ये लेख हमारी सीरीज़, ‘रिइमैजिनिंग एजुकेशन/ इंटरनेशनल डे ऑफ एजुकेशन 2024’ का एक हिस्सा है
पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर की शासन व्यवस्था के ढांचे ने हर किसी के कल्याण के साधन के रूप में शिक्षा के महत्व पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया है. 1948 में अपनाए गए मानवाधिकारों के सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) घोषणापत्र (UDHR) के अनुच्छेद 26 में शिक्षा को एक अपरिहार्य मानवाधिकार के तौर पर रेखांकित करते हुए “हर किसी के लिए शिक्षा के अधिकार” की अनिवार्यता के बारे में बताया गया है. इसके बाद कई अंतर्राष्ट्रीय कानूनी घोषणाओं में आख़िरी मील तक शिक्षा की पहुंच का विस्तार करने की आवश्यकता को दोहराया गया है क्योंकि शिक्षा किसी भी आधुनिक समाज की सामाजिक-आर्थिक उन्नति के लिए ज़रूरी बनी हुई है. चूंकि अंतर्राष्ट्रीय घोषणाएं काफी हद तक प्रथागत बनी हुई हैं, ऐसे में देश का संविधान क़ानूनी ताकत के साथ वास्तविक चीज़ है जो आधुनिक देशों की शासन व्यवस्था की संरचना (गवर्नेंस आर्किटेक्चर) को आगे बढ़ाता है. अलग-अलग देशों में ‘कानून के शासन’ पर आधारित संविधान के लागू होने के साथ सार्वभौमिक शिक्षा का अधिकार उस सामाजिक अनुबंध का एक स्पष्ट और अभिन्न हिस्सा बन गया जिसे ज़्यादातर संप्रभु देशों ने अपने नागरिकों को दिया है.
चूंकि अंतर्राष्ट्रीय घोषणाएं काफी हद तक प्रथागत बनी हुई हैं, ऐसे में देश का संविधान क़ानूनी ताकत के साथ वास्तविक चीज़ है जो आधुनिक देशों की शासन व्यवस्था की संरचना (गवर्नेंस आर्किटेक्चर) को आगे बढ़ाता है.
दुनिया 24 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाती है. इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र ने शांति और विकास को बढ़ावा देने में शिक्षा की भूमिका पर ज़ोर देने के लिए की थी. इस संदर्भ में ये लेख दुनिया भर के देशों में संवैधानिक घोषणाओं पर प्रकाश डालेगा ताकि ये समझा जा सके कि कैसे अलग-अलग संवैधानिक दृष्टिकोणों ने अपने सभी लोगों को शिक्षा प्रदान करने की अनिवार्यता को महसूस किया है और किस हद तक संवैधानिक वादा अभी तक साकार हुआ है. संवैधानिक दृष्टिकोण को दो स्तरों पर दर्शाया गया है: पहला ये कि क्या वैचारिक स्तर पर संविधान स्पष्ट रूप से अपने सभी नागरिकों को शिक्षा के अधिकार का वादा करता है; दूसरा ये कि क्या संविधान ने अपने नागरिकों के लिए शिक्षा को केवल एक अधिकार के तौर पर घोषित किया है या समावेशी शासन व्यवस्था के निशान के रूप में नागरिकों के सबसे कमज़ोर वर्ग के लिए शिक्षा को किफायती और उपलब्ध बनाने को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विशेष प्रावधान पर ज़ोर देने की दिशा में आगे बढ़ा है. अंत में ये लेख इन देशों में शैक्षणिक प्राप्ति के पैमाने का पता लगाता है ताकि शैक्षणिक अधिकारों की संवैधानिक गारंटी के फलीभूत होने की सीमा को मापा जा सके.
