1991 में किए गए आर्थिक सुधारों का स्वरूप उन तकनीकी चुनौतियों के लिहाज़ से अलग था, जिनका सामना भारत 2021 में कर रहा है.
भारत द्वारा अपने यहां आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने के 30 साल बाद भी ये प्रक्रिया अधूरी है. 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधार- जो उसके बाद के वर्षों धीरे धीरे और किस्तों में जारी रहे हैं- भारत की राष्ट्रीय आय और लोगों की समृद्धि को बढ़ाने में सफल रहे हैं. हम किसी भी पैमाने से मापें, देश में ग़रीबी भी नाटकीय तरीक़े से कम हुई है. फिर भी, इस बात में कोई शक नहीं है कि 1991 में बनाई गई योजना के लिहाज़ से अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है.
1991 के आर्थिक सुधार उस दौर की तकनीकी चुनौतियों के हिसाब से किए गए थे. 2021 में भारत के सामने अलग तरह की चुनौतियां हैं. उस समय विकास की परिकल्पनाएं पूरी तरह से संगठित औद्योगिक क्षेत्र का आकार बढ़ाने पर केंद्रित थीं. हालांकि, उदारीकरण के बाद के दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था ऐसे रास्ते से होकर गुज़री जिसकी उम्मीद नहीं थी. 1990 के दशक के आख़िर में शुरू होकर 2000 के दशक के शुरुआती दिनों में सकल घरेलू उत्पाद में उद्योगों की हिस्सेदारी घट गई और सेवा क्षेत्र ही विकास का इंजन बन गया. हक़ीक़त ये है कि महामारी से पहले 2019 में GDP में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान दो दशक के सबसे कम स्तर पर पहुंच गया था.
सूचना एवं संचार तकनीकों के विकास से तकनीकी क्षेत्र में आए बदलावों ने ही भारत के विकास की रूप-रेखा तैयार की, न कि सीधे तौर पर आर्थिक सुधारों से प्रभावित क्षेत्रों ने. हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि भारत ने विकास के मोर्चे पर जो उपलब्धि हासिल की उसमें आर्थिक सुधारों का योगदान नहीं था. लेकिन, सुधारों ने सीधे तौर पर उन पर असर नहीं डाला.
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. यहां पर इस बात की समीक्षा कर पाना मुमकिन है कि 1991 के मूल आर्थिक सुधारों का मक़सद उन क्षेत्रों में नई जान फूंकना था, जो दूसरी औद्योगिक क्रांति से जुड़े थे, यानी उन सुधारों का मक़सद स्टील, केमिकल और अन्य क्षेत्रों में तकनीकी रूप से उन्नत उत्पादन को बढ़ाना था. फिर भी, आर्थिक सुधारों से उन क्षेत्रों का विकास हुआ, रोज़गार के नए अवसर पैदा हुए और मूल्य बढ़ा, जिन्हें हम तीसरी औद्योगिक क्रांति का हिस्सा कहते हैं- यानी सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित सेवाएं, वित्त और व्यापार. सूचना एवं संचार तकनीकों के विकास से तकनीकी क्षेत्र में आए बदलावों ने ही भारत के विकास की रूप-रेखा तैयार की, न कि सीधे तौर पर आर्थिक सुधारों से प्रभावित क्षेत्रों ने. हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि भारत ने विकास के मोर्चे पर जो उपलब्धि हासिल की उसमें आर्थिक सुधारों का योगदान नहीं था. लेकिन, सुधारों ने सीधे तौर पर उन पर असर नहीं डाला. 1991 के सुधारों में कई तत्व थे. 1991 की गर्मियों में हुआ पहला बड़ा बदलाव तो रूपए का अवमूल्यन था- इससे भारतीय करेंसी को खुलकर लेन-देन करने का मौक़ा देना, और उद्योग लगाने के लिए ज़रूरी लाइसेंस व्यवस्था को ख़त्म करना था. 1990 के दशक के बाद के वर्षों में विदेशी व्यापार का भी उदारीकरण कर दिया गया.
