Author : Swati Prabhu

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 05, 2024 Updated 0 Hours ago

ग्रीन डील जलवायु परिवर्तन पर यूरोपियन यूनियन (EU) के दृष्टिकोण को दिखाती है. लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि वित्तीय मदद से वो बाकी देशों को इसके लिए कैसे तैयार करता है?

ग्रीन डील पर सहयोगियों को समझाना यूरोपियन यूनियन (EU) के लिए बड़ी चुनौती

2019 में यूरोपियन यूनियन (EU) ने जिस ग्रीन डील का ऐलान किया था, उसी को आगे बढ़ाते हुए अक्टूबर 2023 में फिट फॉर 55 पैकेज जारी किया गया. इस दस्तावेज़ में वो सुझाव और कानून हैं, जिनका पालन करते हुए यूरोप को 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 55 फीसदी की कमी लानी है. लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, मानवाधिकारों का पालन, शांति और स्थिरता बनाए रखते हुए उसे ये लक्ष्य हासिल करना है. इस फैसले की एक वजह ये भी है दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों, खासकर अफ्रीका, एशिया और अमेरिका पर ईयू का काफी राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव है. पिछले कई साल से इन क्षेत्रों के विकास में यूरोपियन यूनियन (EU) ने जो सहयोग दिया है, उससे ये बात समझी जा सकती है. 

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक जलवायु पूंजी कोष के लिए यूरोपियन यूनियन (EU), यूरोपियन इंवेस्टमेंट बैंक और यूरोप की दूसरी संस्थाओं ने 28.5 अरब यूरो की मदद दी. इसमें से 54 फीसदी राशि इन देशों की अर्थव्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढालने में या फिर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने में खर्च की गई. अफ्रीका और एशिया को सबसे ज्यादा मदद राशि मिली है

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक जलवायु पूंजी कोष के लिए यूरोपियन यूनियन (EU), यूरोपियन इंवेस्टमेंट बैंक और यूरोप की दूसरी संस्थाओं ने 28.5 अरब यूरो की मदद दी. इसमें से 54 फीसदी राशि इन देशों की अर्थव्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढालने में या फिर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने में खर्च की गई. अफ्रीका और एशिया को सबसे ज्यादा मदद राशि मिली है. इतना ही नहीं यूरोपियन यूनियन (EU) ने जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए इन देशों को 11.9 अरब यूरो का निजी पूंजी कोष भी मुहैया कराया है. 

 Figure 1: Geographical distribution of EU’s climate finance

Source: European Council

पूंजी की कमी चिंताजनक स्थिति में

इतनी मदद के बावजूद विकासशील देशों में इस क्षेत्र में काम करने के लिए पूंजी की कमी चिंताजनक स्थिति में पहुंच गई है. एडेप्शन गैप रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देश जितनी आर्थिक मदद दे रहे हैं, उसकी तुलना में विकासशील देशों को 18 गुना ज्यादा मदद चाहिए. 2021 के ग्लासगो जलवायु समझौते में विकासशील देशों की तरफ से ये अपील की गई है कि 2019 की तुलना में इस आर्थिक मदद को 2025 तक कम से कम दोगुना करना चाहिए. वित्तीय मदद की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है. अगर विकास में सहयोग के नज़रिए से देखें तो ग्रीन डील में तीन हैरान करने वाली बातें हैं. इस वक्त दुनिया में जैसी उथल-पुथल चल रही है, उसे देखते हुए इस ग्रीन डील को समझना और आसान हो गया है. यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सला वन डर लेअन ने जिस तरह राष्ट्रीय हितों और विदेश नीति को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया था, उससे ये साबित हो गया कि ग्रीन डील को दुनिया की मौजूदा भूराजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. 

इस वक्त दुनिया में जैसी उथल-पुथल चल रही है, उसे देखते हुए इस ग्रीन डील को समझना और आसान हो गया है. यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सला वन डर लेअन ने जिस तरह राष्ट्रीय हितों और विदेश नीति को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया था, उससे ये साबित हो गया कि ग्रीन डील को दुनिया की मौजूदा भूराजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. 

यूरोपियन यूनियन (EU) खुद को इस दिशा में किए जा रहे कामों के अगुवा के तौर पर पेश करना चाहता है. यूरोपियन यूनियन (EU) ये उम्मीद कर रहा है कि जिस तरह वो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोशिश कर रहा है, विकासशील देश भी वैसा ही करें. लेकिन ये काफी मुश्किल है. वित्तीय मदद देने को लेकर यूरोपियन यूनियन (EU) आंकड़ों के हिसाब से भले ही बहुत अच्छी तस्वीर पेश कर रहा हो लेकिन इन आंकड़ों का अगर ठीक से विश्लेषण किया जाए तो उसकी भूमिका बहुत निराशाजनक है. 2020 में यूरोपियन इंवेस्टमेंट बैंक ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए 2.5 अरब डॉलर (77 प्रतिशत) निवेश किए जबकि इन देशों को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढालने के लिए 740 मिलियन डॉलर (23 प्रतिशत) ही दिए गए.

