Published on Aug 20, 2021 Updated 0 Hours ago

हमेशा की तरह मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम सालेह के खेमे ने भावहीन चुप्पी साध रखी है.

मोहम्मद नशीद के इब्राहिम सालेह के साथ रिश्ता ख़त्म करने के साथ ही मालदीव में गहराई राजनीतिक अस्थिरता

एक अप्रत्याशित कदम के तहत, जो शायद थोड़ा जल्दी आ गया हो, मालदीव के संसद के स्पीकर मोहम्मद ‘अन्नी’ नशीद ने लंबे वक्त से दोस्त रहे मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम ‘इबू’ सालेह से सभी तरह की ‘राजनीतिक रिश्तों’ को विराम देने की घोषणा कर दी. इस घटनाक्रम ने देश में लंबे समय के लिए पहले से मौजूद राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अस्तव्यस्तता की ओर इशारा किया है. उन्होंने कहा कि “इससे मुझे कोई लेना देना नहीं अगर इस फैसले से कुछ एमडीपी के सदस्य मुझसे नाख़ुश होते हैं, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति (अबदुल्ला) यामीन और उनकी पीपीएम (प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव) अगर नरम धार्मिक विचारों के प्रति समर्थन देना जारी रखते हैं तो मैं उनसे मदद मांग  सकता हूं”. उनका यह बयान एमडीपी पार्टी कैडरों और समर्थकों दोनों के लिए हैरानी का विषय है.

एमडीपी समर्थकों के लिए यह संतोष की बात थी कि पीपीएम अध्यक्ष अब्दुलरहीम ने नशीद के विचारों को नज़रअंदाज़ कर दिया. यामीन के साथ सहमति के बाद उन्होंने कहा “ना ही पीपीएम और ना ही अध्यक्ष यामीन किसी भी तरह से बिना सोचे समझे नशीद के साथ कोई समझौता करने जा रहे हैं. हमलोगों को नशीद और इबु के बीच जारी लड़ाई से कोई लेना देना नहीं है.” यामीन फ़िलहाल अपने घर में नज़रबंद हैं. लेकिन मोहम्मद सईद जो एक और यामीन केंद्रित पार्टी पीपुल्स नेशनल कांग्रेस (पीएनसी) के उपाध्यक्ष हैं उन्होंने सालेह सरकार की आलोचना करते हुए उसकी तुलना समुद्र में तैरते दिशाहीन जहाज से की और कहा कि सरकार को कैसे और कहां आगे बढ़ना है ये पता ही नहीं है.

हो सकता है कि पीपीएम की घोषणा नशीद खेमे के लिए हैरानी पैदा करने वाली हो, लेकिन आलोचकों और उनके करीबियों का मानना है कि उनके एकतरफ़ा फैसले और घोषणाओं का ज़मीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है. ऐसी स्थिति में एमडीपी पहले से ही एक विभाजित और अपनी ज़मीन खोती हुई राजनीतिक पार्टी नज़र आने लगी है. 

हो सकता है कि पीपीएम की घोषणा नशीद खेमे के लिए हैरानी पैदा करने वाली हो, लेकिन आलोचकों और उनके करीबियों का मानना है कि उनके एकतरफ़ा फैसले और घोषणाओं का ज़मीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है. ऐसी स्थिति में एमडीपी पहले से ही एक विभाजित और अपनी ज़मीन खोती हुई राजनीतिक पार्टी नज़र आने लगी है. जबकि यामीन केंद्रित पीपीएम-पीएनसी गठजोड़ के लिए आगामी चुनावों को लेकर तमाम संभावनाएं नज़र आ रही हैं. बीते अप्रैल में इस गठजोड़ ने एमडीपी से माले के मेयर चुनाव में पहली बार जीत छीन ली. 

