Published on Dec 13, 2023 Updated 0 Hours ago
कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट की व्यवस्था: एक “अनुचित” परिवर्तन का प्रतीक?

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM), जो कि यूरोपियन यूनियन (EU) में आयात किए जाने वाले ज़्यादा कार्बन वाले उत्पादों पर लगाई जाने वाली कार्बन लेवी है, को 2026 में यूरोपीय हरित समझौते (ग्रीन डील) के हिस्से के रूप में लागू किया जाना तय है. हालांकि, इस पर शुरुआती अमल 2023 में शुरू हो रहा है. ये वित्तीय कार्रवाई EU की तरफ से अपने पर्यावरण से जुड़े लक्ष्यों को लेकर कदम उठाने में तेज़ी का एक हिस्सा है, ख़ास तौर पर ‘कार्बन लीकेज’ (किसी देश में सख्त जलवायु नीतियों की वजह से उत्सर्जन को लेकर नरम रुख़ रखने वाले देशों में कारोबार का जाना और इस तरह कुल उत्सर्जन में बढ़ोतरी होना) को देखते हुए. धीरे-धीरे CBAM को अमल में लाने का काम EU एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम (ETS), जिसका लक्ष्य EU के औद्योगिक डिकार्बनाइज़ेशन की कोशिशों को बढ़ाना है, में मुफ्त भत्तों को धीरे-धीरे ख़त्म करने से मेल खाता है. इस प्रक्रिया में CBAM सर्टिफिकेट का मूल्य EU-ETS के मूल्य से जुड़ा हुआ है. इसलिए CBAM का प्रस्ताव जहां शुरुआत में सीमेंट, लोहा एवं स्टील, एल्युमिनियम, फर्टिलाइज़र, बिजली और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों के लिए रखा गया है, वहीं इसके दायरे का विस्तार अन्य क्षेत्रों के अलावा कृषि, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं IT जैसे क्षेत्रों में करने की भी योजना है. ये ETS से कवर किए गए क्षेत्रों में 50 प्रतिशत से ज़्यादा उत्सर्जन को शामिल करेगा. 

EU CBAM को ऐतिहासिक साधन के तौर पर मानता है जो उनके क्षेत्र में प्रवेश करने वाले ज़्यादा कार्बन वाले सामानों के उत्पादन से उत्सर्जित कार्बन पर उचित मूल्य की खोज करने में मदद करेगा. 

EU CBAM को ऐतिहासिक साधन के तौर पर मानता है जो उनके क्षेत्र में प्रवेश करने वाले ज़्यादा कार्बन वाले सामानों के उत्पादन से उत्सर्जित कार्बन पर उचित मूल्य की खोज करने में मदद करेगा. EU इसे गैर-EU अर्थव्यवस्थाओं के द्वारा स्वच्छ उत्पादन की पद्धति की तरफ बदलाव की दिशा में एक “प्रोत्साहन” के तौर पर देखता है. ये सुनिश्चित करने के लिए कि आयात होने वाले सामान की कार्बन लागत EU के घरेलू उत्पादन से मेल खाती है, CBAM इस बात की छानबीन करता है कि EU में आयात होने वाले किसी ख़ास सामान के उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन के लिए लागत शामिल हो. इससे EU के जलवायु लक्ष्यों को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है. इसके अलावा, CBAM को इस तरह से तैयार किया गया है कि वो विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुरूप हो. 

ऊपर की बातों को देखते हुए हम न्यायसंगत परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य से CBAM के ख़िलाफ़ सवाल उठाते हैं और दलील देते हैं कि कैसे ये प्रक्रिया और साधन मान्य उद्देश्यों के विपरीत है. मानवता इस समय “विकास की कीमत” पर विचार किए बिना बेलगाम आर्थिक विकास की अपनी इच्छा के नतीजों का सामना कर रही है. ये चूक जलवायु परिवर्तन के रूप में सामने आई है. दुनिया भर में विकास के नए रास्तों, जो तबाही को रोकने के लिए स्थिरता और शून्य उत्सर्जन पर ज़ोर दें, को तैयार करने की आवश्यकता को लेकर आम राय है. ये बदलाव तेज होने के साथ-साथ न्यायसंगत और समावेशी भी होना चाहिए. ये ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के लिए ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण है जिसने ग्लोबल नॉर्थ (विकसित देशों) के औद्योगीकरण के आघात को झेला है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ग्लोबल नॉर्थ के औद्योगीकरण की कीमत चुकाने वाले ग्लोबल साउथ के बड़े हिस्से की अपनी आकांक्षाएं भी हैं. उनके पास विकास, रोज़गार और आर्थिक भलाई की कुर्बानी के रूप में भारी आर्थिक लागत उठाए बिना इस बदलाव को साकार करने के लिए साधन शायद नहीं है. सवाल ये है कि लागत कौन उठाएगा?

