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Published on May 24, 2024 Updated 0 Hours ago

मालदीव के साथ उथल-पुथल भरे रिश्तों के बावजूद भारत ने पिछले दिनों उसे लगभग 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर का बजटीय समर्थन दिया है.

भारत-मालदीव संबंध: पड़ोसी देश के प्रति भारत की ‘सद्भावना का सच्चा प्रदर्शन'

9 मई को भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर के साथ बैठक के बाद दिल्ली से लौटने के कुछ ही दिनों के भीतर मालदीव के विदेश मंत्री मूसा ज़मीर ने अपने अनुरोध पर कर्ज़ चुकाने की मियाद आगे बढ़ाने की ‘भारत की सच्ची सद्भावना के प्रदर्शन’ के लिए अपना धन्यवाद पोस्ट किया. भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ तौर पर उस समय प्रक्रिया को तेज़ किया जब दोनों सरकारों के बीच अतीत के समझौते के आधार पर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) का 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज़ चुकाने की तारीख 15 मई थी और 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर का एक और कर्ज़ सितंबर में चुकाना है

इसके कुछ हफ्ते पहले भारत ने चावल, गेहूं का आटा, चीनी, आलू और अंडे समेत ज़रूरी सामानों का निर्यात कोटा बढ़ाया था. साथ ही मालदीव के मुख्य कंस्ट्रक्शन उद्योग के लिए आवश्यक कंस्ट्रक्शन मैटेरियल जैसे कि रेत और पत्थर के निर्यात के कोटा में भी बढ़ोतरी की थी. इससे पहले भारत ने बिना किसी संकोच या विरोध के उस समय हामी भरी थी जब राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू ने मेडिकल बचाव और देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की हवाई निगरानी के लिए उपहार के रूप में दिए गए तीन विमानों का संचालन और रख-रखाव करने वाले सैन्य कर्मियों को भारत को वापस लेने की अपनी चुनाव के समय की मांग को आगे बढ़ाया था. 10 मई, जिस दिन ज़मीर दिल्ली से वापस आए, को भारतीय सैन्य कर्मियों के आख़िरी तीन बैच, जिसमें कुल 76 कर्मी थे, भारत लौट गए. इनकी जगह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी HAL के सिविलियन पायलट और टेक्नीशियन लेंगे

मुइज़्ज़ू को ये श्रेय जाता है कि काम-काज संभालने के बाद उन्होंने बिना किसी रुकावट के या सैन्य कर्मियों को वापस लेने की अपनी मांग से जोड़े बिना भारत के इंफ्रा निवेश को जारी रखा.

मालदीव में निर्वाचित सरकार के बदलने का हवाला दिए बिना भारत प्रतिष्ठित थिलामाले समुद्री पुल समेत बुनियादी ढांचे की कई परियोजनाओं का काम जारी रखे हुए है. इसके अलावा भारत मालदीव के कई द्वीपों में बड़े असर वाली कई विकास योजनाओं (हाई-इंपैक्ट डेवलपमेंट स्कीम) पर भी काम कर रहा है. मुइज़्ज़ू को ये श्रेय जाता है कि काम-काज संभालने के बाद उन्होंने बिना किसी रुकावट के या सैन्य कर्मियों को वापस लेने की अपनी मांग से जोड़े बिना भारत के इंफ्रा निवेश को जारी रखा. राष्ट्रपति बनने के कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने समुद्री पुल पर चल रहे काम का जायज़ा भी लिया और कोविड-19 महामारी की वजह से देर से चल रही इस परियोजना को तेज़ करने के लिए कहा. 

अकेला मामला, लेकिन... 

फिर भी सवाल बने हुए हैं, विशेष रूप से भारतीय चिंताओं को लेकर जो काफी हद तक रक्षा एवं सुरक्षा मामलों तक सीमित हैं, ख़ास तौर पर इस क्षेत्र में चीन की प्रतिकूल मौजूदगी पर केंद्रित हैं. इस मामले में परेशानी का एक मुद्दा है मालदीव के बंदरगाह पर दो महीनों में दो बार चीन के रिसर्च/जासूसी जहाज़ ‘शियांग यांग होंग 03’ को रुकने की अनुमति देना और मालदीव के EEZ के इर्द-गिर्द इस जहाज़ का तीन महीने तक मंडराना. भारत में इसको लेकर सवाल उठने की वजह ये है कि चीन का जहाज़ बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुइज़्ज़ू की बैठक के बाद आया और मुइज़्ज़ू ने भारत के साथ साझा समुद्र विज्ञान सर्वेक्षण (ओशनोग्राफिक सर्वे) को जून की मौजूदा समय सीमा से आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया. 

