Author : Andreas Kuehn

Published on May 07, 2022 Updated 1 Days ago

इतिहास हमें बताता है कि दबदबा स्थायी चीज़ नहीं है. एक वक़्त ऐसा था जब चीन नहीं बल्कि अमेरिका धरती से हासिल होने वाले दुर्लभ पदार्थों का सबसे बड़ा उत्पादक था.

राज्यसत्ताओं के लिए पदार्थ के भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक मायने

ये लेख रायसीना फाइल्स 2022 सीरीज़ का हिस्सा है.


वैश्विक अर्थव्यवस्था पर एडवांस टेक्नोलॉजी के बड़े ​गहरे प्रभाव होंगे. इससे समावेशी और टिकाऊ विकास का रास्ता निकलेगा. डिजिटल प्रौद्योगिकी (आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से लेकर सेमीकंडक्टर्स, क्लाउड कंप्यूटिंग और इंटरनेट आफ़ थिंग्स यानी IoT तक) चौथी औद्योगिक क्रांति (4IR) के केंद्र में है.  बहरहाल हरित ऊर्जा से जुड़े बदलाव लाने और भविष्य के लिए निम्न कार्बन वाली अर्थव्यवस्था सुनिश्चित करने में इलेक्ट्रिक वाहनों, सोलर पैनल्स, विंड टर्बाइंस और ऊर्जा भंडारकों की ही भूमिका अहम रहने वाली है. वैश्विक जलवायु संकट और अगले 30 वर्षों में विश्व में ऊर्जा की मांग में अनुमानित तौर पर 47 फ़ीसदी की बढ़ोतरी की पृष्ठभूमि में टिकाऊ, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर जाने वाले व्यावहारिक और स्पष्ट रास्ते सुनिश्चित करना भविष्य की प्रौद्योगिकियों के लिहाज़ से बेहद अहम हैं.[1]

आम तौर पर कोबाल्ट, तांबा, निकेल, लिथियम और नियोडाइमियम और डायस्प्रोज़ियम जैसे धरती के दुर्लभ तत्वों को निम्न-कार्बन उत्सर्जन वाले भविष्य के लिहाज़ से अहम माना जाता है. इसकी वजह ये है कि इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन चक्कियों और सोलर पैनलों में इन्हीं का इस्तेमाल होता है. सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT), रोबोटिक्स, ड्रोन्स और 3डी प्रिंटिंग से जुड़ी विनिर्माण गतिविधियों के साथ इनका अटूट रिश्ता है.

इस नए युग की ओर हमारे बढ़ते क़दमों के साथ-साथ चुनौतियों और अनिश्चितताओं की झड़ी लग गई है. ऐसे में ये बात ज़ाहिर हो चुकी है कि धातुओं और खनिजों का एक समूह (ख़ासतौर से आवर्त सारणी में 17 तत्वों का परिवार, जिन्हें धरती के दुर्लभ तत्व के तौर पर जाना जाता है) और दूसरे अहम पदार्थ डिजिटल और टिकाऊ ऊर्जा प्रौद्योगिकी का निर्माण करने वाले उद्योगों के कच्चे माल के तौर पर अहम हो जाते हैं. दरअसल मौजूदा दौर में इन अहम पदार्थों की अहमियत वैसी ही है जैसी 18वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के दौरान कोयले और लोहे की थी. ग़ौरतलब है कि इसी औद्योगिक क्रांति की बदौलत मानवता के इतिहास में आमूलचूल बदलाव आए थे. ऊर्जा के स्रोत के तौर पर कोयले ने भाप के इंजनों को ताक़त दी और लौह अयस्क को लोहे और बाद में स्टील का रूप दिया. ये तो महज़ शुरुआत थी. औद्योगीकरण से बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ, शहर बड़े नगरों में बदल गए, सामाजिक ढांचों में बदलाव हुआ और नई भूराजनीतिक ताक़तों का उदय हुआ. इनमें ख़ासतौर से यूरोप और अमेरिका के नाम शुमार हैं. मौजूदा दौर में भी इसी पैमाने का बदलाव देखा जा रहा है, जो आने वाले दिनों में वैश्विक व्यवस्था को नया आकार देने का काम करेगा. फ़िलहाल आपूर्ति के लिए विदेशी स्रोतों पर निर्भरता और कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र में भारी केंद्रीकरण देखने को मिल रहा है. ऐसे में आपूर्ति सुनिश्चित करने और मूल्य श्रृंखला के प्रबंधन से जुड़ी क़ाबिलियत (खुदाई से लेकर प्रॉसेसिंग और इस्तेमाल से लेकर रिसाइक्लिंग) बेहद अहम हो जाती है. इसके साथ ही हाई टेक के लिए महत्वपूर्ण पदार्थों के ख़ास रासायनिक और भौतिक गुणों को इस्तेमाल में लाने की क़वायद भी निहायत ज़रूरी हो जाएगी. इन्ही क़वायदों के बूते भविष्य में आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य मोर्चों की अगुवाई करने वाला नेतृत्व तय होगा.

