Issue BriefsPublished on Apr 15, 2023
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‘भारत के पूर्वोत्तर राज्य: पूर्व के पड़ोसी देशों के साथ “कनेक्टिविटी” का प्रवेश द्वार’

  • Pratnashree Basu
  • Sreeparna Banerjee

    भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र (NER) दक्षिण एशिया के पूर्व में भारत और उसके पड़ोसियों और पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया और उससे आने वाले क्षेत्रों के बीच एक निर्णायक संपर्क स्थान साबित हो सकता है. इसकी वज़ह से भारत इन क्षेत्रों के साथ राजनयिक, ढांचागत और वाणिज्यिक संबंधों को मज़बूती प्रदान कर सकता है. इस आलेख में बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल और भूटान के साथ NER की सीमा-पार भूमि कनेक्टिविटी पहलुओं का आकलन किया गया हैं. ये सभी देश बंगाल की खाड़ी बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग पहल (BIMSTEC) के सदस्य भी हैं. इस आलेख में विशेषत: क्षेत्र में ढांचागत कनेक्टिविटी विकसित करने में जापान की भूमिका पर नज़र डालने के साथ ही यह सिफारिशें की गई हैं कि कैसे इन पहलों को गति दी जा सकती है. इसका एक तरीका यह भी है कि इन परियोजनाओं को पूर्वोत्तर की विकासात्मक प्राथमिकताओं और सुरक्षा चिंताओं के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए.

Attribution:

एट्रीब्यूशन: श्रीपर्णा बैनर्जी एंड अंबर कुमार घोष, ‘‘भारत के पूर्वोत्तर राज्य: पूर्व के पड़ोसी देशों के साथकनेक्टिविटीका प्रवेश द्वार, ओआरएफ़ ओकेशनल पेपर नंबर 395, मार्च 2023, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन.

प्रस्तावना

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बढ़ते सामरिक महत्व को देखते हुए भारत को इस क्षेत्र में एक अहम भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए. उसे इस क्षेत्र के देशों के साथ सहयोग के सभी आयामों का पता भी लगाना होगा. अत: भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह इस क्षेत्र के देशों के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर अर्थात अवसंरचनात्मक, कर्मशियल अर्थात वाणिज्यिक, डिजिटल के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से मज़बूत और बहु-आयामी कनेक्टिविटी नेटवर्क स्थापित करने को अहमियत प्रदान करें. ऐसा करने के लिए भारत को इन देशों के साथ होने वाली बातचीत अथवा संवाद के केंद्र में उपरोक्त क्षेत्रों में सहयोग को रखना होगा.

एक वैश्वीकृत दुनिया में, कनेक्टिविटी ही विकास के केंद्र में है. लेकिन, कनेक्टिविटी का कार्य संरचनात्मक चुनौतियों से भरा पड़ा है.

भारत के लिए उसके तत्काल पड़ोस में आने वाले देशों के साथ कनेक्टिविटी सबसे ज़्यादा अहम है. पूर्व में अनेक देशों के साथ अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करने वाले भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र (NER) में दक्षिण एशिया के साथ-साथ पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में आने वाले भारत के पूर्वी पड़ोसियों के साथ एक उत्साहपूर्ण और आकर्षक लिंक अर्थात कड़ी साबित होने की व्यापक क्षमता मौजूद है. BIMSTEC भी भारत के पूर्वोत्तर में उसके साथ सीमा साझा करने वाले देशों - विशेषत: बांग्लादेश, म्यांमार, नेपा और भूटान - के साथ संबंधों को मज़बूती प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. भारत की विदेश नीति में उसकी 'Act East' और 'Neighbourhood First' नीतियों में परिलक्षित होने वाली प्राथमिकताएं भी पूर्वोत्तर क्षेत्र पर व्यापक रूप से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए कनेक्टिविटी गेटवे के रूप में ध्यान केंद्रित करती हैं. बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में अपनी लंबे समय से चली आ रही विशेषज्ञता के साथ, जापान भी, पूर्वोत्तर के भीतर और आसपास भौतिक संपर्क परियोजनाओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.[1]

यह आलेख, सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से अद्वितीय और भू-रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पूर्वोत्तर जैसे क्षेत्रों में भारत जैसे देशों के लिए सीमा पार कनेक्टिविटी की पड़ताल करता है. इसके साथ ही इस आलेख में इस बात पर भी नज़र डाली गई है कि वैश्वीकरण के बाद के युग में कौन-सी चुनौतियां उसके अर्थात भारत के सामने खड़ी हैं. यह आलेख भारत के पूर्वी पड़ोसियों के साथ भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी प्रयासों और उन्हें पूरा करने में NER की अहमियत पर प्रकाश डालता है. इसके अलावा इस आलेख में बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार के साथ भारत की क्षेत्रीय संपर्क पहल की प्रकृति और प्रगति की जांच करने के साथ ही भारत के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियों की रूपरेखा तैयार की गई है.

कनेक्टिविटी या ‘संयोजकता’ की गतिशीलता

एक वैश्वीकृत दुनिया में, कनेक्टिविटी ही विकास के केंद्र में है. लेकिन, कनेक्टिविटी का कार्य संरचनात्मक चुनौतियों से भरा पड़ा है. कनेक्टिविटी में सबसे पहला नंबर आता है भौतिक कनेक्टिविटी अर्थात - सड़क, रेलवे, वायु, जल, वाणिज्यिक और संसाधन-साझा करने की पहल जैसे कि सीमा पार बिजली-संचरण और गैस पाइपलाइन नेटवर्क स्थापित जैसे कार्यों का. इसके साथ-साथ आती है डिजिटल कनेक्टिविटी. लेकिन कनेक्टिविटी ही अपने आप में एक अंत नहीं होती है. बल्कि, यह स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर अधिक खुली राजनीतिक, राजनयिक, वाणिज्यिक और सामाजिक-सांस्कृतिक बातचीत सुनिश्चित करने में सहायक साबित होती है.

