दक्षिणी चीन सागर को लेकर धीरे-धीरे ही सही, मगर एक ठोस मोर्चेबंदी हो रही है. और ये सिर्फ़ मज़बूत नीति बनाने के लिए अहम नहीं है, बल्कि इससे ये भी सुनिश्चित हो सकेगा कि तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी नहीं होगी. और संयुक्त प्रयास व्यर्थ नहीं जाएंगे.
जिस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस की महामारी की चपेट में है, उस समय भी साउथ चाइना सी को लेकर उठा-पटक पर कोई विराम नहीं लगा. महामारी के दौरान भी अमेरिका और चीन इस मुद्दे पर आपस में टकरा रहे हैं. पिछले कुछ महीनों में ही चीन ने साउथ चाइना सी में नौसैनिक अभ्यास किए हैं और मिसाइलें दागी हैं. वहीं अमेरिका ने साउथ चाइना सी को लेकर बहुत सख़्त शब्दों वाला एक बयान ही नहीं जारी किया. बल्कि, उसके हिसाब से जो कंपनियां साउथ चाइना सी में अवैध निर्माण के लिए उत्तरदायी हैं, उनके ख़िलाफ़ प्रतिबंध भी लगाए गए हैं. भारत ने भी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की बार-बार घुसपैठ के जवाब में, दक्षिणी चीन सागर में एक नौसैनिक युद्धक जहाज़ तैनात किया है. वहीं, दक्षिणी पूर्वी एशियाई देश, इस इलाक़े में चीन के जहाज़ों द्वारा उनकी समुद्री सीमाओं का उल्लंघन करने पर कड़ा ऐतराज़ जता रहे हैं.
हम पिछले कई वर्षों से दक्षिणी चीन सागर में राजनीतिक उथल पुथल का दौर देख रहे हैं. अक्सर कुछ नौसैनिक जहाज़ या विमान यहां पर एक दूसरे से टकराव की मुद्रा में भी दिखते रहे हैं. तनाव में इस वृद्धि के बावजूद, इस क्षेत्र में जितने भी देश चीन के साथ सीमा के विवाद में उलझे हैं, न तो उन्होंने चीन के अतिक्रमण को अब तक सीधी चुनौती दी है. और न ही उन देशों ने चीन को चैलेंज किया है, जो साउथ चाइना सी में चीन की अवैध गतिविधियों की आलोचना करते आए हैं. अब तक सभी देशों ने मिल जुलकर, इस मसले के समाधान के लिए कोई सघन प्रयास करने से परहेज़ ही किया है. अब तक दक्षिणी चीन सागर में चीन की बढ़ती दादागीरी का मुक़ाबला करने की कोशिशें टुकड़ों में ही होती रही हैं. और सभी देश बस पारंपरिक तरीक़े से ही चीन का विरोध करते दिखे हैं. फिर चाहे कोई एक देश हो, या किसी क्षेत्रीय संगठन द्वारा विरोध की हम बात करें, तो भी ऐसा ही देखने को मिला है.
अब तक हमने दक्षिणी चीन सागर को लेकर जो भी राय, दृष्टिकोण या विश्लेषण सामने आते देखे हैं, उनके केंद्र में समुद्री क्षेत्र को विवादित कहने पर ही ज़ोर दिया जाता रहा है. किसी ने भी ये नहीं कहा कि साउथ चाइना सी के हालात बिगाड़ने के पीछे सिर्फ़ एक देश की हरकतें ज़िम्मेदार हैं. और वो देश चीन है, जो नियमित रूप से इस इलाक़े को अस्थिर बनाने की कोशिश करता रहा है.
अब तक हमने दक्षिणी चीन सागर को लेकर जो भी राय, दृष्टिकोण या विश्लेषण सामने आते देखे हैं, उनके केंद्र में समुद्री क्षेत्र को विवादित कहने पर ही ज़ोर दिया जाता रहा है. किसी ने भी ये नहीं कहा कि साउथ चाइना सी के हालात बिगाड़ने के पीछे सिर्फ़ एक देश की हरकतें ज़िम्मेदार हैं. और वो देश चीन है, जो नियमित रूप से इस इलाक़े को अस्थिर बनाने की कोशिश करता रहा है. और इसे देखकर ही लगता है कि सभी देश ख़ुद को छलावे में रखे हुए हैं. दक्षिणी चीन सागर में जो भी ‘विवाद’ हैं, वो अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के विरुद्ध हैं. हम साउथ चाइना सी में आज जो कुछ होते देख रहे हैं, वो असल में समुद्री गतिविधियों की स्थिरता विघ्न डालने की कोशिशें हैं. और यही नहीं, इन हरकतों के ज़रिए कई देशों की वाजिब समुद्री संप्रभुता और अधिकारों का भी उल्लंघन किया जा रहा है. और अब तक इस चुनौती से निपटने के लिए जो भी क़दम उठाए गए हैं, वो बहुत कम अवधि को दृष्टिकोण में रख कर उठाए गए हैं. सिर्फ़ वर्ष 2002 में साउथ चाइना सी में कन्डक्ट ऑफ़ पार्टीज़ को लेकर एक घोषणा की गई थी, और वो भी बाध्यकारी नहीं थी. आज साउथ चाइना सी को लेकर हम देशों की त्वरित प्रतिक्रिया तो देखते हैं. लेकिन, इसके बाद कोई ठोस और मज़बूत रणनीति रूप लेते हुए नहीं दिखती.