राज्यसत्ताओं की अलग-अलग प्राथमिकताओं और औद्योगिक ज़रूरतों की झलक देते हुए यूरोपीय संघ (EU) ने 30 तत्वों को “नाज़ुक और कच्चे माल” का दर्जा दिया है. जापान ने 34 “दुर्लभ पदार्थों” की पहचान की है जबकि अमेरिका ने 35 “अहम पदार्थों” को अपने राष्ट्रीय हितों के लिहाज़ से सूचीबद्ध किया है. हालांकि इन तीनों सूचियों में महज़ आधे नाम ही आपस में मेल खाते हैं.[2] आम तौर पर कोबाल्ट, तांबा, निकेल, लिथियम और नियोडाइमियम और डायस्प्रोज़ियम जैसे धरती के दुर्लभ तत्वों को निम्न-कार्बन उत्सर्जन वाले भविष्य के लिहाज़ से अहम माना जाता है. इसकी वजह ये है कि इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन चक्कियों और सोलर पैनलों में इन्हीं का इस्तेमाल होता है.[3] सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT), रोबोटिक्स, ड्रोन्स और 3डी प्रिंटिंग से जुड़ी विनिर्माण गतिविधियों के साथ इनका अटूट रिश्ता है. ज़ाहिर है मैगनिशियम , नियोबियम, जर्मेनियम, बोरेट्स और स्कैंडियम जैसे धरती के दुर्लभ पदार्थ यूरोपीय संघ के डिजिटल कायाकल्प की क़वायद के लिए निहायत ज़रूरी हैं. ये सभी आपूर्ति से जुड़े जोख़िमों को दर्शाते हैं.[4]

अभी ये निश्चित नहीं है कि निकट भविष्य और मध्यम कालखंड में आपूर्ति में होने वाली बढ़ोतरी इन मांगों को पूरा करने के लिहाज़ से पर्याप्त होगी या नहीं. ख़ासतौर से इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले खनिजों के मामले में ये किल्लत और भी ज़्यादा अहम हो जाती है.

इन नाज़ुक पदार्थों की मांग को बढ़ाने के पीछे जलवायु परिवर्तन से निपटने के मक़सद से दुनिया के देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय क़रारों (जैसे पेरिस जलवायु समझौता और संयुक्त राष्ट्र का टिकाऊ विकास लक्ष्य) से लेकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, टिकाऊ विकास और औद्योगिक विकास से जुड़ी योजनाओं के मिले-जुले कारक शामिल हैं. जर्मनी की इंडस्ट्री 4.0 रणनीति उसके विशाल औद्योगिक और इंजीनियरिंग सेक्टर को भविष्य की ज़रूरतों के अनुकूल बनाती है. इसी तरह भारत ने 2030 तक अपने निजी और व्यावसायिक वाहनों के एक बड़े हिस्से को इलेक्ट्रिक वाहनों में बदल देने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. ये तमाम कारक इस क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ती मांग के वाहक बन गए हैं. उम्मीद के मुताबिक तीव्र गति से स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल प्रौद्योगिकी की तैनाती से इस क्षेत्र की मांग में बढ़ोतरी होगी.[5]

क्या आपूर्ति तेज़ी से बढ़ती मांग को पूरा कर पाएगी- आज भूराजनीतिक और आर्थिक तौर पर ये एक बड़ा सवाल बन गया है. अनुमान है कि 2040 तक स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी से जुड़े पदार्थों की वायदा आपूर्ति में मौजूदा मांग के मुक़ाबले कम से कम चार गुणा बढ़ोतरी की दरकार होगी. और तो और, 2050 तक नेट-ज़ीरो वाले परिदृश्य में ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए इसमें 6 गुणा बढ़ोतरी की ज़रूरत पड़ेगी.[6]  अभी ये निश्चित नहीं है कि निकट भविष्य और मध्यम कालखंड में आपूर्ति में होने वाली बढ़ोतरी इन मांगों को पूरा करने के लिहाज़ से पर्याप्त होगी या नहीं. ख़ासतौर से इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले खनिजों के मामले में ये किल्लत और भी ज़्यादा अहम हो जाती है. इलेक्ट्रिक कारों और मोबाइल उपकरणों में बड़े पैमाने पर लिथियम का इस्तेमाल होता है. वैसे तो ये प्रचुर मात्रा में उपलब्ध 33वां तत्व है, लेकिन इसकी मौजदूगी बेहद निम्न केंद्रीकरण में है. लिहाज़ा इसकी ख़ुदाई का काम बेहद ख़र्चीला है.[7] हरित प्रौद्योगिकी के सिलसिले में धातु के इस्तेमाल में कमी की बजाए बढ़ोतरी की एक और बानगी तांबा है. इलेक्ट्रिक वाहनों में इनकी चार गुणा ज़्यादा दरकार (या प्रति कार 80 किलो तांबा) है. साथ ही संभावना है कि इसके ज्ञात भंडारों में से 90 फ़ीसदी की 2050 तक ख़ुदाई भी हो जाएगी.[8]

नई भू-राजनीति और नाज़ुक पदार्थों के वाहक के तौर पर केंद्रीकरण और निर्भरता

इन अहम पदार्थों की मांग में वैश्विक स्तर पर आई तेज़ी ने एक नई भूराजनीति का आग़ाज़ किया है. इन खनिज भंडारों की क़ुदरती सरहदें, उत्पादन के केंद्रीकरण का ऊंचा स्तर और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं (ख़ासतौर से कमज़ोर संस्थाओं वाली राज्यसत्ता, ज़बरदस्त राजनीतिक अस्थिरता या एकाधिकारवादी हुकूमतें) पर निर्भरता मौजूदा दौर में उभरते समीकरणों के मुख्य निर्धारक हैं. धरती की भूगर्भीय बनावट से हासिल फ़ायदे की बदौलत समृद्ध और आसानी से हासिल होने वाले खनिज भंडारों से संपन्न कुछ देश इन अहम पदार्थों में से इकलौते या पदार्थ समूह के ताक़तवर आपूर्तिकर्ताओं में बदल गए हैं.[9] हालांकि केंद्रीकरण से जुड़ा क़िस्सा महज़ भूगर्भीय घटनाओं या नाज़ुक पदार्थों के खनन पर आकर ही ख़त्म नहीं हो जाता. दरअसल आगे चलकर इसकी प्रॉसेसिंग और रिफ़ाइनिंग से जुड़ी प्रक्रियाओं तक इसका विस्तार होता है. लिहाज़ा वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ केंद्रीकरण पर तवज्जो देने की दरकार है.