सालेह कैंप भले ही हमेशा से भावहीन चुप्पी साधे रहता है लेकिन निजी तौर पर वो अमेरिका,जहां से राष्ट्रपति चुनाव की अवधारणा को शामिल किया गया है, की तरह ही राष्ट्रपति को दूसरी बार पद पर काबिज होने की वकालत करते रहे हैं. नशीद कितने सही हैं या नहीं, लेकिन वो अभी भी युवा हैं और साल 2028 तक उनके विकल्प वाली सरकार की व्यवस्था के मुताबिक पांच साल के लिए पद पर बने रह सकते हैं. हालांकि,  6 मई के बम विस्फोट की घटना के बाद अस्पताल में नशीद और राष्ट्रपति सालेह की मुलाकात के बाद दोनों एक बार भी सरकारी आयोजनों के अलावा बीते वर्ष अक्टूबर के बाद एक दूसरे से नहीं मिले. और अब जबकि नशीद धार्मिक नरमी को मापदंड बनाकर यामीन से नए रिश्ते बना रहे हैं तो सामान्य तौर पर यह कई सवाल पैदा करता है.

कुछ सप्ताह पहले नशीद ने यामीन से ‘व्यवस्था परिवर्तन’ को लेकर उनसे संपर्क बढ़ाने की मंशा का जिक्र किया था. हालांकि अभी की तरह तब इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी. और इसे लेकर शर्त जोड़कर नशीद ने यह साफ कर दिया है कि वो लंबे समय के लिए रिश्ता चाहते हैं. अगर ऐसा है तो सवाल यहां यह खड़ा होता है कि 2023 के चुनावों से पहले नशीद या तो संवैधानिक तरीकों से सालेह के नेतृत्व को कमज़ोर करना चाहते थे या हैं.  पीपीएम के अब्दुल रहीम का यह कहना कि नाशीद के साथ उनकी पार्टी बिना सोचे समझे आगे बढ़ने को तैयार नहीं है, इस बयान को इस पृष्ठभूमि पर परख़े जाने की ज़रूरत है. उनका यह कहना कि उन्हें एमडीपी के अंदर जारी घमासान से कोई लेना देना नहीं है इस बात की ओर इशारा करता है कि वो इससे ज़्यादा की इच्छा और मांग रखते हैं. 

2023 के चुनावों से पहले नशीद या तो संवैधानिक तरीकों से सालेह के नेतृत्व को कमज़ोर करना चाहते थे या हैं.  पीपीएम के अब्दुल रहीम का यह कहना कि नाशीद के साथ उनकी पार्टी बिना सोचे समझे आगे बढ़ने को तैयार नहीं है, इस बयान को इस पृष्ठभूमि पर परख़े जाने की ज़रूरत है.

कुल मिलाकर इसका अर्थ यह हुआ कि यामीन कैंप यह कहना चाहता है कि नशीद अपने विवादों को सालेह (उनके अपने फ़ायदे के लिए) के साथ पहले निपटा लें उसके बाद उनकी तरफ आगे बढ़ें. इस रुख़ का यह मतलब हुआ कि राजनीतिक रूप से कमज़ोर नशीद की मंशा यामीन के कद को कम करने की है. विकल्प के तौर पर अगर एमडीपी के भीतर विवाद सुलझ जाता है और नशीद के मक़सद को यामीन पूरा कर देते हैं, तो पीपीएम-पीएनसी गठजोड़ को मौजूदा फायदे से महरूम रहना पड़ सकता है और उसका सियासी भविष्य अधर में लटक सकता है.

