Author : Rajen Harshé

Published on Mar 16, 2022 Updated 0 Hours ago

अगर लीबिया सफलतापूर्वक लोकतांत्रिक बदलाव को पाना चाहता है तो उसे लोकतंत्र के रास्ते में आने वाली तमाम बाधाओं को दूर करना होगा.

जटिल संकट के जाल में फँसा लीबिया: असहज कर देने वाला लोकतांत्रिक और राजनैतिक रास्ता

लीबिया के लोकतांत्रिक बदलाव पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं. टोब्रुक में मौजूद और पूर्वी क्षेत्र के वर्चस्व वाली लीबिया की संसद ने फरवरी 2022 में फाति बाशाघा को प्रधानमंत्री के रूप में चुनने का फैसला किया. इसके बाद बाशाघा की नई सरकार को 1- मार्च 2022 को संसद से मान्यता दी गई. हालांकि, अब्दुल हामिद दबीबा के नेतृत्व वाली वर्तमान और अंतरिम संयुक्त राष्ट्र समर्थित सरकार की बाशाघा को सत्ता सौंपने की अनिच्छा से लीबिया में घमासान मचा हुआ है. संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने बाशाघा की नियुक्ति पर चिंता व्यक्त की है और कहा है कि बाशाघा “अपेक्षित मानकों को पूरा नहीं करते”. इस गहराते राजनीतिक संकट के बीच लीबिया के सबसे बड़े तेल क्षेत्र अल- शरारा (el sharara oil field, Libya), जहां एक दिन में 2,90,000 बैरल तेल का उत्पादन होता है, वहां तेल उत्पादन रोक दिया गया है और प्रदर्शनकारियों ने प्रमुख निर्यात टर्मिनल को बंद रखने की धमकी दी है. लीबिया में ऐसे नाटकीय घटनाक्रम तब घटित हो रहे हैं जबयूक्रेन पर रूसी आक्रमण और रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाने के परिणामस्वरूप तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. लेकिन संयोग से, लीबिया में अफ्रीका का सबसे बड़ा तेल भंडार मौजूद है और इसी ऊर्जा उत्पादन से संबंधित मसलों ने अक्सर लीबिया में सशस्त्र संघर्षों को जन्म दिया है. इस समय भी राजनीतिक सत्ता को हथियाने के लिए बाशाघा और दबीबा के बीच जारी प्रतिद्वंद्विता की वजह से लीबिया में राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता का दौर शुरू हो सकता है. इस गतिरोध को दूर करने के लिए राष्ट्रपति चुनाव कराने से पहले थोड़ी सी राजनीतिक स्थिरता को बनाया जा सकता है.

लीबिया रणनीतिक रूप से पूर्वी भूमध्य सागर में तेल और प्राकृतिक गैस का समृद्ध भंडार है. लिहाज़ा राजनीतिक रूप से स्थिर, लोकतांत्रिक और एकीकृत लीबिया देश में आंतरिक व्यवस्था की शुरुआत कर सकता है और निवेशकों के भरोसे को भी बढ़ावा दे सकता है. 

वास्तव में, लीबिया के 2.5 मिलियन मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाले थे लेकिन 24 दिसंबर 2021 को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को अचानक स्थगित कर दिया गया. अब भले ही दबीबा जून 2022 तक देश में चुनाव कराने की योजना बना रहे हों लेकिन देश के राजनीतिक अखाड़े में बाशाघा के ताल ठोकने के साथ ही उनकी अपनी स्थिति को काफी चुनौती मिल रही है. लीबिया की राजनीति और समाज को स्थिर करने के लिए परस्पर विरोधी ताक़तों की नाकामी ने भी लीबिया को असल में दलदल की स्थिति में धकेल दिया है. यही नहीं, लीबिया रणनीतिक रूप से पूर्वी भूमध्य सागर में तेल और प्राकृतिक गैस का समृद्ध भंडार है. लिहाज़ा राजनीतिक रूप से स्थिर, लोकतांत्रिक और एकीकृत लीबिया देश में आंतरिक व्यवस्था की शुरुआत कर सकता है और निवेशकों के भरोसे को भी बढ़ावा दे सकता है. हालांकि, लीबिया में एक स्थिर राजनीतिक हालात दूर की कौड़ी लगती है. पिछले दशक की अराजक स्थितियों के संदर्भ में, लीबिया में गृहयुद्ध के आंतरिक और बाहरी आयामों की व्याख्या करना ज़रूरी होगा और लीबिया के राष्ट्रपति पद के दावेदारों द्वारा पेश किए जाने वाले नेतृत्व की गुणवत्ता को उजागर करना भी उचित होगा.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