दुनिया के देशों को इस बात का एहसास होने लगा है कि ये नाज़ुक पदार्थ उनकी आर्थिक सेहत, राज्यसत्ता की सुरक्षा और उनके उद्योगों के लिए निहायत ज़रूरी हैं. चीन में इन पदार्थों का केंद्रीकरण है. 

आर्थिक और सामरिक उद्देश्यों के लिए नाज़ुक पदार्थों पर निर्भरता के चलते दुनिया के देश (कुछ दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा) नाज़ुक अवस्था में पहुंच गए हैं. निर्भरता कम करने और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मज़बूत करने की बात ज़ोरशोर से उठाई जाती रही है. हाल के वर्षों में बढ़ते भूराजनीतिक तनावों के बीच ये क़वायद ज़ोर पकड़ने लगी है. साथ ही दुनिया के देशों को इस बात का एहसास होने लगा है कि ये नाज़ुक पदार्थ उनकी आर्थिक सेहत, राज्यसत्ता की सुरक्षा और उनके उद्योगों के लिए निहायत ज़रूरी हैं. चीन में इन पदार्थों का केंद्रीकरण है. दरअसल अकेले चीन में दुनिया के कुल रेयर अर्थ के 60 फ़ीसदी हिस्से का उत्पादन और 90 फ़ीसदी हिस्से का शोधन होता है. ऐसे में दुनिया के देशों में इस बात की समझ बनी है और उनकी जागरूकता बढ़ी है कि चीन इस मोर्चे पर अपनी ताक़त के बूते दूसरों को इन पदार्थों का लाभ देने से इनकार कर सकता है या फिर इन सामग्रियों को मुहैया कराने में देर कर सकता है. इसके अलावा ये समझ भी बढ़ी है कि खनन की बजाए प्रॉसेसिंग ही असल कमज़ोरी है.[10] दरअसल आज की तारीख़ में अमेरिका अपने यहां धरती से निकले दुर्लभ अयस्कों को प्रॉसेसिंग के लिए चीन भेजता है. इसके बाद आगे की विनिर्माण गतिविधियों के लिए इसे दोबारा चीन से आयात किया जाता है. घरेलू स्तर पर इन अयस्कों को गलाने और प्रॉसेसिंग की क्षमता खड़ी करना एक ख़र्चीली क़वायद है. साथ ही इस मसले पर पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े ख़तरे भी चिंताजनक रूप से काफ़ी ज़्यादा हैं.[11]

इस सिलसिले में एक केंद्रीकृत और ग़ैर-भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के तौर पर अक्सर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो की मिसाल दी जाती है. ये मुल्क राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है.[12] दुनिया भर में खनन से हासिल होने वाले कोबाल्ट का 70 फ़ीसदी हिस्सा यहीं से निकलता है. इलेक्ट्रिक कार, कंप्यूटर और सेल फ़ोन की बैटरियों के लिए ये एक अहम घटक है. चीन के एक कारोबारी समूह ने 2016 में कॉन्गो में दुनिया के सबसे बड़े और सबसे शुद्ध कोबाल्ट भंडारों में से एक को ख़रीद लिया था. विडम्बना ये है कि चीनी समूह ने ये ख़रीद अमेरिका के एक खनन समूह से की थी. इससे दुनिया के लिए एक ख़तरे के तौर पर चीन से जुड़ी धारणा और मज़बूत होती है.[13] जहां तक चीन का ताल्लुक़ है तो वो अपने तेज़ी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के लिए कोबाल्ट की बेरोकटोक आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है.[14] चीन इन अहम पदार्थों में से कइयों का शीर्ष उत्पादक है. इनमें बिस्मथ (वैश्विक बाज़ार हिस्से का 85 प्रतिशत), गैलियम (80 प्रतिशत), जर्मेनियम (80 प्रतिशत), इंडियम (48 प्रतिशत), स्कैंडियम (66 प्रतिशत), सिलिकॉन धातु (66 प्रतिशत), टाइटेनियम (45 प्रतिशत), टंग्स्टन (69 प्रतिशत), वेनाडियम (45 प्रतिशत) और रेयर अर्थ एलिमेंट (86 प्रतिशत) शामिल हैं.[15] दूसरे संसाधन-संपन्न देशों का अन्य नाज़ुक पदार्थों के उत्पादन में दबदबा है. इनमें ब्राज़ील (नियोबियम, वैश्विक बाज़ार हिस्से का 92 प्रतिशत); चिली (लिथियम, 44 प्रतिशत); कॉन्गो (कोबाल्ट, 59 प्रतिशत; टैंटालम, 33 प्रतिशत); फ़्रांस (हाफ़नियम, 49 प्रतिशत); स्पेन (स्ट्रोनियम, 31 प्रतिशत); दक्षिण अफ़्रीका (प्लेटिनम धातु, 84 प्रतिशत); तुर्की (बोरेट, 42 प्रतिशत); और अमेरिका (बेरिलियम, 88 प्रतिशत) शामिल हैं. अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, कनाडा, फ़िनलैंड, फ़्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, जापान, कज़ाकिस्तान, कोरिया, लाओस, मेडागास्कर, मेक्सिको, मंगोलिया, मोरक्को, नॉर्वे, रूस, रवांडा, ताजिकिस्तान, थाईलैंड, यूक्रेन और वियतनाम समय-समय पर इन अहम पदार्थों के सबसे बड़े उत्पादकों में शामिल रहे हैं. हालांकि इन देशों में इन पदार्थों का उत्पादन काफ़ी कम मात्रा में होता है. ऑस्ट्रेलिया कोबाल्ट का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जहां दुनिया में उत्पादित कुल कोबाल्ट का 4 प्रतिशत हिस्सा पैदा होता है. हालांकि इस पैमाने पर कॉन्गो के मुक़ाबले ऑस्ट्रेलिया काफ़ी पीछे है.[16]

जहां तक चीन का ताल्लुक़ है तो वो अपने तेज़ी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के लिए कोबाल्ट की बेरोकटोक आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है. 

