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Published on Jan 17, 2024 Updated 0 Hours ago

चीन द्वारा अपने परमाणु परीक्षण पर लगाई गई रोक हटाने की आशंका के बीच, भारत को चाहिए कि वो परमाणु और मिसाइलों के क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाए, ताकि चीन से पैदा होने वाले ख़तरे का मुक़ाबला कर सके.

क्या चीन एक बार फिर से परमाणु परीक्षण की शुरुआत करने जा रहा है?

ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि चीन (PRC) अपने शिंजियांग सूबे के लोप नुर परमाणु परीक्षण सुविधा में सिलसिलेवार ढंग से परमाणु परीक्षण करने की तैयारी कर रहा है. अगर चीन ऐसा करता है, तो इसके भयंकर परिणाम न सिर्फ़ बाक़ी दुनिया के लिए होंगे, बल्कि इनका सबसे ज़्यादा असर तो भारत को झेलना होगा. हाल में सामने आई जानकारियां ये साबित करती हैं कि चीन, परमाणु हथियारों का ऐसा ज़ख़ीरा जमा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिनकी क्वॉलिटी उनके आकार, घातक होने और प्रभाव के मामले में बेहतर है. चीन के लोप नुर परमाणु परीक्षण केंद्र को नए एटमी परीक्षणों के लिए तैयार करने के पीछे के कारणों का मूल्यांकन करना ज़रूरी है, ताकि जब चीन परमाणु परीक्षणों के इस नए दौर की शुरुआत करे, तो उसके इस फ़ैसले के नतीजों का आकलन किया जा सके. अभी ये तो कहा ही जा सकता है कि 1996 में ख़ुद चीन ने अपने ऊपर परमाणु परीक्षण न करने की जो रोक लगाई थी, वो अब अपने उस फ़ैसले को पलटने का इरादा बना रहा है. 1990 के दशक के मध्य से ही चीन की सरकार ऐसे नए परमाणु हथियारों पर रिसर्च और विकास (R&D) को आगे बढ़ा रही है, जिनके असर को आज़माने के लिए नए परीक्षणों की दरकार है.

पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान लोप नुर में जो गतिविधियां देखी गई हैं, उनसे इस बात की प्रबल संभावना नज़र आ रही है कि चीन नए परमाणु हथियारों के परीक्षण की तैयारी कर रहा है और उसकी तैयारियों में धरती के भीतर गहराई में एक सुरंग खोदना भी शामिल है, जिसके बारे में आकलन किया गया है कि वो एक तिहाई मील गहरी है.

पिछले कुछ हफ़्तों के दौरान लोप नुर में जो गतिविधियां देखी गई हैं, उनसे इस बात की प्रबल संभावना नज़र आ रही है कि चीन नए परमाणु हथियारों के परीक्षण की तैयारी कर रहा है और उसकी तैयारियों में धरती के भीतर गहराई में एक सुरंग खोदना भी शामिल है, जिसके बारे में आकलन किया गया है कि वो एक तिहाई मील गहरी है. लोप नुर में चीन के परमाणु परीक्षण केंद्र को मलान के नाम से जाना जाता है. ये दो वर्ग मील में फैला इलाक़ा है, जिसमें मोटे तौर पर 30 अलग अलग तरह की इमारतें हैं, जिनका 2017 से ही पुनर्निर्माण किया जा रहा है. नए निर्मित किए गए इलाक़े में गहरे गड्ढे खोदे गए हैं, जिससे चीन को लंबाई में खोदे गए गड्डों की तुलना में ज़्यादा तादाद में परमाणु परीक्षण करने में आसानी होगी. वैसे तो अमेरिका और रूस अपने परमाणु परीक्षण केंद्रों में सीमित गतिविधि के रूप में नियमित रूप से परमाणु परीक्षण करते रहते हैं. लेकिन, इस वक़्त लोप नुर में जितने बड़े पैमाने पर तैयारी हो रही है, उसकी इन गतिविधियों से कोई तुलना नहीं की जा सकती है. इससे इस बात की पुष्टि हो जाती है कि चीन अपने राष्ट्रपति, शी जिनपिंग की अगुवाई वाले केंद्रीय सैन्य आयोग (CMC) से हरी झंडी मिलने के बाद, बेहद कम समय में परीक्षण दोबारा शुरू करने की तैयारी कर रही है.

