्री को बर्ख़ास्त कर दिया था. वहीं, मौमून अब्दुल गयूम के हाथ से ये तीसरी पार्टी भी निकल गई है. क्योंकि न्यूनतम तीन हज़ार सदस्य न होने के कारण वो निचली अदालत में पार्टी की मान्यता रद्द करने का मुक़दमा चुनाव आयोग से हार गए थे. चुनाव आयोग ख़ुद भी एक विवाद में फंसा हुआ है. क्योंकि उसके पांच में से चार मौजूद सदस्यों ने 2:2 के अनुपात में मतदान करके दि डेमोक्रेट्स नाम से नई पार्टी दर्ज करने की गुज़ारिश ख़ारिज करने के बजाय, उसमें देरी करने पर मुहर लगाई. चुनाव आयोग ने तीन महीने के समय के भीतर पार्टी की सदस्यता की पुष्टि करने की शर्त में भी रियायत देने से इनकार कर दिया. आम तौर पर पार्टियों को तीन महीने में सदस्यता की पुष्टि कराने की शर्त से छूट दे दी जाती है. लेकिन, जब दि डेमोक्रेट्स के नेताओं ने चुनाव आयोग के सामने धरना दिया, तो चुनाव आयोग ने ये रियायत देने से इनकार कर दिया.
मालदीव का ये संसदीय संकट तब शुरू हुआ, जब MDP डिप्टी स्पीकर ईवा अब्दुल्ला के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई, क्योंकि ईवा अब्दुल्ला ने पार्टी छोड़ दी थी. इसके कुछ हफ़्तों बाद, MDP ने स्पीकर मोहम्मद नशीद के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया, जबकि वो पार्टी के अध्यक्ष थे. ये दोनों अविश्वास प्रस्ताव तब आए, जब ‘नशीद के सांसदों’ और विपक्षी दलों ने मिलकर विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद और अटॉर्नी जनरल इब्राहिम रिफ्फत के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. इन दोनों पर आरोप है कि उन्होंने
‘चागोस मसले’ पर मालदीव का समुद्री क्षेत्र मॉरीशस के हवाले कर दिया, वो भी उस वक़्त जब, हाल ही में दशकों पुराने इस विवाद पर UNCLOS-ITLOS का फ़ैसला आने वाला था.
चुनाव आयोग ने तीन महीने के समय के भीतर पार्टी की सदस्यता की पुष्टि करने की शर्त में भी रियायत देने से इनकार कर दिया. आम तौर पर पार्टियों को तीन महीने में सदस्यता की पुष्टि कराने की शर्त से छूट दे दी जाती है.
चूंकि, MDP अपने साथ मुद्दों पर आधारित 54-60 सांसदों के समर्थन का दावा कर रही थी, ऐसे में विपक्ष के अविश्वास प्रस्तावों का गिर जाना और MDP के प्रस्तावों की जीत होना तय था. स्पीकर के तौर पर मोहम्मद नशीद ने इसमें दो पेंच और जोड़ दिए, जब उन्होंने बहुमत के नेता मोहम्मद असलम के कहने पर अपने ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर वोट और डिप्टी स्पीकर ईवा के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव को तब तक के लिए स्थगित कर दिया, जब तक संसद समितियां नए समीकरणों के हिसाब से गठित न हो जाएं. मुहम्मद असलम ने इस क़दम का भी विरोध किया.
जब उनके पुराने नामांकित सदस्य हसन अफ़ीफ़ ने स्पीकर और डिप्टी स्पीकर की ग़ैरमौजूदगी में लगातार तीन बैठकों की अध्यक्षता की अनिवार्य शर्त पूरी कर ली, तो नशीद अपने ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव से ख़ुद को अलग रखने के फ़ैसले से भी मौजूदा सत्र के आख़िरी दिन पलट गए. उस दिन संसद में संसदीय समिति में प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा हो रही थी. अब इस पर मतदान, अगस्त के मध्य में होने वाले अगले सत्र में होने की संभावना है. जब बहुमत के नेता मोहम्मद असलम और MDP के दूसरे सांसदों ने संसदीय समितियों के गठन जैसे संसद के अहम कामकाज को निपटाने के लिए सत्र को आगे बढ़ाने की मांग की तो, नशीद ने फ़ैसला दिया कि ये तो स्पीकर का विशेषाधिकार है. संसदीय समितियों के पुनर्गठन के साथ ही चुनाव आयोग का भी पुनर्गठन होना है.