इतिहास हमें बताता है कि दबदबा स्थायी चीज़ नहीं है. एक वक़्त ऐसा था जब चीन नहीं बल्कि अमेरिका धरती से हासिल होने वाले दुर्लभ पदार्थों का सबसे बड़ा उत्पादक था. 1980 के दशक और 1990 के दशक की शुरुआत में चीन शीर्ष उत्पादक बन गया.[17] औद्योगिक नीति, राज्यसत्ता की मदद से जुटाई गई रकम और पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर ढीले-ढाले नियमों की बदौलत चीन ने ये दर्जा हासिल किया. चीन की सस्ती क़ीमतों वाले निर्यातों से प्रतिस्पर्धा कर पाने में नाकाम खदान कंपनियों ने अपना कामकाज बंद कर दिया. रेयर अर्थ्स के लिए चीन पर दुनिया की निर्भरता उस वक़्त साफ़ हो गई जब उसने संसाधनों के प्रबंधन और प्रदूषण कम करने के लिए कोटा व्यवस्था की शुरुआत की. नतीजतन इन सामग्रियों की क़ीमतें आसमान छूने लगीं. इन पदार्थों के उत्पादन में चीन का दबदबा 2010 में अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया. उस साल चीन ने 97 प्रतिशत बाज़ार हिस्से पर क़ब्ज़ा जमा लिया था.[18] उसके बाद से चीन का हिस्सा गिरकर तक़रीबन 70-80 प्रतिशत के आसपास आ गया है.[19] आज अपने तेज़ी से बढ़ते हाईटेक विनिर्माण सेक्टर की बदौलत चीन रेयर अर्थ का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है. इन सामानों के शुद्ध आयातक के तौर पर चीन अब अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए म्यांमार समेत कुछ अन्य देशों पर निर्भर है. साथ ही वो अपने उद्योगों की वजह से क़ीमतों में संभावित उछाल और आपूर्ति में आने वाली रुकावटों के प्रति संवेदनशील हो गया है.

भू-राजनीति के क्षेत्र में ताक़त के इज़हार से जुड़े खेल में विदेशी स्रोतों पर निर्भरता से फ़ायदा उठाना एक प्रमुख दांव बन गया है. ऊर्जा से जुड़ी भूराजनीति (जैसे किसी देश के ईंधन सप्लाई में रोड़े अटकाना) इसकी पहली मिसाल है. ऊर्जा के मामले में ज़रूरत जितनी बड़ी होगी उसके विकल्प ढूंढने उतने मुश्किल होंगे. ऐसे में दबाव में आने के आसार भी उतने ही ज़्यादा होंगे. भूराजनीतिक तनाव का ऊंचा स्तर और जंग, इन हालातों को और विकट बना देते हैं. रूस-यूक्रेन के बीच मौजूदा बड़े पैमाने वाला संघर्ष शुरू होने से पहले ही कई लोग इस बात की आशंका जता रहे थे कि रूस पर अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए निर्भर रहने के चलते पश्चिम के देश किस प्रकार उसका प्रभावी ढंग से मुक़ाबला कर सकेंगे.[20] ग़ौरतलब है कि यूरोप ज़बरदस्त रूप से रूसी गैस (45 फ़ीसदी) और तेल (27 फ़ीसदी) पर निर्भर है. इन अनिश्चितताओं की वजह से तेल की क़ीमतें आसमान छूने लगीं. तात्कालिक आधार पर इस निर्भरता से निपटने के लिए जवाब के तौर पर क़रीब 30 देशों ने अपने सामरिक तेल भंडार से 6 करोड़ बैरल तेल निकालने की योजना बनाई.[21]

कई अहम पदार्थ भौगोलिक रूप से तेल और प्राकृतिक गैस के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा केंद्रीकृत हैं.[22] ऐसे में ये कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि बाज़ार शोध से जुड़े एक समूह ने रूसी और यूक्रेनी स्रोतों से हासिल किए जाने वाले नियॉन और पैलाडियम पर चिप उद्योग की निर्भरता को रेखांकित किया है.[23] ऐसे में मुमकिन है कि बेहद अहम सामग्रियों की आपूर्ति श्रृंखला आने वाले वक़्त में भूराजनीतिक तनावों का कहीं ज़्यादा और बार-बार शिकार बनने लगेंगी. इन्हीं आशंकाओं के चलते सरकारों ने अहम और उभरती प्रौद्योगिकी से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला की गहन रूप से समीक्षा की है.[24] मौजूदा संकट के बीच बाइडेन प्रशासन ने अमेरिकी सेमीकंडक्टर उद्योग से अपने आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने को कहा है.[25] इससे इतर जाकर देखें तो रूस-यूक्रेन युद्ध से ज़ाहिर हुआ है कि एक पक्ष अपने ऊपर दूसरे देशों की निर्भरताओं को बदला लेने के मक़सद से हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है. इस तरह वो उनकी अर्थव्यवस्थाओं को निशाना बना सकता है. इतना ही नहीं इसके चलते राज्यसत्ता के सियासी औज़ार भी कमज़ोर पड़ जाते हैं और उनके द्वारा आयद की गई पाबंदियों के संभावित प्रभाव ढीले पड़ जाते हैं.[26]

आज अपने तेज़ी से बढ़ते हाईटेक विनिर्माण सेक्टर की बदौलत चीन रेयर अर्थ का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है. इन सामानों के शुद्ध आयातक के तौर पर चीन अब अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए म्यांमार समेत कुछ अन्य देशों पर निर्भर है. साथ ही वो अपने उद्योगों की वजह से क़ीमतों में संभावित उछाल और आपूर्ति में आने वाली रुकावटों के प्रति संवेदनशील हो गया है. 