दूसरा, प्रादेशिक संप्रभुता को दी जाने वाली प्रधानता अक्सर सीमा पार कनेक्टिविटी हासिल करने की संभावनाओं की राह में रोड़ा बन जाती है. यह बात ख़ासकर उस वक़्त और जटिल हो जाती है जब संबंधित देशों के बीच अविश्वास का माहौल होता है. वैश्वीकरण के इस युग में, सीमा पार संवाद और अंतरराष्ट्रीय बातचीत महत्वपूर्ण हो गई है. अत: क्षेत्रीय संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखने के लिए उठाए गए कदम कभी-कभी कनेक्टिविटी की पहलों को कमज़ोर करने वाले साबित हो सकते हैं. तीसरा, इस तरह की पहल को संबंधित देशों में परंपरागत रूप से राजनीतिक और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग द्वारा ऊपर से नीचे तक संचालित, सांख्यिकी के रूप में ही देखा जाता है. चूंकि ये पहलें सीधे ज़मीनी स्तर पर जीवन को प्रभावित करती हैं, अत: इन पहलों की योजना और कार्यान्वयन में नीचे से ऊपर के दृष्टिकोण को लागू करना महत्वपूर्ण होता है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ये कनेक्टिविटी किसके लिए है?

अंत में, संघर्षों और हिंसा से जुड़े ख़तरों ने भी दुनिया के अनेक हिस्सों में कनेक्टिविटी-संचालित विकासात्मक पहलों की संभावनाओं को प्रभावित किया है.[2] विकास की बढ़ती ज़रूरतों ने कनेक्टिविटी को अहम बना दिया है. वैश्वीकरण के साथ ही आर्थिक मंदी, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवा की ख़ामियों, मानव विस्थापन और पर्यावरणीय आपदाओं जैसे वैश्विक ख़तरों का मुकाबला करने की आवश्यकता भी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कनेकशन्स अर्थात दो देशों के बीच संपर्क के साधन अथवा संबंधों को महत्वपूर्ण बनाती है.

भारत के लिए ‘कनेक्टिविटी’ की अनिवार्यता

दक्षिण एशिया और बंगाल की खाड़ी के व्यापक क्षेत्र में भारत बेहद महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है. अत: भारत को इस क्षेत्र में अधिक जीवंत भूमिका निभाने की आवश्यकता है. ऐसा करने के लिए उसे अपने पूर्व में और दक्षिण पूर्व एशियाई पड़ोसियों के साथ अधिक मज़बूती से जुड़ना चाहिए.

कनेक्टिविटी ही इस तरह के जुड़ाव अथवा संवाद को प्रोत्साहित करने और सुगम बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है. BIMSTEC एक ऐसी संस्था है जो इस काम में भारत की सहायता कर सकती है.[3] बंगाल की खाड़ी के क्षेत्र के स्थान और महत्व को देखते हुए, व्यापक रूप से भारत-प्रशांत के लिए भारत को प्रवेश द्वार माना जाता है.  इस क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर ‘‘वैश्विक अवसरों और चुनौतियों की एक विशाल श्रृंखला’’ की मेज़बानी करने वाले क्षेत्र के रूप में भी देखा जाता है.[4]

भारत ने एक लंबे अर्से से हिंद-प्रशांत को लेकर एक सुसंगत दृष्टि का प्रदर्शन किया है. भारत की दृष्टि यह है कि यह क्षेत्र मुक्त, खुला, समावेशी और नियम-आधारित व्यवस्था के अधीन बना रहे.[5] भारत की यह दृष्टि एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस (ASEAN) के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए सम्मान, एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था का पालन करने और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का हिमायती है.[6]

भारत ने सात केंद्रीय क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव अर्थात भारत प्रशांत महासागर पहल की भी शुरुआत की है. ये सात केंद्रीय क्षेत्र हैं - समुद्री सुरक्षा; समुद्री पारिस्थितिकी; समुद्री संसाधन; क्षमता निर्माण और संसाधन साझा करना; आपदा जोख़िम में कमी लाना और आपदा प्रबंधन; विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक सहयोग; और व्यापार संपर्क और समुद्री परिवहन.[7] इस पहल की सफ़लता इस बात पर निर्भर करती है कि भारत कैसे अपने भौतिक, आर्थिक और डिजिटल कनेक्टिविटी चैनलों को मज़बूत करने की क्षमता को बढ़ाता है अथवा उसको पुख़्ता करता है. भारत के पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति, इसकी ऐतिहासिक और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता, इसे बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में भारत की कनेक्टिविटी योजनाओं और वाणिज्यिक हितों के लिए एक धुरी बनाती है. इस क्षेत्र में, ख़ासकर भारत के पूर्वोत्तर में, जापान के पास काफ़ी अनुभव है. जापान का 'मुक्त और खुला इंडो पैसिफिक' का विचार और भारत की पूर्वोत्तर को महत्व देने वाली 'एक्ट ईस्ट' और 'नेबरहुड फर्स्ट' नीतियां, रणनीतिक रूप से अभिसरण करतीं हुई अथवा एक दूसरे से मेल खाती हुई दिखती हैं.[8]

NER का अवलोकन

भारत के पूर्वोत्तर में आठ राज्य हैं- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, सिक्किम, मिज़ोरम, मेघालय और नागालैंड. यह क्षेत्र म्यांमार, चीन, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के साथ 5,812 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को साझा करता है. यह लैंडलॉक अर्थात भूमिबद्ध क्षेत्र है; आठ में से सात राज्य शेष भारत से केवल उत्तर बंगाल में सिलीगुड़ी कॉरिडोर के माध्यम से जुड़े हुए हैं. सिलीगुड़ी कॉरिडोर भूमि की एक संकीर्ण पट्टी है (22-किमी चौड़ी) जिसे 'चिकन नेक' भी कहा जाता है. यह गलियारा उत्तर में नेपाल और दक्षिण में बांग्लादेश से घिरा हुआ है.[9]

पूर्वोत्तर क्षेत्र अपनी रणनीतिक अहमियत के अलावा अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के लिए भी पहचाना जाता है. आठ राज्यों में बहुस्तरीय जातीय विविधता और मिश्रित सामाजिक-सांस्कृतिक डाइनैमिक्स अर्थात गतिशीलता है, जो उस क्षेत्र की जनसांख्यिकीय संरचना को अनूठा बनाती है. इस क्षेत्र में आने वाले राज्यों में विशिष्ट सांस्कृतिक, सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक जटिलताओं को अपने में समेटे रखने वाले अनेक जनजातीय समूहों को पाया जा सकता हैं. ये जनजातीय समूह लगभग 220 विभिन्न भाषाएं बोलते हैं.[10] ऐतिहासिक रूप से, पूर्वोत्तर क्षेत्र एक अलग और परिधीय क्षेत्र अथवा इकाई रहा है. भारत की राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था पर लंबे समय से इस क्षेत्र की उपेक्षा करने का आरोप लगाया जाता रहा है. यह क्षेत्र लंबे समय से उन्नति, विकास और कल्याण के मामले में भारत की मुख्यधारा की राजनीतिक कल्पना के हाशिए पर बना हुआ है. इस क्षेत्र में राजनीतिक हिंसा, जातीय संघर्ष, बागी आंदोलनों और अवैध सीमा पार प्रवास भी यहां के विकास में बाधक साबित हुए हैं. अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरे होने के कारण NER को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं और भी बढ़ जाती हैं.[11]

सड़क परियोजनाओं के लिए हालिया दौर में राशि आवंटन में वृद्धि हुई है. 2016 तक, सड़कों के सुधार और निर्माण के लिए अधिकतम आवंटन सालाना 4,500 करोड़ रुपये था. लेकिन अब वित्त वर्ष 2022-23 में, यह बढ़कर 13,500 करोड़ रुपये हो गया है.