हालांकि, वर्ष 2019 इस मसले पर कुछ ऐसे क़दम ज़रूर उठाए गए हैं, जो ध्यान देने योग्य हैं. इनसे ये संकेत मिलता है कि साउथ चाइना सी में चीन की गतिविधियों के ख़िलाफ़ अब एक अधिक मिली जुली और ठोस मोर्चेबंदी की जा रही है. अब चीन की गतिविधियों का पहले से अधिक खुलकर और मज़बूती से विरोध हो रहा है. अब ये ज़ुबानी विरोध आख़िर में एक संयुक्त रणनीति में परिवर्तित हो पाएगा या नहीं, ये आने वाले समय में ही पता चल सकेगा.
दक्षिणी चीन सागर को लेकर एक बहुआयामी और ठोस रणनीति बेहद ज़रूरी है. ये महत्वपूर्ण है क्योंकि, साउथ चाइना- सी को लेकर वैश्विक और क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं अब तक हड़बड़ी वाली और बेतरतीब रही हैं. इसके उलट, इस क्षेत्र को लेकर चीन लगातार, बिना रुके और बेहद योजनाबद्ध तरीक़े से अपनी गतिविधियां बढ़ाता जा रहा है.
दक्षिणी चीन सागर को लेकर एक बहुआयामी और ठोस रणनीति बेहद ज़रूरी है. ये महत्वपूर्ण है क्योंकि, साउथ चाइना- सी को लेकर वैश्विक और क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं अब तक हड़बड़ी वाली और बेतरतीब रही हैं. इसके उलट, इस क्षेत्र को लेकर चीन लगातार, बिना रुके और बेहद योजनाबद्ध तरीक़े से अपनी गतिविधियां बढ़ाता जा रहा है. ऐसे में चीन की सतत गुस्ताख़ियों से निपटने के लिए एक संस्थागत रणनीति की सख़्त ज़रूरत है. चीन जिस तरह से साउथ चाइना सी पर अपना प्रभाव और उसके संसाधनों पर अपना नियंत्रण बढ़ाने में लगा हुआ है, उसके पीछे आम तौर पर दो बड़े कारण माने जाते हैं. पहला तो ये कि इस समुद्री क्षेत्र में मौजूद तेल और गैस के बड़े भंडारों पर क़ब्ज़ा जमाना. माना जाता है कि साउथ चाइना सी में तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मौजूद हैं. और, दूसरी वजह है ये है कि चीन इस इलाक़े में अपने नौसैनिक अड्डे बनाना चाहता है. जिससे कि वो पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अपनी नौसैनिक ताक़त और प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर सके. हाल ही में जारी किए गए साउथ चाइना सी के नए नक़्शे से साफ़ पता चलता है कि किस तरह चीन ने इस इलाक़े में अपनी सैनिक क्षमता का विस्तार कर लिया है. यहां रडार लगा दिए हैं. मिसाइल लॉन्च करने के ठिकाने बना लिए हैं और लड़ाकू विमान उतारने के लिए हवाई पट्टी भी तैयार कर ली है. चीन, वर्ष 2014 से ही यहां के पार्सल और स्प्रैटली द्वीपों पर सैनिक संसाधनों का निर्माण करने में जुटा हुआ है.