इन घटनाक्रमों को अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर यथार्थवादी सोच रखने वालों के चश्मे से देखने पर इस बात की संभावना माननी पड़ेगी कि दुनिया की राज्यसत्ताएं अहम पदार्थों की आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ी कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाती रहेंगी. दरअसल ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ख़रीदार देश की निर्भरता और आर्थिक जोख़िम, आपूर्तिकर्ता राष्ट्र के लिए भूराजनीतिक मुनाफ़ा है. हालांकि इसके उदाहरण अभी बहुत थोड़े से हैं. मसलन 2010 में चीन का जापान के साथ एक कूटनीतिक विवाद हुआ था. पूर्वी चीन सागर के विवादित जलक्षेत्र में सेनकाकु नौका भिड़ंत की घटना सामने आई थी. मछलियां पकड़ने वाली चीनी नौका जापानी कोस्ट गार्ड के दो जहाज़ों से टकरा गई थी.[27] इस वारदात के बाद पैदा हुई कूटनीतिक रस्साकशी में चीन ने जापान के ख़िलाफ़ ऐसा ही भूराजनीतिक दांव चला था. उसने जापान पर रेयर अर्थ्स के उत्पादन में अपनी मज़बूती का धौंस जमाने का फ़ैसला किया. इस घटना के बाद चीन की ओर से जापान को रेयर अर्थ्स का निर्यात रोक दिया गया था. इस घटना को चीन की विदेश नीति के तहत आर्थिक ज़ोर-ज़बरदस्ती की शुरुआती मिसाल के तौर पर देखा जाता है.[28] आगे चलकर 2014 में विश्व व्यापार संगठन ने अपने फ़ैसले में चीन द्वारा निर्यात पर लगाई गई पाबंदी को ख़ारिज कर दिया था.[29] चीन ने अमेरिका को भी रेयर अर्थ्स के मसले पर उसकी निर्भरता याद दिलाई है. वॉशिंगटन द्वारा दूरसंचार उपकरणों का निर्माण करने वाली चीनी कंपनी हुआवेई को काली सूची में डाले जाने के कुछ ही दिनों बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रेअर अर्थ मैग्नेट मेकर फ़र्म का दौरा किया था. इस दौरे का ज़ोर- शोर से प्रचार-प्रसार किया गया. इस दौरान राष्ट्रपति जिनपिंग ने इन खनिजों को “अहम सामरिक संसाधन” क़रार दिया था.[30]

नवाचार, विविधता और ढांचागत बदलावों के ज़रिए भूराजनीतिक कारकों से बचाव की क़वायद

संसाधनों की किल्लत आर्थिक सिद्धांत का प्रमुख अंग हैं. नतीजतन अहम पदार्थों को लेकर प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है. अर्थशास्त्री थॉमस सोवेल ने संक्षेप में मगर बड़ी बेबाक़ी से इस तंगी की व्याख्या प्रस्तुत की थी. उन्होंने कहा था कि “कोई भी वस्तु कभी भी सबकी इच्छाओं को पूरा करने के लिहाज़ से पर्याप्त नहीं होती.” बाज़ार व्यवस्था के ज़रिए क़ीमत के आधार पर दुर्लभ संसाधनों का गतिशील रूप से आवंटन होता है. क़ीमत में बढ़ोतरी से उत्पादन में इज़ाफ़ा होता है, लेकिन उपभोग का स्तर नीचे चला जाता है. आपूर्ति और मांग के सिद्धांत के आधार पर जब उत्पादकों को अपने निवेश पर मुनाफ़े की उम्मीद होगी तो वो खनन गतिविधियों में निवेश करेंगे. कई बार ऊंची क़ीमतें ख़रीदारों को नवाचार करने और उन सामग्रियों के सस्ते विकल्प तलाशने या फिर पहले से ज़्यादा कुशल डिज़ाइनों की तलाश करने को प्रेरित करेंगे.

तंगी एक सियासी विचार भी है. इसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक चिंताओं को जोड़ते हुए कई तरह की प्रेरक दलीलें पेश की जाती हैं. राज्यसत्ताएं इन अहम पदार्थों तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करने (या दूसरों को पहुंच बनाने से रोकने) की क़वायद में लगी रहेंगी ताकि वो अपनी आर्थिक और सैनिक शक्तियों का विस्तार कर सकें. इस मक़सद से राज्यसत्ताएं घरेलू मोर्चे पर इन अहम पदार्थों की ज़रूरतों और उनकी वैश्विक आपूर्ति पर नज़र बनाकर रखती रही हैं. इस उद्देश्य के लिए वो सक्षम एजेंसियों का सहारा लेते हुए औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए योजनाएं तैयार करती रहती हैं.

