विदेश मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए ऑनलाइन कोर्स में तालिबानी राजनयिकों के शामिल होने को तालिबान के प्रति भारत के समग्र दृष्टिकोण के लिहाज़ से ग़लत नहीं समझा जाना चाहिए.
पिछले सप्ताह अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्रालय (MoFA) के इंस्टीट्यूट ऑफ डिप्लोमेसी के एक लीक हुए आंतरिक पत्र ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. अंतरिम तालिबान प्रशासन के कार्यालयों के भीतर आंतरिक रूप से प्रसारित किए गए इस पत्र में कह गया था कि विदेश मंत्रालय में अंग्रेज़ी जानने वाले जो भी कर्मचारी हैं, वे भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) की क्षमता निर्माण पहल इंडियन टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन(ITEC) द्वारा आयोजित किए जाने वाले 'अल्पकालिक ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम' में नामांकन कराएं. अपनी साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान इस बारे में पूछे जाने पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ITEC के उद्देश्य को दोहराते हुए कहा कि इसके प्रावधानों के अंतर्गत सभी देशों के लोग ऑनलाइन क्षमता निर्माण कोर्स में भाग लेते हैं. प्रवक्ता ने यह भी स्वीकार किया कि हो सकता है कि भारत के अंदर और बाहर कई अफ़ग़ानियों ने इसके लिए अपना नामांकन कराया हो. इस ख़बर के फैलने के कुछ समय बाद नई दिल्ली में, विशेष रूप से भारत में मौज़ूद अफ़ग़ान छात्रों और अपने देश यानी अफ़ग़ानिस्तान में फंसे उन छात्रों के बीच बेचैनी फैल गई, जिन्हें तालिबान के सत्ता में आने के बाद बगैर किसी मदद के अपने हाल हाल पर छोड़ दिया गया था. ऐसे में जबकि एक ऑनलाइन क्रैश कोर्स तालिबान के कब्ज़े वाले अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत के समग्र नज़रिए को प्रतिबिंबित नहीं करता है, लेकिन इसने तालिबान के साथ नई दिल्ली के जुड़ाव और अपने देश में फंसे अफ़ग़ान छात्रों के लिए वीज़ा सुविधाओं को फिर से शुरू करने के सवालों को सुर्खियों में लाने का काम ज़रूर किया है.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, कोझिकोड द्वारा आयोजित, 'इमर्जिंग विद इंडियन थॉट्स: विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित विदेशी प्रतिनिधियों के लिए एक इंडियन इमर्जन प्रोग्राम' नाम के इस शॉर्ट-टर्म ऑनलाइन कोर्स का मक़सद चयनित छात्रों को भारत के राजनीतिक और कारोबारी वातावरण से परिचित कराना था.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, कोझिकोड द्वारा आयोजित, 'इमर्जिंग विद इंडियन थॉट्स: विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित विदेशी प्रतिनिधियों के लिए एक इंडियन इमर्जन प्रोग्राम' नाम के इस शॉर्ट-टर्म ऑनलाइन कोर्स का मक़सद चयनित छात्रों को भारत के राजनीतिक और कारोबारी वातावरण से परिचित कराना था. वैसे तो यह कोर्स दुनिया भर के छात्रों के लिए उपलब्ध था, लेकिन यह प्राथमिक तौर पर सरकारी अधिकारियों, उद्यमियों और वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रबंधकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. इंस्टीट्यूट के मुताबिक़ पहले दिन ऑनलाइन क्लास में शामिल होने वाले 20 लोगों में से 18 अफ़ग़ानिस्तान से थे, जबकि बाक़ी दो लोग मालदीव और थाईलैंड से थे. तालिबानी नेताओं को पाठ्यक्रम में हिस्सा लेने की अनुमति देने के बारे में हो रही आलोचना का जवाब देते हुए आईआईएम, कोझिकोड ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवारों के बारे में निर्णय लेने का विशेषाधिकार मंत्रालय का है, संस्थान को उम्मीदवारों के राजनीतिक या संस्थागत संबंधों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. सामान्य तौर पर सभी ITEC पाठ्यक्रमों के लिएउम्मीदवारों को एक फॉर्म भरना होता है और इसे अपनी नोडल सरकारी एजेंसी के पास जमा करना होता है, जो कि बाद में इस फॉर्म को भारतीय दूतावास/उच्चायोग को भेजती है. लीक हुए पत्र में आईओडी के महानिदेशक मुफ़्ती नुरुल्लाह अज़्ज़ाम ने उल्लेख किया है कि उन्हें काबुल में भारतीय 'तकनीकी मिशन' से एक नोट वर्बल यानी एक प्रकार की कूटनीतिक सूचना के माध्यम से पाठ्यक्रम के बारे में जानकारी दी गई थी. नई दिल्ली ने इस दावे को यह कहते हुए पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया कि भारत नोट वर्बल के माध्यम से उन सरकारों के साथ संवाद नहीं करता है, जिन्हें वह मान्यता नहीं देता है.
