Published on Aug 16, 2022 Updated 0 Hours ago

भारत को सही मायनों में स्वतंत्र होने के लिए व्यवस्थागत परिवर्तनों की बहुत ज़रूरत है.

देश की स्वाधीनता के 75 वर्ष: बेहतर भविष्य पर नज़र!

ट्विटर हैंडल के माध्यम से देश के जन सामान्य तक अपनी बात पहुंचाने के अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को किया जाने वाला संबोधन, उनके लिए बड़े स्तर पर अपने विचारों और योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने का साधन है. उनकी भाषण शैली लोगों का ध्यान खींचने वाली, इतिहास का उदाहरण देने वाली और विस्तार से बात रखने वाली होती है. यह उस अवसर के तो अनुकूल होती है, लेकिन इसमें असल मुद्दे पीछे रह जाते हैं और कोरी बयानबाजी, बड़ी-बड़ी बातें ही सामने आती हैं.

उदाहरण के लिए वित्त मंत्री के वार्षिक बजट भाषण के विपरीत, ऐसा प्रधानमंत्री के भाषण में कही गई बातों को गहराई से नहीं समझने के कारण हो सकता है. लेकिन ऐसा करना ठीक वैसे ही होगा, जैसे कि किसी विषय को पूरी तरह से नकार देते वक़्त उसके अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को ख़ारिज़ कर दिया जाए. जबकि होना यह चाहिए कि बेकार बातों को भूलकर अच्छी बातों पर गौर करना चाहिए. प्रधानमंत्री के तौर पर पूरे कार्यकाल के दौरान स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए उनके भाषण, उनकी सोच में हो रहे लगातार परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं. वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री मोदी का भाषण, जहां तमाम तरह के उपदेशों से भरा हुआ था, वहीं वर्ष 2015 से 2017 तक के उनके भाषणों में घरेलू मुद्दों को लेकर चिंता और उन पर ठोस कार्रवाई की प्रतिबद्धता नज़र आ रही थी. जबकि वर्ष 2018 से 2021 के भाषण में उन्होंने अपनी सोच का दायरा काफ़ी बढ़ा लिया और वर्ष 2047 यानी आजादी के 100 वर्षों तक के लक्ष्यों का ना सिर्फ बखान किया, बल्कि उन लक्ष्यों को पूरा करने के उपायों पर ज़ोर भी दिया.

देखा जाए तो पिछले तीन साल काफ़ी जबरदस्त रहे हैं. वर्ष 2019 तक भारत-चीन सहयोग की गर्मजोशी कम हो गई. एशिया के दो दिग्गज देश पारस्परिक अलग-अलग उद्देश्यों और परिस्थितियों को समझते हुए अलग रास्ते पर चल पड़े. सीमा पर तनाव और झड़पों के साथ-साथ व्यापार में जैसे को तैसा वाली प्रतिशोध की भावना (समानांतर रूप से मुद्रास्फीति बढ़ना) वाले टैरिफ उपाय ‘पश्चिमी गठबंधन’ के साथ भारत के दोबारा सहयोग की वजह बन गए. इसके अगले दो वर्ष 2020 और 2021 कोविड- 19 महामारी की भेंट चढ़ गए. सरकार ने बढ़ते राजकोषीय घाटे (वित्त वर्ष 2021 के दौरान जीडीपी का 9.2 प्रतिशत) के बावज़ूद जन कल्याण के लिए खुलकर ख़र्च किया. यह राजकोषीय घाटा इस वित्तीय वर्ष में 6.4 प्रतिशत के उच्च स्तर पर बना हुआ है. चालू वित्त वर्ष (2022) में भी राजकोषीय घाटे का यही हाल है. भारत ज़्यादातर ईंधन (कोयला, तेल और गैस) और खाद्य तेल के कारण आयातित मुद्रास्फीति को लेकर अतिसंवेदनशील है. ज़ाहिर है कि ईंधन का निर्यातक नहीं होने की वजह से यूक्रेन संकट के बाद से भारत वस्तुओं के क़ीमत में बढ़ोतरी से प्रभावित है.

नए क़दमों और निर्णयों की पड़ताल

शुरुआत में देखा जाए तो कई झटकों का सामना करना पड़ा. पहला झटका था, नोटबंदी का फ़ैसला, जिसने वृद्धि को प्रभावित किया. नोटबंदी को बिना सोचे समझे भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के हथियार के तौर पर लागू किया गया था. इसका श्रेय लेने के लिए सरकार ने सिस्टम में अधिक प्रभावी उपायों को जोड़कर कई कदम उठाए, जैसे आधार से जुड़े भुगतान के डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू करना, जिससे कर चोरी करना मुश्किल हो गया. इसके साथ ही वर्ष 2021 में मौजूदा फर्मों के लिए कॉर्पोरेट कर दरों को लगभग 25 प्रतिशत और नई फर्मों के लिए 15 प्रतिशत तक कम करने के बावज़ूद कर राजस्व में उछाल आया है.

