कश्मीर को आतंकवाद और हिंसा से पूरी तरह से मुक्त कराने का लक्ष्य भी बहुत दूर की कौड़ी मालूम हो रहा है. यही हाल कश्मीरी नेताओं की नई पौध तैयार करने की योजना का भी है.
कश्मीर इस वक़्त जमा हुआ है. घाटी में शून्य से भी नीचे रह रहे तापमान ने यहां के बाशिंदों को मजबूर कर दिया है कि वो अपने घरों में ही बंद रहें. भयंकर सर्दी की वजह से लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए भी घर से बाहर निकलने से परहेज़ ही करते हैं. 21 दिसंबर को कश्मीर में चिल्लाई कलां का दौर शुरू हुआ. ये साल का सबसे सर्द सीज़न होता है. लेकिन, हक़ीक़त ये है कि कश्मीर में ज़िंदगी को जमा देने वाली सर्दी की शुरुआत पिछले साल 5 अगस्त से हुई थी.
कश्मीर के जानने वालों के बीच ये कमोबेश आम राय थी कि जब देश के गृहमंत्री ने संसद में जम्मू-कश्मीर का संविधान बदलने का एलान किया था, तो उसके बाद पूरे कश्मीर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठेगी. लेकिन, आशंका के मुताबिक़ विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ आने के उलट, पूरे इलाक़े में वक़्त से पहले ही एक ठंड आ गई.
पहले सरकार ने राज्य पर तमाम तरह की पाबंदियां लगाईं. फिर आम लोगों ने ख़ुद ही नागरिक कर्फ्यू लगा दिया. इस का नतीजा ये हुआ कि पूरे कश्मीर में किसी तरह की पाबंदी आज भी लगी हुई है. इस बंदी के दौरान, लोगों ने अपने रोज़मर्रा के काम-काज को न्यूनतम संभव स्तर तक सीमित रखा हुआ है. कुछ गिने-चुने इलाक़ों को छोड़ दें, तो विरोध-प्रदर्शन और पत्थरबाज़ी की घटनाएं बेहद कम हुई हैं.
जहां तक सुरक्षा के हालात की बात है, तो सुरक्षा बलों ने वो बढ़त गंवा दी है, जो हिंसक उग्रवाद के ख़िलाफ़ अभियानों के दौरान उन्हें हासिल थी. बालाकोट के हवाई हमलों के बाद नियंत्रण रेखा के पार से घुसपैठ में कुछ दिनों की ख़ामोशी रही थी. लेकिन, अब इस में फिर से इज़ाफा हो रहा है. इन से ये संकेत मिलता है कि नया साल कश्मीर में ख़ुशियों का पैग़ाम ले कर आने वाला नहीं है. तमाम रिपोर्ट्स के मुताबिक़, 5 अगस्त के बाद नियंत्रण रेखा के उस पार से 55 आतंकवादियों ने कश्मीर में घुसपैठ की है. पूरे साल की बात करें, तो 114 आतंकवादियों ने 2019 में नियंत्रण रेखा के उस पार से कश्मीर में घुसपैठ की थी.
पांच अगस्त के बाद से सुरक्षा बलों का पूरा ध्यान राज्य में क़ानून और व्यवस्था को नियंत्रित रखने में लग गया. जिसकी क़ीमत आतंकवाद के ख़िलाफ़ अभियान को लंबे समय तक मुल्तवी रखने की सूरत में चुकानी पड़ी है. आंकड़े बताते हैं कि 2019 में कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में केवल 155 आतंकवादी मारे गए. जबकि, 2018 में सुरक्षा बलों ने 246 आतंकवादियों का ख़ात्मा किया था. जब कि 5 अगस्त से पहले कश्मीर में 120 आतंकवादियों को ढेर किया जा चुका था.
ऐसा लगता है कि सुरक्षा बलों के लिए स्थानीय जनता के बीच से आतंकवादियों की भर्ती अब चिंता का बड़ा विषय नहीं रह गई है. जम्मू-कश्मीर पुलिस का दावा है कि 5 अगस्त के बाद से इस में कोई इज़ाफा नहीं हुआ है. असल में इन आतंकवादियों की भर्ती पर निगरानी रखने में सोशल मीडिया का महत्वपूर्ण रोल हुआ करता था. क्योंकि नए आतंकवादी टेलीग्राम और व्हाट्सऐप ग्रुप के ज़रिए अपनी आमद का एलान करते थे. ऐसी किसी जानकारी के अभाव में आज हम कश्मीर में आतंकवादियों की भर्ती के ट्रेंड की तादाद का ठीक से पता नहीं लगा सकते हैं.