इसके बाद सोशल मीडिया पर ‘बायकॉट मालदीव’ की अपील का सवाल भी है जो मुहिम भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ मालदीव के तीन उप मंत्रियों के द्वारा अपमानजनक पोस्ट के बाद चलाई गई. ये अपमानजनक पोस्ट मोदी के द्वारा लक्षद्वीप के दौरे और इस द्वीप को एक पर्यटन स्थल के रूप में बढ़ावा देने के बाद किए गए. दिल्ली में भारतीय न्यूज़ एजेंसी ANI के साथ एक इंटरव्यू में मालदीव के विदेश मंत्री ज़मीर ने इस घटना के लिए ‘माफी मांगी’, तीनों मंत्रियों को तुरंत निलंबित करने की तरफ ध्यान दिलाया और दोहराया कि उनके विचार निजी थे और ये सरकार का रवैया नहीं था. 

संयोग से मुइज़्ज़ू की 14 जनवरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस को ऐसी बातों के लिए याद रखा जाएगा जो चीन के शी जिनपिंग समेत किसी भी राष्ट्र प्रमुख ने नहीं कहीं थी. पिछले दशक के दौरान वर्दीधारी चीनी शिक्षाविदों की तर्ज पर लेकिन भारत का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि ‘मालदीव किसी का पिछलग्गू नहीं है’ और ‘हम पर धौंस जमाने का किसी के पास लाइसेंस नहीं है’. उन्होंने कुछ दिन पहले तुर्किए के आधिकारिक दौरे का भी ज़िक्र किया जहां उन्होंने कहा था कि हवाई निगरानी में ‘आत्मनिर्भरता’ को सुनिश्चित करने के लिए मालदीव ड्रोन ख़रीद रहा है. इसके दो महीने से भी कम समय में शुरुआती दो ड्रोन पहुंच गए. इसके साथ-साथ राष्ट्रपति ने अपने इस फैसले का भी एलान किया कि ‘एक स्रोत पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता’ को ख़त्म करने के लिए सभी ज़रूरी सामानों जैसे कि चावल, आटा और चीनी का आयात सालाना आधार पर किया जाएगा. 

इस बात की जानकारी नहीं है कि मुइज़्ज़ू ने बीजिंग में शी जिनपिंग के साथ कर्ज-पुनर्संरचना (डेट-रिस्ट्रक्चरिंग) को लेकर बात की या नहीं लेकिन चीन के दूत वांग लिक्शिन ने अब कहा है कि वो ‘कर्ज-पुनर्संरचना’ को लेकर बात कर रहे थे. हालांकि ये आगे कर्ज़ की राह में रुकावट डाल सकती है. 

मुइज़्ज़ू को भारत का नाम नहीं लेना पड़ा लेकिन बाद के घटनाक्रमों ने दिखाया कि कैसे आने वाले महीनों में भारत ने इन ज़रूरी सामानों और दूसरी चीज़ों के अधिक आयात कोटा को मंज़ूरी दी क्योंकि तुर्किए से ज़्यादा लागत पर ख़रीदारी लाल सागर में व्यापारिक जहाज़ों पर हूती के हमलों की वजह से बाधित हुई. आज जब विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पिछले साल के आख़िर से शुरू होने वाले कर्ज़ के जाल के अपने दो साल पुराने आकलन को फिर से ज़िंदा किया है, ऐसे में मालदीव भारत से मिलने वाली सभी वित्तीय और आर्थिक सहायता का फायदा उठा सकता है, विशेष रूप से जनवरी में मुइज़्ज़ू की चीन यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए गए समझौतों के परिणामस्वरूप ‘अधिक चीनी कर्ज़ के ख़तरे’ को देखते हुए. इस बात की जानकारी नहीं है कि मुइज़्ज़ू ने बीजिंग में शी जिनपिंग के साथ कर्ज-पुनर्संरचना (डेट-रिस्ट्रक्चरिंग) को लेकर बात की या नहीं लेकिन चीन के दूत वांग लिक्शिन ने अब कहा है कि वो ‘कर्ज-पुनर्संरचना’ को लेकर बात कर रहे थे. हालांकि ये आगे कर्ज़ की राह में रुकावट डाल सकती है. 