इन अहम पदार्थों की लगातार बढ़ती मांग ने आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों को पंख लगा दिए हैं. मांग में बढ़ोतरी के चलते क़ीमतें आसमान छू रही हैं. इससे खदान से जुड़ी नई और मौजूदा गतिविधियों में निवेश बढ़ रहा है. ये निवेश गहरी अनिश्चितता लेकर आते हैं. नए खदानों या प्रॉसेसिंग प्लांटों के विकास में बरसों लग सकते हैं. साथ ही करोड़ों अमेरिकी डॉलर का ख़र्च आ सकता है. इसके साथ ही अप्रत्याशित देरी, नियामक बदलावों, खदान से बेहद निम्न उत्पादन और क़ीमतों में उतार-चढ़ाव से जुड़े जोख़िम आमदनी को चट कर सकते हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध से ज़ाहिर हुआ है कि एक पक्ष अपने ऊपर दूसरे देशों की निर्भरताओं को बदला लेने के मक़सद से हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है. इस तरह वो उनकी अर्थव्यवस्थाओं को निशाना बना सकता है. इतना ही नहीं इसके चलते राज्यसत्ता के सियासी औज़ार भी कमज़ोर पड़ जाते हैं और उनके द्वारा आयद की गई पाबंदियों के संभावित प्रभाव ढीले पड़ जाते हैं. 

किल्लत को कम करने और केंद्रीकरण के स्तर में गिरावट लाने वाले शक्तिशाली कारकों में से एक है- वैश्विक मूल्य श्रृंखला के अनुरूप प्रौद्योगिकी और ढांचागत बदलावों के ज़रिए होने वाला नवाचार. नई प्रौद्योगिकी के साथ-साथ खनन और प्रॉसेसिंग के ज़्यादा कार्यकुशल तरीक़ों से नए भंडारों के खोज से वैश्विक मूल्य श्रृंखला में मदद मिलती है. जापानी शोधकर्ताओं ने रेयर अर्थ्स की समृद्ध आपूर्तियों की खोज की है. प्रशांत महासागर में स्थित अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र में सतह के 6000 मीटर नीचे समुद्र के दलदली इलाक़े में ये खोज हुई है. इसी बीच अमेरिका पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार तौर-तरीक़े से रेयर अर्थ्स के खनन के लिए जैवतकनीक का विकास कर रहा है.[31] अमेरिका और जापान- दोनों ने ही विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता को कम करने के लिए ऐसी क़वायद शुरू की थी. निजी कंपनियां गहरे समुद्र में कोबाल्ट, निकेल और मैंगनीज़ के खनन के लिए प्रौद्योगिकी का विकास कर रही हैं. हालांकि इस क़वायद ने अभी व्यावसायिक गतिविधियों का रूप नहीं लिया है.[32] इतना ही नहीं चांद और खगोलीय वस्तुओं के खनन पर भी विचार किया जा रहा है. कुछ लोगों का विचार है कि एक दिन इन प्रयासों से इस दिशा में अहम समाधान हासिल हो सकते हैं.[33] बहरहाल अल्पकाल में संरचना से जुड़े प्रतिस्पर्धी विकल्पों और विस्थापन के ज़रिए किल्लत को कम करने में मदद मिल सकती है. इतना ही नहीं ये क़वायद स्वीकार्य रूप से लाभदायक भी साबित हो सकती है. इलेक्ट्रिक कार बैटरियों के सिलसिले में निकेल-कोबाल्ट-एल्युमिनियम की बजाए लिथियम-आयरन-फॉस्फेट रसायन का प्रयोग शुरू करने से निकेल और कोबाल्ट की मांग में कटौती हो सकेगी. हालांकि इससे बैटरियों के प्रदर्शन में गिरावट आती है और उनका वज़न भी बढ़ जाता है. दूसरी ओर इससे उनका जीवनकाल लंबा हो जाता है और वो अपेक्षाकृत सुरक्षित भी होते हैं.[34] जापान के एक समूह ने एक ऐसा मोटर तैयार किया है जिसमें रेयर अर्थ्स की कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ती.[35] अंत में एक और लाख टके की बात- दरअसल, अहम पदार्थों की आपूर्तियों के सिलसिले में रिसाइक्लिंग से जुड़ी क़वायद के एक टिकाऊ स्रोत के तौर पर उभरने की उम्मीद की जा रही है. हालांकि इस दिशा में कामयाबी के लिए पहले रिसाइक्लिंग के मक़सद से पदार्थों का पर्याप्त भंडार तैयार करना ज़रूरी है.

अहम पदार्थों की आपूर्ति से जुड़ी किल्लत अल्पकाल में बरकरार रहने के आसार हैं. इतना ही नहीं, भविष्य में इसमें सुधार आने से पहले हालात के और बदतर होने की आशंका है. ऐसे में अल्पकाल और मध्यवर्ती कालखंड में भूराजनीतिक और भूआर्थिक मोर्चे पर वास्तविक ख़तरे सामने हैं. हालांकि ऐसा लगता है कि इस तंगी से जुड़े आर्थिक और सियासी समीकरणों की बदौलत दीर्घकाल में इन चुनौतियों से पार पा लिया जाएगा. नवाचार और आर्थिक प्रोत्साहनों की क़वायद से संरचना से जुड़े विकल्प और इन पदार्थों के कुशल और निम्न लागत वाले विकल्प सामने आएंगे. इसके साथ ही इन नाज़ुक पदार्थों की रिसाइक्लिंग को भी बढ़ावा मिलेगा. ऐसे प्रयासों के साथ-साथ पहले से जारी प्रक्रियाओं के ज़रिए अहम पदार्थों की आपूर्ति से जुड़ी इन तमाम भूराजनीतिक कमज़ोरियों में गिरावट आने की उम्मीद है. ग़ौरतलब है कि कोविड-19 के प्रभावों से निपटने की जद्दोजहद में विनिर्माण के स्तर को ऊंचा उठाने और आपूर्ति श्रृंखलाओं के अहम हिस्सों को दुरुस्त करने की क़वायद पहले ही परवान चढ़ चुकी है. चीन द्वारा रेयर अर्थ्स के निर्यात में कोटा सिस्टम लागू करने के जवाब के तौर पर जापानी प्रयासों से धरती की इन दुर्लभ सामग्रियों के आयात में भारी कटौती हुई है. पहले जापान अपनी ज़रूरत का 90 प्रतिशत चीन से आयात करता था, ये आंकड़ा एक दशक के भीतर 60 प्रतिशत से भी नीचे आ चुका है. 2025 तक इसके और कम होने और 50 फ़ीसदी से भी नीचे आ जाने का अनुमान लगाया गया है.[36]