कश्मीर में सुरक्षा की चुनौतियां इस नए साल में भी वैसी ही होंगी, जैसी 5 अगस्त 2019 से पहले थीं. और सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपने अभियानों में बढ़त हासिल करने के लिए और कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ेगी.
अपनी ज़मीन पर आतंकवादी संगठनों को मदद देने को लेकर पाकिस्तान की कभी हां और कभी ना की वजह से हालात और भी अनिश्चित हो गए हैं. पाकिस्तान आर्मी के बड़े अधिकारियों ने हाल के दिनों में जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के आक़ाओं से मुलाक़ात इशारा करते हैं कि पाकिस्तान, सीमा पार आतंकवाद को अपना समर्थन नहीं बंद करने वाला है. और ये हाल तब है, जब पाकिस्तान की अदालत में लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ मुक़दमा चल रहा है.
कश्मीर में सुरक्षा की चुनौतियां इस नए साल में भी वैसी ही होंगी, जैसी 5 अगस्त 2019 से पहले थीं. और सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपने अभियानों में बढ़त हासिल करने के लिए और कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ेगी. इसके साथ ही साथ, आतंकवाद को जम्मू इलाक़े में फैलने से रोकने के लिए भी और सघन प्रयास सुरक्षा बलों को करने पड़ेंगे. जम्मू इलाक़े का किश्तवाड़ ज़िला, जो पिछले साल तक आतंकवाद से मुक्त था, वहां पर अब आतंकी गतिविधियों में काफ़ी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. और ये संकेत शुभ नहीं हैं.
5 अगस्त को केंद्र सरकार ने जो फ़ैसला लिया, उसका सबसे ख़राब नतीजा हम ने कश्मीर घाटी में राजनीतिक गतिविधियों के पूरी तरह से ख़ात्मे के तौर पर देखा है. तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों और प्रमुख राजनीतिक दलों के सब से बड़े नेताओं की नज़रबंदी से कश्मीर घाटी में मुख्यधारा की राजनीति पटरी से उतरी हुई है. जिन नेताओं को नज़रबंदी से रिहा किया गया है, उन में से किसी ने ये साहस नहीं दिखाया है कि कोई राजनीतिक गतिविधि चलाए. न ही इन नेताओं ने कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक बयान जारी किया है. 2020 में भी इस में कुछ ख़ास बदलाव आने की संभावना नहीं नज़र आती है. कश्मीर में किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि की उम्मीद तभी जगेगी, जब सभी प्रमुख राजनेताओं को नज़रबंदी से रिहा किया जाएगा.
बहुत से चेहरे टीवी चैनलों पर दिखे और ये दावा किया कि वो कश्मीर की नई पीढ़ी के नेता हैं. लेकिन, बाद में ये सभी चेहरे टीवी के पर्दे से लापता हो गए. अभी हालात ये हैं कि इन लोगों को, जनता का बहुत कम ही समर्थन मिल रहा है. और एक नया राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने के लिए इन चेहरों को कई बरस लग जाने हैं.
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दल सुरक्षा के लिहाज़ से कोई ख़तरा नहीं हैं. वैसे भी, शून्य से नीचे के तापमान में किसी तरह के राजनीतिक आंदोलन की संभावना न के बराबर है. ऐसे में इन नेताओं की नज़रबंदी हर गुज़रते दिन के साथ राजनीतिक बदला नज़र आने लगी है. सुरक्षा बलों का कहना है कि राजनीतिक क़ैदियों को रिहा करने का फ़ैसला राजनेताओं के ही हाथ में है. वहीं, गृहमंत्री का दावा है कि कश्मीर के राजनीतिक बंदियों की रिहाई का फ़ैसला स्थानीय प्रशासन करेगा. ये आश्चर्य की बात है कि कश्मीर का कोई भी अलगाववादी नेता नज़रबंद नहीं है. अब अगर ये अलगाववादी, कश्मीर की क़ानून-व्यवस्था के लिए ख़तरा नहीं हैं, तो मुख्यधारा के राजनेताओं के साथ ऐसा बर्ताव क्यों हो रहा है? नेताओं की नज़रबंदी को लेकर सरकार के बयान विरोधाभासी हैं. एक तरफ़ तो सरकार ये दावा करती है कि इन नेताओं ने जनता का समर्थन खो दिया है. वहीं दूसरी तरफ़, इन नेताओं को इसलिए नज़रबंद किए जाने की बात होती है, ताकि क़ानून-व्यवस्था बनी रहे. क्योंकि, ये नेता अगर छूट गए, तो अपने समर्थकों की मदद से हंगामा खड़ा कर सकते हैं.