वैसे तो चीन ने बड़ी दृढ़ता से परमाणु परीक्षण की तैयारी करने की बात से इनकार किया है. पर, सवाल ये है कि चीन जब 45 परमाणु परीक्षण कर चुका है, तो फिर वो फिर से परमाणु परीक्षण करने की तैयारी क्यों कर रहा है? चीन ने आख़िरी बार 1996 में परमाणु परीक्षण किए थे और उसके मौजूदा परमाणु हथियारों के डिज़ाइन, भले ही उनको जांचा-परखा जा चुका हो, मगर अब पुराने परीक्षणों से मिले आंकड़े, छोटे और हल्के एटम बमों को ज़्यादा असरदार बनाने के लिए आंकड़ों का विश्वसनीय होना ज़रूरी है. चूंकि, चीन ने नई पीढ़ी की मिसाइलें विकसित करके उन्हें तैनात कर दिया है. ऐसे में उसके लिए नई मिसाइलों के हिसाब से परमाणु हथियार बनाने के लिए भी नए आंकड़ों की ज़रूरत है, ताकि मिसाइलें दाग़ने के प्लेटफ़ॉर्मों को हल्के मगर मारक होने के पैमानों पर कसकर देखा जा सके. अमेरिका और रूस (इसमें पूर्व सोवियत संघ द्वारा किए गए परीक्षण भी शामिल है) ने क्रमश: 1030 और 715 परमाणु परीक्षण किए हैं. इतने बड़े पैमाने पर एटमी टेस्ट करने से उन्हें अपने परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण और रख-रखाव के लिए आंकड़ों का भंडार जुटाने में मदद मिली है. अपने विरोधियों यानी अमेरिका और रूस की तुलना में चीन ने बहुत कम परमाणु परीक्षण किए हैं. ऐसे में ये हैरानी की बात नहीं है कि शी जिनपिंग की अगुवाई में चीन के सामरिक प्रबंधक, परमाणु परीक्षण के धमाकों की संभावना को दोबारा जीवित करने को लेकर प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे हैं.

भारत के सामने मुश्किल विकल्प

अगर 27 साल की रोक के बाद चीन दोबारा परमाणु परीक्षण शुरू करता है, तो भारत के सामने चुनने के लिए मुश्किल विकल्प होंगे. परमाणु परीक्षणों के आंकड़े के मामले में चीन को पहले ही भारत के ऊपर काफ़ी बढ़त हासिल है. ऐसे में भारत के मुक़ाबले में चीन के परमाणु हथियार पहले से ही काफ़ी बेहतर हैं. चीन अगर दोबारा परमाणु परीक्षण शुरू करता है, तो इससे भारत की एटमी चुनौतियां और जटिल ही होने वाली हैं. भारत की प्राथमिक चुनौती, पर्याप्त रूप से भरोसेमंद हथियारों का ज़ख़ीरा जमा करना है, जो हवा, ज़मीन और पानी के भीतर से दुश्मन पर सटीक निशाना लगा सकें. इसके अतिरिक्त, चीन के परमाणु हथियारों के विस्तार के सामने अपनी यथास्थिति बनाए रखने की एक क़ीमत भारत को चुकानी होगी, ख़ास तौर से तब और अगर भारत चीन के परमाणु हथियारों की तादाद और गुणवत्ता में इज़ाफ़े के बावजूद, भारत परमाणु हथियारों की संख्या को स्थिर बनाए रखे. क्योंकि, अगर भारत भी अपने परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाता है, तो ‘हथियारों की होड़ और स्थिरता’ में इज़ाफ़ा होगा. भारत के लिए एक दूसरी मगर उतनी ही महत्वपूर्ण और जटिल बात, चीन द्वारा अपने ऊपर हमला होने की सूरत में नुक़सान को कम से कम रखने की क्षमता में बढ़ोत्तरी करना भी है. जैसे कि MQ-19 मिसाइल इंटरसेप्टर, भारत की मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) अग्नि-III मिसाइलों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही हवा में रोक सकने की क्षमता रखता है. ज़मीन पर स्थित मिसाइल डिफेंस सिस्टम (GBMD) के अलावा, चीन के पास हवा में लॉन्च की जा सकने वाली क्रूज़ मिसाइलों की क्षमता भी है, जो भारत के पास नहीं है. भारत के लिए चीन से परमाणु ख़तरे को और गंभीर बनाने वाली एक तीसरी जटिल चुनौती, चीन के ‘पहले एटमी हथियार इस्तेमाल न करने की नीति’ (NFU) को ‘पहले परमाणु हमला करने’ (FU) में तब्दील करने की आशंका भी है. इससे भारत के लिए हालात और मुश्किल भरे हो जाएंगे, क्योंकि इससे भारत की तुलनात्मक रूप से छोटी परमाणु हथियारों से लैस मिसाइलों की क्षमता पूरी तरह से तबाह हो जाने का ख़तरा पैदा होगा.

चीन के परमाणु हथियारों के विस्तार के सामने अपनी यथास्थिति बनाए रखने की एक क़ीमत भारत को चुकानी होगी, ख़ास तौर से तब और अगर भारत चीन के परमाणु हथियारों की तादाद और गुणवत्ता में इज़ाफ़े के बावजूद, भारत परमाणु हथियारों की संख्या को स्थिर बनाए रखे.