रुपए को सहारा देने वाली व्यवस्था को ख़त्म करने से न सिर्फ़ भारत पर भुगतान के संतुलन का दबाव कम हुआ- जो आर्थिक सुधारों की तात्कालिक वजह थी- बल्कि रुपए के अवमूल्यन से निर्यात के बाज़ार में भारत के उत्पादों के मुक़ाबला करने की क्षमता भी बढ़ी. जब किसी देश की करेंसी की क़ीमत कम होती है, तो उस देश के उत्पादों की तुलनात्मक क़ीमत भी उसके प्रतिद्वंदियों के मुक़ाबले कम हो जाती है. इस वजह से सूचना प्रौद्योगिकी के निर्यात भारत के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का सबसे बड़ा ज़रिया बन गए. उद्योग लगाने के लिए लाइसेंस की ज़रूरत ख़त्म होने से उम्मीद ये थी कि अन्य क्षेत्र की कंपनियां इस मौक़े का फ़ायदा उठाएंगी और विदेशी व्यापार खुलने से वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुक़ाबला करने के लिए तैयार हो सकेंगी.
फिर भी, 1991 के आर्थिक सुधारों की योजना के कई अहम पहलू ऐसे थे, जिन्हें पूरी तरह से लागू नहीं किया गया. मिसाल के तौर पर, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही तरह के करों के व्यापक सुधार बाद के लिए टाल दिए गए. पिछले दशक में जीएसटी लागू करने तक, अप्रत्यक्ष करों को और तार्किक आधार नहीं दिया गया. डायरेक्ट टैक्स कोड तो अब तक पारित नहीं हुआ है. टैक्स को लेकर तस्वीर साफ न होने से भारत में उत्पादन से जुड़े जोखिम बने हुए हैं और इन्होंने भारत के बाक़ी दुनिया से मुक़ाबला कर पाने की क्षमता को भी कमज़ोर किया है. इसी तरह ‘फैक्टर मार्केट’ में भी पूरी तरह से सुधार नहीं किया गया; अर्थशास्त्री इसे ‘उत्पादन से जुड़े कारक’ कहते हैं. जैसे कि ज़मीन, श्रम और पूंजी- ये किसी उत्पादन प्रक्रिया की बुनियादी ज़रूरत होते हैं. अगर आपके पास कंपनियों के उत्पादों का मुक्त बाज़ार है, तो आपके पास उन चीज़ों का भी मुक्त बाज़ार होना चाहिए, जिन्हें ख़रीदकर कंपनियां अपना माल तैयार करती हैं. अगर भारतीय कंपनियां श्रमिकों, पूंजी, प्राकृतिक संसाधनों और ज़मीन के प्रतिबंधित और सीमित बाज़ार पर ही निर्भर हैं, तो उनकी मुक़ाबला कर पाने की क्षमता और कम हो जाती है. यही कारण है कि 1990 के दशक के आख़िरी वर्षों में भारत में औद्योगीकरण की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी थी. कारकों के बाज़ार का सुधार निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से मुश्किल काम है. लेकिन, हर गुज़रते साल के साथ ये सियासी मुश्किलें कम होती जा रही हैं और ऐसे सुधारों की ज़रूरत और बढ़ती जा रही है.
डायरेक्ट टैक्स कोड तो अब तक पारित नहीं हुआ है. टैक्स को लेकर तस्वीर साफ न होने से भारत में उत्पादन से जुड़े जोखिम बने हुए हैं और इन्होंने भारत के बाक़ी दुनिया से मुक़ाबला कर पाने की क्षमता को भी कमज़ोर किया है.
असल में फैक्टर मार्केट में सुधार कर पाने में नाकामी ही वो वजह थी कि आर्थिक सुधारों के बाद के वर्षों में दूसरी औद्योगिक क्रांति से जुड़े क्षेत्रों के बजाय तीसरी औद्योगिक क्रांति के उद्योगों ने भारत के आर्थिक विकास की अगुवाई की. इनमें से बहुत से क्षेत्रों, जैसे कि आईटी सेक्टर को अपने एकदम नए उद्योग होने का भी फ़ायदा मिला. क्योंकि, उनके विकास की राह में बाधा बनने वाले नियम ही नहीं थे, जो उनका विकास रोक पाते. कई क्षेत्रों को ज़मीन या ऐसे संसाधनों की ज़रूरत ही नहीं थी जो बुनियादी उद्योगों को होती है. इसीलिए, ये क्षेत्र फैक्टर मार्केट में सुधार न होने के बावजूद अपना विकास कर पाने में सफल रहे.