संवैधानिक रूप से स्थापित प्रतिबद्धताओं को स्वीकार करते हुए दुनिया भर के कई देशों ने अपने-अपने संविधानों में शिक्षा के अधिकार की गारंटी देने वाले स्पष्ट प्रावधानों को शामिल किया है. 1970 से पहले अपनाए गए केवल 63 प्रतिशत संविधानों में जहां ये प्रावधान शामिल थे, वहीं 2000 से लागू सभी संविधानों ने शिक्षा के अधिकार की गारंटी देने वाले स्पष्ट संवैधानिक दृष्टिकोण की घोषणा की है. वर्तमान समय में दुनिया भर के 152 देश शिक्षा के अधिकार की गारंटी देते हैं, हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर इनमें काफी अधिक अंतर है. सभी दक्षिण एशियाई देश और लैटिन अमेरिका, कैरिबियन, यूरोप एवं मध्य एशिया के ज़्यादातर देश शिक्षा के अधिकारों के लिए संवैधानिक प्रावधानों की गारंटी देते हैं. इसके विपरीत पूर्व एशिया एवं प्रशांत, मिडिल ईस्ट एवं उत्तर अफ्रीका और सब-सहारन अफ्रीका के लगभग 12 से 25 प्रतिशत देश शैक्षणिक अधिकारों से जुड़े किसी विशेष प्रावधान की घोषणा नहीं करते.
आंकड़ा 1: अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षा के अधिकार की एक स्पष्ट गारंटी के साथ देशों की संख्या (प्रतिशत में)
स्रोत: लेखक का अपना, कॉन्स्टीट्यूट प्रोजेक्ट से आंकड़े
हालांकि कोई भी दो देश एक समान शिक्षा के अधिकार की गारंटी नहीं देते. कई देश शिक्षा को मूलभूत अधिकार के तौर पर स्वीकार करते हैं और इसके लिए उन्होंने अपने संविधान या राष्ट्रीय कानून में प्रावधान किया है लेकिन इन अधिकारों की सीमा और स्वरूप में काफी अंतर है. नीचे की तालिका 1 तीन मानकों के आधार पर दुनिया भर के अलग-अलग क्षेत्रों में शैक्षणिक अधिकारों का तुलनात्मक विश्लेषण पेश करती है. ये मानक हैं- समावेशिता (संवैधानिक अधिकारों के तहत आने वाली अनिवार्य शिक्षा का स्तर और जिस उम्र तक शिक्षा अनिवार्य है), सामर्थ्य (शैक्षणिक संस्थानों का स्वरूप और उससे जुड़ी लागत) और पहुंच (योग्यता या प्रतिस्पर्धा के आधार को छोड़कर शिक्षा तक समान पहुंच और गैर-भेदभाव का अधिकार).
तालिका 1: शिक्षा का अधिकार और घटक के मानक
स्रोत: लेखक का अपना, कॉन्स्टीट्यूट प्रोजेक्ट से आंकड़े
हालांकि, संवैधानिक ढांचे के परे इन अधिकारों को लागू करना अलग-अलग देशों में भिन्न है. कई विकसित देशों जैसे कि जर्मनी में सरकार बिना किसी स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान के सभी स्तरों पर बिना किसी रोक-टोक के शिक्षा प्रदान करती है. इसके साथ-साथ कुछ विकासशील देशों में शैक्षणिक अधिकारों के एहसास में संसाधनों की कमी, राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक फैक्टर या दूसरी चुनौतियों से रुकावट आ सकती है. विचार के योग्य एक और पहलू है प्राइवेट शिक्षा की मौजूदगी. कुछ देशों में शिक्षा जहां एक अधिकार है, वहीं सरकार शायद इसे सीधे प्रदान नहीं कर सकती है. ऐसे में प्राइवेट संस्थानों को कभी-कभी किसी कीमत पर शैक्षणिक सेवा की पेशकश करने की मंज़ूरी मिलती है. ये कानून और व्यवहार के बीच अंतर के बारे में बताता है. नीचे आंकड़ा 2 साफ तौर पर दिखाता है कि शिक्षा के अधिकार को जहां व्यापक तौर पर स्वीकार किया गया है और अंतर्राष्ट्रीय संधियों एवं राष्ट्रीय संविधानों से इसे समर्थन मिलता है, वहीं इसका वास्तविक कार्यान्वयन और प्रदान की गई गारंटी का स्तर एक देश से दूसरे क्षेत्र के देश तक महत्वपूर्ण रूप से अलग हैं. स्पष्ट संवैधानिक प्रावधानों की कमी के बावजूद पूर्व एशिया एवं प्रशांत, यूरोप, मध्य एशिया और उत्तर अमेरिका में कई देशों ने समावेशिता को सुनिश्चित करते हुए अपनी आबादी के बीच शैक्षणिक लाभ को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है. इसके साथ-साथ सब-सहारन अफ्रीका और दक्षिण एशिया के कुछ देश अपने नागरिकों के लिए अच्छे इरादे के साथ अधिकारों की गारंटी के बावजूद महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