ब्रिटिश शासकों ने इस क्षेत्र की संस्कृति को 'बाहरियों' से बचाने की कोशिश की थी. ऐसे में ऐतिहासिक रूप से, इनमें से कुछ राज्यों को जानबूझकर अलग-थलग भी रखा गया था. ब्रिटिश शासकों ने अधिकांश क्षेत्र को 'पिछड़े इलाकों', 'बहिष्कृत क्षेत्रों', और 'आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों' के रूप में निर्धारित किया था. ऐसा करते हुए ब्रिटिश शासकों ने यहां के मूल निवासियों को अपने मामलों को नियंत्रित करने और प्रबंधित करने की अलग-अलग स्तर तक अनुमति दे रखी थी.[12] 1873 के बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट के तहत, NER क्षेत्र में एक 'ईनर लाइन अर्थात आंतरिक रेखा' खींची गई थी. इसका उद्देश्य क्षेत्र से बाहर के लोगों, विशेष रूप से व्यावसायिक हितों वाले लोगों को सरकारी स्वीकृति के बिना यहां प्रवेश करने से प्रतिबंधित करना था.[13] आज़ादी के बाद के दौर में भी यह नीति जारी रही. आंतरिक रेखा प्रणाली को इस क्षेत्र की विविध सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय पहचान की रक्षा करने वाली रेखा के रूप में देखा जाता है.

इसके अलावा, भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में ‘‘स्वायत्त डिस्ट्रिक्ट कौंसिल अर्थात जिला परिषदों का गठन मैन्डेटिड अर्थात आज्ञापित किया गया है. इसमें अन्य बातों के साथ-साथ आदिवासी प्रथागत कानूनों को वैधता प्रदान की गई थी.’’[14] कठिन इलाके वाले पूर्वोत्तर के प्रति राजनीतिक मुख्यधारा की उदासीनता के साथ ही इस तरह के संरक्षणवादी कानून की वज़ह से ही इस क्षेत्र में औद्योगीकरण, बुनियादी ढांचे और संचार विकास, रोज़गार सृजन और शासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व की दिशा में की जा रही कोशिशों में बाधा उत्पन्न हुई है.

इस क्षेत्र में विकास को लेकर लंबे समय से चली आ रही चुनौतियों को कम करने के लिए, पूर्वोत्तर में सड़क और रेलवे के बुनियादी ढांचे में सुधार सबसे महत्वपूर्ण विकासात्मक अनिवार्यताओं में से एक बन गई है. लैंड कनेक्टिविटी अर्थात भूमि संपर्क से जुड़ी पहलों को BIMSTEC के कुछ देशों के साथ ही साऊथ एशिया सब-रिजनल इकोनॉमिक कोऑपरेशन अर्थात दक्षिण एशिया उप-क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग (एसएएसईसी) देशों के साथ मिलकर काम करके ही गति प्रदान की जा सकती है.  निम्नलिखित हिस्सों में NER क्षेत्र में ऐसे कनेक्टिविटी प्रयासों की उपलब्धियों और चुनौतियों पर चर्चा की गई हैं.

इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद ज़रूरी

व्यापार, वाणिज्य और लोगों से लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाने के लिए कनेक्टिविटी कॉरिडोर अर्थात संपर्क गलियारों की अहमियत को लेकर आज अधिक जागरुकता हो गई है. लेकिन इस कार्य को हासिल करना एक मुश्किलों से भरा काम है. भारत के NER की टोपोग्राफी अर्थात भौगोलिक स्थिति ही इस क्षेत्र में संपर्क गलियारों की राह में पेश आने वाली सबसे पहली चुनौती होगी.

सीमा पर बनाई जाने वाली सड़कों की योजना तैयार करते वक़्त शायद ही कभी बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक उद्योगों की ज़रूरतों को ध्यान में रखा गया हो. आमतौर पर इन सड़कों पर भारी परिवहन संभव नहीं हो पाता. इन सड़कों का निर्माण अक्सर स्थानीय आर्थिक गतिविधियों के घरेलू केंद्रों के बीच आंतरिक संपर्क बढ़ाने के लिए ही किया जाता है. उत्तर पूर्व में परिवर्तन दिखाई देने लगा है. जैसा कि ओआरएफ़ के पिछले आलेख में उल्लेख किया गया है, इस क्षेत्र में भारत के प्रयास ‘‘उत्तर पूर्व में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार गलियारे[15] समेत उत्तर बंगाल और भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में सड़क संपर्क का विकास और सुधार’’ करके ‘‘इन क्षेत्रों को स्थानीय आबादी के लिए समग्र आर्थिक लाभ के साथ आर्थिक रूप से मज़बूत करने, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ उन्हें और अधिक मज़बूत तरीके से एकीकृत करने’’ पर केंद्रित हैं.

2021 में, दुर्गम और दूरस्थ इलाकों में सड़कें बनाने में माहिर बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन अर्थात सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने कुल 102 परियोजनाओं को पूरा किया, जिनमें पूर्वोत्तर की अनेक परियोजनाएं शामिल हैं. इनमें फ्लैग हिल, डोकला, सिक्किम में 11,000 फीट (3,353 मीटर) की ऊंचाई पर भारत का पहला स्वदेश निर्मित क्लास 70 [a] डबल-लेन मॉड्यूलर ब्रिज और सिक्किम में ही चुंगथांग-मंगन राजमार्ग पर 578 मीटर की थेंग सुरंग का भी समावेश हैं. वर्तमान में यहां चल रही परियोजनाओं में अरुणाचल प्रदेश में 13,800 फीट (4,200 मीटर) पर रणनीतिक टिव्न-ट्यूब सेला सुरंग, और 10,000 फीट (3,048 मीटर) पर नेचिपु सुरंग शामिल हैं, जो पश्चिम कामेंग और तवांग से आगे के क्षेत्रों को कनेक्टिविटी प्रदान करेंगी.[16] यहां तक कि 2008 में बनी मेघालय की सोनापुर सुरंग ने एनएच6 के साथ कनेक्टिविटी में इज़ाफ़ा कर दिया है.

