Author : Shoba Suri

Published on Sep 12, 2023 Updated 0 Hours ago
मानव पूंजी और सतत विकास में निवेशः सहजीवन की मिसाल!

मानव पूंजी में निवेश सतत विकास की प्रक्रिया का एक अनिवार्य तत्व है, चूंकि यह आर्थिक विकास, सामाजिक उन्नति और पर्यावरण संबंधित स्थिरता को बढ़ावा देता है-अपने लोगों में निवेश करना, विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और कौशल विकास के क्षेत्र में. येस्थायी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने, गरीबी को कम करने और सामाजिक विकास के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए भारत की विकास रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा है. आर्थिक लाभों के अलावा, शिक्षा और कौशल विकास, व्यक्तियों का सशक्तिकरण, सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देनेऔर असमानताओं को कम करने का कार्य करते हैं. शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से, लोगों को बेहतर नौकरी के अवसर प्राप्त होने की संभावना के साथ ही, उनकेजीवन स्तर में सुधार और गरीबी में कमी आती है.नीचे दिये गये चित्र 1 मेंस्थिरता के चार स्तंभ, अर्थात् सामाजिक, पर्यावरणीय, आर्थिक और मानवीय पहलू को इंगित करता है.मानव पूंजी स्थिरता का अभिन्न अंग है और इसमें किसी संगठन के कामकाज और स्थिरता का समर्थन करने और विभिन्न समाजव समुदायों के कल्याण में योगदान करने के लिए आवश्यक कौशल का अधिग्रहण शामिल है.

चित्र 1: स्थिरता के चार स्तम्भ

मानव पूंजी सूचकांक 2020 में भारत174 देशों में से 116वें पायदान पर था. भारत में दुनिया केमलेरिया के बोझका 3 प्रतिशत और दुनिया केतपेदिक/टीबी के एक चौथाई से अधिक मामले हैं. भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.26 प्रतिशत स्वास्थ्य पर और 3 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है. आर्थिक सर्वेक्षण 2021 के अनुसार, स्वास्थ्य पर उच्च आउट-ऑफ-पॉकेट-व्यय (ओओपीई) भारत की गरीबी में योगदान देता है. यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति द्वारा निर्धारित 2.5-प्रतिशत लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को फिर से प्राथमिकता देने की सिफारिश करता है ताकि ओओपीई को मौजूदा 65 प्रतिशत की तुलना में स्वास्थ्य देखभाल व्यय के 30 प्रतिशत तक लाने में मदद मिल सके.

शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से, लोगों को बेहतर नौकरी के अवसर प्राप्त होने की संभावना के साथ ही, उनकेजीवन स्तर में सुधार और गरीबी में कमी आती है.

भारत ने साक्षरता के मामले में एक लंबा सफर तय किया है, लेकिन यहां अभी भी 31.3 करोड़ अनपढ़ लोग रहते हैं, जिनमें से 59 प्रतिशत महिलाएं हैं. जब शिक्षा की बात आती है तो सरकारी आंकड़े शहरी और ग्रामीण भारत के बीच एक बड़ा अंतर दिखाते हैं. शहरी क्षेत्रों में, 35.8 प्रतिशत आबादी ने माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह केवल 24.9 प्रतिशत है. स्नातक स्तर तक और उससे ऊपर की शिक्षा पूरी करने का प्रतिशत ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अलग होता है, जो ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में क्रमशः 5.7 से 21.7 प्रतिशत तक होता है. भारत में साक्षरता में लिंग अंतर कम हो गया है, लेकिन अभी भी पुरुषों और महिलाओं के बीच 16.9 प्रतिशत का अंतर है. 42 प्रतिशत शहरी परिवारों की तुलना में केवल 14.9 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास इंटरनेट की सुविधा थी.