न्यायसंगत परिवर्तन की धारणा सिद्धांतों, प्रक्रियाओं और प्रथाओं पर आधारित एक दूरदर्शी और जोड़ने वाला दृष्टिकोण है जिसका लक्ष्य हमारी अर्थव्यवस्था को एक शोषण करने वाले मॉडल से बदल कर सुधार वाले मॉडल की तरफ ले जाना है. इसमें उत्पादन और खपत पर फिर से विचार करना शामिल है ताकि वो ज़्यादा समग्र और बर्बादी से मुक्त हों. दूसरी तरफ न्यायसंगत परिवर्तन के लिए ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ के बीच आदान-प्रदान को भी शामिल करने की आवश्यकता है ताकि उनकी ज़रूरतों को पूरा किया जा सके क्योंकि ग्लोबल साउथ के बड़े हिस्से के लिए हरित अर्थव्यवस्था की तरफ बदलाव न सिर्फ उनके काम-काज बल्कि दूसरों के काम-काज के लिए उनकी मौजूदा महत्वाकांक्षाओं और आकांक्षाओं के साथ मेल-जोल की आवश्यकता पैदा करेगी. इस मायने में सिर्फ प्रदूषण पैदा करने वाले यानी ग्लोबल नॉर्थ के औद्योगीकृत देश ग्लोबल साउथ के लिए इस बदलाव की कीमत चुकाते हैं. 

विदाई का आधार 

इस बात को दिमाग में रखने की ज़रूरत है कि ग्लोबल साउथ में कई देशों की उत्पादन प्रक्रिया ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन वाली हो सकती है और हरित अर्थव्यवस्था की तरफ उनका परिवर्तन 2026 तक संभव नहीं होगा. प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के हिसाब से देखें तो आज भी अमेरिका (13.68 टन), कनाडा (14.43 टन), ऑस्ट्रेलिया (15.22 टन) और EU (5.5 टन) दक्षिण एशिया के देशों जैसे कि भारत (1.6 टन), बांग्लादेश/नेपाल (0.5 टन), म्यांमार (0.6 टन), इत्यादि से बहुत आगे हैं. इसलिए प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की सीमांत दर (प्रति व्यक्ति एक यूनिट अतिरिक्त उत्पादन की वजह से उत्सर्जन की अतिरिक्त यूनिट) इन देशों में EU समेत ग्लोबल नॉर्थ के ज़्यादातर देशों की तुलना में कम है. इसे ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की पिछले दिनों की एक रिसर्च में भी दिखाया गया है. इस रिसर्च में बताया गया है कि जलवायु को लेकर प्रदर्शन के मामले में ब्रिक्स (या उभरते देशों का संगठन) अलग-अलग संगठनों जैसे कि G20 और OECD के बीच सबसे अच्छा प्रदर्शन करता है. इसके अलावा भारत ब्रिक्स देशों के बीच सबसे अच्छा प्रदर्शन करता है. ORF की एक और रिसर्च में खुलासा हुआ है कि G20 देशों के बीच भारत में विकास की कार्बन लागत (या GDP विकास की एक अतिरिक्त यूनिट के साथ जुड़ा उत्सर्जन) सबसे कम है. 

न्यायसंगत परिवर्तन की धारणा सिद्धांतों, प्रक्रियाओं और प्रथाओं पर आधारित एक दूरदर्शी और जोड़ने वाला दृष्टिकोण है जिसका लक्ष्य हमारी अर्थव्यवस्था को एक शोषण करने वाले मॉडल से बदल कर सुधार वाले मॉडल की तरफ ले जाना है.