सड़क परियोजनाओं के लिए हालिया दौर में राशि आवंटन में वृद्धि हुई है. 2016 तक, सड़कों के सुधार और निर्माण के लिए अधिकतम आवंटन सालाना 4,500 करोड़ रुपये था. लेकिन अब वित्त वर्ष 2022-23 में, यह बढ़कर 13,500 करोड़ रुपये हो गया है.[17]

BIMSTEC को एक अधिक एकीकृत उन्नत और कारोबारी समूह बनाने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि इसके सदस्य देश आपस में प्रभावी रूप से जुड़े हों. टेबल 1 में उन्हें बेहतर तरीके से आपस में जोड़ने वाली सड़क परियोजनाओं की वह सूची है जो परियोजनाएं वर्तमान में चल रही हैं.

टेबल 1: भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार के बीच सीमा सड़क संपर्क परियोजनाएं*

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Table 1: Border Road Connectivity Projects* between India, Bangladesh, Nepal, Bhutan, and Myanmar
  Description Funding Organisation (tentative) Amount (in US$ million) Estimated completion year
India and Bhutan
1 Road from Gelephu (Bhutan) to Samthaibari (near Hapachara in Assam) National Highways & Infrastructure Development Corporation 117 2021 (ongoing)
2 Construction of the Samrang Jomotsangkha section (58 km) of Bhutan’s East-West Highway. Will improve accessibility along Bhutan’s southern border with India Government of India under its Project tied assistance 21 2023
3 Construction of the Lhamoizhingkha-Sarpang section of the Southern East West Highway (75 km, including 14 bridges) Yet to be finalised   2028
India and Bangladesh
4 Upgrade of NH 8 Silchar– Agartala–Sabroom (connecting Assam and Tripura) and NH 37 along with the Karimganj– Sutrakhandispur section up to the India-Bangladesh border National Highways & Infrastructure Development Corporation, along with Japan International Cooperation Agency (JICA) 610 2023
5 Four-laning of the Rangpur to Burimari Highway (128 km) in Bangladesh which connects it with Changrabandha (India) and Bhutan Asian Development Bank (ADB) 960 2023
6 Two-laning of the road from Dudhanai on the Assam– Meghalaya border to Dalu on the Meghalaya-Bangladesh border, via Bagmara, NH 217 JICA 227 2022 (ongoing)
7 Improving NH 208 between Teliamura and Harina (158 km) in Tripura JICA 285 2022 (ongoing)
8 Upgrade of the road between Kolkata and Bongaon near Petrapole on the India-Bangladesh border Government of India and JICA 130 2022 (ongoing)
9 Two-laning of the alternative route between Silchar and Guwahati via Harangajao Thuruk in Assam National Highways & Infrastructure Development Corporation 452 2022 (ongoing)
10 Developing link roads between Srirampu–Dhubri and Phulbari in Assam with Tura in Meghalaya with a new bridge across the Brahmaputra River on NH 127B JICA 530 2023
11 Improving the Manu Simlung section of NH 108  in Tripura JICA 170 2022 (ongoing)
12 Improving NH 217 between Tura and Dalu and extending it to the India-Bangladesh border JICA 79 2020 (ongoing)
13 Improving the Shillong-Dawki road in Meghalaya, including the Dawki bridge on the India-Bangladesh border JICA 31 2023
14 Building a new bridge over the Feni River at Sabroom in southern Tripura, connecting India and Bangladesh JICA 13 2020 (ongoing)
15 Building the Khowai–Agartala link road National Highways & Infrastructure Development Corporation Government of India 85 2023
16 Improving sections of NH 512 between the 82.4 km and 99.5 km mark, and between 104.2 km and 106.6 km mark in Dakshin Dinajpur, West Bengal National Highways & Infrastructure Development Corporation 21 2022 (ongoing)
17 Four-laning of the Bhanga– Bhatiapara-Kalna–Lohagora– Narail-Jashore–Benapole Highway (135 km) in Bangladesh India’s Lines of Credit 1,100 2024
India and Myanmar
18 Upgrade of the road from Dimapur (Nagaland) to Maram (northern Manipur) via Peren National Highways & Infrastructure Development Corporation 360 2023
19 Four-laning of the Imphal–Moirang highway, in Manipur ADB 180 2022 (ongoing)
20 Four-laning of the stretches from Kohima to Kedima (Nagaland), and Kromg to Imphal (Manipur) of NH 39 ADB 280 2023
21 Upgrading Ukhrul–Tolloi–Tadubi road in Manipur ADB and National Highways & Infrastructure Development Corporation 230 2023
22 Ukhrul–Jessami, NH 202 in Manipur ADB 230 2023
23 Upgrading  Jiribam–Tipaimukh road in Manipur ADB 210 2023
24 Aizawl–Tuipang road, connecting with the Kaladan Multimodal Transport Corridor JICA 946 2023
25 Improvement of the Imphal Kangchup–Tamenglong Tousem (all in Manipur) to Haflong (Assam) road National Highways & Infrastructure Development Corporation and ADB 184 2023
26 Construction  of an alternative highway to Gangtok (Sikkim) from Bagrakot and Kafer (West Bengal) National Highways & Infrastructure Development Corporation 48 2020 (ongoing)
27 Improvement of roads from Paletwa to Kaletwa and from Kaletwa to Zorinpui on the border between Chin State, Myanmar and Mizoram, as part of the Kaladan Multimodal Transit Transport project Government of India (under its development assistance) 484[18] 2023(ongoing)
28

India- Myanmar- Thailand Trilateral Highway: Improvement of the 120.74 km stretch from Kalewa-Yagyi in the Sagain region

Construction of 69 bridges along the approach road to the highway on the 149.70 km Tamu-Kyigone-  Kalewa (TKK) stretch

Government of India (under its development assistance) 1700[19] 2023 (ongoing)
India and Nepal
         
29 Development of the Siliguri– Mirik–Darjeeling link road ADB 150 2023
30 Construction of Mechi Bridge, which connects Nepal’s Jhapa district to Darjeeling in West Bengal ADB and National Highways & Infrastructure Development Corporation 25 2019

Source: ADB and BIMSTEC Reports 2022[20]

*: टेबल में उल्लेखित सभी बॉर्डर रोड्स अर्थात सीमा सड़कों का उल्लेख BIMSTEC कनेक्टिविटी मास्टर प्लान में वर्णित प्रमुख कनेक्टिविटी परियोजनाओं से लिया गया है. यह मास्टर प्लान इन सड़कों को अंतदेर्शीय कनेक्टिविटी के लिए पहुंच सड़कों के रूप में उद्धृत करता हैं. जबकि इनमें से कुछ सड़कें इंट्रा-कंट्री अर्थात अंतर-देशीय मार्ग हैं, जिनके उन्नयन से क्षेत्रीय संपर्क बढ़ेगा, क्योंकि वे सीमावर्ती सड़कें हैं.

