प्रकृति पर आधारित समाधानों के तहत तीन प्रमुख स्तंभों पर ज़ोर दिया जाता है. ये हैं- जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और शहरी लचीलापन. इनमें कम कार्बन उत्सर्जन वाले और जलवायु के अनुरूप ढलने वाले उपाय शामिल हैं.
आज शहरों में तपिश पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बढ़ गई है.
ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) के उत्सर्जन पर काबू पाने और घरेलू लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार में शीर्ष स्तर पर नीतियों और मिशनों पर काम हो रहा है. भारत के कई शहर और ख़ासतौर से वहां की स्थानीय इकाइयां जलवायु परिवर्तनों से जुड़े ख़तरों से निपटने की जंग में पहली कतार में हैं. ख़तरा इतना गंभीर है कि उन्हें इस मोर्चे पर तेज़ी के साथ काम करने को मजबूर होना पड़ा है.
जलवायु परिवर्तन से जुड़े जंग में अपने लक्ष्य तय करने और अपनी कार्ययोजना तय करने के लिए शहरों के बीच होड़ सी मची हुई है. दरअसल, इस काम के लिए समय काफ़ी कम है. भारतीय शहरों में बुनियादी ढांचे के विकास, डिज़ाइन और शहरी योजनाओं से जुड़े अहम और न्यायोचित बदलाव लंबे समय से लंबित हैं. शहरों की जलवायु योजनाओं में प्रकृति-आधारित समाधानों को शामिल करने की क़वायद तेज़ हो रही है. शहरों में आबादी का घनत्व ज़्यादा है. उनके सामने अनेक तरह की चुनौतियां हैं. वहां बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर भारी दबाव है. शहरों में इन विकास कार्यों के साथ-साथ ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के संदर्भ में सामाजिक-आर्थिक ज़रूरतों का संतुलन बिठाने से जुड़ा ज्वलंत प्रश्न भी सामने खड़ा है.
जलवायु परिवर्तन से जुड़े जंग में अपने लक्ष्य तय करने और अपनी कार्ययोजना तय करने के लिए शहरों के बीच होड़ सी मची हुई है. दरअसल, इस काम के लिए समय काफ़ी कम है.
प्रकृति पर आधारित समाधानों के तहत तीन प्रमुख स्तंभों पर ज़ोर दिया जाता है. ये हैं- जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और शहरी लचीलापन. इनमें कम कार्बन उत्सर्जन वाले और जलवायु के अनुरूप ढलने वाले उपाय शामिल हैं. शहरों को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढालने और इन बदलावों के प्रभावों से पार पाने के क़ाबिल बनाना होगा. इसके साथ ही उनके पुनरुद्धार के लिए टिकाऊ रास्ते अख़्तियार करने होंगे. इसके अलावा बुनियादी ढांचा खड़ा करने के पारपंरिक तौर-तरीक़ों की जगह वैकल्पिक उपाय अपनाने होंगे. निश्चित तौर पर क़ुदरत पर टिके इन बदलावों की अहमियत काफ़ी ज़्यादा है. हालांकि ये बदलाव अपने साथ कई तरह की चुनौतियां भी लेकर आते हैं. इन चुनौतियों का ताल्लुक़ प्रशासन, क्षमताओं और ऐसे बदलाव लाने के लिए ज़रूरी रकमों से है. इससे पहले कि हम स्थानीय निकायों के सामने खड़े व्यवस्थागत मुद्दों पर रोशनी डालें, हमें इस विकराल समस्या और उसके मौजूदा प्रभावों पर नज़र डाल लेनी चाहिए. वैश्विक तौर पर शहरी भूक्षेत्र पृथ्वी के कुल सतही क्षेत्र का सिर्फ़ 2 फ़ीसदी हिस्सा हैं. हालांकि इतने छोटे भू-भाग में सिमटे होने के बावजूद दुनिया में ऊर्जा के कुल उपभोग का 78 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं शहरी इलाक़ों में ख़र्च होता है. इतना ही नहीं उत्सर्जित होने वाले ग्रीन हाउस गैसों का 70 प्रतिशत हिस्सा भी शहरी क्षेत्रों से ही निकलता है.