काबुल पर तालिबान का कब्जा होने के क़रीब दो साल बाद अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत की नीति में बदलाव आया है. लेकिन दूसरे देशों की भांति, संकट में घिरे हुए अफ़ग़ानिस्तान में तेज़ी से बदलते घटनाक्रमों ने एक स्थाई और स्थिर दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने के काम को बहुत मुश्किल कर दिया है. पिछले साल जून में अपने 'तकनीकी मिशन' को खोलने के बाद से नई दिल्ली, अफ़ग़ानिस्तान को मानवीय सहायता और आपदा राहत प्रदान करने में सबसे आगे रही है. खाद्यान्न से लेकर कोविड वैक्सीन उपलब्ध कराने तक और पिछले वर्ष आए विनाशकारी भूकंप के दौरान सहायता के लिए भारत ने वहां ज़मीनी स्तर पर जो कार्य किए हैं, वो यह स्पष्ट रूप से साबित करते हैं कि अफ़ग़ान नागरिकों की वास्तविक भलाई के लिए उसको कितनी ज़्यादा चिंता है. ऐतिहासिक रूप से देखा जाए, तो भारत-अफ़ग़ान संबंध लोगों के बीच पारस्परिक संबंधों पर केंद्रित रहे हैं, भले ही सत्ता पर कोई भी काबिज हो. नई दिल्ली के इन्हीं क़दमों की वजह से रणनीतिक लिहाज़ से बेहद अहम अफ़ग़ानिस्तान में भारत को अपार लोकप्रियता हासिल हुई है. यही वजह है कि फंसे हुए अफ़ग़ान छात्रों के सवाल पर त्वरित कार्रवाई करने में नाक़ाम रहने पर भारत को हर तरफ़ से आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है.
देखा जाए, तो मौज़ूदा समय में लगभग 14,000 अफ़ग़ान छात्र भारत में विभिन्न विश्वविद्यालयों में नामांकित हैं. ऐतिहासिक रूप से अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले छात्रों के लिए भारत सबसे मुनासिब जगह रही है. पिछले 16 वर्षों में 60,000 से अधिक अफ़ग़ान छात्रों ने भारत में अपनी पढ़ाई पूरी की है.काबुल में तालिबान के शासन के बाद जो हालात हैं, उनके मद्देनज़र अपने सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए नई दिल्ली ने जहां अफ़ग़ान छात्रों को वीज़ा देने पर रोक लगा दी, वहीं उनके पहले से मौज़ूद वीज़ा को भी रद्द कर दिया. तभी से अफ़ग़ानी छात्रों का समुदाय इस मुद्दे पर कार्रवाई करने के लिए लगातार नई दिल्ली से संपर्क करता आया है. अक्टूबर 2022 में एक कार्यक्रम को दौरान भारत के विदेश मंत्री ने वीज़ा सेवाओं को फिर से शुरू करने से पहले "विश्वास और योग्यता" के स्तर को बढ़ाने की बात कही थी. लेकिन वीज़ा में देरी होने से छात्रों को रोज़ाना मुश्किलों से दो-चार होना पड़ता है. कई छात्रों को अपनी फीस का भुगतान करने या नौकरी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, साथ ही उनमें से कई के पास तो घर लौटने का भी कोई विकल्प नहीं रह गया है. इंडियन काउंसिल ऑफ कल्चरल रिलेशन्स (ICCR), जो कि पिछले सत्रह सालों से छात्रों को स्कॉलरशिप दे रही है, उसने भी इस वर्ष अफ़ग़ान छात्रों को कोई छात्रवृत्ति नहीं दी है. ऐसे में कई अफ़ग़ान छात्र ऐसे हैं, जो अब अपनी पहले से ही कम व्यक्तिगत बचत से काम चला रहे हैं. हालात यह हो चुके हैं कि कुछ छात्रों का नाम उनके विश्वविद्यालयों से काट दिया गया है क्योंकि वे यूनिवर्सिटी परिसर में स्वयं उपस्थित होने में विफल रहे हैं. इतना ही नहीं, अफ़ग़ान छात्रों की इंटरनेट सेवाओं तक असमान पहुंच और इसके लिए बहुत अधिक ख़र्च की वजह से ऑनलाइन क्लासेस में उनके शामिल होने की संभावना भी न के बारबर है.