वर्ष 2017-18 के बाद से वास्तविक विकास का स्तर निरंतर कम होता रहा है, जो कि रोजगार सृजन, आय और निजी निवेश प्रवाह के लिए चिंता की वजह है. फिर भी महामारी से जुड़ी आर्थिक मंदी से उबरने में भारतीय अर्थव्यवस्था का तुलनात्मक लचीलापन हाल के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों से स्पष्ट होता है. नीचे दी गई तालिका में 38 में से चुनिंदा नौ अर्थव्यवस्थाओं, जिनके आंकड़े उपलब्ध हैं, उनकी रिकवरी को दिखाया गया है. इस सूची में मिस्र, ईरान, पाकिस्तान, पोलैंड और तुर्किये[1] को शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि इन देशों ने वर्ष 2020 में कोई बड़ी मंदी का अनुभव नहीं किया था. लेकिन इस सूची में चीन और कोरिया शामिल हैं, ये दोनों ही लोकप्रिय तुलनात्मक अर्थव्यवस्था नहीं थे. रिकवरी इंडेक्स वर्ष 2019 की जीडीपी को आधार बनाता है और वर्ष 2023 तक हर अगले साल के लिए एकत्र किए गए वृद्धि के आंकड़ों को जोड़ता है (2022 और 2023 के लिए आईएमएफ अनुमान).

 

भारत वर्ष 2019 से 2022 (15.6 प्रतिशत जोड़कर) के मध्य वास्तविक जीडीपी में सबसे तेज़ रिकवरी दिखाता है, वो भी दक्षिण अफ्रीका (6.3 प्रतिशत) के साथ 2020 में जीडीपी (-6.6 प्रतिशत) में अधिकतम कमी दर्ज़ करने के बावज़ूद. इसका श्रेय, विकास के प्रति संवेदनशीलता और स्थानीय स्तर पर बेहतर तरीके से किए गए महामारी प्रबंधन, कृषि में निरंतर प्रगति और उच्च विकास दर, आर्थिक परेशानियों से बचाने के लिए देश में व्यापक स्तर पर की गई ग़रीबों की मदद, मांग में स्थिरता और कम ब्याज दरों पर ऋण उपलब्धता सुनिश्चित करने वाली उदार आर्थिक नीति को दिया जाना चाहिए.

‘अच्छी’ नौकरियों का अकाल

देश में पर्याप्त रोज़गार सृजन की कमी से निराशाजनक स्थित लगातार बनी हुई है, ज़ाहिर है कि धीमी वृद्धि इसकी एक बड़ी वजह है, क्योंकि नया निवेश ठहर गया है. अंतिम उपाय के रूप में सरकार को खाली पदों को खंगालना पड़ा और इस वर्ष अपनी एजेंसियों और विभागों के भीतर लंबे समय से रिक्त पड़े और संभवत: गैरज़रूरी 10 लाख पदों को भरना पड़ा. और यह सब पिछले चार वर्षों में कृषि सेक्टर के काफ़ी अच्छे प्रदर्शन के बावजूद करना पड़ा है. हालांकि, इनमें से कुछ पद संरचनात्मक और अपेक्षित भी हैं. वर्ष 1945 के बाद अच्छी नौकरियों में विस्तार की बड़ी वजह सरकारी तंत्र में दक्षता और कुशलता को बढ़ाना था. जबकि 1980 के दशक के बाद डिजिटिलीकरण के साथ उत्पादों और सेवाओं में नवाचार ने वैश्विक स्तर पर वित्त, पर्यटन, व्यापार और श्रम के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के मुताबिक़ नौकरियों में वृद्धि दर्ज़ की गई.  

हालांकि, अब ऐसी अनुकूल और बेहतर स्थिति नहीं है. वैश्विक स्तर पर विकास और व्यापार दोनों धीमे हो रहे हैं. इससे सबसे बुरी तरह प्रभावित भारत जैसी निम्न और निम्न-मध्यम-आय वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिन्होंने अपनी जनसंख्या की ज़रूरतों के अनुरूप विकास बनाए रखने के लिए ना तो पूंजी भंडार किया और ना ही दक्ष मानव बल तैयार किया. सुरक्षा और व्यापार से संबंधित अवरोध विकास की गति को बाधित करते हैं, लेकिन ये ‘सक्रिय’ और आज़मायी हुईं आर्थिक नीतियों के तौर पर राजनीतिक दृष्टि से आकर्षक हैं. ब्रेक्ज़िट सांकेतिक व्यावहारिकता को अलगाव में बदलने का एक अच्छा उदाहरण है.