सरकार के बड़े नेताओं ने साफ़ कर दिया है कि कश्मीर में नेताओं की नई फ़ौज पुराने राजनीतिक ज़मींदारों की जगह लेने वाली है. बहुत से चेहरे टीवी चैनलों पर दिखे और ये दावा किया कि वो कश्मीर की नई पीढ़ी के नेता हैं. लेकिन, बाद में ये सभी चेहरे टीवी के पर्दे से लापता हो गए. अभी हालात ये हैं कि इन लोगों को, जनता का बहुत कम ही समर्थन मिल रहा है. और एक नया राजनीतिक आंदोलन खड़ा करने के लिए इन चेहरों को कई बरस लग जाने हैं.
इसी तरह से, जिन पंचों और सरपंचों को कश्मीर का नया नेता बताया जा रहा था, वो भी अचानक ख़ामोश हो गए हैं. पुराने राजनेताओं की जगह पंचायत स्तर के नेताओं को खड़ा करने की योजना का नाकाम होना तय है. क्योंकि कश्मीर घाटी की 62 फ़ीसद पंचायत सीटें ख़ाली ही हैं. इसीलिए, इन ख़ाली सीटों को भरने के लिए चुनाव शायद इस साल कराए जाएं. इन चुनावों से कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियों को फिर से ज़िंदा होने की संभावना दिखती है. लेकिन, ये योजना तभी कामयाब होगी, जब मुख्यधारा की पुरानी पार्टियां इन चुनावों में शिरकत करेंगी.
इसी तरह से, 2020 में अलगाववादी राजनीतिक गतिविधियों के भी शांत रहने की संभावना है क्योंकि उन्हें जांच एजेंसियों का ख़ौफ़ होगा. हुर्रियत के अलगाववादी नेताओं के ख़िलाफ़ एनआईए के केस ने इन नेताओं को क़ाबू में रखने का काम बड़े असरदार तरीक़े से किया है. कई अलगाववादी नेता, इन मामलों की वजह से जेल में हैं. हालांकि, एनआईए ने 5 अगस्त के बाद किसी नए अलगाववादी नेता को गिरफ़्तार नहीं किया है. लेकिन, हुर्रियत के ख़िलाफ़ एनआईए जांच का दबाव लगातार बना रहेगा.
इन हालात के बीच कश्मीर के अवाम की आवाज़ को लगातार अनसुना किया जा रहा है. कश्मीर में 145 दिनों तक इंटरनेट पर लगातार लगी रही पाबंदी की वजह से जन संवाद को बेहिसाब नुक़सान हुआ है.
जो भी थोड़ी-बहुत जानकारी स्थानीय और राष्ट्रीय प्रेस में आ रही है, उसे भी काफ़ी पड़ताल के बाद जारी किया जा रहा है. कश्मीर के स्थानीय अख़बारों ने ख़ुद से ही सेंसरशिप लगा रखी है. और वो सरकार को नाराज़ करने से बच रहे हैं. ज़्यादातर रिपोर्टिंग कश्मीर में लगी पाबंदियों, मानवाधिकारों के हालात और सरकारी घोषणाओं तक ही सीमित रहे हैं.
हालांकि, सरकार के फ़ैसलों को लेकर ज़मीनी स्तर पर आम जनता की राय क्या है, इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. ये भी नहीं पता है कि लोगों के ख़याल आगे कौन सी दिशा में बढ़ेंगे. कश्मीर के अवाम और नेताओं ने जो ख़ामोशी अख़्तियार कर रखी है, उसे लेकर ये मुग़ालता पालना ठीक नहीं होगा कि उन्होंने कश्मीर के बारे में 5 अगस्त 2019 को लिए गए फ़ैसले को स्वीकार कर लिया है.
एक आम कश्मीरी, विरोध प्रदर्शन के बजाय आर्थिक हालात बेहतर करने को तरज़ीह देने पर मजबूर हो सकता है. आर्थिक मुश्किलों के साथ-साथ सरकार के कड़ी कार्रवाई करने के ख़ौफ़ की वजह से घाटी में विरोध प्रदर्शनों की आशंका कम ही है.