आपूर्ति और मांग के सिद्धांत के आधार पर जब उत्पादकों को अपने निवेश पर मुनाफ़े की उम्मीद होगी तो वो खनन गतिविधियों में निवेश करेंगे. कई बार ऊंची क़ीमतें ख़रीदारों को नवाचार करने और उन सामग्रियों के सस्ते विकल्प तलाशने या फिर पहले से ज़्यादा कुशल डिज़ाइनों की तलाश करने को प्रेरित करेंगे. 

परिवर्तन और नवाचार धीरे-धीरे मूल्य श्रृंखला को एकदम नया रूप दे सकते हैं. ग़ैर-भरोसेमंद आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटाकर, आपूर्ति को और लोचदार बनाकर, विविधता से जुड़ी क़वायदों और आपूर्ति श्रृंखला में केंद्रीकरण को घटाने के लिए रणनीतिक तौर पर निवेश के ज़रिए ये लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. समान सोच रखने वाली राज्यसत्ताओं के बीच बहुपक्षीय कार्रवाइयों से इस घटनाक्रम में मदद मिल सकती है. इस मक़सद से राज्यसत्ताओं को पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने, भंडार तैयार करने, पदार्थों का इस्तेमाल कम करने या उनका विकल्प ढूंढने के प्रयास करने चाहिए. साथ ही उत्पादन के टिकाऊ तौर-तरीक़े सुनिश्चित करने और अहम पदार्थों के वैश्विक व्यापार में सबके लिए समान अवसर से जुड़े विचार का समर्थन करना चाहिए. हालांकि इन तमाम क़वायदों के बावजूद इंसानी कारणों से होने वाले टकरावों और प्राकृतिक आपदाओं की वजह से बड़े पैमाने पर और अप्रत्याशित रुकावटों की आशंकाएं लगातार बनी रहती हैं. मौजूदा दौर में यूक्रेन में जारी तकलीफ़देह संघर्ष से इस बात की तस्दीक होती है. बहरहाल दीर्घकाल और अल्पकाल में सतर्कता के साथ तैयार की गई योजनाओं और निगरानी रखने की व्यवस्थाओं के ज़रिए ऐसी आकस्मिक तबाहियों के प्रभाव कम किए जा सकते हैं. इन अहम पदार्थों की बुनियाद पर तैयार डिजिटल और टिकाऊ ऊर्जा तकनीकों से हासिल होने वाले भारी-भरकम बदलावों की रफ़्तार बनाए रखने के लिए ये क़वायद निहायत ज़रूरी है.


[1] Meghan Gordon and Maya Weber, “Global energy demand to grow 47% by 2050, with oil still top source: US EIA,” S&P Global Commodity Insights, October 6, 2021, https://www.spglobal.com/platts/en/market-insights/latest-news/oil/100621-global-energy-demand-to-grow-47-by-2050-with-oil-still-top-source-us-eia.

[2]Jane Nakano, The Geopolitics of Critical Minerals Supply Chains, Washington DC, Center for Strategic & International Studies, 2021, https://csis-website-prod.s3.amazonaws.com/s3fs-public/publication/210311_Nakano_Critical_Minerals.pdf?DR03x5jIrwLnNjmPDD3SZjEkGEZFEcgt.

[3] Dolf Gielen, Critical Materials for the Energy Transition, Abu Dhabi, International Renewable Energy Agency,

2021, https://irena.org/-/media/Files/IRENA/Agency/Technical-Papers/IRENA_Critical_Materials_2021.pdf.

[4] “European Commission, Critical materials for strategic technologies and sectors in the EU – a foresight study, 2020,” https://rmis.jrc.ec.europa.eu/uploads/CRMs_for_Strategic_Technologies_and_Sectors_in_the_EU_2020.pdf.

[5] Aditi Shah, “Indian businesses seek government support to meet 2030 EV target,” Reuters,  October 14, 2021, https://www.reuters.com/technology/indian-businesses-seek-government-support-meet-2030-ev-target-2021-10-14/.

[6] IEA Publications, The Role of Critical Minerals in Clean Energy Transitions, International Energy Agency, 2021, https://iea.blob.core.windows.net/assets/24d5dfbb-a77a-4647-abcc-667867207f74/TheRoleofCriticalMineralsinCleanEnergyTransitions.pdf.

[7] For comparison, gold ranks 75th with 0.0004 parts per million. Lithium’s abundance in the earth’s crust with 20 parts per million is 50,000 times larger.

[8] “The Role of Critical Minerals in Clean Energy Transitions, 2021”; “Metals in the Energy Transition,” IFP Energies Nouvelles, https://www.ifpenergiesnouvelles.com/issues-and-foresight/decoding-keys/climate-environment-and-circular-economy/metals-energy-transition.

[9] The “resource curse” reminds us that developing countries rich in minerals have faced poor economic development. The abundance of natural resources does not per se translate into economic growth.

[10] Charles Riley, “A shortage of these metals could make the climate crisis worse,” CNN, May 5, 2021, https://www.cnn.com/2021/05/05/business/climate-crisis-metals-shortage/index.html.