रेलवे कनेक्टिविटी

एक तरफ बांग्लादेश, भूटान और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों और दूसरी तरफ ASEAN देशों के साथ एक साझा बाज़ार स्थापित करने के लिए पूर्वोत्तर से गुजरने वाले सड़क और रेल दोनों के ही कनेक्टिविटी कॉरिडोर बेहद महत्वपूर्ण हैं. लेकिन पहाड़ी भौगोलिक स्थिति की वज़ह से उत्तर पूर्व में रेलवे नेटवर्क बनाना एक कड़ी चुनौती है. इसके बावजूद कुछ रेलवे ट्रैक सिक्किम को छोड़कर सभी पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंच चुके हैं. सिक्किम में भी एक दशक से अधिक समय से रेलवे लाइन पर काम चल रहा है.[21]

2021 तक, भारतीय रेलवे पूर्वोत्तर में 2,008 किमी की कुल लंबाई और 75,795 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली 19 परियोजनाओं पर काम कर रही थी. ये परियोजनाएं स्वीकृति और निष्पादन के विभिन्न चरणों में हैं.[22] 2014 से, परियोजनाओं के लिए औसत राशि आवंटन में 161 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है. भूमि अधिग्रहण में दिक्कत, वन और अन्य मंजूरी में देरी के साथ ही समग्र भूगर्भीय और भौगोलिक स्थितियों की वज़ह से इन राज्यों में पहले की अनेक रेलवे परियोजनाओं में अपेक्षा से अधिक समय लगा और इनकी लागत भी कहीं अधिक रहती थी.[23]

भारत का पूर्वोत्तर में बेहतर रेल कनेक्टिविटी पर ज़ोर कई अन्य क्षेत्रीय कनेक्टिविटी पहलों के अनुरूप है. इसमें SASEC; बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल (BBIN) समूह; BIMSTEC; और दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) रेलवे गलियारा विकास योजना भी शामिल हैं. भारत और बांग्लादेश के बीच पहले से ही ट्रेन सेवाएं चल रही हैं: (a) गेदे (भारत) से दर्शना (बांग्लादेश) तक; (b) पेट्रापोल (भारत) से बेनापोल (बांग्लादेश); (c) सप्ताह में पांच दिन चलने वाली कोलकाता से ढाका तक मैत्री एक्सप्रेस; (d) कोलकाता से खुलना तक द्वि-साप्ताहिक बंधन एक्सप्रेस; और (e) न्यू जलपाईगुड़ी और ढाका छावनी के बीच चलने वाली

द्वि-साप्ताहिक मिताली एक्सप्रेस.[24] इसके साथ ही ढाका से कोलकाता के बीच बांग्लादेश के दर्शना से होकर चलने वाली एक और लिंक खोलने की भी योजना है.[25]

यह उम्मीद की जा रही है कि इन सेवाओं से द्विपक्षीय व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा. मसलन, हाल ही में शुरू की गई मिताली एक्सप्रेस की वज़ह से बांग्लादेशी पर्यटकों को भारत के पूर्वोत्तर में दार्जिलिंग, डुआर्स और सिक्किम और उत्तर बंगाल तक यात्रा करना आसान हो जाएगा. यह घरेलू रेलवे संपर्क अथवा यातायात को मज़बूत करने में भी सहायक है. क्योंकि बांग्लादेशी क्षेत्र से गुज़रने से कोलकाता और सिलीगुड़ी या न्यू जलपाईगुड़ी के बीच यात्रा के लिए लगने वाले वक़्त में चार घंटे की कटौती संभव हो गई है.

मालगाड़ियों के लिए दो और रेल लिंक - पश्चिम बंगाल में सिंघाबाद से बांग्लादेश स्थित रोहनपुर तक, और पश्चिम बंगाल में राधिकापुर से बांग्लादेश में बिरोल तक - जल्द ही चालू होने की संभावना है.

Table 2: Railway Connectivity Work in Progress

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Table 2: Railway Connectivity Work in Progress
Description Funding Organisation (tentative) Amount (in US$ million) Estimated completion year
Construction of the Bangabandhu Sheikh Mujib Railway Bridge (parallel to the Jamuna Bridge) across the Jamuna River from Sirajganj to Tangail in Bangladesh with twin dual-gauge lines JICA 1,173 2023
Construction of the Padma Bridge Rail Link from Dacca to Jashore in Bangladesh People’s Republic of China (PRC) 4,216 2022
Construction of a dual gauge railway line between Bogura and Shahid M. Monsur Ali Station, Sirajgunj in Bangladesh ILOC and Bangladesh Government 796 2022
Building of the line connecting New Belonia (in South Tripura) to Feni (in Bangladesh)    

Planning

Survey completed

Construction of the Radhikapur–Birol rail link in Bangladesh     Survey ongoing
Construction of a new 12 km rail link from Akhaura (Bangladesh) to Agartala (Tripura) India 144 2023
Construction of a new 3 km line linking Haldibari (West Bengal) to Chilahati (Bangladesh) India   2021
Construction of new lines which link Jiribam to lmphal (125 km) in Manipur and Imphal to Moreh (111 km) on the India– Myanmar border; another line linking Moreh to Tamu and KaIay (128 km) in Myanmar, and onward to Mandalay, also being built. North East Frontier Railways, India Yet to be finalised 2028
Development of (i) the Kokrajhar (Assam)–Gelephu (Bhutan) (57 km) line; (ii) the Pathsala (Assam)–Nanglam (Bhutan) (51 km) line; (iii) the Rangiya (Assam)– Samdrupjongkhar (Bhutan) (48 km) line; (iv) the Banarhat (West Bengal)–Samtse (Bhutan) (23 km) line, and (v) the Hasimara (West Bengal)–Phuentsholing (Bhutan) (18 km) line India 130 Not available
Development of (i) the Jaynagar– Bardibas line (69 km, including 3 km in India and 66 km in Nepal), (ii) the Jogbani–Biratnagar (19 km) line in Nepal, (iii) the Nepalganj to Nepalganj Road (12 km) line, (iv) the Nautanwa– Bhairahawa (15 km) in Nepal, and (v) the line from New Jalpaiguri in North Bengal to Kakarbhitta in Nepal (46 km) India 900 2025