जब नशीद ने देखा कि संसद का बहुमत उनके ख़िलाफ़ है, तो उन्होंने अपना आधिकारिक निवास ख़ाली कर दिया है. क़ानून के मुताबिक़, 6 मई 2021 को एक बम हमले के बाद, सुरक्षा कारणों से नशीद को सरकारी आवास मिला हुआ था, और उन्होंने संभवत: स्पीकर का पद भी नहीं छोड़ा है. उसके बाद से MDP संसदीय दल ने संसद के आपातकालीन सत्र को बुलाने की मांग की है. बहुमत के नेता असलम ने कहा है कि वो नशीद और ईवा अब्दुल्ला के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव वापस नहीं लेंगे. वहीं, राष्ट्रपति के कार्यालय ने कहा है कि नशीद इस्तीफ़ा दे भी देते हैं तो मजलिस को अपना काम करते रहना चाहिए. हालांकि, नशीद की मंज़ूरी के बग़ैर ये कैसे हो सकेगा, ये देखना बाक़ी है. क्योंकि, तकनीकी तौर पर नशीद अभी भी स्पीकर बने हुए हैं. मालदीव के संविधान निर्माताओं को भी एहसास नहीं fरहा होगा कि देश में ऐसे भी हालात पैदा हो सकते हैं.
ये एक आदर्श त्रिशंकु की वाली अवस्था है. संसद और चुनाव आयोग में गतिरोध एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. ऐसे में जब भी मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, तो चुनाव आयोग से आम सहमति से प्रतिक्रिया देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है. आने वाले समय में एक स्थिति ये बन सकती है कि राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह इन संकटों को आगे बढ़ने से रोकने और इनका समाधान निकालने के लिए सियासी पहल करें. इससे राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना औपचारिक रूप से जारी हो सकती है और पहले से से तय तारीख़ यानी 23 जुलाई से राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन शुरू हो सकता है. फिर 9 और 30 सितंबर को दो चरणों में चुनाव भी हो सकते हैं. दूसरे चरण की ज़रूरत तभी पड़ेगी, जब पहले राउंड में किसी भी उम्मीदवार को आधे से ज़्यादा वोट नहीं मिलते हैं.
इन विवादों के बीच, विपक्षी PPM-PNC गठबंधन के नेताओं ने अपने कूटनीतिक प्रयासों के तहत, कनाडा के हाई कमिश्नर एरिक वाल्श से मुलाक़ात की और उन्हें मौजूदा सियासी हालात की जानकारी दी. एक ट्वीट में उन्होंने शिकायत की कि वो संसद में दाख़िल नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि वहां ताला लगा है. इसके अलावा, विपक्षी गठबंधन ने देश के सशस्त्र बलों से कहा कि वो आगे आकर देश को नियंत्रित करें.
वहीं, इससे अलग मगर बेहद प्रासंगिक अपील में राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह ने मालदीव के राष्ट्रीय सुरक्षा रक्षा बलों (MNDF) की 131वीं सालगिरह पर उन्हें संबोधित करते हुए कहा कि वो देश की एकता की हिफ़ाज़त करें और सुरक्षा को मज़बूत बनाएं. विपक्षी नेता अब्दुल्ला यामीन गुट के अब कमज़ोर या ख़त्म की जा चुकी ‘इंडिया आउट’ मुहिम और साझा विपक्ष के मॉरीशस के साथ समुद्री सीमा विवाद को लेकर आशंकाओं की ओर इशारा करते हुए, राष्ट्रपति सोलिह ने कहा कि, ‘स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा, दूसरे देशों के साथ कूटनीतिक संबंध मज़बूत बनाने पर निर्भर है.’ विपक्षी दल राष्ट्रपति को संसद में तलब करने का इरादा रखते हैं, ताकि उनसे मॉरीशस के साथ सीमा विवाद पर सफ़ाई मांग सकें.
संसद और चुनाव आयोग में गतिरोध एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. ऐसे में जब भी मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, तो चुनाव आयोग से आम सहमति से प्रतिक्रिया देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है.
जेल में बंद राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार अब्दुल्ला यामीन के वकीलों ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल के ख़िलाफ़ एक मामले में सरकार ने निचली अदालत में ‘बदनीयती से काम किया’ और अब्दुल्ला यामीन के पुराने बयानों का ‘अपने हिसाब से इस्तेमाल किया’. उस मामले में निचली अदालत ने अब्दुल्ला यामीन को 11 साल क़ैद की सज़ा सुनाई है, जिससे वो चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए हैं. उस मामले में यामीन ने सरकार के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया था.