इन सभी परिस्थितियों की वजह से अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों को लेकर भारत की प्रतिबद्धता कहीं न कहीं कमज़ोर हुई है और इससे वहां के लोगों में गुस्सा और निराशा का भाव उत्पन्न हुआ है.
यह सब वो बातें हैं, जिनकी वजह से प्रशिक्षण संबंधी पत्र को सार्वजनिक रूप से जारी करने को लेकर तमाम सवाल और चिंताएं पैदा हुईं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि उस पत्र को तालिबान द्वारा जानबूझ कर सार्वजनिक किया गया था, ताकि वह भारत की तरफ अपनी बढ़ती पहुंच को साफ तौर पर ज़ाहिर कर सके. हालांकि, पहली बार में तालिबानी लीडर्स के इस कोर्स में शामिल होने की संभावना देखा जाए तो बहुत कम है, लेकिन वहां के योग्य छात्र अपने देश के बदले हुए राजनीतिक परिद्श्य की वजह से इस सबमें उलझ कर रह गए हैं. इन सभी परिस्थितियों की वजह से अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों को लेकर भारत की प्रतिबद्धता कहीं न कहीं कमज़ोर हुई है और इससे वहां के लोगों में गुस्सा और निराशा का भाव उत्पन्न हुआ है. छात्रों के नज़रिए से देखें, तो भारत का यह निर्णय, अफ़ग़ानिस्तान के प्रति उसकी लंबे वक़्त से चली आ रही नीति के बिलकुल उलट था.
तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में अपनी वापसी के बाद से ही लगातार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता या वैधता पाने की जद्दोजहद कर रहा है. भले ही अन्य तमाम मुद्दों के साथ-साथ महिला शिक्षा और श्रम बल में उनकी भागीदारी के बारे में उसके नीतिगत फैसले पश्चिम के साथ ही क्षेत्र के कुछ अन्य देशों द्वारा की गई मांगों के पूरी तरह ख़िलाफ़ जाते हैं, फिर भी तालिबान अपनी तरफ से कोशिशों में लगा हुआ है. तालिबान इसके लिए भारत से भी संपर्क स्थापित कर रहा है और अपने देश के नागरिकों के लिए मदद मांग रहा है. शुरुआत में तालिबान ने भारत से मान्यता मांगने के अलावा, भारत के ख़िलाफ़ कार्य करने वाले आतंकवादियों को बढ़ावा नहीं देने को लेकर आश्वासन दिया. इतना ही नहीं तालिबान शासन ने दोनों देशों यानी भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच वाणिज्यिक उड़ानों के संचालन के लिए अनुरोध किया, साथ ही अफ़ग़ान छात्रों को वीज़ा देने के मुद्दे पर भी भारत से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया. तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में वापसी के दो सप्ताह बाद, नई दिल्ली और तालिबान के बीच पहली सार्वजनिक रूप से स्वीकृत एक औपचारिक बैठक दोहा में हुई थी, जिसमें भारत ने मानवतावादी शर्तों पर तालिबान के साथ अपने सीमित जुड़ाव को आधार बनाया था. भारत द्वारा तकनीकी मिशन खोलना भी इसी क्रम में अलगे क़दम की तरह है. तालिबान ने नई दिल्ली में अपने राजदूत को नियुक्त करने की अनुमति देने के आग्रह के साथ ही, भारत सरकार के अलावा निजी सेक्टर से अनुरोध किया है कि अफ़ग़ानों के लिए नौकरी के अवसर उपलब्ध कराने हेतु वे उनके देश की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश करें. लेकिन विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने सभी से कहा है कि ऑनलाइन कोर्स की अधिसूचना को लेकर ज़्यादा अटकलबाज़ी नहीं लगाएं.