Source: ADB and BIMSTEC Report 2022[26]

बांग्लादेश भी, बांग्लादेश की सीमा पर चिल्हाटी से पश्चिम बंगाल में हल्दीबाड़ी तक रेल लिंक का उपयोग करके भूटान तक एक लिंक बनाने का इच्छुक है. इसी लिंक पर वर्तमान में मिताली एक्सप्रेस चलती है. बांग्लादेश चाहता है कि वह इस लिंक का उपयोग करते हुए हल्दीबाड़ी से सड़क मार्ग से सीधे भूटान तक निर्माण सामग्री को पहुंचाने में सफ़ल हो जाएं. भारत में जयनगर से बिजलपुरा होते हुए नेपाल में बर्दिबास तक प्रस्तावित 68.7 किलोमीटर रेल लिंक के 35 किलोमीटर जयनगर-कुर्ता खंड का उद्घाटन अप्रैल 2022 में किया गया था.[27] भारत में जोगबनी से नेपाल में बिराटनगर (कुल लंबाई 18.6 किमी) तक एक और रेलवे लाइन का पहला आठ किलोमीटर का हिस्सा पूरा हो चुका है, और शेष हिस्से के लिए काम का आवंटन कर दिया गया हैं.

इस क्षेत्र में कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए, भारत बांग्लादेश और नेपाल के साथ सीमा पार विद्युत पारेषण लाइनों को भी वित्तपोषित अर्थात निधि मुहैया करवा रहा है. इसी प्रकार भारत, बिहार में मोतीहारी और नेपाल में अमलेखगंज के बीच दक्षिण एशिया की पहली क्रॉस-बॉर्डर पेट्रोलियम उत्पाद पाइपलाइन बिछा रहा है. इसके साथ ही भारत, बांग्लादेश में एक और हाई-स्पीड डीजल पाइपलाइन भी स्थापित कर रहा है, जो तेल परिवहन की लागत को कम करने के साथ ही सड़क पर बढ़ने वाली भीड़ में भी कमी लाने में सहायक साबित होगी. कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट भी महत्वपूर्ण है - म्यांमार में कोलकाता से सितवे बंदरगाह तक समुद्री मार्ग, सितवे से पलेटवा तक कलादान नदी तक का नदी मार्ग, और मिज़ोरम सीमा पर पलेटवा से जोरिनपुई तक का सतही मार्ग म्यांमार द्वारा बनाया जा रहा है. लेकिन यह परियोजना आंशिक रूप से भारत द्वारा वित्तपोषित है.

इन परियोजनाओं को चालू करना काफ़ी हद तक राजनीतिक इच्छाशक्ति और संबंधित देशों की आंतरिक स्थिति पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिए जैसे कि बांग्लादेश-भारत और भूटान-भारत संबंध काफ़ी हद तक वाइब्रेंट अर्थात जीवंत हैं, अत: उनकी द्विपक्षीय परियोजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं. हालांकि कभी-कभी ये परियोजनाएं समय सीमा को पूरा करने में विफ़ल हो जाती हैं. लैंड-लॉक अर्थात भूमिबद्ध नेपाल भी, माल और सेवाओं के परिवहन के लिए भारत पर निर्भर है. अत: कालापानी [b] और सुस्ता पर भारत के साथ अपने क्षेत्रीय विवादों के बावजूद, [c] नेपाल भारत के साथ सीमा पार कनेक्टिविटी विकसित करने का इच्छुक दिखाई देता है.

म्यांमार के मामले में कनेक्टिविटी सहयोग की राह में विभिन्न चुनौतियों खड़ी है. म्यांमार में वर्तमान सैन्य शासन के साथ भारत ने औपचारिक संबंध बनाए रखे हैं. लेकिन भारत और म्यांमार के बीच इन औपचारिक संबंधों के बावजूद यह बात इस तथ्य को प्रभावित नहीं करती है कि भारत की दो सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय परियोजनाएं- कलादान मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट ट्रांजिट प्रोजेक्ट और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग - म्यांमार के संघर्ष क्षेत्रों से विशेष रूप से चिन राज्य से गुज़रती हैं. क्षेत्र में सक्रिय विद्रोही समूहों की वज़ह से पलेटवा से जोरिनपुई तक 110 किलोमीटर की दूरी पर सड़क निर्माण धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है; इसी प्रकार यहां जो 25 पुल बनने हैं उनमें भी देरी हो रही है. इसके अलावा थाईलैंड के साथ व्यापार को सुगम बनाने में सहायक साबित होने वाले त्रिपक्षीय राजमार्ग पर भी काम अटका हुआ है. यह मार्ग पूरा हो गया तो दोनों देशों को पूर्वोत्तर के माध्यम से एक अधिक कुशल और लागत प्रभावी परिवहन मार्ग मिल जाएगा.

फरवरी 2021 में जब सैन्य तख़्तापलट हुआ, और जून 2022 के बीच में चिन राज्य में 35 आगजनी की घटनाओं में 1,300 स्ट्रक्चर्स अर्थात संरचनाएं क्षतिग्रस्त हुईं और जिसमें 30,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं.[28] अराकान आर्मी जैसे समूह, जिन्होंने पहले भी 2019 में भारतीय श्रमिकों को अगवा करते हुए काम बाधित किया था, अब और भी सक्रिय हो गए है. कुल मिलाकर, तख़्तापलट के बाद से ही म्यांमार एक बढ़ते प्रतिरोध आंदोलन के साथ राजनीतिक उथल-पुथल को झेल रहा है. इन प्रतिरोधी आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए सैन्य जुंटा अर्थात सैन्य शासन को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है.[29]

एक बार परियोजनाएं पूरी हो जाने के बाद, एक मोटर वाहन समझौता (MVA) - जो हस्ताक्षरकर्ता देशों के वाहनों को एक दूसरे के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति देगा - माल और लोगों की सीमा पार आवाज़ाही को भी आसान बनाने में अहम साबित होगा. इस तरह के समझौतों का मसौदा तैयार हो चुका है. एक मसौदा बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल (BBIN) के बीच तैयार है और दूसरा मसौदा भारत, म्यांमार और थाईलैंड के बीच तय हो चुका है. लेकिन उन पर हस्ताक्षर नहीं हो सके है. इसका कारण यह है कि भूटान और थाईलैंड दोनों की ही कुछ चिंताओं पर अभी तक कोई हल नहीं निकल पाया है. सड़क यातायात में संभावित वृद्धि से जुड़ी पर्यावरण संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए भूटान ने बीबीआईएन एमवीए से हाथ खींच लिया है. (BIMSTEC MVA पर भी विचार करने की योजना है, लेकिन भूटान उपरोक्त कारणों से उस पर भी आपत्ति जता सकता है.) थाईलैंड को इस बात की चिंता है कि MVA के कारण स्थानीय खिलाड़ियों अर्थात स्थानीय कारोबार को नुकसान पहुंच सकता है. बांग्लादेश, भारत और नेपाल द्वारा जल्द ही एमवीए को लागू करने की उम्मीद है.[30],[31]