फिर भी, दक्षिण एशिया के उन देशों की तुलना ग्लोबल नॉर्थ के देशों से की जाएगी जो अभी तक कम कार्बन वाले औद्योगिक उत्पादन की तरफ नहीं बढ़ पाए हैं और CBAM स्कीम के तहत उन पर जुर्माना लगाया जाएगा जिससे उनके उत्पाद EU के बाज़ार में कम प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे. ये न्यायसंगत परिवर्तन के सिद्धांत के ख़िलाफ़ होगा. दूसरी तरफ, EU के देश हरित वित्त (कार्बन कम करने, अनुकूलन और हानि एवं नुकसान) मुहैया कराने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं लेकिन वो बांग्लादेश के टेक्सटाइल एवं रेडीमेड गारमेंट (RMG) उद्योग को दंडित करेंगे जो कि उसके एक्सपोर्ट बास्केट  का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसके विकास को आगे बढ़ाने में अहम रहा है. कपड़ा उद्योग में चिंताएं पहले से ही महसूस की जा रही हैं और अगर CBAM को कपड़ा उद्योग पर लागू किया जाता है तो छोटी अर्थव्यवस्थाओं की प्रतिस्पर्धा ख़तरे में पड़ सकती है. इसलिए अगर CBAM और EU की तरफ से विकास एवं जलवायु वित्त को एक साथ देखा जाता है तो ये ग्लोबल साउथ को पहले पैसे देने और फिर उन्हें लूट लेने की तरह है.   

असमानता को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि CBAM को अमल में लाकर EU विकासशील देशों को पेरिस समझौते के तहत उनकी प्रतिबद्धता से बहुत ज़्यादा हासिल करने के लिए मजबूर कर रहा है. पेरिस समझौते के अनुसार अलग-अलग देशों ने अपनी क्षमता और विकास के स्तर के हिसाब से अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC)- कार्बन कम करने और अनुकूलन के लिए एक जलवायु कार्य योजना- के लिए प्रतिबद्धता जताई है. उदाहरण के तौर पर, भारत ने 2005 की तुलना में 2030 तक अपनी GDP की उत्सर्जन तीव्रता 45 प्रतिशत कम करने की प्रतिबद्धता जताई है. लेकन भारत ने CBAM के तहत शामिल किए गए क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन EU के स्तर तक कम करने का भरोसा नहीं दिया है. EU की ये कार्रवाई ऐतिहासिक रूप से उसकी मूर्खता के प्रायश्चित के लिए विकासशील देशों को अपने निर्धारित मानदंडों का पालन करने के लिए मजबूर करने के समान है. पहले मूर्खता करना और फिर प्रभावित देशों पर प्रायश्चित का एक हिस्सा थोपना न्यायसंगत या समानता के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है और इन्हीं सिद्धांतों पर COP (जलवायु परिवर्तन सम्मेलन) की बातचीत आधारित है. 

बाज़ार आधारित मूल्यांकन का सवाल 

दूसरी समस्या CBAM के बाज़ार आधारित मूल्यांकन के साथ है. ये मूल्यांकन EU-ETS कीमत के आधार पर किया जा रहा है. किसी भी तरह से बाज़ार को कार्बन रोकने (चाहे जमा करने या फिर वातावरण से हटाकर ठोस या लिक्विड रूप में रखने से हो) की कीमत का पता नहीं चला. कार्बन बाज़ार को स्थापित करने का लक्ष्य था कार्बन उत्सर्जन को कम करना, न कि सट्टेबाज़ी के केंद्र के रूप में उभारना. कार्बन क्रेडिट कीमत की खोज करके इन बाज़ारों के कार्बन अवशोषण, वातावरण से कार्बन को हटाकर ठोस या लिक्विड रूप में रखने और जमा करने की वैल्यू को दिखाना था. ये वैल्यू सोशल कॉस्ट ऑफ कार्बन (SCC) के द्वारा अच्छी तरह से दिखाई गई है जैसा कि विलियम नॉर्डहॉस के द्वारा सोचा गया था (हालांकि स्टर्न रिव्यू में पेश किया गया था). ये वो कीमत है जिसका भुगतान कार्बन उत्सर्जन की एक अतिरिक्त यूनिट के साथ समाज को करना पड़ता है.  

