Author : Pushan Das

Published on Nov 26, 2018 Updated 0 Hours ago

26/11 के 10 साल बाद एनएसजी को साजो-सामान और परिवहन संबंधी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सीधे शब्दों में कहें, एनएसजी योजनाबद्ध जवाबी हमला करने के लिए अब इंतजार नहीं कर सकता है।

लड़खड़ाती आतंकवाद निरोधक नीति

एनएसजी कमांडो 28 नवंबर 2008 को नरीमन हाउस की छत पर एक हेलीकॉप्टर से नीचे उतरते हुए। © रॉयटर्स

26 नवंबर 2008 को मुंबई पर आतंकवादी हमले ने कई प्रमुख कमियों का खुलासा किया और सुरक्षा को लेकर भारत में की जाने वाली जवाबी कार्रवाई के संबंध में अपर्याप्त रणनीतिक और कमजोर आॅपरेशनल पहलुओं को उजागर किया। इसके बाद देश के सुरक्षा तंत्र में छोटे-मोटे सुधारों का क्रियान्वयन किया गया, लेकिन एक दशक से भी कम समय में यह तंत्र पुन: पस्त हालत में चला गया। जनवरी 2016 में पठानकोट वायुसेना बेस पर आतंकवादी हमले कको लेकर लिए भारत की असंगठित और अव्यवस्थित प्रतिक्रिया से यह असफलता स्पष्ट हुई। एक बार फिर, आतंकवाद निरोधी (सीटी) क्षमताओं में कार्य विभाजन, एक साथ मिलकर समन्वय से काम करने संबंधित दिक्कतें सामने आईं।

समय आ गया है कि एक बार फिर उन सिद्धांतों की समीक्षा की जाए जिनके आधार पर घरेलु स्तर पर आतंकवाद से निपटने की जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों के हस्तक्षेप को तय किया जाता है। यह समीक्षा भी करनी होगी कि किस प्रकार भारतीय सुरक्षा तंत्र विशेष इकाईयों यानी स्पेशल यूनिट्स के विभिन्न हिस्सों को अग्रिम रूप से देश भर में एक समन्वित नेटवर्क के रूप में स्थापित करता है।

26/11 के हमले के बाद, सुरक्षा व्यवस्था के लिए कई संरचनात्मक सुधारों का महत्वाकांक्षी प्रस्ताव दिया गया — विशेष रूप से, विभिन्न राज्यों में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड तैनाती के लिए क्षेत्रीय केंद्रों का निर्माण, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की स्थापना, हमारे आतंकवाद के बुनियादी ढांचे और रणनीति में गुणात्मक सुधार को सक्षम करने के लिए कई अन्य पहलों के साथ-साथ राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड (नेटग्रिड) की स्थापना, और राष्ट्रीय काउंटर आतंकवाद केंद्र (एनसीटीसी) की योजना। [1]


समय आ गया है कि एक बार फिर उन सिद्धांतों की समीक्षा की जाए जिनके आधार पर घरेलु स्तर पर आतंकवाद से निपटने की जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों के हस्तक्षेप को तय किया जाता है। यह समीक्षा भी करनी होगी कि किस प्रकार भारतीय सुरक्षा तंत्र विशेष इकाईयों यानी स्पेशल यूनिट्स के विभिन्न हिस्सों को अग्रिम रूप से देश भर में एक समन्वित नेटवर्क के रूप में स्थापित करता है।


नेशनल काउंटर टेररिज़्म सेंटर (एनसीटीसी) की स्थापना कई एजेंसियों को एकीकृत कमान के तहत लाने के लिए की गई थी। एनसीटीसी आतंकवादी हमलों को रोकने के लिए ज़िम्मेदार होता, इसके अलावा हमले की स्थिति में उससे निपटना तथा उसके असर को सीमित करने के लिए रणनीति बनाने की जिम्मेदारी भी उसकी होती। 26/11 के एक दशक बाद, आतंकवाद निरोधी कार्रवाई के लिए इस एकीकृत कमान और नियंत्रण संरचना को बनाने का प्रस्ताव अभी भी कागजों पर है एनसीटीसी को राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड (एनएटीजीआरआईडी) से सहायता मिलनी थी, जो कि 21 विभिन्न एजेंसियों के डेटाबेस से जुड़ा नेटवर्क है जिसके दायरे में महत्वपूर्ण जानकारियां और खुफिया सूचनाएं शामिल है। पहले, प्रत्येक संगठन का अपना अलग डेटाबेस होता था जो अन्य किसी एजेंसी की पहुंच में नहीं था।