प्रचंड बहुमत लेकिन… 

पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव में मुइज़्ज़ू की जीत किसी भी लोकतंत्र के लिए अनूठी है. शायद वो अकेले उम्मीदवार थे जो आख़िरी समय में मुकाबले में शामिल हुए थे और उन्होंने एक समय के अपने राजनीतिक गुरु और जेल में बंद पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के काफी समर्थकों- जो रूढ़िवादी थे/हैं लेकिन कट्टर नहीं- को अपनी तरफ खींच लिया और दो चरणों के चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह के ख़िलाफ़ जीत हासिल की. ऐसा लगता है कि भारत को ये समझा आ गया है कि भारतीय सैन्य कर्मियों की वापसी मुइज़्ज़ू के लिए एक विरासत में मिला/कब्ज़ा किया गया ‘पारंपरिक मुद्दा’ था, भले ही चुनाव आम तौर पर घरेलू राजनीति और व्यक्तित्वों के आधार पर लड़ा और जीता गया था. 

यही बात मुइज़्ज़ू के PNC-PPM गठबंधन पर लागू होती है जिसने राष्ट्रपति के द्वारा मुख्य रूप से एक सहयोगी/तालमेल वाली संसद की अपील के बाद पिछले महीने के संसदीय चुनाव में ‘प्रचंड बहुमत’ हासिल किया. ये पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह की विपक्षी मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP), जिसके पास निवर्तमान संसद में सबसे ज़्यादा संख्या थी, के द्वारा मुइज़्ज़ू के ख़िलाफ़ महाभियोग की धमकी के बाद हुआ जबकि उस समय तक राष्ट्रपति और उनकी टीम ने ठीक से काम-काज भी नहीं संभाला था. हालांकि मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने उनकी संशोधित प्रक्रिया को रद्द कर दिया था.

MDP और उससे टूट कर बनी पार्टी के बीच मतों का बंटवारा जारी रहने से भी मुइज़्ज़ू की पार्टी को मदद मिली. साथ ही यामीन की नई पार्टी पीपुल्स नेशनल फ्रंट (PNF), जिसे संसदीय चुनाव के लिए कोई एक चुनाव चिह्न नहीं मिला था, की नाकामी से भी मुइज़्ज़ू की पार्टी को फायदा हुआ. संसद में प्रचंड बहुमत के साथ मुइज़्ज़ू के लिए कोई दिक्कत, अगर कोई है तो, भीतर से ही खड़ी हो सकती है जैसा कि उनके पूर्ववर्ती सोलिह के साथ हुआ था. फिर भी संसदीय चुनाव में शानदार जीत, जो कि उनकी अपनी है, के बाद उन्हें आने वाले महीनों और वर्षों में यामीन के नाकाम और भुला दिए गए ‘इंडिया आउट’ अभियान के फिर से ज़िंदा होने की संभावना का अनुमान लगाने और इसलिए उससे निपटने में सक्षम होना चाहिए. 

नई पीढ़ी के नेता 

45 वर्ष के मुइज़्ज़ू नई पीढ़ी के राजनेता हैं, वो मौजूदा लोकतंत्र केंद्रित उन चुनावी विरोधियों से अलग हैं जो 2008 में बहुदलीय संविधान के लागू होने के समय से राजनीति कर रहे हैं. इसी तरह नई पीढ़ी के आकांक्षा से भरे मतदाता हैं जो अतीत से और भी कटे हुए हैं. इस वजह से घरेलू राजनीति, शासन व्यवस्था और विदेश एवं सुरक्षा नीतियों को संभालने में मुइज़्ज़ू भी संभावनाओं से भरपूर हैं. 

45 वर्ष के मुइज़्ज़ू नई पीढ़ी के राजनेता हैं, वो मौजूदा लोकतंत्र केंद्रित उन चुनावी विरोधियों से अलग हैं जो 2008 में बहुदलीय संविधान के लागू होने के समय से राजनीति कर रहे हैं. इसी तरह नई पीढ़ी के आकांक्षा से भरे मतदाता हैं जो अतीत से और भी कटे हुए हैं.