आज भारत चौथी औद्योगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ा है. फिर भी आज का भारत एक साथ कई सदियों में जी रहा है. आज भारत की अर्थव्यवस्था में सभी औद्योगिक क्रांतियों से जुड़े क्षेत्र सक्रिय हैं. आज भी भारत में ऐसे सैकड़ों छोटे कारखाने हैं, जो पहली औद्योगिक क्रांति से जुड़ी बुनियादी तकनीक इस्तेमाल करते हैं. आज भारत के पास स्टील, ऑटोमोबाइल और पेट्रोकेमिकल जैसे दूसरी औद्योगिक क्रांति वाले क्षेत्रों की विश्व स्तरीय कंपनियां भी हैं. देश के आर्थिक विकास की रीढ़ कहे जाने वाले सॉफ्टवेयर और दूरसंचार उद्योग में भी भारत दुनिया का अगुवा है. ये क्षेत्र तीसरी औद्योगिक क्रांति से जुड़े हैं. और अब भारत को ऑटोमेशन और डिजिटलीकरण के लिए भी तैयारी करनी है, जो चौथी औद्योगिक क्रांति की ज़मीन तैयार करेंगे.
अब भारत को ऑटोमेशन और डिजिटलीकरण के लिए भी तैयारी करनी है, जो चौथी औद्योगिक क्रांति की ज़मीन तैयार करेंगे.
तो क्या सुधारों का कोई ऐसा कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है, जो एक साथ सभी औद्योगिक क्षेत्रों में नई जान डाल सके? क्योंकि आज भारत के सामने यही चुनौती है.
पहली ज़िम्मेदारी तो ये होनी चाहिए कि 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों को पूरा किया जाए. 1990 में की गई कल्पना के अनुसार प्रत्यक्ष कर- कॉरपोरेट इनकम टैक्स, सिक्योरिटीज़ टैक्स और निजी आयकर में जड़ से बदलाव करना होगा. हाल के वर्षों में फैक्टर मार्केट से जुड़े कुछ सुधार हुए हैं. इनकी रफ़्तार बढ़ानी होगी. लेबर कोड संसद से पारित हो चुके हैं. लेकिन, उनमें अभी पूरी तरह से लचीलापन नहीं आया है. पहले से अधिक लचीले श्रम बाज़ार के साथ साथ इसमें सामाजिक सुरक्षा के अधिक असरदार ढांचे को जोड़ने को प्राथमिकता देनी होगी. ज़मीन से जुड़े सुधार- जैसे कि खेती लायक़ ज़मीन को बेचने और ख़रीदने की आज़ादी देनी होगी. इससे ज़मीन के बाज़ार में सरकारी अफ़सरों और बिचौलियों की भूमिका ख़त्म होगी. हो सकता है कि सरकारें अपने ज़मीन बैंक बनाने को तरज़ीह दें और जबरन ज़मीन अधिग्रहण करें. लेकिन, ज़मीन का एक ढंग का बाज़ार होना बेहतर विकल्प होगा, और आख़िर में पूंजी पर सरकारी बैंकों का शिकंजा ख़त्म होना चाहिए. क्योंकि सरकारी बैंकों ने बार बार ये साबित किया है कि कंपनियों को ज़रूरत के वक़्त पूंजी नहीं मिल पाती और सरकारी बैंकों के क़र्ज़ बांटने की प्रक्रिया में ख़ामी से बार बार ख़राब क़र्ज़ का संकट पैदा हुआ है. इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी क़ानून लागू करके ज़्यादा लचीला पूंजी बाज़ार बनाने की दिशा में एक क़दम तो उठा है. लेकिन, नए दिवालिया क़ानून की कामयाबी के बावजूद इसकी राह में कई चुनौतियां बनी हुई हैं- न्यायिक व्यवस्था में इन मामलों की सुनवाई के लिए ज़रूरी बेंच की कमी इनमें से एक है. वैसे तो अब भारत में किसी कंपनी के दिवालिया घोषित होने की प्रक्रिया की समय सीमा तय है, लेकिन, अक्सर इस क़ानून के तहत तय की गई मियाद का पालन नहीं होता.
दूसरी ज़िम्मेदारी असल में वो है, जो देश में दूसरी और तीसरी औद्योगिक क्रांति से जुड़े क्षेत्रों के लिए भी प्रासंगिक है: कौशल की कमी. भारत में जहां मांग से ज़्यादा कामगार मौजूद हैं, वहां पर रोज़गार देने वाले- फिर चाहे वो ऑटोमोबाइल कंपनी का कारखाना हो या सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनी- यही शिकायत करें कि उनके कारोबार के लिए ज़रूरी हुनर या तो उपलब्ध नहीं या फिर बहुत महंगा है, तो ज़ाहिर है देश में हुनरमंद लोगों की भारी कमी है. चौथी औद्योगिक क्रांति का फ़ायदा उठाने की पहली शर्त यही है कि भारत की आबादी का कौशल विकास किया जाए. क्योंकि चौथी औद्योगिक क्रांति से जुड़े कई क्षेत्रों में प्रति कामगार उत्पादकता बहुत अधिक रहने वाली है. कौशल विकास के साथ साथ उन लोगों की मदद करने की भी ज़रूरत है, जो अपना करियर और नौकरी की जगह बदलना चाहते हों या फिर अपनी शिक्षा का स्तर बदलना चाहते हों- या फिर महामारी जैसी निजी सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हों. एक उचित कल्याणकारी व्यवस्था उद्यमियों और कामगारों के जोखिम लेने का हौसला बढ़ाती है. चौथी औद्योगिक क्रांति के चलते तेज़ी से आ रहे बदलावों के चलते जोखिम लेना बेहद अहम हो जाता है.