इस बात की आशंकाएं बढ़ गई हैं कि 2020 के बसंत में कश्मीर घाटी में कुछ अशांति फैलेगी. हालांकि इस उठा-पटक को लेकर जताई जा रही आशंकाएं निराधार तो नहीं हैं, लेकिन लोगों के बीच थकान सरकार को किसी अशांति से बचने में मदद करेगी. कश्मीर के एक कारोबारी संगठन के मुताबिक़, घाटी में तमाम पाबंदियों की वजह से क़रीब 2.4 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है.
2016 में कश्मीर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद पूरे राज्य और ख़ास तौर से कश्मीर इलाक़े की अर्थव्यवस्था को कई तरह के झटकों का सामना करना पड़ा है. इस वजह से कश्मीर की आर्थिक स्थिति बेहद ख़राब बनी हुई है. इस की वजह से एक आम कश्मीरी, विरोध प्रदर्शन के बजाय आर्थिक हालात बेहतर करने को तरज़ीह देने पर मजबूर हो सकता है. आर्थिक मुश्किलों के साथ-साथ सरकार के कड़ी कार्रवाई करने के ख़ौफ़ की वजह से घाटी में विरोध प्रदर्शनों की आशंका कम ही है.
5 अगस्त को लिए गए फ़ैसलों के असल नतीजे हो सकता है कि तुरंत सामने न आएं. जैसा कि इतिहास गवाह रहा है, कश्मीर में हम ने कई बार ऐसे उतार-चढ़ाव देखे हैं, जिनकी पहले कोई संभावना नहीं दिख रही थी. आज कश्मीरियों के मोह भंग के हालात 1987 में चुनाव के फ़र्ज़ीवाड़े के बाद पैदा हुए हालात से कहीं ज़्यादा बुरे हैं. 1987 में चुनावों में धांधली के बाद भी ऊपरी तौर पर कश्मीर में शांति बनी रही थी और सत्ताधारी सरकार ने 1989 की सर्दियों में आतंकवाद के ख़ूंरेंजी दौर के आग़ाज़ से पहले कुछ वक़्त तक काम भी किया था.
2010 के विरोध प्रदर्शनों के बाद कश्मीर में हालात दोबारा सामान्य हो गए थे. लाखों सैलानी कश्मीर घूमने आ रहे थे. कश्मीर घाटी में हिंसा पिछले तीन दशक में सब से निचले स्तर पर पहुंच गई थी और 2014 में हुए आम चुनाव कश्मीर घाटी में अमन और सामान्य हालात की सब से बड़ी गवाही थे. कहने की ज़रूरत नहीं कि 2016 में हुई घटनाओं ने को झकझोर डाला था. और ये उस वक़्त हुआ था, जब घाटी के लोग ऐसे सामान्य हालात के आदी होते जा रहे थे.
फिलहाल तो भारत सरकार कश्मीर को लेकर अपनी मौजूदा नीति पर ही चलती रहेगी. इस नीति के पेंच-ओ-ख़म बहुत स्पष्ट नहीं हैं. अब तक कश्मीर को आधुनिक राज्य के तौर पर विकसित करने के सभी वादों के पूरे होने की संभावनाएं बेहद कमज़ोर दिख रही हैं. कश्मीर को आतंकवाद और हिंसा से पूरी तरह से मुक्त कराने का लक्ष्य भी बहुत दूर की कौड़ी मालूम हो रहा है. यही हाल कश्मीरी नेताओं की नई पौध तैयार करने की योजना का भी है. कश्मीर में अभी तो ख़ामोशी ही आम है. ठीक उसी तरह, जैसे किसी क़ब्रिस्तान में सन्नाटा होता है. अब नया साल कश्मीर घाटी में अमन, तरक़्क़ी और ख़ुशहाली का कोई नया पैग़ाम लाएगा, इस बात की भविष्यवाणी कर पाना बेहद मुश्किल है. लेकिन, कश्मीर को लेकर भारत सरकार की एक नीति एकदम स्पष्ट है. इस का रवैया सख़्त बना रहेगा. ये अपने फ़ैसले से पीछे नहीं हटेगी. इस की वजह से 2020 में कश्मीर में सर्दियों के दिन और भी लंबे खींचने तय हैं.
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Khalid Shah was an Associate Fellow at ORF. His research focuses on Kashmir conflict Pakistan and terrorism. ...
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