[11] Jaya Nayar, “Not So “Green” Technology: The Complicated Legacy of Rare Earth Mining,” Harvard International Review,  https://hir.harvard.edu/not-so-green-technology-the-complicated-legacy-of-rare-earth-mining.

[12] Shin Watanabe, “Chinese cobalt producer to double Congo output with eye on top spot,” Nikkei Asia, January 7, 2022,  https://asia.nikkei.com/Business/Markets/Commodities/Chinese-cobalt-producer-to-double-Congo-output-with-eye-on-top-spot.

[13] Dionne Searcey, Michael Forsythe and Eric Lipton,  “A Power Struggle Over Cobalt Rattles the Clean Energy Revolution, The New York Times, December 7, 2021,  https://www.nytimes.com/2021/11/20/world/china-congo-cobalt.html.

[14] “China Electric Vehicles Market – Growth, Trends, COVID-19 Impact, And Forecasts (2022 – 2027),” Mordor Intelligence, https://www.mordorintelligence.com/industry-reports/china-electric-vehicles-ev-market-outlook.

[15] European Commission, Critical Raw Materials Resilience: Charting a Path towards greater Security and Sustainability, Communications from the Commission, COM (2020) 474 final, Brussels, European Union, 2020,  https://eur-lex.europa.eu/legal-content/EN/TXT/?uri=CELEX:52020DC0474.

[16] Charles Riley, “A shortage of these metals could make the climate crisis worse,” CNN, May 5, 2021, https://www.cnn.com/2021/05/05/business/climate-crisis-metals-shortage/index.html.

[17] “The Geopolitics of Critical Minerals Supply Chains”

[18] Marc Schmid,  “Rare Earths in the Trade Dispute Between the US and China: A Déjà Vu,” Intereconomics Vol. 54, No. 6 (2019), pp. 378-384, https://www.intereconomics.eu/contents/year/2019/number/6/article/rare-earths-in-the-trade-dispute-between-the-us-and-china-a-deja-vu.html.

[19] John Boyd, “U.S. and Japan Seeking to Break China’s Grip on Rare Earths Production,” IEEE Spectrum, July 23, 2020, https://spectrum.ieee.org/us-and-japan-seeking-to-break-chinas-grip-on-rare-earths.

[20] Alex Smith, “A Russia-Ukraine War Could Ripple Across Africa and Asia,” Foreign Policy, January 22, 2022, https://foreignpolicy.com/2022/01/22/russia-ukraine-war-grain-exports-africa-asia.

[21] U.S. Department of Energy, Government of the United States of America, https://www.energy.gov/articles/us-and-30-countries-commit-release-60-million-barrels-oil-strategic-reserves-stabilize.

[22] “The Role of Critical Minerals in Clean Energy Transitions, 2021”

[23] Alexandra Alper and Karen Freifeld, “Russia could hit U.S. chip industry, White House warns,” Reuters, February 11, 2022, https://www.reuters.com/technology/white-house-tells-chip-industry-brace-russian-supply-disruptions-2022-02-11/.

[24] The White House, Building Resilient Supply Chains, Revitalizing American Manufacturing, and Fostering Broad-Based Growth (Washington DC: The White House, 2021) https://www.whitehouse.gov/wp-content/uploads/2021/06/100-day-supply-chain-review-report.pdfhttps://www.whitehouse.gov/wp-content/uploads/2021/06/100-day-supply-chain-review-report.pdf.

[25] Alper and Freifeld, “Russia could hit U.S. chip industry, White House warns”

[26] David Leonhardt, “Can Sanctions Work? Yes, but they often don’t.,” The New York Times, February 23, 2022, https://www.nytimes.com/2022/02/23/briefing/sanctions-russia-us-europe.html.

[27] Keith Bradsher, “Amid Tension, China Blocks Vital Exports to Japan,” The New York Times, September 23, 2010, https://www.nytimes.com/2010/09/23/business/global/23rare.html.

[28] Bonnie S. Glaser, “Time for Collective Pushback against China’s Economic Coercion,” Center for Strategic & International Studies, January 13, 2021, https://www.csis.org/analysis/time-collective-pushback-against-chinas-economic-coercion.

[29] Brigid Gavin, “China’s growing conflict with the WTO,” Intereconomics Vol. 48, No. 4 (2013), Springer, pp. 254-261, https://doi.org/10.1007/s10272-013-0467-6.

[30] Lucy Hornby and Henry Sanderson, “Xi highlights China’s dominance of rare earths market,” Financial Times, May 21, 2019,  https://www.ft.com/content/48398c92-7b5d-11e9-81d2-f785092ab560.

[31] Boyd, “U.S. and Japan Seeking to Break China’s Grip on Rare Earths Production”

[32] Kathryn Miller et. al, “An Overview of Seabed Mining Including the Current State of Development, Environmental Impacts, and Knowledge Gaps,” Frontiers in Marine Science, https://doi.org/10.3389/fmars.2017.00418.

[33] Paul Spudis, “Mining the Moon,” American Scientist 94, no. 3 (2006), https://doi.org/10.1511/2006.59.280.

[34] “Critical Materials for the Energy Transition”

[35] “How Japan won rare earths trade dispute over China,” The Dong-A Ilbo, July 27, 2019, https://www.donga.com/en/article/all/20190727/1801535/1.

[36] Mary Hui, “Japan’s global rare earths quest  holds lessons for the US and Europe,” Quartz, April 23, 2021, https://qz.com/1998773/japans-rare-earths-strategy-has-lessons-for-us-europehttps://qz.com/1998773/japans-rare-earths-strategy-has-lessons-for-us-europe.

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Andreas Kuehn

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Dr. Andreas Kuehn is a senior fellow at ORF Americas Cyber Cooperation Initiative.

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