ग्लोबल साउथ के देशों में यूरोपियन यूनियन (EU) के फैसले पर संदेह

यूरोपियन यूनियन (EU) की ग्रीन डील एक महात्वाकांक्षी योजना है. उसकी कोशिश है कि ईयू इमिशन ट्रेडिंग सिस्टम (ED ETS) के तहत इन देशों की अर्थव्यवस्था को हरित विकास के हिसाब से ढालने और गैस उत्सर्जन में कमी लाने के जो सामाजिक प्रभाव होंगे, उसके लिए आर्थिक मदद की जाए. परिवहन, घरों और छोटे उद्योगों को मदद देने में प्राथमिकता दी जाएगी. इसके लिए एक सामूहिक जलवायु कोष बनाया जाएगा. यूरोपियन यूनियन (EU) के बजट में इसके लिए 72.2 बिलियन यूरो का प्रावधान होगा. 65 बिलियन यूरो की मदद अलग से दी जाएगी. लेकिन यूरोपियन यूनियन (EU) ने ईयू इमिशन ट्रेडिंग सिस्टम के बाद अब जिस तरह से कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लागू करने का फैसला किया है, उसने विकासशील देशों की चिंता बढ़ा दी है. यूरोपियन यूनियन (EU) का दावा है कि उसने इसकी शुरूआत कार्बन लीकेज को रोकने की मकसद से की है लेकिन विकासशील देशों का कहना है कि इसका मकसद संरक्षणवाद को बढ़ावा देना है क्योंकि इसकी वजह से विकासशील देशों से आयात होने वाली चीजों पर यूरोपियन यूनियन (EU) अतिरिक्त शुल्क लगाएगा. यही वजह है कि ग्लोबल साउथ के देशों में यूरोपियन यूनियन (EU) के इस फैसले को लेकर संदेह है.

यूरोपियन यूनियन (EU) का दावा है कि उसने इसकी शुरूआत ‘कार्बन लीकेज’ को रोकने की मकसद से की है लेकिन विकासशील देशों का कहना है कि इसका मकसद संरक्षणवाद को बढ़ावा देना है क्योंकि इसकी वजह से विकासशील देशों से आयात होने वाली चीजों पर यूरोपियन यूनियन (EU) अतिरिक्त शुल्क लगाएगा. यही वजह है कि ग्लोबल साउथ के देशों में यूरोपियन यूनियन (EU) के इस फैसले को लेकर संदेह है.

ऐसे में यूरोपियन यूनियन (EU) की ग्रीन डील का मकसद इन विकासशील देशों की नाराज़गी को कम करना भी है. फिट फॉर 55 पैकेज की नीतियों में इन विकासशील देशों की चिंताओं को भी जगह दी गई है. आपसी विश्वास बढ़ाने और विकास के क्षेत्र में सहयोग को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दिया गया है.

ग्रीन डील की ग्लोबल गेटवे पहल के तहत यूरोपियन यूनियन (EU) ने साल 2027 तक के लिए 300 अरब यूरो का कोष बनाया है जिसका मकसद उन परियोजनाओं को आर्थिक मदद देना है, जिन पर बदलते जलवायु का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हालांकि कुछ लोग इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनीशिएटव (BRI) का मुकाबला करने की रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं. 

अब ये सवाल भी खड़ा हो गया है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर हो रहे काम का अगुवाई करने वाला किसे माना जाए. ऐसी स्थिति में यूरोपियन यूनियन (EU) को चाहिए कि वो आर्थिक विकास में सहयोग के अपने द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौतों में ग्रीन डील को भी शामिल करे. इससे ये फायदा होगा कि विकासशील देशों के लिए इस नीति में जो नकारात्मक बातें हैं, उनका समाधान करने में मदद मिलेगी. इन देशों को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढालने के लिए जो नीतियां बनेंगी और उन्हें लागू करवाने में जितनी आर्थिक मदद की जरूरत होगी, उसके बीच तालमेल भी बिठाया जा सकेगा. इससे उत्तर और दक्षिण के बीच का विभाजन भी कम होगा. इसे लेकर 2022 में यूरोपियन यूनियन (EU) और मोरक्को के बीच जो समझौता हुआ, वो इस दिशा में एक बेहतर पहल है. दुबई में हुए COP28 सम्मेलन के दौरान यूरोपियन यूनियन (EU) ने मोरक्को को 50 मिलियन यूरो की मदद देकर ये स्पष्ट कर दिया कि हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने को लेकर उसकी नीयत साफ है. 

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास को लेकर यूरोपियन यूनियन (EU) और विकासशील देशों में जो समझौते (SDG 17 ) हो रहे हैं, उनका आधार समानता, नीतियों में सामंजस्य बिठाना, समावेशी विकास और संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल करना है. ये सही है कि हर देश अपने हितों के हिसाब से नीतियां बनाता है लेकिन यूरोपियन यूनियन (EU) को अपनी महत्वाकांक्षाओं और विकासशील देशों की जरूरतों के बीच एक संतुलन कायम करना होगा. ग्रीन डील यूरोपियन यूनियन (EU) की सोच को दिखाती है लेकिन ये देखना भी दिलचस्प होगा कि इसके लिए वो वित्तीय मदद के कौन से तरीके अपनाता है. क्योंकि दुनिया के बाकी देश सिर्फ 2030 तक नहीं बल्कि उससे आगे भी देख रहे हैं.


स्वाति प्रभु - ओआरएफ के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में एसोसिएट फेलो हैं

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Swati Prabhu

Swati Prabhu

Dr Swati Prabhu is Associate Fellow with theCentre for New Economic Diplomacy (CNED). Her research explores the interlinkages between Indias development partnerships and the Sustainable ...

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