अक्टूबर 2011 में अमेरिका के नेतृत्व वाली उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नेटो) की सेनाओं ने जबमुअम्मर गद्दाफ़ी  की सत्ता को बदल दिया, तब से लीबिया की विभाजित राजनीति को अक्सर स्थानीय सरदारों, आदिवासी मिलिशिया, अलग-अलग हित समूहों और राजनीतिक नेताओं के बीच संघर्ष के तौर पर देखा जाता रहा है. साल 2012 के जनरल नेशनल कांग्रेस (जीएनसी) के चुनाव के साथ-साथ साल 2014 के प्रतिनिधि सभा के चुनाव हुए जिसमें महज 18 प्रतिशत मतदाताओं ने भागीदारी की, जिससे लीबिया में एक स्थिर लोकतांत्रिक सत्ता नहीं बन पाई. नतीजतन साल 2014 के मध्य से राजनीतिक परिस्थितियों ने लीबिया को गृह युद्ध की चपेट में ले लिया था जो अनिवार्य रूप से दो दलों के बीच की प्रतिस्पर्द्धा को जाहिर करता है. एक ओर पश्चिमी लीबिया में फ़ैज़ अल-सर्राज (2016-2021) के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र समर्थित गवर्नमेंट ऑफ़ नेशनल यूनिटी (जीएनयू) की सरकार ने तुर्की और कतर के मज़बूत समर्थन से त्रिपोली पर पूरी तरह नियंत्रण कर लिया था. जबकि दूसरी ओर, साल 2015 के बाद लीबिया की राष्ट्रीय सेना (एलएनए) का नेतृत्व करने वाले जनरल ख़लीफ़ा हफ़्तार ने लीबिया के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों पर अपना नियंत्रण कर लिया था. एलएनए अपनी राजधानी के रूप में टोब्रुक के साथ अपनी गतिविधियों को बढ़ा रहा था. साथ ही हफ़्तार को रूस, मिस्र, फ्रांस, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसी बाहरी शक्तियों का भी समर्थन प्राप्त था. संसाधन संपन्न लीबिया को अफ्रीका के प्रवेश द्वार के रूप में मानते हुए, इन बाहरी शक्तियों में से हर मुल्क ने एक अलग लीबिया नीति को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया जिसमें ऊर्जा और मैरीटाइम सुरक्षा जैसे भूराजनीति से संबंधित मुद्दे भी शामिल थे. लेकिन लगातार गृह युद्ध ने तेल आपूर्ति को भी बाधित कर दिया और लीबिया की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर कर दिया. इतना ही नहीं तेल आपूर्ति की ऐसी रुकावटों ने संघर्ष में शामिल सभी पक्षों को प्रभावित किया.

गृह युद्ध के चलते 50,000 शरणार्थी दूसरे देश भागने पर मज़बूर हुए हैं तो 2,68,000 लोगों को विस्थापित होना पड़ा है. हालांकि, फरवरी 2021 में लीबिया के राजनीतिक संवाद मंच (एलपीडीएफ) के जरिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाले मध्यस्थता प्रयासों ने परिवर्तन का रास्ता खोला था. 

इसके अलावा, गृह युद्ध के चलते 50,000 शरणार्थी दूसरे देश भागने पर मज़बूर हुए हैं तो 2,68,000 लोगों को विस्थापित होना पड़ा है. हालांकि, फरवरी 2021 में लीबिया के राजनीतिक संवाद मंच (एलपीडीएफ) के जरिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाले मध्यस्थता प्रयासों ने परिवर्तन का रास्ता खोला था. आख़िरकार, संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाले 5+5 संयुक्त सैन्य आयोग के जरिए लीबिया के गृहयुद्ध में संघर्षरत तमाम पक्ष अक्टूबर 2020 में जेनेवा में एक ऐतिहासिक युद्धविराम समझौते पर सहमत हुए. इस घटना ने संयुक्त राष्ट्र की निगरानी के तहत लीबिया में लोकतांत्रिक बदलावों की दिशा तय की लेकिन हैरानी की बात यह है कि लीबिया को लेकर मिस्र और तुर्की जैसे प्रतिस्पर्द्धी मुल्कों ने भी आपसी तालमेल के बाद ही लीबिया में लोकतांत्रिक परिवर्तन का समर्थन किया था.