कनेक्टिविटी की दिशा में जापान की पहल

भारत के पूर्वोत्तर से जापान का संबंध द्वितीय विश्व युद्ध के समय से जुड़ा है, जब उसने कोहिमा और इंफाल के आसपास महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ी थी. हाल के दिनों में, जापान ने अपने विदेशी विकास सहायता (ODA) कार्यक्रम के माध्यम से पूर्वोत्तर में निवेश किया है.[32]

सितंबर 2017 में भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और जापान की फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक पॉलिसी पर आधारित दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग का मंच भारत-जापान एक्ट ईस्ट फोरम स्थापित किया गया था. इसे भारत के पूर्वोत्तर में विकासात्मक बुनियादी ढांचे की सुविधा मुहैया करने और सांस्कृतिक संपर्क परियोजनाएं की पहचान करने को कहा गया है.[33] कोविड 19 की महामारी के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उपजी स्थिति को देखते हुए भारत अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक भागीदारी चाहता है. इस दिशा में भारत के प्रयासों को पूरा करने के लिए जापानी कारोबारी इच्छुक हैं.[34] दोनों देशों के बीच सहयोग का व्यापक उद्देश्य उनके साझा हितों को बढ़ावा देना और मूल शक्तियों को समाहित करना भी है.

चित्र1: भारत के पूर्वोत्तर में प्रमुख ओडीए परियोजनायें

[ Source: JICA[35]

अपनी जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) के माध्यम से, जापान टेबल 1 और 2 में सूचीबद्ध कई कनेक्टिविटी परियोजनाओं में भारत की सहायता कर रहा है. विशेष रूप से जापान, पूर्वोत्तर में पर्वतीय क्षेत्रों में राजमार्गों को विकसित करने के लिए तकनीकी और क्षमता संबंधी जानकारी भी मुहैया करवा रहा है.

अप्रैल 2015 में, भारत और जापान ने 'भारत-जापान निवेश और व्यापार संवर्धन और एशिया प्रशांत आर्थिक एकीकरण के लिए कार्य एजेंडा' पर हस्ताक्षर किए थे. इसके तहत जापान, भारत में जापानी औद्योगिक टाउनशिप (JIT) [d] विकसित करेगा, जहां भारत में काम करने वाली जापानी कंपनियां स्थापित होंगी. अब तक 114 जापानी कंपनियों को जगह देने वाली 12 जेआईटी को आठ भारतीय राज्यों में स्थापित किया जा चुका है. असम में गुवाहाटी से 100 किमी पश्चिम में नागरबेरा में एक और JIT के लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया है, लेकिन इसका निर्माण कार्य अभी शुरू होना है.[36]

चित्र-2: JIT परियोजनाओं के स्थान

Figure 2: Location of JIT Projects

Source: Ministry of Commerce and Industry in India[37]

 

निष्कर्ष

ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित पूर्वोत्तर भारत का पिछले कुछ दशकों में महत्व बढ़ा है. इसका श्रेय आंशिक रूप से भारत सरकार की ओर से अपनाई गई 'Act East' नीति के तहत इस क्षेत्र को दी जा रही प्राथमिकता को जाता है. इसके साथ ही इंडो-पैसिफिक अर्थात भारत-प्रशांत क्षेत्र की पॉलिटिकल डायनैमिक्स अर्थात क्षेत्र की राजनीतिक गतिशीलता की वज़ह से भी भारत की क्षेत्रीय संयोजकता (कनेक्टिविटी) महत्वकांक्षाओं की दृष्टि से पूर्वोत्तर भारत एक महत्वपूर्ण कनेक्टिंग स्पेस अर्थात संपर्क क्षेत्र के रूप में उभरा है. इसी वज़ह से इस क्षेत्र में अवसंरचनात्मक और आर्थिक पहलों में वृद्धि देखी जा रही है. इन पहलों को विशेषत: जापान जैसे विशेष भागीदार उत्प्रेरित अथवा गति देने का काम कर रहे हैं.

भारत को अभी भी पूर्वोत्तर में अधिक रिस्पॉन्सिव अर्थात प्रतिक्रियाशील पारिस्थितिकी तंत्र की ज़रूरत है. विकासात्मक योजना के लिए एक बॉटम्स अप अर्थात नीचे से ऊपर का दृष्टिकोण, इन प्रयासों को अधिक टिकाऊ, सार्थक और कुशल बनाने में सहायक साबित होगा. मसलन, इस क्षेत्र के नागरिकों ने जहां कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर हाल ही में दिए जा रहे ज़ोर का स्वागत किया है, वहीं उन्होंने यह चिंता भी व्यक्त की है कि इंट्रा-नॉर्थईस्ट अर्थात अंतर-पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है. इसके साथ ही इस क्षेत्र से जुड़े आंतरिक सुरक्षा के जटिल मुद्दे अभी भी कायम हैं.

वर्तमान में चल रही रेल और सड़क परियोजनाओं के लिए क्षमता निर्माण और पर्याप्त भंडारण सुविधाओं के साथ बेहतर सीमा अवसंरचना का निर्माण किया जाना भी ज़रूरी है. भारत ने कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट ऑफ गुड्स अंडर कवर ऑफ़ टीआईआर कारनेट (जिसे TIR कन्वेंशन कहा जाता है) के तहत माल के अंतर्राष्ट्रीय परिवहन पर कन्वेंशन की पुष्टि की है. [e] यह टीआईआर कन्वेंशन वैश्विक व्यापार को सुगम बनाता है, लेकिन बांग्लादेश और म्यांमार ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की हैं. इन दोनों ही देशों से भारत को इसकी पुष्टि करने का आग्रह करना चाहिए. इसी प्रकार इस क्षेत्र में डिजिटल कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर अर्थात डिजिटल अवसंरचना को भी मज़बूत किया जाना आवश्यक है.

