अफ़ग़ानिस्तान में इस वक़्त, उसके पड़ोसी मध्य एशियाई देशों, पाकिस्तान और चीन के शिंजियांग वीगर स्वायत्तशासी क्षेत्र के दस हज़ार से ज़्यादा विदेशी लड़ाकों की मौजूदगी की बात सामने आई है.
तालिबान ने जिस नाटकीय ढंग से अफ़ग़ानिस्तान पर दोबारा क़ब्ज़ा किया है, उससे मध्य एशियाई गणराज्यों (CARs) की स्थिरता, सुरक्षा, भू-सामरिक रणनीति और जियोपॉलिटिक्स को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. अफ़ग़ानिस्तान में इस वक़्त, उसके पड़ोसी मध्य एशियाई देशों, पाकिस्तान और चीन के शिंजियांग वीगर स्वायत्तशासी क्षेत्र के दस हज़ार से ज़्यादा विदेशी लड़ाकों की मौजूदगी की बात सामने आई है. ये डरावनी हक़ीक़त, हाल ही में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट से उजागर हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक़, इनमें से ज़्यादातर विदेशी लड़ाके तालिबान, अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (ISKP) से जुड़े हुए हैं. इसके अलावा, अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा उठा-पटक के बीच, वहां मध्य एशिया के अन्य आतंकी संगठनों जैसे कि इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ उज़्बेकिस्तान (IMU) इस्लामिक जिहाद यूनियन (IJU) और जमात अंसारुल्लाह से जुड़े आतंकवादियों की मौजूदगी का असर, पड़ोस के मध्य एशियाई देशों में फैलने की आशंका को बढ़ा दिया है.
मध्य एशियाई देशों कज़ाख़िस्तान, किर्गीज़िस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान का जन्म 1991 में पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद हुआ था. 1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में आतंकवाद के उभार का इन नए और आर्थिक रूप से कमज़ोर मध्य एशियाई देशों पर भी असर पड़ा था. अफ़ग़ानिस्तान- पाकिस्तान सीमा पर लंबे समय तक रही अराजकता और उससे पैदा हुई अनिश्चितता के चलते ही मध्य एशिया में IMU और IJU जैसे आतंकवादी संगठनों का जन्म हुआ. इनसे क्षेत्र से सौहार्द्र और स्थिरता को ख़तरा पैदा हो गया. मध्य एशिया और ख़ास तौर से ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और किर्गीज़िस्तान में हथियारबंद घुसपैठ में नाकाम रहने के बाद IMU और IJU ने ख़ास तौर से अफ़ग़ानिस्तान को अपना ठिकाना बना लिया था. पिछले 20 साल के दौरान जब अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिका का नियंत्रण था, तो इन आतंकवादी संगठनों को भारी नुक़सान हुआ और उन्हें पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान इलाक़े में पनाह लेनी पड़ी थी.
1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में आतंकवाद के उभार का इन नए और आर्थिक रूप से कमज़ोर मध्य एशियाई देशों पर भी असर पड़ा था. अफ़ग़ानिस्तान- पाकिस्तान सीमा पर लंबे समय तक रही अराजकता और उससे पैदा हुई अनिश्चितता के चलते ही मध्य एशिया में IMU और IJU जैसे आतंकवादी संगठनों का जन्म हुआ.
जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान दोबारा ताक़तवर होने लगा, तो मध्य एशिया के इन आतंकवादी संगठनों ने कट्टरपंथियों की मदद से अपनी गतिविधियां दोबारा शुरू कर दीं. 2013 के आते आते IMU और IJU के लगभग तीन हज़ार लड़ाके तालिबान, तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और अल-क़ायदा के साथ मिलकर अफ़ग़ानिस्तान में लड़ाई लड़ रहे थे. अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाक़ों को अपना ठिकाना बनाकर, इन आतंकी संगठनों ने मध्य एशियाई गणराज्यों में 19 आतंकवादी हमले किए. ख़ास तौर से कज़ाख़िस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गीज़िस्तान में 2008 से 2018 के बीच हुए इन हमलों में 138 लोगों की जान चली गई. इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशियाई देशों की सीमा पर भी हथियारबंद हिंसा में इज़ाफ़ा देखा गया. इसके अलावा, मध्य एशियाई देशों की दमनकारी नीतियों के चलते पूरे मध्य एशिया में कट्टरपंथ और उग्रवादी विचारधारा में ज़बरदस्त उभार दर्ज किया गया है. ख़बरों के मुताबिक़ मध्य एशियाई देशों से चार हज़ार से ज़्यादा लोग सीरिया और इराक़ गए, जिससे वो इस्लामिक स्टेट (ISIS) और जबात फतेह में शामिल हो सकें. हालांकि सीरिया और इराक़ में उलटफेर के बाद 2018 में इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत ने एक वीडियो संदेश के ज़रिए, मध्य एशिया के इन लड़ाकों में से ज़्यादातर को इस्लामिक स्टेट और जबात फतेह छोड़कर अफ़ग़ानिस्तान की जंग में शामिल होने के लिए राज़ी करने में कामयाबी हासिल कर ली.
