ऊपरी तौर पर देखें तो, झारखंड में विधानसभा चुनाव की लड़ाई ग़ैर बराबरी की लगती है. लेकिन, अभी से हम मतदाता के मूड को भांपने की भूल नहीं कर सकते.
आदिवासी बहुल राज्य झारखंड में हाल ही में पांच चरणों में विधानसभा चुनाव कराने का एलान हुआ है. झारखंड में सत्ताधारी बीजेपी, विधानसभा चुना के मैदान में बढ़त के साथ उतर रही है. क्योंकि राज्य में विपक्ष की हालत बेहद कमज़ोर है.
झारखंड राज्य में विधानसभा चुनाव 30 नवंबर 2019 से शुरू होंगे. और नतीजों का एलान, 23 दिसंबर 2019 को किया जाएगा. चुनाव की तारीख़ों का एलान चुनाव आयोग ने 1 नवंबर 2019 को किया था. मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने एलान किया था कि, झारखंड में पांच चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में 30 नवंबर, 7 दिसंबर, 12 दिसंबर, 16 दिसंबर और 20 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे.
पहले दौर में 13 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होगा. तो, दूसरे दौर में 20 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. तीसरे राउंड में 17 सीटों के मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए वोट डालेंगे. वहीं, चौथे राउंड में 15 सीटों पर मतदान होगा. 20 दिसंबर को आख़िरी दौर के मतदान में 16 विधानसभा क्षेत्रों में वोट डाले जाएंगे. मूलत: आदिवासी बहुल झारखंड राज्य के कई ज़िले नक्सली हिंसा के शिकार हैं. पिछली बार यानी 2014 में भी यहां विधानसभा चुनाव पांच चरणों में ही कराए गए थे.
2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की थी. और 2014 से ज़्यादा सीटें भी हासिल की थीं. आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी की शानदार सफलता के बाद झारखंड तीसरा राज्य है, जहां विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. इस साल ये तीसरा बीजेपी शासित राज्य होगा, जहां विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. इससे पहले महाराष्ट्र और हरियाणा में 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव कराए गए थे.
ऐसा माना जा रहा था कि बीजेपी, महाराष्ट्र और हरियाणा में आसानी से चुनाव जीत लेगी. लेकिन, दोनों ही राज्यों में बीजेपी को चुनावी झटका लगा है. दोनों ही राज्यों में बीजेपी को पिछली बार के मुक़ाबले कम ही सीटें मिली हैं. हालांकि महाराष्ट्र और हरियाणा, दोनों ही राज्यों में बीजेपी, सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है.
इस समय झारखंड में बीजेपी आल झारखंड स्टूडेंट्स् यूनियन यानी AJSU के साथ गठबंधन सरकार चला रही है. बीजेपी की पुरज़ोर कोशिश होगी कि वो झारखंड में महाराष्ट्र और हरियाणा से बेहतर प्रदर्शन करे. ऐसा माना जा रहा था कि बीजेपी, महाराष्ट्र और हरियाणा में आसानी से चुनाव जीत लेगी. लेकिन, दोनों ही राज्यों में बीजेपी को चुनावी झटका लगा है. दोनों ही राज्यों में बीजेपी को पिछली बार के मुक़ाबले कम ही सीटें मिली हैं. हालांकि महाराष्ट्र और हरियाणा, दोनों ही राज्यों में बीजेपी, सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है.
झारखंड में बीजेपी सरकार की अगुवाई मुख्यमंत्री रघुबर दास के हाथ में है. 2014 में बीजेपी ने झारखंड की 81 विधानसभा सीटों में से 37 पर जीत हासिल की थी. इसके सहयोगी दल यानी आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन ने पांच विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. दोनों दलों ने मिल कर राज्य विधानसभा में बहुमत के लिए ज़रूरी आंकड़ा जुटा लिया था. बाद में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा के आठ विधायक टूट कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. जेवीएम में टूट की वजह से विधानसभा में बीजेपी की स्थिति और भी मज़बूत हो गई थी. बीजेपी के शानदार प्रदर्शन का एक नतीजा ये भी हुआ था कि राज्य में कांग्रेस को केवल 6 सीटों पर ही जीत हासिल हो सकी थी. बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में भी झारखंड की 14 में से 12 सीटों पर विजय प्राप्त की थी.
इस बार बीजेपी ने 65 विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. बीजेपी की राज्य इकाई और मुख्यमंत्री रघुबर दास को भरोसा है कि वो ये लक्ष्य हासिल कर देंगे. इसके लिए वो प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे के भरोसे हैं. रघुबर दास, पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले झारखंड के पहले मुख्यमंत्री हैं. उन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की वजह से, विधानसभा चुनाव में वो आसानी से जीत हासिल कर लेंगे.
