Author : Shoba Suri

Expert Speak India Matters
Published on Mar 28, 2024 Updated 21 Hours ago

जैसे-जैसे जल संकट बढ़ रहा है, उसका असर खाद्य प्रणाली के माध्यम से फैल रहा है. इसका सीधे तौर पर खेती की उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता है. 

खाद्य सुरक्षा को बनाए रखना: पानी की महत्वपूर्ण भूमिका

ये लेख निबंध श्रृंखला विश्व जल दिवस 2024: शांति के लिए जल, जीवन के लिए जल का हिस्सा है. 


विश्व की स्थिरता और समृद्धि- दोनों में पानी एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, विशेष रूप से जब बात खाद्य सुरक्षा की आती है. कृषि उत्पादन सुनिश्चित करने, फसल की वृद्धि में सहायता और पशुधन को बनाए रखने में पानी एक मूलभूत संसाधन के रूप में काम करता है. पर्याप्त और विश्वसनीय ढंग से पानी की आपूर्ति की उपलब्धता खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है क्योंकि पानी सीधे तौर पर कृषि उत्पादकता और दुनिया भर के लोगों के लिए पोषक भोजन की उपलब्धता पर असर डालता है. इसके अलावा पानी अर्थव्यवस्थाओं को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके विपरीत पानी की कमी या पानी की अपर्याप्त उपलब्धता अर्थव्यवस्थाओं को अस्थिर कर सकती है, ग़रीबी बढ़ा सकती है और सामाजिक अशांति का कारण बन सकती है. खेती और आर्थिक स्थिरता में अपनी भूमिका के अलावा पानी समग्र सामाजिक कल्याण और लोगों के स्वास्थ्य में भी योगदान करता है. इसलिए हर किसी तक समान रूप से साफ पानी की उपलब्धता स्थिरता, समृद्धि और लोगों के बीच एवं अलग-अलग देशों में सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देने के लिए ज़रूरी है (रेखाचित्र 1).

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स्रोत: जल और खाद्य सुरक्षा- श्रृंखला

अपने 8 अरब निवासियों का पेट भरने के लिए पर्याप्त खाद्य के उत्पादन की विश्व की क्षमता के बावजूद हर रोज़ 82.3 करोड़ लोग भूख का सामना करते हैं. कोविड-19 महामारी के आर्थिक असर से उबरने की कोशिशों के बावजूद संयुक्त राष्ट्र को 2030 तक “ज़ीरो हंगर” यानी भूख से किसी के भी पीड़ित नहीं होने के सतत विकास लक्ष्य को हासिल करने में काफी पीछे रहने की आशंका है. अनुमानों के मुताबिक इस दशक के अंत तक भी 67 करोड़ लोग भूख से जूझेंगे. सिंचाई वाली खेती, जो कि कुल खेती की भूमि की मात्र 20 प्रतिशत है, बुनियाद के रूप में खड़ी है जो वैश्विक खाद्य उत्पादन में 40 प्रतिशत योगदान देती है. ध्यान देने की बात है कि सिंचित खेती बारिश के पानी से खेती की तुलना में प्रति इकाई ज़मीन पर कम-से-कम दोगुना उत्पादन करती है. इसकी वजह से अधिक उत्पादन होता है और कृषि में विविधता आती है. 

खेती और आर्थिक स्थिरता में अपनी भूमिका के अलावा पानी समग्र सामाजिक कल्याण और लोगों के स्वास्थ्य में भी योगदान करता है.

जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, शहरों का विस्तार हो रहा है और जलवायु के पैटर्न में बदलाव आ रहा है, वैसे-वैसे जल संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा का तेज़ होना तय है जो विशेष रूप से कृषि से जुड़े क्षेत्रों पर असर डालेगा. जलवायु परिवर्तन में खेती का योगदान ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन के माध्यम से दिखता है जो पृथ्वी के जल चक्र में रुकावट पैदा करके चुनौतियों में बढ़ोतरी करता है. इस तरह खाद्य उत्पादन के साथ जुड़ी अनिश्चितताओं और जोखिमों में बढ़ोतरी होती है. अनुमानों से संकेत मिलता है कि 2030 तक दक्षिण एशिया और अफ्रीका का दक्षिणी हिस्सा सबसे असुरक्षित क्षेत्रों के तौर पर उभरेंगे और जलवायु परिवर्तन की वजह से भोजन की बहुत ज़्यादा कमी का सामना करेंगे. 

2050 तक वैश्विक जनसंख्या 10 अरब के पार जाने का अनुमान है. ऐसे में भोजन और संसाधनों के लिए मांग में तेज़ी आएगी जिसकी वजह से बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनाज और फाइबर की ज़रूरत होगी. इस बढ़ती मांग के साथ विकासशील क्षेत्रों में बढ़ती आमदनी के कारण अधिक कैलोरी वाली खाने-पीने की चीज़ों और अलग-अलग प्रकार के खाद्य पदार्थों की मांग में तेज़ी आएगी. ये तथ्य 2050 तक कृषि उत्पादन में लगभग 70 प्रतिशत बढ़ोतरी की आवश्यकता पर ज़ोर देता है.  