संयुक्त राष्ट्र की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बहाल करने की कोशिशों के बावजूद चुनाव आयोग, संसद की चुनाव समिति और खंडित न्यायपालिका जैसे सक्षम निकायों के बीच सामान्य नियम पर सहमति नहीं होने की वजह से राष्ट्रपति चुनाव में योग्य उम्मीदवारों का निर्धारण नहीं कर पाया है, अब यह और मुश्किल होता जा रहा है. अब कानूनों में अस्पष्टता का लाभ उठाते हुए, राजनीतिक नेताओं ने नियमों की धज्जियां उड़ाकर अपने निजी हितों को बढ़ाना शुरू कर दिया. जिस तरीक़े से लीबिया में राजनीतिक नेतृत्व संविधान बनाने और चुनाव कराने की प्रक्रिया को उलझा रहा है उसे लेकर आलोचनात्मक रवैया अपनाना ज़रूरी है.

 

उभरते राजनीतिक प्रतिद्वन्दी

शुरुआत करने के लिए, नए चुनावी कानून संसद द्वारा पारित नहीं किए गए थे. लेकिन केवल एचओआर के अध्यक्ष, अगुइला सालेह इस्सा द्वारा इसकी सीधे तौर पर पुष्टि की गई थी. इन कानूनों का ज़्यादा सटीक विवरण आदेशात्मक निर्देश हो सकता है. जिस तरह से लीबिया में कानूनों का मसौदा तैयार किया गया, उसने कार्यकारी पद को काफ़ी सशक्त बना दिया. स्पीकर ने अपने कार्यकाल के दौरान पूरी तरह जनरल खलीफा हफ़्तार के सहयोगी के रूप में काम किया. दरअसल, हफ़्तार अपने सैन्य पद पर लौटने का विकल्प खोए बिना राष्ट्रपति चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन विडंबना यह है कि नवंबर 2021 में अगुइला सालेह इस्सा ने ख़ुद राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की थी.

लीबिया में एक टोब्रुक-आधारित संसद और एक त्रिपोली-आधारित राष्ट्र परिषद भी थी. नई संवैधानिक व्यवस्था को लागू करने के लिए, अंतरिम सरकार को एक एकीकृत लीबिया में प्रमुख संस्थानों के साथ राजधानी की स्थापना का रास्ता तय करना पड़ा.

हफ़्तार और अगुइला सालेह इस्सा के उलट, दबीबा, जिनको मार्च 2021 में टोब्रुक के संसद में “सभी लीबियाई” के प्रधानमंत्री के रूप में अंतरिम शासन का नेतृत्व करने की शपथ दिलाई गई थी, उनकी भूमिका अलग थी. दबीबा पश्चिमी शहर मिसराता के एक शक्तिशाली कारोबारी रहे हैं. सरकार के अंतरिम प्रमुख के रूप में उनके सामने देश को मतदान के लिए तैयार करना, संस्थानों को एकजुट करना, मिलिशिया को ख़त्म करना और धीरे-धीरे सुरक्षा बलों को मज़बूत करने की चुनौती थी. क्योंकि सुरक्षा बल गृह युद्ध के दौरान त्रिपोली और टोब्रुक में स्थित दो समानांतर सरकारों के लिए काम कर रहे थे, इसलिए लीबिया की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए एक एकीकृत सैन्य बल की ज़रूरत थी. इसके अलावा लीबिया में एक टोब्रुक-आधारित संसद और एक त्रिपोली-आधारित राष्ट्र परिषद भी थी. नई संवैधानिक व्यवस्था को लागू करने के लिए, अंतरिम सरकार को एक एकीकृत लीबिया में प्रमुख संस्थानों के साथ राजधानी की स्थापना का रास्ता तय करना पड़ा. इन कार्यों को अंजाम देते हुए दबीबा ने मौजूदा नियमों के मुताबिक़, चुनाव में खड़े होने से रोके जाने के बावजूद, नवंबर 2021 में राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का ऐलान कर दिया.