जनसांख्यिकीय प्रवृत्ति

हमारी प्रति व्यक्ति आय निम्न-मध्यम-आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए 4255 अमेरिकी डॉलर (विश्व बैंक एटलस पद्धति) की ऊपरी सीमा की सिर्फ़ आधी है. इसका लाभ यह है कि जब तक वर्ष 2050 तक हमारी अर्थव्यवस्था का आकार बढ़कर सभी कामगारों को समायोजित करने लायक नहीं जाता, नौकरी के लिए विदेश जाने का एक रास्ता खुला रह सकता है. वैश्विक मांग के अनुरूप कौशल विकसित करने के लिए हमें सिस्टम में बड़े बदलाव करने की ज़रूरत है.

इसके लिए सबसे पहले, पाठ्यक्रमों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के हिसाब से तैयार किया जाए. अभी हमारे पाठ्यक्रम तकनीकी आवश्यकताओं पर ज़्यादा केंद्रित हैं और पूरी तरह व्यावहारिक उपयोगों के मुताबिक़ नहीं हैं. विज्ञान, प्रौद्योगिकी, गणित और संचार के उद्देश्य के लिए बुनियादी विदेशी भाषाओं को मिलाकर बने एक पूरे पैकेज को लेकर पुनर्विचार करने और इसे भविष्य की नौकरियों के अनुसार तैयार करने की आवश्यकता है.

दूसरा, भारत में 20 यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सिलेंस हैं, जो ना केवल अपने स्वयं के पाठ्यक्रम निर्धारित करने और शिक्षा के तरीकों को अपनाने के लिए अधिकृत हैं, बल्कि छात्रों को अच्छी नौकरियों के लिए तैयार करती हैं. ऐसे में सरकार की तरफ से वित्तपोषित हमारे स्कूल, प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय एडवांस इकोनॉमिक्स के नामी संस्थानों के साथ सहयोग और सर्टिफिकेशन प्राप्त करके ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं? शिक्षा के क्षेत्र में नवाचारों को प्रोत्साहित कर, प्रबंधन की स्वायत्तता को बढ़ाकर और अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी को बढ़ावा देकर सरकार कम ख़र्च और लागत में शैक्षिक परिणामों में अपेक्षित सुधार कर सकती है.

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमारे कार्यस्थलों में, दफ़्तरों में महिलाओं की संख्य न के बराबर है. 90 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में केवल महिलाओं का एक-पांचवां हिस्सा (25 से 59 आयु वर्ग के लोग) काम चाहता है. जहां तक प्रजनन दर की बात है, तो वर्ष 2021 में हमारी कुल प्रजनन दर 2.2 रही है, जो बच्चा जनने वाले समूहों में प्रति महिला 2.1 बच्चे के वैश्विक टीएफआर की ओर घट रही है. ज़ाहिर है कि अगर अधिक संख्या में महिलाएं काम करेंगी, तो इसमें तेज़ी से गिरावट आ सकती है और ऐसा होना भी चाहिए.

लोक सेवा में महिलाओं के लिए आरक्षण नीति में आमूल-चूल परिवर्तन काफ़ी वक़्त से लंबित है. निजी क्षेत्र के लिए लैंगिक संवेदनशीलता को लागू करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन (कर छूट) का और भी बड़ा प्रभाव होगा, क्योंकि सरकारी नौकरियों की तुलना में निजी सेक्टर में रोज़गार कहीं अधिक हैं. हाल ही में 9 अगस्त को महाराष्ट्र कैबिनेट के 20 मंत्रियों ने शपथ ली थी, लेकिन शर्मनाक बात यह है कि उनमें एक भी महिला नहीं थी. यह साबित करता है कि एक प्रगतिशील राज्य को भी लैंगिक समानता लाने के लिए अभी कितना कुछ करना बाकी है.

इस सबके साथ ही हमें अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को भी बरक़रार रखने की ज़रूरत है. क्या हमें अधिक उम्र होने से पहले ही उच्च-मध्यम आय वाली श्रेणी में नहीं पहुंच जाना चाहिए? हालांकि भारत में प्रति एक हज़ार जीवित जन्म में से पांच वर्ष से कम आयु में मरने वालों की संख्या 28 है, जो वर्ष 2021 के वैश्विक औसत 37 की तुलना में बेहतर है. लेकिन यह संख्या श्रीलंका में 7, वियतनाम में 16 और बांग्लादेश में 22 की तुलना में कहीं अधिक है, यानि हम इस मामले में इन देशों से पिछड़ रहे हैं. पोषण को लेकर एक समन्वित तरीके से किए गए प्रयासों (जैसे कि पिछले वर्ष फोर्टिफाइड चावल की घोषणा की गई) और लक्षित जन स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से अगले दो दशकों में कामगारों की उपलब्धता सुनिश्चित करने वाले बच्चों के समूहों को संरक्षित किया जा सकता है. ऐसा प्रजनन दर में वांछनीय कमी का लक्ष्य हासिल करने के साथ किया जा सकता है. यह हमारे जनसांख्यिकीय लाभांश को बढ़ाता है. 