भारत ने गुणवत्ता से भरपूर शिक्षा तक पहुँच और शैक्षिक सुधार एवं शैक्षिक परिणामों को बेहतर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए है. सरकार ने 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसी विभिन्न पहलों को लागू किया है.इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और अटल नवाचार मिशन जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य माध्यमिक शिक्षा को बढ़ावा देना और छात्रों के बीच नवाचार और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना है. भारत ने रोज़गार क्षमता बढ़ाने और उद्योग की आवश्यकताओं और कार्यबल कौशल के बीच की खाई को पाटने के लिए कौशल विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया है. सरकार के प्रमुख कार्यक्रम, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में लाखों युवाओं को कौशल प्रशिक्षण प्रदान करना है. इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय कौशल विकास निगम कौशल विकास कार्यक्रम बनाने और प्रशिक्षुता या अप्रेंटिसशिप को बढ़ावा देने के लिए उद्योग भागीदारों के साथ सहयोग करता है.

स्वस्थ भारत

भारत, इस वक्त स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करने और लोगों की सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के बारे में है. सरकार ने प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों के साथ आयुष्मान भारत (राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना) और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू की है जो कुल आबादी के अधीन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करती है. इन पहलों का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे में अंतर को पाटना, आवश्यक सेवाएं प्रदान करना और ओओपीई को कम करना है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (बालिका बचाओ, बालिकाओं को शिक्षित करो) और स्वच्छ भारत अभियान (स्वच्छभारत अभियान) जैसे कार्यक्रमों के साथ भारत के मानव पूंजी निवेश के प्रयास भी समग्र विकास को बढ़ावा देने और सामाजिक असमानताओं को दूर करने के लिए तैयार हैं, जो क्रमशः लैंगिक समानता स्थापित करने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में सुधार, और स्वच्छता और स्वच्छता को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करते हैं.

सरकार ने 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने के लिएसर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसी विभिन्न पहलों को लागू किया है.

हालांकि, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा तक पहुंच में असमानता, लिंग और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. शिक्षा के माध्यम से अर्जित कौशल अक्सर नौकरी बाजार में आवश्यक कौशल के साथ मेल नहीं खाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बेरोजगारी होती है. स्कूल, व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी मानव पूंजी के विकास में बाधा डालती है; विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, इन संसाधनों की कमी है. लैंगिक असमानताएँ बनी हुई हैं, विशेष रूप से शिक्षा और कार्यबल में भागीदारी में.भारत की मानव पूंजी क्षमता को खोलने के लिए शिक्षा और समान रोजगार के अवसरों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण आवश्यक है. भारत के कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्यरत है, जिनमें अक्सर नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और कौशल विकास के अवसरों की कमी होती है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी प्राइवेट लिमिटेड के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर 8.2 प्रतिशत पर उच्च बनी हुई है और 2023 की शुरुआत से बढ़ रही है..

विश्व बैंक के अनुसार, किसी भी देश के लिए, मानव पूंजी में निवेश सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालिक निवेश है जो अपनी भविष्य की समृद्धि और लोगों की भलाई के लिए काफी कुछ कर सकता है. शिक्षा, कौशल असंतुलन, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और लैंगिक असमानता से संबंधित चुनौतियों का समाधान करके, भारत आर्थिक प्रगति और सामाजिक उन्नति के लिए अपनी मानव क्षमता का उपयोग कर सकता है. प्रभावी मानव पूंजी निवेश के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी एक अभिन्न अंग है. सरकारी निकायों, एवं निजी उद्यमों और नागरिक समाज के बीच सहयोग,एक साथ संसाधनों, विशेषज्ञता और नवीन दृष्टिकोण को एकत्र कर सकता है. रणनीतिक निवेश, नीतिगत सुधार और सहयोगात्मक प्रयास एक ऐसे कार्यबल को आकार देने में महत्वपूर्ण हैं जो न केवल उत्पादक हो बल्कि एक गतिशील वैश्विक अर्थव्यवस्था की उभरती मांगों के अनुकूल भी हो. मानव पूंजी विकास के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने में, भारत यह सुनिश्चित करते हुए कि विकास न्यायसंगत, समावेशी और स्थायी स्वभाव का हो, इसके साथ ही वो खुद को वैश्विक क्षेत्र में एक प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित कर सकता है.

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