भारत में ग्रीन हाउस गैसों के कुल उत्सर्जन में शहरी क्षेत्रों का योगदान 44 प्रतिशत है. इस उत्सर्जन का काफ़ी बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे के निर्माण, परिवहन परियोजनाओं, औद्योगिक उत्पादन, रियल एस्टेट क्षेत्र में होने वाले निर्माण कार्यों और कचरा निर्माण से सामने आता है. शहरीकृत वातावरण पर बढ़ते दबाव की वजह से वहां के क़ुदरती माहौल को भारी नुकसान पहुंचा है. इसके चलते जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अत्यंत गंभीर और चरम स्वरूपों वाली घटनाएं देखने को मिल रही हैं. इनमें समुद्री जल-स्तर में उछाल, बाढ़, तापमान में बढ़ोतरी और प्रदूषण में इज़ाफ़ा शामिल हैं. ओआरएफ़ के एक पेपर में इससे जुड़े अनेक अध्ययनों को संकलित किया गया है. इसमें भारत के छह शहरों और वहां के निर्माण क्षेत्रों के पर्यावरणीय कारकों का विश्लेषण किया गया है. इस अध्ययन में 1973 से शुरुआत कर 2030 के हालातों के भावी आकलनों को रेखांकित करते हुए शहरी क्षेत्रों में महसूस किए जा रहे प्रकृति-आधारित नुकसानों को रेखांकित किया गया है. इसके तहत शहरी इलाक़ों में महसूस किए जा रहे हरित (पेड़, हरियाली) और नीले (जल-क्षेत्रों) प्रकृति-आधारित नुकसान प्रमुख हैं (चित्र 1 देखिए). पिछले 40 वर्षों में बेंगलुरु के निर्माण क्षेत्र में 925 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है. वहीं दूसरी ओर मुंबई में हरित-क्षेत्र में 60 प्रतिशत और जलीय-क्षेत्र में 65 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
भारत में ग्रीन हाउस गैसों के कुल उत्सर्जन में शहरी क्षेत्रों का योगदान 44 प्रतिशत है. इस उत्सर्जन का काफ़ी बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे के निर्माण, परिवहन परियोजनाओं, औद्योगिक उत्पादन, रियल एस्टेट क्षेत्र में होने वाले निर्माण कार्यों और कचरा निर्माण से सामने आता है.
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की साल 2021 की रिपोर्ट में इन नुकसानों के प्रभावों को रेखांकित किया गया है. नासा द्वारा समर्थित इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस सदी के अंत तक भारत के 12 तटीय शहर समुद्र तल से और तीन फ़ीट नीचे आ जाएंगे. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, इस रिपोर्ट में इन शहरों के पानी में डूबने का अंदेशा जताया गया है. इनमें मुंबई, चेन्नई, विशाखापट्टनम, मैंगलोर और कोच्चि शामिल हैं. भारत की शहरी आबादी 2014 में 41 करोड़ थी. 2050 में इसके बढ़कर 81.4 करोड़ हो जाने का अनुमान है. ऐसे में जलवायु में इस तरह के बदलावों पर काबू पाना और भी ज़रूरी हो जाता है.
शहरी स्थानीय निकायों ने जलवायु से संबंधित अपनी योजनाओं और लक्ष्यों को लेकर कई तरह की प्रतिबद्धताएं जताई हैं. ऐसे में प्रकृति-आधारित हस्तक्षेपों को मद्देनज़र रखते हुए कुछ अहम उपायों पर नज़र डालना ज़रूरी हो जाता है. शहरी स्थानीय निकायों को इन उपायों पर निश्चित तौर पर ग़ौर फ़रमाना चाहिए:
शहरों में काम करने वाले विभिन्न विभागों, सरकारी संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों के बीच प्रकृति-आधारित समाधान खड़े किए जाने के फ़ायदों पर अबतक काफ़ी कम ध्यान दिया गया है. अब वक़्त आ गया है कि इन लाभों पर उचित ध्यान दिया जाए.
भारतीय शहर इन प्रभावों से निपटने और उनके हिसाब से ढलने के लिए कई तरह की परियोजनाएं शुरू कर रहे हैं. न्यायोचित शहरी भविष्य के लिए प्रकृति-आधारित समाधान लाना ज़रूरी हो जाता है.
भारत के शहर अपने भूक्षेत्र में शहरी जलवायु योजनाओं के निर्माण के शुरुआती चरण में हैं. बग़ैर किसी योजना और तेज़ गति से शहरीकरण के चलते इन क्षेत्रों पर भारी असर पड़ा है. भारतीय शहर इन प्रभावों से निपटने और उनके हिसाब से ढलने के लिए कई तरह की परियोजनाएं शुरू कर रहे हैं. न्यायोचित शहरी भविष्य के लिए प्रकृति-आधारित समाधान लाना ज़रूरी हो जाता है. इस सिलसिले में क्षमता, प्रशासन और फ़ंड से जुड़े मुद्दे सुनिश्चित करने की आवश्यकता है. दरअसल, मौजूदा वक़्त में किए जा रहे प्रयासों को आवश्यक तंत्रों और बुनियादी ढांचों के निर्माण के लिए मिल रहे अवसर के तौर पर देखने की ज़रूरत है.
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