इन हालात को देखते हुए, अफ़ग़ानिस्तान के समीकरण में आए नाटकीय बदलाव ने मध्य एशियाई देशों की चिंता को बढ़ा दिया है. इसकी वजह ये है कि ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान की 2387 किलोमीटर लंबी और आसानी से पार की जा सकने वाली सीमा अफ़ग़ानिस्तान से लगती है. जब से तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में अपना अभियान तेज़ किया था, तब से हज़ारों अफ़ग़ान नागरिकों और उसके सैनिकों के तालिबान की बर्बरता से बचने के लिए सीमा पार करके मध्य एशियाई देश पहुंचने की ख़बरें आई हैं.
सुरक्षा के बिगड़ते हालात और मध्य एशिया के आतंकवादी संगठनों की मौजूदगी ने मध्य एशियाई गणराज्यों को तालिबान से संपर्क साधने को मजबूर किया है. ताजिकिस्तान ने तो अपनी सेना के एक लाख सक्रिय सदस्यों और एक लाख तीस हज़ार रिज़र्व सैनिकों और अधिकारियों को 22 जुलाई को सक्रिय किया और इनमें से बीस हज़ार सैनिकों को अफ़ग़ान सीमा पर भेजा है. अपने पड़ोस में इस तनाव को बड़े संघर्ष में तब्दील होने से रोकने के लिए रूस ने भी ताजिक- अफ़ग़ान सीमा पर अपने सैन्य उपकरण भेजे हैं. रूस ने ये क़दम साझा सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) के तहत उठाया है. रूस ने अफ़ग़ान सीमा से 20 किलोमीटर की दूरी पर उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के साथ सैन्य अभयास किया है, ताकि वो तालिबान या किसी अन्य संगठन के किसी भी दुस्साहसिक क़दम उठाने से पहले ही अपनी तैयारियों का संकेत साफ़ तौर पर दे सके.
इस क्षेत्र के नेता आतंकवादियों के बढ़ते प्रभाव और असुरक्षित सीमा के पार से आतंकवाद के विस्तार को लेकर तो चिंतित हैं ही; इसके अलावा वो अफ़ग़ानिस्तान के हालात के इसके क्षेत्रीय भू-सामरिक और भू-आर्थिक प्रभावों को लेकर भी फ़िक्रमंद हैं.
छह अगस्त को मध्य एशियाई गणराज्यों के नेता तुर्कमेनिस्तान में मिले थे. इन नेताओं ने अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा के बढ़ते संकट के बीच क्षेत्रीय सहयोग को मज़बूत करने और इलाक़े की चुनौतियों के मिलकर निपटने के मसले पर चर्चा की. इन नेताओं ने अफ़ग़ानिस्तान की अस्थिरता पर चिंता जताई और अफ़ग़ानिस्तान के भीतर और मध्य एशियाई गणराज्यों की सीमा पर मध्य एशिया के आतंकवादी संगठनों की मौजूदगी को लेकर भी चर्चा की. इस क्षेत्र के नेता आतंकवादियों के बढ़ते प्रभाव और असुरक्षित सीमा के पार से आतंकवाद के विस्तार को लेकर तो चिंतित हैं ही; इसके अलावा वो अफ़ग़ानिस्तान के हालात के इसके क्षेत्रीय भू-सामरिक और भू-आर्थिक प्रभावों को लेकर भी फ़िक्रमंद हैं. ताजिक आतंकवादी संगठन जमात अंसारुल्लाह के दोबारा ताक़तवर होने के चलते ताजिकिस्तान तो ख़ास तौर से चिंतित है. इस संगठन को अफ़ग़ानिस्तान में ‘ताजिक तालिबान’ के नाम से जाना जाता है. तालिबान ने जमात अंसारुल्लाह को सामरिक रूप से अहम अफ़ग़ानिस्तान की उत्तरी सीमा की ज़िम्मेदारी दे रखी है.