भारत द्वारा अफ़ग़ानिस्तान के प्रति एक स्पष्ट नज़रिया अपनाने की जगह पर इस ढुलमुल रवैये का दोनों देशों के संबंधों के तमाम दूसरे पहलुओं पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है. भारत के इस लचर नीति का एक बड़ा शिकार अफ़ग़ानिस्तान के सामान्य नागरिक हैं.
हालांकि, जहां तक इस ऑनलाइन कोर्स की बात है, तो यह किसी भी लिहाज़ से भारत की तालिबान के बारे में नीति में बदलाव या फिर संबंधों के सामान्य होने का प्रत्यक्ष तौर पर कोई संकेत नहीं दे सकता है. लेकिन ये भी सच्चाई है कि यह तालिबान के साथ किसी न किसी प्रकार के संभावित जुड़ाव का संकेत तो देता ही है. भारत द्वारा अफ़ग़ानिस्तान के प्रति एक स्पष्ट नज़रिया अपनाने की जगह पर इस ढुलमुल रवैये का दोनों देशों के संबंधों के तमाम दूसरे पहलुओं पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है. भारत के इस लचर नीति का एक बड़ा शिकार अफ़ग़ानिस्तान के सामान्य नागरिक हैं. वीज़ा मुद्दे पर एक समाधान तक पहुंचने में देरी ने न केवल अफ़ग़ान छात्रों की दिक़्क़तों को बढ़ा दिया है, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत की साख को भी नुक़सान पहुंचाने का काम किया है. अफ़ग़ानिस्तान में सहायता मुहैया करने के सबसे बड़े क्षेत्रीय योगदानकर्ता के रूप में भारत की सकारात्मक धारणा जहां इससे प्रभावित हुई है, वहीं जिस प्रकार से वर्ष 2022-23 में संभावित अफ़ग़ान छात्रों ने भारत में शिक्षा के लिए कम पूछताछ की है, उससे शिक्षा के एक अनुकूल गंतव्य के रूप में इसकी स्थिति को भी झटका लगा है. ऐसे में जबकि अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ से उठने वाले सुरक्षा और आतंकी ख़तरों को लेकर चिंताएं वाजिब हैं, तो ज़रूरी हो जाता है कि उसके बारे में किसी भी नीतिगत नज़रिए या फैसले में इन चिंताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के कल्याण के सवाल पर ज़्यादा सधी हुई एवं सोची-समझी प्रतिक्रिया अपनाने का भी प्रयास होना चाहिए. जिस प्रकास से तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में शिक्षा ग्रहण करने के लिए महिलाओं की पहुंच में अवरोध पैदा कर रहा है और सार्वजनिक जगहों पर उनकी मौज़ूदगी को लेकर हुई प्रगति को रोकने का काम कर रहा है, उससे यह तय है कि भविष्य को लेकर कोई उम्मीद की किरण नहीं दिखाई देती है. ऐसे परिस्थितियों में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ ही इस क्षेत्र के देशों के लिए यह बेहद ज़रूरी हो जाता है कि वे अफ़ग़ानिस्तान के संबंध में अपने किसी भी नीतिगत विचार-विमर्श के केंद्र में अनिवार्य रूप से वहां आम लोगों को रखें.
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Shivam Shekhawat is a Junior Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. Her research focuses primarily on India’s neighbourhood- particularly tracking the security, political and economic ...
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