NER के माध्यम से माल और लोगों की निर्बाध आवाज़ाही सुनिश्चित करने के लिए BIMSTEC और BBIN दोनों के ही MVA को जल्द से जल्द निर्णायक अंजाम तक पहुंचाना आवश्यक हैं. नीति निमार्ताओं को पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए वीज़ा आवश्यकताओं को आसान बनाने को प्राथमिकता देनी चाहिए. इस दिशा में कुछ डेस्टिनेशन अर्थात गंतव्य स्थलों के लिए वीज़ा-मुक्त या वीज़ा-ऑन-अराइवल योजनाओं पर विचार किया जा सकता है. इन सारी बातों अथवा पहलों का उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी क्षमता के निर्माण के लिए बहुआयामी प्रयासों का दोहन करना होना चाहिए.


Endnotes

[a] Class 70 bridge is one which can bear a load of up to 70 tonnes.

[b] The dispute centres around the origin of the Kali River, which marks the India-Nepal border along Pithoragarh district in Uttar Pradesh, and after which Kalapani is named. The countries differ on its origin, and accordingly, on the areas that should be part of either country.  In 2020, the dispute deepened, with both countries providing contending maps.

[c] The dispute over the Susta region, currently part of West Champaran district in Bihar, has arisen following a change in the course of the Gandak River which marked the boundary of the two countries.

[d] JITs provide special facilities for Japanese companies such as translation serrvices and facilitation support, infrastructural support, residential clusters, and other incentives.

[e] The TIR Convention, adopted under the aegis of the UN in March 1978, aims to facilitate international transit by simplifying Customs procedures and providing an international guarantee system. So far 68 of the 193 UN member countries have ratified it.

[1] Ambar Kumar Ghosh and Anasuya Basu Ray Chaudhury, “The Role of India’s Northeast in the Regional Cooperation Architecture”, Observer Research Foundation Special Report, June 30, 2021.

[2] Anasua Basu Ray Chaudhury and Ambar Kumar Ghosh, “Situating India’s Northeast in the Bay of Bengal Regional Architecture”, Observer Research Foundation GP Series, September 27, 2022.

[3]  Rakhahari Chatterji & Anasua Basu Ray Chaudhury, Reimagining BIMSTEC: Strengthening Regional Solidarity Across the Bay of Bengal, Observer Research Foundation, February 22, 2021.

[4] Udayan Das, “What is the Indo-Pacific”, The Diplomat, July 13, 2019.

[5]  Darshana M Barua, “India in the Indo-Pacific: New Delhi’s Theater of Opportunity”, Carnegie Endowment for International Peace, June 30, 2020.

[6]India supports ASEAN’s unity, centrality in free and open Indo-Pacific”, The Print, August 5, 2022.

[7]  Premesha Saha and Abhishek Mishra, “The Indo-Pacific Oceans Initiative: Towards a Coherent Indo-Pacific Policy for India”, Observer Research Foundation Occasional Paper 292, December 23, 2020.

[8] Rupakjyoti Borah, “Japan’s Infrastructure Investment in Northeast India”, The Diplomat, February 8, 2022.

[9] Pratim Ranjan Bose, “Connectivity is No Panacea for an Unprepared Northeast India”, Strategic Analysis, 43, No. 4, (2019) 335–341

[10] Raile Rocky Ziipao, “Roads, tribes, and identity in Northeast India”, Asian Ethnicity, 2020, VOL. 21, NO. 1, 1–21

[11] Sanjib Baruah, Durable Disorder: Understanding the Politics of Northeast India, Oxford University Press, 2007

[12]  “Explained: What is the Inner Line Permit System, and northeast states’ concerns over it?”, The Indian Express, December 5, 2019.

[13] “Explained: What is the Inner Line Permit System, and northeast states’ concerns over it?”

[14]  Pradip Phanjoubam, “India at 75: The fragility of the Northeast’s integration”, The Hindu, August 16, 2022.

[15] Ambar Kumar Ghosh and Anasua Basu Ray Chaudhury, “Situating India’s Northeast in the Bay of Bengal Regional Architecture”,

[16]  Sandip Dighe, “Border Roads Organisation blazes a trail in most testing conditions”, The Times of India, November 18, 2022.

[17]  Sandip Dighe, “Border Roads Organisation blazes a trail in most testing conditions”, s

[18] Ministry of External Affairs, Government of India; “Indian firm appointed for road building under the Kaladan project in Myanmar”, Mizzima, February 28, 2022.

[19] Ministry of External Affairs, Government of India.

[20]  “BIMSTEC Master Plan for Transport Connectivity”, ADB, April 2022.

[21] Myithili Hazarika, “Sikkim could finally be added to India’s rail map by 2022, 13 years after project began”, The Print, August 8, 2020.

[22]Ongoing Railway Projects in Hilly Regions”, Ministry of Transport, Government of India, New Delhi, February 3, 2021.

[23] Ministry of Transport, Government of India, New Delhi, February 3, 2021.

[24] Sohini Bose and Prathana Sen, “Mitali Express: Implications for India–Bangladesh and sub-regional connectivity”, Observer Research Foundation, August 5, 2022.

[25]  “Bangladesh keen to import high-quality train coaches from India”, Newsonair, July 18, 2022.

[26]  “BIMSTEC Master Plan for Transport Connectivity”, ADB, f

[27]Commencement of Train Operations on Jaynagar (Bihar – India) – Kurtha (Nepal) Section.”, Konkan Railway Corporation Ltd., April 2, 2022.

[28]POWs Reveal Names of Junta Captains Who Reduced Chin Town of 10,000 to Ashes”, The Irrawaddy, February 13, 2023.

[29] Sreeparna Banerjee, “India’s Connectivity Projects with Myanmar, Post-Coup: A Stocktaking”, Observer Research Foundation, February 22, 2023.

[30]  Suhasini Haider, “Bangladesh, India, Nepal move ahead on motor vehicle agreement project”, The Hindu, March 9, 2022.

[31]Thailand expresses concern over BIMSTEC motor vehicle pact”, Business Standard, April 11, 2018.

[32] Titli Basu, “Japan in India’s Northeast: The Indo-Pacific Connect”, IDSA, April, 2022.

[33] Ministry of External Affairs, Government of India.

[34]India, Japan looking at working together in Bangladesh and Myanmar: Jaishankar”, Hindustan Times, 18 September 2020.

[35] Presentation of Watanabe Jun, JICA, Building Connectivity in Northeast India, November 3, 2022, for Conference held on 3 November.

[36] Rahul Chanda, “No Progress in Japanese Township project work in Assam”, G Plus, October 12, 2022.

[37]Update on Japan Industrial Townships in India”, Department for Promotion of Industry & Internal Trade Ministry of Commerce and Industry India, December 2021.

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