हालांकि 26/11 का यह हमला, खुफिया जानकारियों के अभाव के कारण नहीं था। रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय खुफिया एजेंसियों ने 2006 और 2008 के बीच मुंबई पुलिस को संभावित हमले के बारे में 26 चेतावनियां दी थीं। कई एजेंसियों के बीच खुफिया जानकारी को साझा करने और समन्वय को ठीक करने के लिए मल्टी एजेंसी सेंटर (एमएसी) और सहायक मल्टी एजेंसी सेंटर (एसएमएसी) से युक्त नई व्यवस्था अभी भी कमजोर है। इनमें उस तरहं के उच्च स्तरीय समन्वय की कमी में कमी रहती है जिसमें गृह और पुलिस विभाग अपने केंद्रीय समकक्षों के साथ मिलकर काम करते हैं। [2] यह एक प्रशासनिक आदेश के माध्यम से आने की संभावना नहीं है, और इसके लिए कानून लाना होगा।

भारत की पुलिस और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में समन्वय की बेहद कमी है जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है। भारत की संघीय राजनीतिक व्यवस्था पुलिस की जिम्मेदारी ज्यादातर राज्यों पर छोड़ देती है। राज्य पुलिस बल लगातार अपर्याप्त आतंकवाद निरोधी प्रशिक्षण और उपकरणों की कमी से ग्रस्त हैं। [3] एक आतंकवादी हमले से निपटने में प्रभावी होने के लिए, सबसे पहले जवाबी कार्रवाई करने वालों को इन दोनों ही चीजों की खासी जरूरत होती है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 2008 के हमलों में अधिकांश मौतें पहले घंटे में हुईं, इसके बाद चार दिनों की एक तनावपूर्ण अवधि थी जब हमलावरों ने खुद को इमारतों में अवरोधकों के साथ बंद कर लिया, और अपने साथ लोगों को बंधक बना लिया। इस हमले ने स्पष्ट किया किया कि 2008 में एक बड़ी आतंकवादी घटना से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस को कितने खराब ढंग से प्रशिक्षित थी और उसके पास साधनों की भारी कमी थी। ऐसा लगता है कि कई पुलिस अधिकारी निष्क्रिय रहे क्योंकि उनके पास आतंकवादियों के मुकाबले के हथियार नहीं थे। आगामी वर्षों में, मुंबई पुलिस ने “फोर्स वन” नाम से एक कमांडो बल बनाया। हालांकि, जहां पुलिस पुलिस सशस्त्र है वहां इस प्रकार के कदम तभी प्रभावी हो सकते हैं जब बहुत कम समय के भीतर कई हमलों का जवाब देने की क्षमता हो।


पहले चरण के रूप में, बुनियादी प्रशिक्षण की गुणवत्ता में मामूली सुधार भी भारतीय पुलिस बलों की जवाबी कार्रवाई की क्षमता में व्यापक वृद्धि कर सकती थी।


अगर मुंबई में या हाल ही में पेरिस में हुए तेजी से गतिशील हमलों की तरह कोई हमला हो गया, जिसमें कई टीमें एक ही साथ कई स्थानों पर हमला-सशस्त्र हिंसा, कारजैकिंग, चलती गाड़ी से गोलीबारी, प्रीफैब्रिकेटिड आईईडी, बंधक बनाना करती हैं तो यह है संदिग्ध है कि 26/11 के एक दशक बाद भी राज्य पुलिस बल समय पर या प्रभावशाली जवाबी कार्रवाई कर पाएंगे। पहले चरण के रूप में, बुनियादी प्रशिक्षण की गुणवत्ता में मामूली सुधार भी भारतीय पुलिस बलों की जवाबी कार्रवाई की क्षमता में व्यापक वृद्धि कर सकता था।

साल 2008 में, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) का मुख्यालय दिल्ली के दक्षिण में था और देश में कहीं और इसका बेस नहीं था। इससे भी बदतर बात यह है कि इसके पास अपना कोई विमान नहीं था और आपातकालीन स्थिति में उसे भारतीय वायु सेना के विमानों पर भरोसा करना पड़ता था। किसी भी त्वरित कार्रवाई बल को जल्द से जल्द एक आतंकवादी हमले के घटनास्थल तक पहुंच जाना चाहिए, और हमला शुरू होने के 30-60 मिनट के भीतर ही उसे वहां पहुंचना चाहिए,उसके बाद नहीं। मुंबई में हुए हमले में एनएसजी को घटनास्थल पर पहुंचने में लगभग 10 घंटे लग गए गए। एनएसजी को आवश्यक उपकरणों की अनुपस्थिति ने बुरी तरहं प्रभावित किया। रात को देखने की क्षमा रखने उपकरण जैसे नाइट विजन गोगल्स, खराब खुफिया जानकारी और नियोजन तथा एक आॅपरेशनल कमांड सेंटर की कमी ने उसकी कार्रवाई को बुरी तरहं से प्रभावित किया।