पिछले एक से डेढ़ वर्षों के दौरान, अमेरिका, आसियान और साउथ चाइना सी के समुद्री क्षेत्र के देशों द्वारा इस क्षेत्र के लिए धीरे-धीरे ही सही मगर एक ठोस रणनीति तैयार करने की कोशिश हो रही है. मिसाल के तौर पर जब आसियान ने वर्ष आउटलुक ऑन द इंडो-पैसिफिक (AOIP) को अपनाया, उससे पहले तक आसियान एक संगठन के तौर पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र को एक ऐसा क्षेत्र मानने को तैयार ही नहीं था, जहां पर ख़ुद उसकी एक केंद्रीय भूमिका होनी थी. जबकि इस दौरान हिंद-प्रशांत क्षेत्र एक ऐसे इलाक़े के रूप में उभर रहा है, जो न केवल क्षेत्रीय ताक़तों के लिए, बल्कि इस इलाक़े से दूर स्थित देशों के लिए भी दिलचस्पी का विषय बन गया है, वो इसके बारे में खुलकर अपने विचार रख रहे हैं. लेकिन, आसियान ने, साउथ चाइना सी में चीन के तमाम दावों के ख़िलाफ़ अपने सदस्य देशों के अधिकारों को मज़बूती से नहीं रखा. इसके बजाय आसियान देश सामान्य घोषणाओं और समुद्री व्यापारिक मार्गों की स्वतंत्रता जैसे आम बयान जारी करके ही काम चलाते रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह ये रही है कि आसियान के तमाम सदस्य देशों के चीन के साथ अलग अलग तरह के द्विपक्षीय संबंध रहे हैं. हालांकि, अब भी ये मसले बने ही हुए हैं, लेकिन आसियान ने AOIP को मंज़ूरी देकर ये संकेत दिया है कि एक संगठन के तौर पर वो अपने पड़ोस में हो रही गतिविधियों की ओर से अब और आंखें नहीं मूंदे रह सकता है.
इंडोनेशिया और मलेशिया, जो आदतन खुलकर चीन के विरोध में बोलने से बचते रहे हैं. वो भी अब चीन के दावों और बार बार की घुसपैठ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. वहीं, वियतनाम और फिलीपींस तो शुरू से ही चीन की गतिविधियों के विरुद्ध मुखर रहे हैं.
साउथ चाइना सी को लेकर दुनिया के बदलते रुख़ का एक संकेत अमेरिका के रवैये में आए परिवर्तन से भी मिलता है. अमेरिका, जो इस क्षेत्र में चीन की गतिविधियों और उसके समुद्री क्षेत्र संबंधी दावों का विरोध करने की अगुवाई करता रहा है, उसने कुछ महीनों पहले ही साउथ चाइना सी को लेकर अपनी स्पष्ट और मज़बूत नीति का एलान किया था. अमेरिका ने साउथ चाइना सी में चीन की गतिविधियों को दादागीरी क़रार दिया है. चीन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में अमेरिका सबसे आक्रामक रहा है. फिर भी, अब से पहले के अमेरिका के आधिकारिक बयान और इससे पहले की सरकारों की प्रतिक्रियाएं, क़ानूनी दांव पेंच वाली भाषा के पहाड़ तले दब जाती थीं. इनसे अमेरिका के वास्तविक रुख़ का अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल हो जाता था. इससे पहले अमेरिका, स्पष्ट रूप से साउथ चाइना सी को लेकर विरोध वाली नीति घोषित करने से परहेज़ करता रहा था. लेकिन, अमेरिका ने अब जो रणनीति अपनायी है, वो सीधे तौर पर चीन की गतिविधियों को अवैध ठहराती है. और साथ साथ अमेरिका ने ये भी कह दिया है कि अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो वो अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है. इंडोनेशिया और मलेशिया, जो आदतन खुलकर चीन के विरोध में बोलने से बचते रहे हैं. वो भी अब चीन के दावों और बार बार की घुसपैठ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. वहीं, वियतनाम और फिलीपींस तो शुरू से ही चीन की गतिविधियों के विरुद्ध मुखर रहे हैं. इसी बीच में ऑस्ट्रेलिया ने भी साउथ चाइना सी में चीन की गतिविधियों के विरोध में अपने रुख़ को खुलकर और नियमित रूप से बयान करना शुरू कर दिया है. इस क्षेत्र को लेकर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के रुख़ का वियतनाम और फिलीपींस भी समर्थन कर रहे हैं.
इन बातों को देखकर ऐसा लग रहा है कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन, अब साउथ चाइना सी को लेकर तमाम देश एक ठोस रणनीति अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. इससे न सिर्फ़ साउथ चाइना सी में चीन की गतिविधियों के ख़िलाफ़ एक मज़बूत नीति का निर्माण होगा, बल्कि चीन के विरोध में जो प्रयास चल रहे हैं, वो भी व्यर्थ नहीं जाएंगे. ये एक और वजह से भी ज़रूरी है. चूंकि आज मौजूदा क़ानूनी व्यवस्थाएं चरमरा रही हैं, तो अब ऐसे ठोस उपायों की अहमियत बढ़ जाती है. हालांकि, चीन ने अब तक अपने विरोध में उठ रही आवाज़ों को कोई अहमियत नहीं दी है. वो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने का इरादा तो क़तई नहीं दिखा रहा है. ऐसे में ज़रूरी ये है कि कूटनीतिक प्रयासों को ऐसे तरीक़े से ढाला जाए, जिससे कि अंतरराष्ट्रीय नियम क़ायदों का उल्लंघन करने वालों को इसकी भारी क़ीमत चुकाने के लिए बाध्य किया जा सके.
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Pratnashree Basu is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme. She covers the Indo-Pacific region, with a focus on Japan’s role in the region. ...
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