भारतीय पहलू से ये देखा जाना अभी बाकी है कि मुइज़्ज़ू प्रशासन यहां से कैसे द्विपक्षीय मुद्दों पर आगे बढ़ता है, ख़ास तौर पर सुरक्षा सहयोग के मामलों में. इसे मालदीव और चीन के द्वारा मुइज़्ज़ू के जनवरी दौरे में ‘सामरिक सहयोग बढ़ाने’ के फैसले और ‘ग्लोबल सिविलाइज़ेशन इनिशिएटिव’ (GCI) के साथ चीन की ‘ग्लोबल सिक्युरिटी इनिशिएटिव’ (GSI) पर हस्ताक्षर के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. 

भारतीय सैन्य कर्मियों की समयबद्ध वापसी की मांग करते हुए भी मालदीव की सरकार ने दोस्ती-16 कोस्ट गार्ड अभ्यास की मेज़बानी की जहां भारतीय सैनिकों के साथ दोनों देशों के साझा पड़ोसी श्रीलंका के सैनिक भी मौजूद थे. मई 2024 में मालदीव ने ‘ब्लैक मर्लिन’ साझा अभ्यास में अमेरिका के सैनिकों की मेज़बानी की. मालदीव के दौरे पर आए ब्रिटेन के एक मंत्री ने भी पिछले दिनों सुरक्षा से जुड़ी बातचीत की. उसके बाद आर्थिक पहुंच को बढ़ाते हुए संबंधित विभाग के मालदीव के मंत्री ने यूनाइटेड किंगडम (UK) के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को मज़बूत करने के लिए लंदन में बातचीत की. 

गहरी छानबीन

इन सभी बातों ने पड़ोसी देश भारत के साथ द्विपक्षीय रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग को लेकर मुइज़्ज़ू प्रशासन के दृष्टिकोण पर सवाल उठाए हैं. भारत से वापस आने के बाद विदेश मंत्री ज़मीर के साथ एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री गासन ने स्वीकार किया कि सभी भारतीय सैनिक अपने देश लौट गए हैं. उन्होंने ये भी कहा कि उथुरा थिला-फाल्हू (UTF) द्वीप पर भी कोई भारतीय सैन्य कर्मी नहीं है जहां भारत के फंड से कोस्ट गार्ड जेटी का काम चल रहा है. 

रक्षा मंत्री गासन पूर्व राष्ट्रपति मामून अब्दुल गयूम के बेटे हैं और उन्होंने भी सफाई दी कि मालदीव के सैन्य कर्मी भारत के द्वारा उपहार के रूप में दिए गए तीन विमानों को उड़ाने में सक्षम नहीं थे. इसका ये मतलब हो सकता है कि सरकार पहले के सैन्यकर्मियों की तरह भारत के सिविलियन पायलट और तकनीशियनों को तैनात कर सकती है. वैसे तो इस बात को लेकर बहस जारी है कि कैसे भारतीय डॉर्नियर ने तुर्किए के ड्रोन को ‘मात’ दे दी लेकिन भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने दिल्ली में आयोजित एक कॉन्क्लेव में कहा कि अगर अनुरोध किया गया तो भारत ‘मालदीव के पायलटों को ट्रेनिंग’ देगा. 

फिर भी साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में उस वक़्त विवाद हुआ जब मालदीव के था अटोल के थिमाराफुशि द्वीप में 2019 में भारतीय नौसेना के कर्मियों के द्वारा बिना इजाज़त लैंडिंग के मालदीव के आरोपों से जुड़ा मुद्दा उठाया गया. भारतीय उच्चायोग ने तुरंत एक बयान जारी कर इस दावे का खंडन किया और कहा कि ‘अप्रत्याशित मजबूरियों की वजह से’ इमरजेंसी लैंडिंग की गई ताकि लोगों और विमान की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके लेकिन इसके लिए मंज़ूरी ली गई थी.  

ये घटना साफ तौर पर दिखाती है कि द्विपक्षीय संबंधों के शुभचिंतकों, विशेष रूप से मालदीव में, को उन लोगों के बारे में चिंतित होना चाहिए जो अतीत की बातों की पड़ताल करना चाहते हैं जिसमें मुइज़्ज़ू का नेतृत्व शामिल नहीं था. वो अर्ध-सत्य को सामने लाना चाहते हैं जो मिली-जुली मेहनत पर पानी फेर सकता है. 


चेन्नई में रहने वाले एन. सत्या मूर्ति विश्लेषक और राजनीतिक समीक्षक हैं.

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