कपड़ा उद्योग में चिंताएं पहले से ही महसूस की जा रही हैं और अगर CBAM को कपड़ा उद्योग पर लागू किया जाता है तो छोटी अर्थव्यवस्थाओं की प्रतिस्पर्धा ख़तरे में पड़ सकती है.

हालांकि, सभी ज़रूरी सूचना को सटीक ढंग से कीमत में शामिल करने और कीमत को वैल्यू की तरफ आकर्षित करने में बाज़ार की कार्यक्षमता पर सवाल उठते हैं. ख़राब चयन पर 1970 में जॉर्ज अकेरलोफ की स्टडी ने प्रकाश डाला कि कैसे आधी-अधूरी सूचना बाज़ार की प्रभावहीनता की तरफ ले जाती है और इस तरह कीमत को उनकी वास्तविक वैल्यू से दूर करती हैं. ये मुद्दा पर्यावरण से जुड़े बाज़ारों में ख़ास तौर पर गंभीर है जहां इकोसिस्टम सेवाओं की पूरी रेंज और उनके असर के बारे में जानकारी का बहुत ज़्यादा अभाव है. इसके परिणामस्वरूप कार्बन बाज़ार की कीमत अक्सर वास्तविक कमी या कार्बन उत्सर्जन की सामाजिक कीमत के बारे में सटीक ढंग से नहीं बताती है.  

सर्टिफाइड एमिशन रिडक्शन (CER) बाज़ार इस दूरी का उदाहरण है. 2012 के बाद कम औद्योगिक गतिविधि की वजह से CER की कीमत में गिरावट आई. लेकिन क्या इसका ये मतलब है कि मैंग्रोव के जंगल के द्वारा कार्बन कम करने की वैल्यू में गिरावट आई है? निश्चित रूप से नहीं. ये परिस्थिति दिखाती है कि प्रकृति आर्थिक प्रणालियों से अलग काम करती है और बाज़ार की कीमत कुछ भी हो लेकिन जलवायु नियंत्रण एवं पोषक तत्वों की साइक्लिंग जैसी इकोसिस्टम सेवाएं लगातार मुहैया कराती है. इसके परिणामस्वरूप इन सेवाओं की वास्तविक वैल्यू और उनकी बाज़ार कीमत के बीच अंतर है. पर्यावरण से जुड़ी बाज़ार कीमत, जो कि स्थिर सप्लाई की वजह से अक्सर मांग से प्रेरित होती है, इन संसाधनों या सेवाओं के उपयोग को लेकर सीमित समझ के आधार पर होती है. इस वजह से वास्तविक पारिस्थितिक मूल्य (इकोलॉजिकल वैल्यू) और बाज़ार मूल्यांकन के बीच अंतर होता है. इस अर्थ में EU-ETS सिस्टम पर आधारित होने की वजह से CBAM कीमत कमी के मूल्य (स्कारसिटी वैल्यू) को ठीक ढंग से नहीं दिखाती है. 

ये परिस्थिति दिखाती है कि प्रकृति आर्थिक प्रणालियों से अलग काम करती है और बाज़ार की कीमत कुछ भी हो लेकिन जलवायु नियंत्रण एवं पोषक तत्वों की साइक्लिंग जैसी इकोसिस्टम सेवाएं लगातार मुहैया कराती है.

समानता और कार्यक्षमता के आधार पर 

इसलिए ये लेख जिस विवादित मुद्दे पर प्रकाश डालना चाहता है वो ये है कि CBAM न तो समानता के सिद्धांत पर आधारित है (ये देखते हुए कि न्यायसंगत परिवर्तन के सिद्धांत से दूर होने की वजह से ये अन्यायपूर्ण है); न ही ये स्थिरता और एक समान न्याय के उद्देश्यों में मदद करने वाली कार्यक्षमता के मानदंड के अनुरूप है (अप्रभावी बाज़ार की वजह से). इसलिए जब सस्टेनॉमिक्स (जो कि समानता, कार्यक्षमता और स्थिरता की परस्पर विरोधी त्रिमूर्ति में सामंजस्य स्थापित करने की बात करता है) के नज़रिए से देखा जाए तो CBAM औंधे मुंह गिर जाता है. 


नीलांजन घोष ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में डायरेक्टर हैं.

अजय त्यागी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन मं डिस्टिंग्विश्ड फेलो हैं. 

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