केंद्र में केवल दो पार्टियां

नशीद और एमडीपी ने ही ‘गयूम परिवार की निरंकुशता और भ्रष्टाचार’ के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर अपनी सियासी और चुनावी हैसियत को आगे बढ़ाया है. इसमें यामीन के राष्ट्रपति काल (2013-2018) और प्रजातांत्रिक शासन के युग से पहले सबसे लंबे दिनों तक शासन करने वाले, 1978 से 2008 तक, गयूम के राष्ट्रपति शासन का दौर शामिल है. हाल के दिनों में उनके भ्रष्ट और निरंकुश तरीक़ों के चलते यामीन को अंतर्राष्ट्रीय अपमान सहना पड़ा लेकिन इन्हीं वजहों से चीन के साथ उनकी नजदीकियां बढ़ीं हालांकि इसका नतीजा यह हुआ कि साल 2018 में उन्हें राष्ट्रपति पद गंवानी पड़ी. फिलहाल जेल में वो पांच साल की सजा काट रहे हैं. साल 2023 तक वो राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. यह तभी संभव हो सकता है जब सुप्रीम कोर्ट उनके सभी लंबित याचिकाओं पर सुनवाई कर उन्हें सभी आरोपों से बरी कर देगी और उनके ख़िलाफ़ दूसरी लंबित और फास्ट ट्रैक जांच जो चल रही है वो ख़त्म हो जाएगी.

लेकिन साल 2009 के संसदीय चुनाव जिसमें एमडीपी हार गई, तब तत्कालीन राष्ट्रपति नशीद ने घोषणा की थी -यह चुनाव इस बात को साबित करता है कि देश में सिर्फ दो सियासी दल हैं – एमडीपी और धिवेही रय्याथुंगे पार्टी (डीआरपी), जो अब पीपीएम के नाम से जानी जाती है. यामीन के सौतेले भाई राष्ट्रपति ममून गयूम ने इस पार्टी को स्थापित किया था और बाद में इसे पीपीएम के साथ मिला दिया जिसे उन्होंने बाद में स्थापित कियार था. यामीन के राष्ट्रपति शासन काल के दौरान हुए सत्ता पलट के दौरान जिसे ख़त्म कर दिया गया और सत्ता यामीन के हाथ चली गई.

नशीद की यह घोषणा की कि वो यामीन के साथ सियासी गठजोड़ करना चाहते हैं और ऐसा करने में उन्हें एमडीपी समर्थकों की जरा भी परवाह नहीं है, इससे यामीन की छवि एक निरंकुश शासक की बन रही है जो सत्ता पर काबिज होने की जल्दबाज़ी में राजनीतिक शुचिता और नैतिकता को ताक पर रखने को तैयार है.

बढ़ती निराशा

2018 के राष्ट्रपति चुनावों के बाद से ही परंपरागत एमडीपी समर्थकों की निराशा बढ़ती गई. बावजूद इस बात के कि संसद में एडीपी अकेले दो तिहाई बहुमत के साथ सरकार में थी सालेह सरकार का प्रदर्शन पहले दिन से ही ख़राब रहा. दूसरी बात सरकार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और गैर शासन का आरोप लगा कर पिछले कई महीनों से नशीद पार्टी को संकट की तरफ ले जा रहे हैं. और अब ऐसी स्थिति के चरम पर उन्होंने एमडीपी और सालेह कैंप की ख़ामियों की तरफ ना देखकर यामीन के साथ काम करने की इच्छा जताई है. ऐसा करके नशीद ने खुद की स्थिति और खराब कर ली है क्योंकि उन्हें यामीन खेमे से यह भरोसा नहीं दिया गया है कि उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर ही लिया जाएगा. बिना यह साफ़ किये कि यामीन के साथ काम करने के पीछे उनकी मंशा क्या है उन्होंने – निरंकुश और भ्रष्टाचार होने के उन सभी आरोप को जो उनकी पार्टी पहले उनपर लगाया करती थी, उसे दरकिनार कर दिया.

बल्कि एमडीपी समर्थकों को वह यह कहना चाहते हैं कि यामीन का भ्रष्टाचार सालेह सरकार के भ्रष्टाचार से ज़्यादा अच्छा था. लेकिन ज़्यादातर लोगों के लिए इसे स्वीकार करना नामुमकिन है. इसी तरह नशीद की यह घोषणा की कि वो यामीन के साथ सियासी गठजोड़ करना चाहते हैं और ऐसा करने में उन्हें एमडीपी समर्थकों की जरा भी परवाह नहीं है, इससे यामीन की छवि एक निरंकुश शासक की बन रही है जो सत्ता पर काबिज होने की जल्दबाज़ी में राजनीतिक शुचिता और नैतिकता को ताक पर रखने को तैयार है.