गद्दाफ़ी के अंतिम दिनों से ही दबीबा लीबिया के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उनके मज़बूत कारोबारी नेटवर्क और अपार संपत्ति को बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के तौर पर देखा जा सकता है. हाल के वर्षों में उन्होंने अमेरिका और फ्रांस में अपनी छवि चमकाने और पहले से ज़्यादा संपत्ति अर्जित करने के लिए लाखों का भुगतान किया है. अपनी स्थिति को और मज़बूत करने के लिए, जब भी उन्हें अपनी स्थिति के लिए ख़तरा महसूस होता है तब दबीब ने लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा करने और ख़र्च करने पर भरोसा किया है. मिसाल के तौर पर लोगों को ज़मीन और घर ख़रीदने में मदद करना, वेतन बढ़ाना और शादियों में सब्सिडी बांटना. इसके अलावा, मुआमार गद्दाफ़ी के बेटे सैफ़ अल-इस्लाम गद्दाफ़ी, जो अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) द्वारा वांछित थे और 2015 में जिन्हें दोषी भी ठहराया गया था, उन्होंने भी दिसंबर 2021 के चुनावों से पहले राष्ट्रपति पद के लिए एक उम्मीदवार के रूप में अपने नाम की घोषणा की थी. लेकिन 10 साल पहले विद्रोह के दौरान मानवता के ख़िलाफ़ उनके द्वारा किए गए युद्ध अपराधों के कारण शुरुआत में उन्हें सक्षम अधिकारियों द्वारा अयोग्य घोषित कर दिया गया था.लेकिन जब एक बार उन्हें सियासत में हाथ आजमाने की अनुमति दी गई तो गद्दाफ़ी ने घोषणा की कि वह “लीबिया की खोई हुई एकता को बहाल करना चाहते हैं“.

अब तक लीबिया के राजनीतिक नेतृत्व ने उस संविधान को तैयार नहीं किया है जिसे संसद में विचार-विमर्श के बाद बहुमत के साथ सहमति दी जा सके. इसके विपरीत सदन के अध्यक्ष अगुइला सालेह इस्सा ने न केवल संविधान की पुष्टि की बल्कि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए अपने नाम की भी घोषणा कर दी.

निष्कर्ष

संक्षेप में, लीबिया की स्थिति का सार इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है कि: प्रधानमंत्री के रूप में बाशाघा की नियुक्ति विभाजनकारी साबित हो रही है क्योंकि मौजूदा वक़्त में दबीबा नए शासन को सत्ता सौंपने के लिए तैयार नहीं हैं. राजनीति की ऐसी विभाजनकारी प्रकृति बदले में, तेल उत्पादन पर अपना प्रभाव डालती है जो लीबिया की अर्थव्यवस्था को और कमज़ोर कर सकती है. साल 2011 में गद्दाफ़ी के पतन के बाद शुरू हुआ गृह युद्ध केवल लीबिया तक ही सीमित नहीं रहा क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ फ्रांस, रूस, तुर्की, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और कतर सहित बाहरी शक्तियां लीबिया के विवाद में शामिल हो गईं थीं. अब तक लीबिया के राजनीतिक नेतृत्व ने उस संविधान को तैयार नहीं किया है जिसे संसद में विचार-विमर्श के बाद बहुमत के साथ सहमति दी जा सके. इसके विपरीत सदन के अध्यक्ष अगुइला सालेह इस्सा ने न केवल संविधान की पुष्टि की बल्कि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए अपने नाम की भी घोषणा कर दी. संयुक्त राष्ट्र भी संविधान की ऐसी ही व्यवस्था के साथ आगे बढ़ा है. राष्ट्रपति पद के दूसरे उम्मीदवार जैसे जनरल हफ़्तार, दबीबा और सैफ़ अल-इस्लाम गद्दाफ़ी ने भी सियासी अखाड़े में अपना दांव चला है. लेकिन संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति पद पर नज़र टिकाए इन नेताओं की बेईमान भूमिका ने लीबिया में केवल राजनीतिक अवसरवादिता और उम्मीदवारों के बीच हितों के टकराव को जन्म दिया है. इस तरह की अवसरवादिता के साथ-साथ हितों का टकराव बाहरी शक्तियों और ताक़तों को लीबिया की ओर हमेशा आकर्षित करेगा और उनकी आपसी खींचतान के चलते लीबिया में राजनीतिक संकट आने वाले समय में और गहराता जाएगा.

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