वहीं दूसरी तरफ़, साझा सैन्य अभ्यास में शामिल होने के बावजूद, उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान ने तालिबान के प्रतिनिधिमंडल की मेहमाननवाज़ी की है. दोनों देश, भू-सामरिक और भू-आर्थिक कारणों से तालिबान के साथ अपने रिश्ते मज़बूत बनाए रखना चाहते हैं. उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान, अपने व्यापार को जारी रखने और ऊर्जा संपर्कों को बनाए रखने के लिए एक स्थिर अफ़ग़ानिस्तान पर निर्भर हैं. उज़्बेकिस्तान को दक्षिणी मध्य एशियाई आर्थिक कनेक्टिविटी, व्यापार और आवागमन के लिए तालिबान से सहयोग की ज़रूरत है. इसी तरह तुर्कमेनिस्तान को अपने प्राकृतिक संसाधनों के निर्यात और ऊर्जा निर्यात में विविधता लाने के लिए सुरक्षा की दरकार है. उदाहरण के लिए मध्य एशिया- दक्षिण एशिया बिजली भेजने की परियोजना (CASA-1000), तुर्कमेनिस्तान- अफ़ग़ानिस्तान- पाकिस्तान- भारत गैस पाइपलाइन परियोजना और तुर्कमेनिस्तान- अफ़ग़ानिस्तान- पाकिस्तान ऊर्जा के आपसी संपर्क (TAP) की परियोजना में निवेश और इन्हें लागू करने के लिए, तुर्कमेनिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता और सुरक्षा की ज़रूरत है.
असुरक्षित सीमा और नई ताक़त से लैस आतंकवादी संगठनों का मध्य एशियाई गणराज्यों की स्थिरता और सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. हालांकि, तालिबान ने मध्य एशियाई देशों को भरोसा दिया है कि वो अपने किसी पड़ोसी देश के आतंकी संगठन को अपनी सीमा के भीतर या सरहद के पास जंग नहीं छेड़ने देंगे.
अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद मध्य एशिया के आतंकी संगठन ख़ुद को नए सिरे से संगठित करने के लिए तालिबान को समर्थन देंगे, जिससे वो अफ़ग़ानिस्तान से यूरोप की सीमा तक इस्लामिक ख़िलाफ़त स्थापित करने के विचार में नई जान डाल सकें. असुरक्षित सीमा और नई ताक़त से लैस आतंकवादी संगठनों का मध्य एशियाई गणराज्यों की स्थिरता और सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. हालांकि, तालिबान ने मध्य एशियाई देशों को भरोसा दिया है कि वो अपने किसी पड़ोसी देश के आतंकी संगठन को अपनी सीमा के भीतर या सरहद के पास जंग नहीं छेड़ने देंगे. लेकिन, मध्य एशिया के ज़्यादात देशों में ग़रीबी, मानव अधिकारों के उल्लंघन और भ्रष्टाचार के चलते अफ़ग़ानिस्तान का असर इन देशों पर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. अफ़ग़ानिस्तान से बोरिया बिस्तर समेटने के दौरान अमेरिकी सेना ने जो आधुनिक हथियार वहां छोड़ दिए थे, उन्हें हासिल करने के बाद इन आतंकी संगठनों द्वारा क्षेत्र भर के पहले से पेचीदा हालात को और भी जटिल बना देने का ख़तरा मंडरा रहा है.
मध्य एशियाई देश चीन की औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं से निपटने के लिए कनेक्टिविटी के मार्गों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा के तेज़ी से बदलते हालात उनकी इन कोशिशों को भी सीमित कर देंगे.
मध्य एशियाई देश चीन की औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं से निपटने के लिए कनेक्टिविटी के मार्गों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा के तेज़ी से बदलते हालात उनकी इन कोशिशों को भी सीमित कर देंगे. उदाहरण के लिए मध्य एशियाई देशों ने क्षेत्र से ऊर्जा के निर्यात में विविधता लाने के लिए, भारत द्वारा विकसित किए जा रहे ईरान के चाबहार बंदरगाह में दिलचस्पी दिखाई है, जिससे वो चीन पर अपनी निर्भरता को संतुलित कर सकें. उज़्बेकिस्तान ने 2011 में एशियाई विकास बैंक की वित्तीय मदद से अफ़ग़ानिस्तान के मज़ार-ए-शरीफ़ शहर से उज़्बेक- अफ़ग़ान सीमा पर स्थित हैरातन क़स्बे तक 75 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन भी बिछाई है. लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान के नाज़ुक सुरक्षा हालात से ऐसे भू-सामरिक और भू-आर्थिक क़दम पीछे खींचने की आशंका बढ़ गई है, क्योंकि ऐसी परियोजनाओं को आतंकवादी संगठनों से नुक़सान पहुंचने का ख़तरा पैदा हो गया है. इससे मध्य एशिया के तानाशाही शासक न केवल सुरक्षा के मसले पर चीन और रूस पर और अधिक निर्भर होंगे, बल्कि वो आतंकवाद का ख़ौफ़ दिखाकर वो अपने नागरिकों को दबा सकेंगे. आतंकवाद के ख़तरे से इन नेताओं को अपने नागरिकों के अधिकार सीमित करने का बहाना मिल जाएगा. हाल के वर्षों में इन दमनकारी नीतियों ने न केवल लोगों की शिकायतों को बढ़ा दिया है, बल्कि इस वजह से आतंकवादी संगठनों में भर्ती होने में भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है.
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Ayjaz Wani (Phd) is a Fellow in the Strategic Studies Programme at ORF. Based out of Mumbai, he tracks China’s relations with Central Asia, Pakistan and ...
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