अगर चीन द्वारा दोबारा परमाणु परीक्षण करने के बावजूद भारत, फिर से एटमी धमाके के परीक्षण नहीं करता है, तो उसको चीन की तुलना में कम बेहतर एटमी हथियारों के साथ जीने के लिए तैयार करना होगा. ख़ास तौर से विश्वसनीय और ज़्यादा क्षमता और अच्छे प्रदर्शन वाले परमाणु हथियारों के ज़ख़ीरों के मामले में, जो चीन के परमाणु हथियारों की तुलना में कम ताक़तवर हैं. चीन ने अपने एटमी हथियारों को तमाम तरह की मिसाइलों और दूसरे प्लेटफॉर्म पर तैनात कर रखा है और उनसे हमला करने के लिए ख़तरनाक हथियार भी विकसित कर लिए हैं, जैसे कि बेहद डरावनी हाइपरसोनिक मिसाइल. भारत को इस सच्चाई के साथ अपनी तैयारी करनी होगी.

अभी भारत के सामने सबसे अच्छा विकल्प यही है कि वो अपने परमाणु हथियारों के मौजूदा ज़ख़ीरे को बढ़ाए और साधारण धमाकों वाले परमाणु हथियार तैनात करे, जिनको विकसित करके भारत ने उनका परीक्षण भी कर लिया है. इस विकल्प से आगे ये ज़रूरी हो जाता है कि भारत, अपनी लंबी दूरी की मौजूदा मिसाइलों के साथ साथ, परमाणु हथियार दागने के सिस्टम और प्लेटफॉर्मों जैसे कि हाइपरसोनिक मिसाइलों, हवा से लॉन्च होने वाली लंबी दूरी की क्रूज़ मिसाइलों और अधिक संख्या में एटमी बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस पनडुब्बियों को विकसित करने में निवेश करे. इन तीनों ही क्षमताओं का विकास अभी अलग अलग स्तर पर है. चीन के फिर से परमाणु परीक्षण करने की स्थिति में इनके विकास में तेज़ी लाना और उन्हें तैनात करना, भारत के लिए बहुत अहम प्राथमिकता होनी चाहिए. 

वैकल्पिक रूप से भारत, चीन के परीक्षणों के जवाब में अपने एटमी टेस्ट पर 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद स्वयं द्वारा लगाई गई रोक हटाकर ख़ुद भी धमाके कर सकता है. अगर भारत के नीति निर्माता, चीन के जवाब में परमाणु परीक्षण दोबारा शुरू करते हैं, तो उन्हें प्रतिबंधों के नतीजे भुगतने की तैयारी भी करनी होगी, जो ऐसे परमाणु परीक्षणों के बाद लगाए जाते हैं. और, अगर भारत ऐसा करता है, तो उसे चाहिए कि वो कई महीनों तक चलने वाले परमाणु परीक्षण करने की तैयारी के साथ शुरूआत करे, ताकि पिछले दौर के परमाणु परीक्षणों के बाद विकसित किए गए एटमी हथियारों के नए डिज़ाइन और ख़ास तौर से थर्मोन्यूक्लियर एटम बम का परीक्षण करके उनकी कुशलता सुनिश्चित कर सके, जो 1998 में नाकाम हो गए थे. इन सभी परीक्षणों से मिलने वाले आंकड़े, भारत को अपने परमाणु हथियारों को छोटे, हल्के मगर ज़्यादा क़हर ढाने वाले बेहद असरदार हथियार बनाने में मदद करेंगे. ये परमाणु परीक्षण पूरे होने के बाद, प्रतिबंध हटाने के बदले में भारत अगर चाहे तो वो कॉम्प्रिहेंसिव टेस्ट बैन ट्रीटी (CTBT) पर भी दस्तख़त कर सकता है.

अगर भारत के नीति निर्माता, चीन के जवाब में परमाणु परीक्षण दोबारा शुरू करते हैं, तो उन्हें प्रतिबंधों के नतीजे भुगतने की तैयारी भी करनी होगी, जो ऐसे परमाणु परीक्षणों के बाद लगाए जाते हैं.

जहां तक एक के बदले में दूसरे को छोड़ने का सवाल है, तो भारत शांति से नहीं बैठ सकता है. भारत के सामने जो विकल्प हैं, वो आसान नहीं हैं और उन सबकी लागत और उनके जोखिम हैं. फिर भी भारत को चाहिए कि वो अपनी परमाणु हथियारों और मिसाइलों के क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाए, ताकि चीन से पैदा होने वाले ख़तरे से निपटने के लिए ख़ुद को तैयार कर सके. ये न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरे हिंद प्रशांत क्षेत्र में ताक़त का संतुलन बनाए रखने की दृष्टि से आवश्यक है.

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Author

Kartik Bommakanti

Kartik Bommakanti

Kartik Bommakanti is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. Kartik specialises in space military issues and his research is primarily centred on the ...

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