26/11 में एनएसजी मुंबई जल्दी नही पहुंच पायी जिसका परिणाम सरकार द्वारा जल्दबाजी में उठाए गए कदमों के तौर पर सामने आया। मसलन सरकार ने मुंबई, कोलकाता, बैंगलोर, चेन्नई, हैदराबाद और हाल ही में अहमदाबाद में एनएसजी के केंद्र स्थापित किऐ हैं, हरएक केंद्र में लगभग 250 सुरक्षाककर्मी हैं। हालांकि, एक बल के रूप में एनएसजी की गुणवत्ता के बारे में सवाल उठ खड़े हुए हैं क्योंकि इसमें कुछ ज्यादा ही तेजी से विस्तार हो रहा है। [4]

रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि पठानकोट में, इस ‘एलीट’ फोर्स के सदस्यों द्वारा किसी भी आतंकवादी को गोली नहीं मारी गई थी। इसके विपरीत, उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल स्तर के एक अधिकारी को खो दिया जिन्होंने आईईडी जैसे विस्फोटक उपकरणों से निपटने के लिए मानक परिचालन प्रक्रियाओं का उल्लंघन करते हुए अपनी जान गंवा दी।


26/11 में एनएसजी मुंबई जल्दी नही पहुंच पाया जिसका परिणाम सरकार द्वारा जल्दबाजी में उठाए गए कदमों के तौर पर सामने आया। मसलन सरकार ने मुंबई, कोलकाता, बैंगलोर, चेन्नई, हैदराबाद और हाल ही में अहमदाबाद में एनएसजी के केंद्र स्थापित किऐ हैं, हरएक केंद्र में लगभग 250 सुरक्षाककर्मी हैं। हालांकि, एक बल के रूप में एनएसजी की गुणवत्ता के बारे में सवाल उठ खड़े हुए हैं क्योंकि इसमें कुछ ज्यादा ही तेजी से विस्तार हो रहा है।


एनएसजी के अनियमित विस्तार के परिणामस्वरूप प्रशिक्षण स्तर और इसके कर्मियों के मानकों में गिरावट आई है, जिसने इसकी प्रमुख क्षमताओं को कमजोर कर दिया है। [5] केंद्र बनाए गए हैं, लेकिन समर्पित विमान का सवाल अभी भी अनुत्तरित है। एनएसजी को समय पर कार्रवाई के लिए सामरिक हेलीकॉप्टरों की आवश्यकता होती है, लेकिन इसे नीति विकल्प के रूप में भी नहीं उठाया गया है। [6] इसकी रात में देखने वाले उपकरणों से संबंधित क्षमता भी अपर्याप्त है — लंबी दूरी के रात दृष्टि उपकरण यानी ‘नाइट विज़न डिवाइसिस’ और हाथ से काम करने वाले थर्मल इमेजर्स अभी भी कमांडो के लिए अनुपलब्ध हैं।

दुनिया भर में, एसएएस (यूके), जीएसजी-9 (जर्मनी), जीआईजीएन (फ्रांस) जैसी स्पेशल आॅपरेशन यूनिट्स के पास 200 से 400 के बीच कर्मी होते हैं ये इकाईयां केंद्रीकृत स्थानों से काम करती हैं। [7] आतंकवादी निरोधक कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अधिकांश स्पेशल फोर्सेज के पास स्थायी रूप से अपने विमान और हेलीकॉटर होते हैं। ब्रिटिश एसएएस के पास विशेष रूप से प्रशिक्षित और आवश्यक उपकरणों से सुसज्जित हेलीकॉप्टर और पायलट हैं, और इसके कर्मियों ने इन हेलीकॉप्टरों के साथ बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग की है। [8] संयुक्त राज्य अमेरिका में, फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के पास महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के लिए अपनी हेलीकॉप्टर इकाई है। भारत के मामले में एक महत्वाकांक्षी 1,400 करोड़ रुपये की आधुनिकीकरण योजना अभी भी कागजों पर ही है।