हालांकि, हाई कोर्ट ने नौ दिनों की बकरीद की छुट्टी शुरू होने से पहले सुनवाई को फास्ट ट्रैक करने और सारी बहस पूरी करने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया. इत्तिफ़ाक़ से एक निचली अदालत में भी ऐसा ही एक मामला विचाराधीन है, जहां राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन ख़त्म होने से पहले अगर अब्दुल्ला यामीन को सज़ा हो जाती है, तो फिर हाई कोर्ट से उन्हीं किसी तरह का फ़ायदा होने की उम्मीद ख़त्म हो जाएगी. 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत का फ़ैसला पलट दिया था और अब्दुल्ला यामीन को उनके राष्ट्रपति कार्यकाल (2013-2018) के दौरान भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के पहले के तीन मामलों में बरी कर दिया था.
अब्दुल्ला यामीन को राष्ट्रपति चुनाव के लिए पर्चा दाख़िल कर सकने के लिए, नामांकन की तारीख़ से पहले हाई कोर्ट से बरी होना होगा और इसके साथ साथ निचली अदालत में सज़ा पाने से बचना होगा. राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह, अब्दुल्ला यामीन के गठबंधन PPM-PNC के नेताओं से मिलने से दो बार इनकार कर चुके हैं. बाद में उन्होंने कहा था कि वो यामीन के साथ जेल में टॉर्चर की अपनी शिकायतें लेकर संबंधित अधिकारियों से मिल सकते हैं. सरकार के निर्देश पर पुलिस बलों द्वारा विपक्ष पर अत्यधिक बल प्रयोग की शिकायत पर भी राष्ट्रपति ने उन्हें संबंधित अधिकारियों से मिलने की सलाह दी थी.
अगर यामीन को समय पर राहत नहीं मिल पाती और उन्हें नामांकन करने का मौक़ा नहीं मिलता है, तो अगर विपक्षी दलों के पास किसी और नेता को अपना उम्मीदवार बनाने का मौक़ा है, तो कम से कम अभी तो PPM-PNC ने इस पर खुलकर परिचर्चा करने से परहेज़ किया है. गठबंधन के एक सदस्य को तब अपनी पार्टी छोड़नी पड़ी थी, जब उन्होंने मेयर और इस्लामिक विद्वान मुहम्मद मुइज्ज़ू के विपक्षी उम्मीदवार बनने संभावना ज़ाहिर की थी. फिर भी विपक्षी दलों ने दावा किया कि अगले चुनाव में सत्ता उन्हीं के हाथ में होगी और उनका पहला क़दम ‘उन चोरों के पासपोर्ट ज़ब्त करना होगा, जिन्होंने देश को तबाह कर डाला है.’
इस दौरान, राष्ट्रपति चुनाव के लिए इस वक़्त मैदान में यामीन समेत जो चार उम्मीदवार हैं, उनमें से एक कर्नल (रिटायर्ड) मोहम्मद नाज़िम ने संविधान के तहत बने भ्रष्टाचार निरोधक आयोग के उस फ़ैसले को ख़तरा बताया है, जिसमें उनके ख़िलाफ़ करोड़ों डॉलर के ‘पर्यटन प्रोत्साहन घोटाले’ की जांच का आदेश दिया गया है. कर्नल नाज़िम पर ये घोटाला करने का इल्ज़ाम तब लगा था, जब वो अब्दुल्ला यामीन की सरकार में रक्षा मंत्री थे. बाद में उन्हें बर्ख़ास्त करके जेल भेज दिया गया था. जम्हूरी पार्टी (JP) के संस्थापक और उम्मीदवार गासिम इब्राहिम और स्वतंत्र प्रत्याशी उमर नासिर, दोनों ने कहा है कि वो दूसरी पार्टियों के समर्थन के बिना भी चुनाव मैदान में डटे रहेंगे. उमर नासिर, अब्दुल्ला यामीन की सरकार में गृह मंत्री रहे थे.
वैसे तो ‘दि डेमोक्रेट्स’ ने शुरुआत से ही अपना एक प्रत्याशी मैदान में उतारने का ऐलान किया था. लेकिन, MDP छोड़ने के बाद से नशीद ने अब तक इस बात की पुष्टि नहीं की है कि वो राष्ट्रपति चुनाव में उतरेंगे या नहीं. चूंकि, अभी चुनाव आयोग ने दि डेमोक्रेट्स को एक नई पार्टी के तौर पर दर्ज करने से इनकार कर दिया है, तो ये देखना होगा कि क्या वो स्वतंत्र रूप से प्रत्याशी उतारेंगे. मौजूदा संकट और जटिलताओं को देखते हुए एक आशंका ये भी जताई जा रही है कि आगे चलकर वैसा ही संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है, जैसा 2013 के राष्ट्रपति चुनावों के दौरान हुआ था. उस वक़्त सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग एक दूसरे के आमने सामने थे. मौजूदा हालात में मुक़ाबला भले ही दूसरों के बीच हो, लेकिन बुनियादी मसले तो जस के तस हैं.
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N. Sathiya Moorthy is a policy analyst and commentator based in Chennai. ...
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