लोक शक्ति

पिछले वर्ष प्रधानमंत्री ने गति शक्ति की शुरुआत की, यह योजना सभी साइलोस में बुनियादी ढांचे की योजना बनाने और कार्यान्वयन को एकीकृत करती है. राजनीतिक शक्ति भी इस तरह की परिस्थितियों से ग्रस्त है. स्थानीय निकाय- जहां वार्ड पार्षद और पंचायत सदस्य 25 करोड़ परिवारों में से सबसे ग़रीब परिवारों के सीधे संपर्क में हैं, वे सरकार का एक अलग हिस्सा बने रहें, वो भी शक्तियों या वित्त के अधिकारों के साथ. मुंबई जैसी नगर पालिकाओं द्वारा कोविड-19 के दौरान लोगों का जीवन बचाने और ज़रूरी इंतजाम करने के लिए फंडिंग और संस्थागत अभियानों के कुशल संचालन का उदाहरण प्रस्तुत किया गया था. 

लोक जनशक्ति यानी नागरिकों को प्रेरित करने की क्षमता, यह अनुभव स्थानीय निकाय से ही हासिल होता है. वर्तमान लोकसभा के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़, एक तिहाई से भी कम सदस्यों के पास इस प्रकार का अनुभव है. ऐसे में स्थानीय निकाय प्रशासन के अनुभव को फिर से अहमियत क्यों नहीं दी जाए? जनता से दूर हो चुके जनप्रतिनिधियों को विधायक या सांसद के रूप में चुनाव लड़ने के लिए स्थानीय निकाय में एक निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में तीन साल कार्य करने की पूर्व योग्यता को क्यों ज़रूरी नहीं किया जाता और इसे अनिवार्य बनाने के लिए संविधान संशोधन क्यों नहीं किया जाता?

सशक्त स्थानीय निकायों और निर्वाचित मेयरों से अतिरिक्त स्थानीय राजस्व की क्षमता पर विचार किया जाना चाहिए. भारत में संपत्ति कर से मिलने वाला राजस्व, जीडीपी का 0.16 से 0.24 प्रतिशत (आईसीआरआईईआर 2011) अनुमानित था. आईएमएफ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में यह दर जीडीपी (2015) की सिर्फ 0.01 प्रतिशत है. वियतनाम 0.04 प्रतिशत (2015) और इंडोनेशिया 0.35 प्रतिशत (2018) संपत्ति कर एकत्र करता है. चीन ने संग्रह 0.15 प्रतिशत (2005) से बढ़ाकर 1.4 प्रतिशत (2019) कर लिया है. भारत के स्थानीय निकाय केवल संपत्ति कर संग्रह को जीडीपी के 0.35 प्रतिशत के इंडोनेशिया के स्तर तक ले जाकर, पांच वर्षों में 15वें वित्त आयोग द्वारा व्यवस्थाओं के पुनर्निमाण के लिए आवंटित 1.21 ट्रिलियन रुपये से अधिक की रकम हासिल कर सकते हैं.

बेंगलुरू ने संपत्ति कर से होने वाली राजस्व की आय को तीन गुना कर लिया (1996-2001), लेकिन इस वृद्धि का केवल एक तिहाई ही मकान मालिकों ने भुगतान किया. दो-तिहाई राजस्व बेहतर भूमि और भवन रिकॉर्ड प्रबंधन, मूल्यांकन और संग्रह से आया.

निवेश, विकास और सरकारी राजस्व में तभी सुधार हो सकता है, जब सरकार के सभी तंत्र जनादेश का पालन करने के लिए सशक्त हों, साथ ही उन्हें कार्य करने की पूरी आजादी मिले और जवाबदेही भी हो. भारत आगे बढ़ रहा है, लेकिन समय भी आगे बढ़ रहा है. ऐसे में हमें यह दिखाना है कि समय की तुलना में भारत तेज़ गति से विकास की ओर अग्रसर है. इसे राष्ट्र के नवनिर्माण के तौर पर सोच सकते हैं.

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[1] The Republic of Türkiye changed its official name from The Republic of Turkey on 26 May 2022.

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Author

Sanjeev Ahluwalia

Sanjeev Ahluwalia

Sanjeev S. Ahluwalia has core skills in institutional analysis, energy and economic regulation and public financial management backed by eight years of project management experience ...

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