चौथी औद्योगिक क्रांति के हिसाब से होने वाले सुधारों का तीसरा स्तंभ भारत की सरकारी व्यवस्था को बनाया जाना चाहिए. प्रशासनिक सुधारों का इंतज़ार लंबे समय से हो रहा है. ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस सुधारने के लिए तो काफ़ी कोशिशें की गई हैं. पर अभी भी सरकारी अफ़सरों और न्यायाधीशों के लिए पुराने समझौतों पर नए सिरे से नज़र डालना, उनकी नई व्याख्या करना या उनसे पीछे हटना बहुत आसान है. स्वतंत्र नियामक अधिकारी और न्यायिक व्यवस्था को न सिर्फ़ मज़बूत बनाना होगा, बल्कि उसकी क्षमता भी बढ़ानी होगी. सरकारी व्यवस्था की प्रमुख क्षमता विवादों का निपटारा होनी चाहिए. विवादों का फौरी और न्यायोचित निपटारा जोखिम लेने का माहौल बनाने की पहली शर्त है. इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में चौथी औद्योगिक क्रांति के विकास की उर्वर ज़मीन तैयार होगी. प्रशासन की तमाम शाखाओं की क्षमता के विकास- इसमें चौथी नियामक, शाखा शामिल हैं- के बग़ैर दिवालिया क़ानून जैसे अच्छी नीयत से किए गए सुधार भी लड़खड़ा जाते हैं.
भारत में सुधारों की प्रक्रिया शुरू होने की तीसवीं सालगिरह के मौक़े पर, ये ज़रूरी है कि हम पिछले तीन दशकों के अनुभवों से सही सबक़ सीखें. पहली सीख तो ये है कि आधे अधूरे सुधार सही ढंग से काम नहीं करते. दूसरी सीख ये है कि सुधारों से अर्थव्यवस्था की दिशा नहीं तय होती.
भारत में सुधारों की प्रक्रिया शुरू होने की तीसवीं सालगिरह के मौक़े पर, ये ज़रूरी है कि हम पिछले तीन दशकों के अनुभवों से सही सबक़ सीखें. पहली सीख तो ये है कि आधे अधूरे सुधार सही ढंग से काम नहीं करते. दूसरी सीख ये है कि सुधारों से अर्थव्यवस्था की दिशा नहीं तय होती. सुधार केवल भारतीय कामगारों और उद्यमियों के लिए अच्छा माहौल तैयार कर सकते हैं. असल में तो ये भारतीय उद्योग ही होंगे जो भविष्य में भारत के विकास का स्रोत बनेंगे. प्रशासन को ये नहीं करना चाहिए कि वो कुछ गिने चुने क्षेत्रों को ये समझकर बढ़ावा दे कि उसे पता है कि इन्हीं से विकास को रफ़्तार मिलेगी. क्या 1991 के सुधारों ने इस बात की भविष्यवाणी की थी कि आईटी, वित्त, व्यापार और दूरसंचार के क्षेत्र अगले कुछ दशकों के दौरान भारत के विकास के रथ को आगे ले जाएंगे? उन्होंने ये कल्पना तो नहीं की थी और वो ऐसा कर भी नहीं सकते थे. इसी तरह, आज के सुधारों के भीतर भी ऐसा कोई जादुई नुस्खा नहीं छुपा है जिससे देश में चौथी औद्योगिक क्रांति का स्वरूप तय होगा. इन सुधारों का कर्तव्य ये सुनिश्चित करना है कि भारतीय कंपनियां उन ताक़तों की तलाश कर सकें, जो उनका विकास करेंगी और उनका फ़ायदा उठाएं.
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Mihir Swarup Sharma is the Director Centre for Economy and Growth Programme at the Observer Research Foundation. He was trained as an economist and political scientist ...
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