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वक्त आ गया है जब भारत को अपनी यह ऐतिहासिक झिझक छोड़कर ताइवान का हाथ थामना चाहिए और उसके साथ साझेदारी की नई, बेहतर पारी शुरू करनी चाहिए.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ताइवान को चीन में मिलाने को लेकर समय-समय पर बयानबाजी करती रही है. ऐसे में ताइवान की जनता अपने वोटिंग बिहेवियर से उसे बार-बार धता बताती रही है. इस बार भी ताइवानी मतदाताओं ने संप्रभुता समर्थक डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) के विलियम लाई को अपना नेता चुना है. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कहा कि वह यथास्थिति बनाए रखेंगे और चीनी खतरे से ताइवान को बचाएंगे.
अगर पेइचिंग ने इन चुनावों को युद्ध और शांति में से एक चुनने का मौका बताया था और स्वतंत्रता पर लाई के विचारों की वजह से उन्हें गड़बड़ियां पैदा करने वाला करार दिया था तो ताइवानियों ने भी लाई को विजेता बनाकर अपना इरादा स्पष्ट कर दिया है. लाई हालांकि अतीत में ताइवानी स्वतंत्रता के पक्ष में बोलते रहे हैं, लेकिन हालिया जीत के बाद वह थोड़े संयत नजर आए. उन्होने चीन के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई.
इस बार भी ताइवानी मतदाताओं ने संप्रभुता समर्थक डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (DPP) के विलियम लाई को अपना नेता चुना है. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कहा कि वह यथास्थिति बनाए रखेंगे और चीनी खतरे से ताइवान को बचाएंगे.
हालांकि राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन (DPP) के दो कार्यकाल और लाई की ताजा जीत के बाद ताइवान चीनी ख्वाहिशों के विरोध की राह पर काफी आगे बढ़ चुका है. चुनावों से ठीक पहले चीनी फौज ने चेतावनी जारी की थी कि वह ताइवान की स्वतंत्रता की किसी भी ‘साजिश’ को कुचल डालेगी. यही नहीं, चीन के ताइवानी मामलों के कार्यालय ने ताइवानी मतदाताओं को आगाह किया था कि वे सोच-समझ कर वोट दें. मतदाताओं ने इस धमकी का जवाब अपने लोकतांत्रिक मूल्यों का जश्न मनाकर दिया.
देखा जाए तो घरों की बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी के ऊंचे होते स्तर और आर्थिक विकास की उम्मीद से कम रफ्तार के चलते देश में आर्थिक चिंताएं भी बढ़ रही हैं, लेकिन ताइवानी वोटरों ने लाई को जिताकर बताया है कि वे किसी भी सूरत में अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाएं नहीं छोड़ने वाले. वह भी तब, जबकि पेइचिंग ने अपनी दुष्प्रचार मुहिम के जरिए नेताओं को निशाना बनाने और सैन्य व आर्थिक दबावों के जरिए नतीजों को प्रभावित करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी.
ताइवान और चीन के पुनर्मिलन को ऐतिहासिक रूप से अनिवार्य बताने वाले चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए ये चुनाव नतीजे इस बात की चेतावनी है कि उनकी नीतियां और कारगुजारियां उलटे नतीजे देते हुए ऐसा माहौल बना रही हैं जिसमें उन्हें मिलने वाला झटका न्यू नॉर्मल माना जाने लगा है. हालांकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ताइवान के नतीजों को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि वहां सत्तारूढ़ DPP को जनमत की मुख्यधारा का समर्थन हासिल नहीं है.
ताइवान के नतीजे अब न केवल इस द्वीप को लेकर बल्कि पूरे हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन के सामरिक तेवर तय करेंगे. खासकर इसलिए क्योंकि चीन-अमेरिका रिश्ते भी बदलाव से गुजर रहे हैं. उथल-पुथल के लंबे दौर के बाद हाल के दिनों में अमेरिका और चीन के रिश्तों को स्थायित्व देने के कुछ प्रयास हुए हैं. हालांकि DPP की लगातार तीसरी जीत के बाद इस रिश्ते के केंद्र में फिर से ताइवान का मसला आ गया है. अमेरिका से पूर्व वरिष्ठ ऑफिसरों का एक प्रतिनिधिमंडल दोनों देशों के भावी रिश्तों के स्वरूप पर बातचीत के लिए जल्दी ही ताइवान जाने वाला है.
भारत के लिए मौका
भारत के सामने ताइवान के साथ अपने संबंधों को कई मोर्चों पर मजबूत बनाने का अच्छा मौका है. चाहे दोनों देशों के लोगों के संबंधों की बात हो या आर्थिक रिश्तों की और चाहे हाई एंड टेक्नॉलजी की बात हो या शिक्षा की- हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की काफी संभावना है. भारत उन चंद देशों में शामिल है, जो ताइवान के लिए चीन पर अपनी निर्भरता कम करने में खासा मददगार साबित हो सकता है.
क्षेत्रीय एकीकरण
जब से राष्ट्रपति त्साई सत्ता में आईं, उन्होंने क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने के लिहाज से ‘न्यू साउथ बाउंड पॉलिसी’ पर जोर दिया. भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के साथ इसका आसानी से तालमेल बनाया जा सकता है. अब राष्ट्रपति लाई के कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंधों के मौजूदा ढांचे पर काम करते हुए इसे आगे बढ़ाना होगा.
जब से राष्ट्रपति त्साई सत्ता में आईं, उन्होंने क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने के लिहाज से ‘न्यू साउथ बाउंड पॉलिसी’ पर जोर दिया. भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के साथ इसका आसानी से तालमेल बनाया जा सकता है.
शुरुआत दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने से की जा सकती है. भारत योग और आयुर्वेद सीखने के इच्छुक ज्यादा से ज्यादा ताइवानी युवाओं को स्कॉलरशिप मुहैया करा सकता है. दूसरी ओर, ताइवानी यूनिवर्सिटीज इंडियन स्टूडेंट्स के लिए बढ़िया एजुकेशनल डेस्टिनेशन हो सकती हैं.
सदियों पहले चीनी भिक्षु शुआन चैंग बैद्ध धर्म के अध्ययन के लिए भारत आए थे. उनकी अस्थियां ताइवान के सन-मून टेंपल में रखी हैं. भारत और ताइवान मिलकर ताइवान के सन-मून टेंपल को बोध गया जैसे स्थानों से जोड़ते हुए बौद्ध टूरिज्म सर्किट बना सकते हैं.
दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाते हुए यह देखा जा सकता है कि सप्लाई चेन को चीन से हटाने में भारत किस हद तक उपयोगी साबित हो सकता है. ताइवान से आर्थिक सहयोग भारत के लिए इस लिहाज से भी लाभदायक होगा कि ताइवान फिनिश्ड प्रॉडक्ट्स के बजाय महत्वपूर्ण अवयवों का निर्यात करता है. मतलब यह कि इससे भारत के स्मॉल स्केल इंडस्ट्री सेक्टर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के आसार नहीं हैं.
लंबे अर्से से भारत ने ताइवान से यह सोचकर दूरी बनाए रखी कि कहीं चीन को बुरा न लगे. इसका जवाब चीन ने भारतीय हितों को लगातार निशाना बनाकर दिया है. शायद वक्त आ गया है जब भारत को अपनी यह ऐतिहासिक झिझक छोड़कर ताइवान का हाथ थामना चाहिए और उसके साथ साझेदारी की नई, बेहतर पारी शुरू करनी चाहिए.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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