झारखंड में बीजेपी के सामने कई कठिनाइयां खड़ी हो गई हैं. इनकी वजह, आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन और लोक जनशक्ति पार्टी जैसे सहयोगी दल हैं. दोनों ही पार्टियां इस बार झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी से ज़्यादा सीटें मांग रही हैं.
हाल ही में हुए महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों से सबक़ लेते हुए बीजेपी ने इस बार झारखंड में स्थानीय समस्याओं को ही चुनाव प्रचार के प्रमुख मुद्दे बनाने और उनके हल को अपने अभियान में शामिल करने का फ़ैसला किया है. झारखंड में बीजेपी ट्रिपल तलाक़ ख़त्म करने के क़ानून और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का ज़्यादा ज़ोर-शोर से प्रचार करने से बचेगी.
इन सब के बावजूद, झारखंड में बीजेपी के सामने कई कठिनाइयां खड़ी हो गई हैं. इनकी वजह, आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन और लोक जनशक्ति पार्टी जैसे सहयोगी दल हैं. दोनों ही पार्टियां इस बार झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी से ज़्यादा सीटें मांग रही हैं. ज़ाहिर है कि बीजेपी के सहयोगी दलों का हौसला महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे देख कर ही बढ़ा है. क्योंकि महाराष्ट्र में बीजेपी की सब से पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना ने भी पहले बीजेपी पर सत्ता में ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा देने का दबाव बनाया था. इसी तर्ज पर आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन इस बार अपने लिए 2014 के चुनाव में लड़ी सीटों से 8 सीटें ज़्यादा मांग रही है. और पिछली बार एक भी सीट जीतने में नाकाम रही लोक जनशक्ति पार्टी 6 सीटों पर चुनाव लड़ने की ज़िद ठाने हुए है. बीजेपी को उम्मीद है कि वो सहयोगियों के साथ इन मुश्किलों से पार पा लेगी.
सत्ताधारी गठबंधन के लिए एक और सकारात्मक बात ये है कि इस बार पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी ने अकेले ही चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है. इसका नतीजा ये होगा कि बीजेपी से नाराज़ लोगों के वोट विपक्षी दलों में बंट जाएंगे. इसी तरह, बीजेपी अपनी एक और सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस बात पर राज़ी करने में कामयाब रही है कि जेडी यू, झारखंड के कुर्मी बहुल इलाक़ों में अपने प्रत्याशी उतारे. ताकि, कुर्मियों के वोट विपक्षी दलों को और ख़ास तौर से कांग्रेस को न मिल सकें.
विपक्षी दल अब भी बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट होकर मोर्चा बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हालांकि कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने मिल कर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है. लेकिन अब भी उन के बीच सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं हो सकी है.
वहीं दूसरी तरफ़, झारखंड के विपक्षी दल अब भी बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट होकर मोर्चा बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हालांकि कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने मिल कर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है. लेकिन अब भी उन के बीच सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं हो सकी है. झारखंड के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर ओरांव कहते हैं कि, “सब कुछ पहले से तय है. और, जल्द ही महागठबंधन का एलान किया जाएगा.” ओरांव ने कहा कि विपक्षी दलों का मुख्य मक़सद, बीजेपी को राज्य की सत्ता से बाहर करने का है.
ऐसा लगता है कि इस गठबंधन में झारखंड मुक्ति मोर्चा बड़े भाई की भूमिका में होगा. जेएमएम के 44 सीटों पर चुनाव लड़ने की संभावना है. वहीं कांग्रेस को 27 सीटें मिलने की संभावना है. राज्य की बाक़ी की सीटें छोटे सहयोगी दलों जैसे राष्ट्रीय जनता दल और वामपंथी पार्टियों को मिलने की उम्मीद है.
लेकिन, अभी इस बात पर संशय बना हुआ है कि आरजेडी और वामपंथी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के गठबंधन में शामिल होंगे भी या नहीं. वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने पहले ही ये एलान कर दिया है कि वो विपक्ष के महागठबंधन में नहीं शामिल होंगे. इससे बीजेपी को फ़ायदा होने की उम्मीद है. क्योंकि उसके विरोधी वोट तमाम पार्टियों में बंट जाएंगे.
ऊपरी तौर पर देखें तो, झारखंड में विधानसभा चुनाव की लड़ाई ग़ैर बराबरी की लगती है. लेकिन, अभी से हम मतदाता के मूड को भांपने की भूल नहीं कर सकते. क्योंकि ऐसा करना आसान नहीं है. कई बार ऐसे अनुमान ग़लत साबित हुए हैं. यहां तक कि जाने माने चुनाव विशेषज्ञों को भी मतदाता के मूड को समझने में धोखा ही हाथ लगा है. क्योंकि कई बार सरकार के ख़िलाफ़ लोगों की नाराज़गी इतनी छुपी हुई रहती है कि उसका पता लगा पाना आसान नहीं होता.
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Satish Misra was Senior Fellow at ORF. He has been a journalist for many years. He has a PhD in International Affairs from Humboldt University ...
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