जल-खाद्य संबंध की जटिलता

हमारी खाद्य प्रणाली का जटिल नेटवर्क पानी, ऐसा संसाधन जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है लेकिन जिसके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता, पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है. पानी की कमी या अपर्याप्त मात्रा में पानी बंजर ज़मीनों से परे भी गूंजता है और खेत से लेकर खाने की मेज तक की मुश्किल यात्रा के हर पहलू को प्रभावित करता है. खेती के उत्पादन के मूल में पानी जीवनधारा के रूप में काम करता है जो फसलों के अंकुरण से लेकर कटाई तक पोषण करता है. पानी की अपर्याप्त उपलब्धता पौधों के विकास में रुकावट डालती है, फसल की उपज कम करती है और किसानों की आजीविका के लिए ख़तरा पैदा करती है. फिर भी इसका असर कृषि के क्षेत्रों से आगे तक फैला हुआ है. अपर्याप्त पानी इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) के नाज़ुक संतुलन में रुकावट डालता है, जैव विविधता को ख़तरे में डालता है और कृषि परिदृश्य के सामर्थ्य से समझौता करता है.  

पानी और खाद्य प्रणाली के बीच संबंध एक गहरी अंतरनिर्भरता का खुलासा करता है जो कि हमारे पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है. इसमें परस्पर क्रिया का एक जटिल जाल है जो खाद्य उत्पादन, वितरण और खपत के साथ पानी की उपलब्धता, उसकी क्वालिटी और प्रबंधन का नाज़ुक ढंग से संतुलन करता है. मिट्टी का स्वास्थ्य, पोषक तत्वों की उपलब्धता और फसलों का सामर्थ्य निर्धारित करने में पानी की क्वालिटी की एक महत्वपूर्ण भूमिका है जो हमारे भोजन की प्रकृति को तय करने में पानी की आवश्यक भूमिका पर ज़ोर देती है. 

अनुमानों के मुताबिक इस दशक के अंत तक भी 67 करोड़ लोग भूख से जूझेंगे. सिंचाई वाली खेती, जो कि कुल खेती की भूमि की मात्र 20 प्रतिशत है, बुनियाद के रूप में खड़ी है जो वैश्विक खाद्य उत्पादन में 40 प्रतिशत योगदान देती है. 

फिर भी इस संबंध के सामने महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं. पानी की कमी, प्रदूषण और बेअसर प्रबंधन की  प्रथाएं दुनिया भर में खाद्य प्रणाली के सामर्थ्य की स्थिरता को ख़तरे में डालती हैं. घटता जल संसाधन कृषि उत्पादकता में अड़चन डालता है, खाद्य असुरक्षा की स्थिति को बिगाड़ता है और समुदायों में ग़रीबी एवं कमज़ोरी के चक्र को स्थायी बनाता है. इसके अलावा पानी की कमी का असर खाद्य उत्पादन के दायरे से आगे तक फैला हुआ है जिसका प्रभाव व्यापक रूप से अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं, इकोसिस्टम और समाज में भी दिखाई देता है. कम होते जल संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा तनावों में बढ़ोतरी कर सकती है, संघर्ष भड़का सकती है और सामाजिक असमानताओं को गहरा कर सकती है जो पानी-भोजन के बीच संबंध के व्यापक अर्थ को उजागर करती है. 

जैसे-जैसे पानी का संकट बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उसका प्रभाव खाद्य प्रणाली के माध्यम से फैल रहा है जो खाद्य प्रसंस्करण, वितरण और खपत पर असर डाल रहा है. जल संसाधनों की कमी खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में बाधा डालती है, खाद्य उत्पादों को स्वच्छ करने और संरक्षित रखने में उनकी क्षमता को सीमित करती है. इससे खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है जिससे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए ख़तरा पैदा होता है. भोजन का परिवहन और वितरण पानी पर केंद्रित लॉजिस्टिक पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. अपर्याप्त पानी सप्लाई चेन में रुकावट डालता है जिसका नतीजा अक्षमता, भोजन की बर्बादी और लागत में बढ़ोतरी के रूप में निकलता है. 

इसके अलावा पानी की कमी सीमित संसाधनों को लेकर मुकाबले और अनबन में बढ़ोतरी करती है जिससे सामाजिक तनाव और अस्थिरता बढ़ती है. जो इलाके पहले से राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहे हैं, वहां पानी की अपर्याप्त उपलब्धता मौजूदा चुनौतियां बढ़ाती हैं. साथ ही ग़रीबी और असुरक्षा के चक्र को बनाए रखती है. खाद्य उत्पादन और उपलब्धता पर तात्कालिक असर से आगे पानी की कमी जलवायु परिवर्तन में भी योगदान देती है. घटते जल भंडार की वजह से मिट्टी में ख़राबी आती है और मरुस्थलीकरण एवं वनों की कटाई में तेज़ी आती है जिससे पर्यावरण पर अस्थिर खेती की पद्धतियों का असर तेज़ होता है. 

कम होते जल संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा तनावों में बढ़ोतरी कर सकती है, संघर्ष भड़का सकती है और सामाजिक असमानताओं को गहरा कर सकती है जो पानी-भोजन के बीच संबंध के व्यापक अर्थ को उजागर करती है. 

इस परस्पर निर्भरता की पेचीदगियों को हल करने के लिए बहुआयामी समाधानों की आवश्यकता है जो पारंपरिक सीमाओं से परे हो और जल एवं खाद्य प्रबंधन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाए. पानी के मामले में कुशल तकनीकों में निवेश, सतत कृषि पद्धतियों का समर्थन और लचीली खाद्य प्रणाली का विकास हमारे एक-दूसरे से जुड़े जल-खाद्य संबंध की मौजूदा व्यावहारिकता और मज़बूती को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण उपाय हैं. केवल मिल-जुलकर कदम उठाकर और सामूहिक नेतृत्व के माध्यम से ही हम इस बात की गारंटी दे सकते हैं कि पानी जीविका के स्रोत के रूप में काम करता रहेगा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करेगा. 


शोभा सूरी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

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