आया राम गया राम जैसा मामला


संसद में दो तिहाई बहुमत ( 65/87) के बावजूद सालेह खेमा शुरुआत से ही अस्थिर रहा है. इसकी बड़ी वजह राजनीतिक प्रशासन में ढिलाई है जो कुछ दशक पहले नशीद सरकार के दौरान भी मौजूद थी. यहां तक कि सरकार पर नशीद के लगातार आरोपों का भी कुछ असर नहीं हुआ. उन पर बम से हुए हमले ने उल्टे देश में सुरक्षा को लेकर और चिंताएं बढ़ा दीं. नशीद की घोषणा के बाद जहां पार्टी में दो फाड़ की आशंका है वहीं देश में राजनीतिक अस्थिरता के साथ साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल पैदा होने लगे हैं. अंतिम गणना तक 65 सांसदों वाली एमडीपी संसदीय पार्टी सालेह के पक्ष में दो अनुपात एक में विभाजित दिखी. अगर सरकार के बिल और प्रस्तावों के ख़िलाफ़ नशीद खेमा यामीन केंद्रित विपक्षी पार्टियों के साथ ही वोट करता है तो इससे सरकार के लिए आया राम-गया राम वाली स्थिति पैदा हो जाएगी.

लाबीब का दावा है कि उन्होंने पहले किसी दूसरे से फोन पर नशीद की हत्या कराने की 3 अमेरिकी मिलियन डॉलर की साजिश की सूचना साझा किया था और बाद में मारिया के साथ भी इसे साझा किया गया था. लेकिन पूरे मामले के बारे में सुरक्षा एजेंसियों को रिपोर्ट करने के लिए कहने के सिवा उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की

दलबदल विरोधी कानून के अभाव में इसका मतलब यह भी हो सकता है कि एमडीपी में कोई भी खेमा हॉर्स ट्रेडिंग शुरू कर सकता है, जिसमें तीसरे पक्ष और निर्दलीय भी शामिल हो सकते हैं और जिसका नतीजा सियासी भ्रम है. इस तरह का कदम यामीन गठजोड़ के लिए संसद के अंदर और बाहर संकट के बीच अवसर तलाशने का मौका जैसा होगा. ऐसी स्थिति में अभी या बाद में राजनीतिक तौर पर ध्रुवीकृत नागरिक सेवा पूरी तरह चरमरा जाएगी. एक ऐसे देश में जहां की सुरक्षा एजेंसियां – जिसमें मलादीव नेशनल डिफेंस फोर्स (एमएनडीएफ) और मालदीव पुलिस सर्विस (एमपीएस) शामिल हैं और दोनों ही एजेंसियां राजनीतिक आकाओं के हुक्म़ की तामील करने के लिए जानी जाती हैं वहां एक दूसरा बम धमाका, भविष्य में कुछ भी करा सकता है.

दुख़द तो यह है कि यह सब तब हो रहा है जब कोरोना महामारी के चलते देश का पर्यटन कारोबार मंदी के दौर से गुजर रहा है और हाल के वर्षों के मुकाबले वित्त का संकट गहराता जा रहा है. मोबाइल कनेक्टिविटी और सोशल मीडिया के युग में किसी भी तरह की राजनीतिक अस्थिरता की भनक पहले से गिरावट दर्ज़ कर रहे पर्यटन उद्योग को हमेशा के लिए ख़त्म कर सकता है.

संकट में दीदी ?