आंकड़ा 2: अलग-अलग देशों में शैक्षिक अधिकारों की तुलना में शिक्षा की प्राप्ति
स्रोत: लेखक का अपना, कॉन्स्टीट्यूट प्रोजेक्ट और ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट 2021-22 से आंकड़े
वास्तव में दुनिया भर के लोगों के लिए एक निर्णायक अधिकार के रूप में शिक्षा पर बढ़ता संवैधानिक ज़ोर सबके लिए शिक्षा तक बेहतर पहुंच को सुनिश्चित करने की दिशा में दुनिया के द्वारा ताकत लगाने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रोत्साहन है. हालांकि संवैधानिक प्रथाओं पर करीब से नज़र डालने पर पता चलता है कि शैक्षणिक अधिकार को साकार करना कई के लिए चुनौतियों से भरा हुआ है.
पहली चुनौती है सीमित समावेशिता जो कि दुनिया भर में बनी हुई है. संवैधानिक गारंटी और सरकार की कोशिशों के बावजूद कई लोग अभी भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर तक नहीं पहुंच पाते हैं. एक अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया भर में 7.2 करोड़ बच्चे अभी भी प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं क्योंकि स्कूल उनके लिए उपलब्ध नहीं हैं. 75.9 करोड़ वयस्क निरक्षरता के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं और अपने लिए एवं अपने परिवारों के लिए सामाजिक-आर्थिक उन्नति को सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हैं. इस तरह की उपलब्धता की कमी के पीछे गहरी जड़ें जमा चुके सरकारी, संरचनात्मक और सामाजिक फैक्टर के जुड़ाव को ज़िम्मेदार माना जाता है. रोज़गार की कमी, कुपोषण, अपर्याप्त संस्थागत इंफ्रास्ट्रक्चर, सामाजिक पूर्वाग्रह और शिक्षा के प्रति अज्ञानता सामूहिक रूप से शिक्षा को एक अपरिहार्य मानवाधिकार बनाने की तरफ वैश्विक संवैधानिक कोशिशों को कमज़ोर करती हैं. स्कूल की पढ़ाई नहीं करने वाले 3.2 करोड़ बच्चों के साथ सब-सहारन अफ्रीका बुनियादी शिक्षा के अवसरों तक पहुंच नहीं होने के मामले में दुनिया के सबसे गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में से एक बना हुआ है. साथ ही, मध्य एवं पूर्वी अफ्रीका जैसे क्षेत्रों और प्रशांत के कुछ हिस्सों में अभी भी ऐसे 2.7 करोड़ अशिक्षित बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जाते हैं. अधिक स्कूल ड्रॉपआउट रेट ऐसे क्षेत्रों की पहचान करती है क्योंकि बच्चों को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए सही माहौल नहीं मिलता.
रोज़गार की कमी, कुपोषण, अपर्याप्त संस्थागत इंफ्रास्ट्रक्चर, सामाजिक पूर्वाग्रह और शिक्षा के प्रति अज्ञानता सामूहिक रूप से शिक्षा को एक अपरिहार्य मानवाधिकार बनाने की तरफ वैश्विक संवैधानिक कोशिशों को कमज़ोर करती हैं.
दूसरी चुनौती है शिक्षा हासिल करने में गंभीर लैंगिक आधारित निषेध बना होना क्योंकि दुनिया के कई देशों में लड़कियों का एक बड़ा वर्ग स्कूल से बाहर बना हुआ है. ये स्कूल नहीं जाने वाली आबादी का 54 प्रतिशत हिस्सा है. अरब के देशों और मध्य, पश्चिमी एवं दक्षिणी एशिया के कुछ ख़ास क्षेत्रों में शिक्षा में लैंगिक असंतुलन की समस्या बहुत ज़्यादा बनी हुई है. अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया और यमन सबसे अधिक प्रभावित देश हैं जहां लड़कियों की शिक्षा को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है. बेहद कठोर रूढ़िवादी सामाजिक ढांचा और गहराई से जुड़े पितृसत्तात्मक मानदंड आज भी लड़कियों की शिक्षा के प्रति महत्वपूर्ण रुकावटें बनी हुई हैं.