समय के साथ-साथ बीत वर्षों में आतंकवाद की प्रकृति में काफी बदलाव आया है। अब आतंकवादी मुंबई और पेरिस में छितराए हुए तथा “अधिकतम हिंसा” वाले हमले कर रहे हैं। इसलिए अब स्थिति से निपटने ​के लिए और नए किस्म हस्तक्षेप की आवश्यकता है, और यह तेजी से करना होगा। लेकिन 26/11 के दस साल बाद भी एनएसजी को साजो-सामान और परिवहन से संबंधित गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सीधे शब्दों में कहें, एनएसजी योजनाबद्ध जवाबी हमला करने के लिए अब इंतजार नहीं कर सकता है। अधिकांश आधुनिक आतंकवादी परिदृश्यों में समय अब एक विलासिता की वस्तु है। कर्मियों के मामले में, कोई फर्क नहीं पड़ता कि एनएसजी की तरह कितनी अच्छी तरह सुसज्जित या प्रशिक्षित विशेषज्ञ बल हैं, किसी भी आतंकवादी हमले का जवाब देने के लिए एक मजबूत, पुलिस-नेतृत्व क्षमता के विकास की आवश्यकता है। ऐसी व्यवस्था के तहत, पहली जवाबी कार्रवाई करने वाले हमेशा स्थानीय, सशस्त्र पुलिस अधिकारी होते हैं। विशेषज्ञ आतंकवाद निरोधी बलों की तैनाती को केवल पुलिस बलों की विफलता की स्थिति में एक विकल्प माना जाता है। एजेंसियों के बीच समन्वय संबंधित मौजूदा दिक्कतों के लिए नियमित प्रशिक्षण और अभ्यास के माध्यम से विशेषज्ञ आतंकवाद निरोधी एजेंसियों और पुलिस बलों के बीच समन्वय इन समस्याओं को ​कुछ हद तक दूर कर सकता है।

भारत में आतंकवादी घटनाओं की जवाबी कार्रवाई के लिए शुरूआत खुफिया जानकारियों पर काम करने, पहली जवाबी कार्रवाई करने वालों को ठीक से संगठित करने , एक अच्छी तरह से परिभाषित कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम के तहत आतंकवादी निरोधी गतिविधियों के संचालन से हो सकती है। स्पेशल यूनिट्स के अग्रिम हिस्सों को पूरे भारत को कवर करने वाले नेटवर्क में पहले से तैयार करके रखना होगा और एनएसजी की छोटी-मोटी कमियों को दूर करने के लिए विमानन आधारित प्लेटफार्मों का उपयोग करना होगा। नीति निर्माताओं को क्षमता मूल्यांकन और खरीद प्रक्रिया में आतंकवाद और खुफिया जानकारियों को जुटाने के संदर्भ में नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने पर विचार करने की भी आवश्यकता होगी। अंत में, यदि हम प्रभावी रूप से एक और महत्वपूर्ण आतंकवादी हमले को रोकना चाहते हैं तो भारत की आतंकवाद निरोधी क्षमता में सुधार लाने के लिए आने वाले वर्ष में पर्याप्त संसाधनों, स्थिर नीति और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी।


[1] C. Christine Fair, Prospects for Effective Internal Security Reforms in India, Commonwealth & Comparative Politics (July 2011) pp 145-170.

[2] Paul Staniland, “Improving India’s Counterterrorism Policy after Mumbai”, CTC Sentinel, Vol. 2 issue 4 (April 2009). (accessed on 25 October 2018).

[3] Angel Rabasa, Robert D. Blackwill, Peter Chalk, Kim Cragin, C. Christine Fair, Brian A. Jackson, Brian Michael Jenkins, Seth G. Jones, Nathaniel Shestak, and Ashley J. Tellis, “The Lessons of Mumbai”, Rand Corporation, OP 249 (2009). (accessed on 24 October 2018)

[4] Gujarat gets new NSG hub; fifth in the country, The Economic Times, 14 July 2018. (accessed on 21 October 2018)

[5] Saikat Datta, Revisiting the NSG operations: what worked and what didn’t, Hindustan Times, 25 November 2014. (accessed on 22 October 2018)

[6] Jugal R. Purohit, No choppers, no training, no men: National Security Guard in crisis as helicopter and manpower shortages cripple counter-terror effort, 18 April 2013. (accessed on 22 October 2018)

[7] Rajit Ojha, “Force Alarm”, The Caravan , 1 February 2016 (accessed on 25 October 2018)

[8] Tyler Rogoway, About That “Blue Thunder” Counter-Terror Chopper That Landed On London Bridge, The Drive, 4 June 2017. (accessed on 22 October 2018)

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