सरकार की मुश्किलों को बढ़ाने में गैरजिम्मेदाराना रवैया – जो निष्ठाहीनता से कहीं अलग है – रक्षा मंत्री मारिया दीदी, जो 2008 – 2012 के दौरन नशीद जब राष्ट्रपति थे तब पार्टी अध्यक्ष थी, उनकी भूमिका को रेखांकित करती है.  पुलिस मंत्री दीदी, सांसदों, इलियास लाबीब की जांच करने वाली है ख़ास कर तब जबकि संसद की ‘241 कमेटी’ नशीद बम धमाके मामले में सुरक्षा चूकों की जांच कर रही है और निष्कर्ष के तौर इस कमेटी ने कहा है कि दोनों ही पुलिस के साथ ज़रूरी सूचनाओं को साझा करने में नाकाम रहे. हालांकि जब दीदी ने कहा कि बम धमाकों को लेकर पहले कोई अलर्ट नहीं था तब एमडीपी के सांसद ने उनके इस बयान पर विरोध जताया था.

लाबीब का दावा है कि उन्होंने पहले किसी दूसरे से फोन पर नशीद की हत्या कराने की 3 अमेरिकी मिलियन डॉलर की साजिश की सूचना साझा किया था और बाद में मारिया के साथ भी इसे साझा किया गया था. लेकिन पूरे मामले के बारे में सुरक्षा एजेंसियों को रिपोर्ट करने के लिए कहने के सिवा उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की, और तर्क दिया कि इससे संबंधित कोई ‘कार्रवाई करने योग्य गोपनीय जानकारी’ नहीं थी. अगर पुलिस ने लाबीब से इस मामले में पूछताछ की होती और उनकी सूचना के स्रोत के बारे में पूछ कर जांच को बढ़ाया होता तो इस तरह की जानकारी लोगों के साथ साझा नहीं की जाती. इसका मतलब यह था कि गृह मंत्री – इमरान अब्दुल्लाह – धार्मिक मामलों पर केंद्रित अधालत पार्टी (एपी) के नेता और एमडीपी की सहयोगी, को भी सियासी संकट से गुजरना पड़ता. क्योंकि तब उनसे जवाब और मारिया दीदी से इस्तीफे की मांग की जाती.

नए उम्मीदवार

 

मारिया दीदी देश की रक्षा मंत्री बनी रहती हैं या नहीं एक और झटका नशीद के लिए तब सामने आया है जबकि नए नए उम्मीदवार राष्ट्रपति पद की दौड़ में सामने आ रहे हैं, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि एमडीपी में पहले जैसी एकता नहीं रह गई है वो पहले की तरह अपराजेय नहीं है. यहां तक कि मतदाताओं ने भी यामीन को लेकर कोई ख़ास समर्थन नहीं दिखाया है. दिग्गज सेना के अधिकारी और पूर्व रक्षा मंत्री कर्नल मोहम्मद नाज़िम ( रिटायर्ड ) ने भी ज़म्हूरी पार्टी (जेपी) का दामन तब छोड़ दिया जबकि अरबपति नेता गासिम इब्राहिम ने नई पार्टी बनाने की घोषणा की. 

नाज़िम के साथ ही दूसरे सांसद और पूर्व पुलिस अधिकारी अब्दुल्ला रियास ने भी जेपी छोड़ दी. दरअसल, उन्होंने ऐसा तब किया जब बहुत पहले संस्थापक गासिम ने उन्होंने धोखेबाज़ कहा था. इसके अलावा निर्दलीय सांसद अहमद उस्मान मोहम्मद नाशिद भी नई पार्टी में शामिल हुए हैं. कर्नल नाज़िम ने कहा है कि वो ज़रूरी 3000 सदस्यों को पंजीकृत करने के बाद अपनी पार्टी को रजिस्टर करवाएंगे. कुछ रिपोर्ट के मुताबिक, यह समूह जल्द ही नेशनल सॉलिडेरिटी पार्टी में शामिल होने वाला है जिसका नेतृ्त्व पूर्व मंत्री अब्दुल्ला कमालुद्दीन कर रहे हैं.

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