शिक्षा तक पहुंच के मामले में समावेशिता की कमी के अलावा कई देशों में शिक्षा की क्वॉलिटी की कड़ी जांच-पड़ताल की जा रही है. संवैधानिक और कानूनी उपायों के माध्यम से दुनिया भर में शिक्षा तक पहुंच का दायरा धीरे-धीरे व्यापक हो रहा है लेकिन ये उपाय छात्रों के बीच क्षमता निर्माण या कौशल विकास को सुनिश्चित कर सकते हैं या नहीं, ये अनिश्चित बना हुआ है. कई देशों में अलग-अलग अध्ययनों से पता चला है कि स्कूल जाने के बाद भी लाखों बच्चों में पढ़ने, लिखने, गिनने और समझने के कौशल में कमी है. वैसे तो स्कूलों में उनके नामांकन को शैक्षणिक प्राप्ति के निशान के तौर पर देखा जाता है लेकिन ये किसी भी कौशल को विकसित करने या बच्चों के लिए करियर को आगे बढ़ाने और रोज़गार के अवसरों के उद्देश्य से महत्वपूर्ण दीर्घकालिक क्षमता निर्माण और व्यावसायिक ट्रेनिंग की सुविधा देने में नाकाम रहा है.
यहां तक कि सामाजिक स्तर पर भी चूंकि शिक्षा कुशल मानवीय पूंजी के उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है, ऐसे में किसी सार्थक क्षमता विकास के बिना शिक्षा के परिणाम आर्थिक उत्पादकता को नुकसान पहुंचाएंगे और इस तरह राष्ट्रीय निर्माण के प्रयासों को भी. बुनियादी ढांचे के विकास एवं वित्तीय समर्थन की कमी, अपर्याप्त असरदार ट्रेनिंग और अलग तरह की पढ़ाई की तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षकों को मामूली प्रोत्साहन शिक्षा की समग्र गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाएंगे. गैर-परंपरागत नीतिगत कदम जैसे कि बच्चों की तरह-तरह की सीख की आवश्यकता पर आधारित व्यक्तिगत पढ़ाई की तकनीकों को सार्थक शैक्षणिक नतीजे हासिल करने के लिए प्राथमिकता देने की ज़रूरत है.
दुनिया के लिए ये वक्त की ज़रूरत है कि वो महसूस कर ले कि स्कूलों में नामांकन के उच्च स्तर से गुणवत्तापूर्ण एवं यथार्थवादी कौशल विकास की तरफ परिवर्तन का नतीजा कभी भी स्वयंसिद्ध नहीं होगा. इसे ठोस और केंद्रित नीतिगत पहल के ज़रिए सावधानीपूर्वक चलाने की ज़रूरत है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि एक महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार के रूप में शिक्षा के संवैधानिक विचार को बढ़ावा देने के लिए दुनिया की कोशिशों ने शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने का एक क्रमिक लेकिन ठोस प्रयास किया है. हालांकि, समावेशी और सार्थक तरीके से शैक्षणिक अधिकारों के क्षैतिज फैलाव और पर्याप्त गहराई को सुनिश्चित करना आधी लड़ाई जीतने की तरह बना हुआ है.
देबोस्मिता सरकार ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में सस्टेनेबल डेवलपमेंट एंड इन्क्लूज़िव ग्रोथ प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं.
अंबर कुमार घोष ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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Debosmita Sarkar was an Associate Fellow with the SDGs and Inclusive Growth programme at the Centre for New Economic Diplomacy at Observer Research Foundation, India. Her ...
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Ambar Kumar Ghosh is an Associate Fellow under the Political Reforms and Governance Initiative at ORF Kolkata. His primary areas of research interest include studying ...
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