Published on Aug 30, 2022 Updated 0 Hours ago

2019 की विधि रिपोर्ट ने पाया कि 89 प्रतिशत निचली अदालतों की वेबसाइट्स पर ही केस लिस्ट, केस ऑर्डर्स और केस स्टेटस अपलोड किए जाते हैं. हालांकि केवल 36 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही कोर्ट का मैप दिखाई देता था और सिर्फ 32 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही अवकाश पर गए न्यायाधीशों के नाम प्रदर्शित होते थे.

Digitization of Indian Judiciary: भारत की न्यायिक व्यवस्था का डिजिटलीकरण और बुनियादी सुविधाओं की उपेक्षा का इतिहास

Digitaliztion of Indian Judiciary: डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर (Digital Infrastructure of Indian Courts) अथवा सुविधाएं न केवल वादियों को उनकी सुनवाई (ऑनलाइन कार्यवाही की स्थिति में) तक पहुंच पाने में मदद करता है बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि जनता के लिए मामले और उनकी अध्यक्षता करने वाले न्यायाधीशों के बारे में प्रासंगिक जानकारी सुलभता से उपलब्ध हो सके. कोविड-19 महामारी (Covid 19 Pandemic) के दौरान जब अदालतों को अपना काम वर्चुअल तरीके से करने को मजबूर होना पड़ा तो इन महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की कमी इसमें एक बड़ी बाधा साबित हुई. उस वक्त केवल 27 प्रतिशत अधीनस्थ न्यायालय में ही न्यायाधीश के मंच तक वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा वाला कंप्यूटर लगाया जा सका, जिसकी वजह से न्याय प्रदान करने का काम प्रभावित हुआ. [x]

2019 की विधि रिपोर्ट ने पाया कि 89 प्रतिशत निचली अदालतों की वेबसाइट्स पर ही केस लिस्ट, केस ऑर्डर्स और केस स्टेटस अपलोड किए जाते हैं.[xi] हालांकि केवल 36 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही कोर्ट का मैप दिखाई देता था और सिर्फ 32 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही अवकाश पर गए न्यायाधीशों के नाम प्रदर्शित होते थे.

2019 की विधि रिपोर्ट ने पाया कि 89 प्रतिशत निचली अदालतों की वेबसाइट्स पर ही केस लिस्ट, केस ऑर्डर्स और केस स्टेटस अपलोड किए जाते हैं. [xi] हालांकि केवल 36 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही कोर्ट का मैप दिखाई देता था और सिर्फ 32 प्रतिशत वेबसाइट्स पर ही अवकाश पर गए न्यायाधीशों के नाम प्रदर्शित होते थे.

इस बीच, 2021 में सीजेआई कार्यालय की ओर से करवाए गए सर्वेक्षण के अनुसार 72 प्रतिशत निचली अदालत परिसरों में डिजिटल  डिस्प्ले बोर्ड (Digital Display Board in Court) थे, जबकि 41 प्रतिशत के पास ही स्टूडियो आधारित वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग (वीसी) की सुविधा उपलब्ध थी. इसी सव्रेक्षण ने पाया कि 38 प्रतिशत निचली अदालत परिसरों में ही जेल के साथ वीडियो लिंक उपलब्ध थी, जबकि 14 प्रतिशत के पास मेडिकल ऑफिसर्स के साथ वीडियो लिंक मौजूद थी.

विधि के सर्वे को भारत के विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों में डिजिटल  विभाजन के सबूत मिले. उदाहरण के लिए, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के न्यायालय परिसरों की तुलना में चंडीगढ़ और दिल्ली के सभी निचले न्यायालय परिसरों में ऐसी वेबसाइट्स थीं, जो उपयोगकर्ताओं के लिए ज्यादा सहायक थीं. मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और पुडुचेरी की वेबसाइटों में कोर्ट की तस्वीर और नक्शा तो था, लेकिन वहां उपयोगकर्ता के काम को आसान करने वाली अन्य कोई विशेषता नहीं थी, जिसकी वजह से उसका नेविगेशन सुविधाजनक हो पाता. खास बात तो यह थी कि उत्तरपूर्व क्षेत्र के अधिकांश राज्यों में अधिकांश जिला अदालतों के पास सुचारू वेबसाइट भी नहीं है. केवल कुछ चुनिंदा राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, गोवा, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब के पास अपनी वेबसाइट्स में पर्याप्त नेविगेटिंग फीचर्स देखे गए.

बुनियादी सुविधाओं की उपेक्षा का लंबा इतिहास

सच तो यह है कि न्यायिक व्यवस्था में बुनियादी सुविधाओं का अभाव कोई हाल फिलहाल में पैदा नहीं हुआ है. विधि विशेषज्ञ  एम. पी. जैन इसकी जड़ 1790 में लॉर्ड कॉर्नवॉलिस के दौर में देखते हैं. अंग्रेजों का प्रशासन भी “आपराधिक अदालतों की अपर्याप्तता, न्यायाधीशों पर काम का दबाव, भारतीय न्यायाधीशों की अनुपस्थिति, अनिश्चित और विलंबित न्याय की संभावना से पीड़ित लोगों की अपराधियों पर मुकदमा चलाने की अनिच्छा की समस्या से निपटने में विफल रहा था.” [xii]

1988 में 127 वें विधि आयोग की रिपोर्ट ने भारत के न्यायिक बुनियादी ढांचे में, विशेषत: जिला स्तर पर, सुधार के लिए तत्काल उपाय करने पर बल दिया. तब से, लगभग प्रत्येक विधि आयोग की रिपोर्टों ने इसी तरह बुनियादी ढांचे में सुधार का आह्वान किया है. ढांचागत मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए कई न्यायिक निर्देश भी दिए गए हैं.

समकालीन युग में, 1988 में 127 वें विधि आयोग की रिपोर्ट ने भारत के न्यायिक बुनियादी ढांचे में, विशेषत: जिला स्तर पर, सुधार के लिए तत्काल उपाय करने पर बल दिया. [xiii] तब से, लगभग प्रत्येक विधि आयोग की रिपोर्टों ने इसी तरह बुनियादी ढांचे में सुधार का आह्वान किया है. ढांचागत मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए कई न्यायिक निर्देश भी दिए गए हैं. उदाहरण के लिए 2017 के इम्तियाज अहमद बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. और अन्य मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग को “तत्काल ऐसे उपायों पर सिफारिशें करने का निर्देश दिया, जो अतिरिक्त अदालतों का निर्माण करें ताकि अदालती मामले और अन्य संबद्ध मामलों में होने वाली देरी को समाप्त करने में मदद करें और बकाया मामलों की त्वरित निकासी और इस पर आने वाली लागत में कमी लाए.” [xiv] राज्यों की सरकारों ने अपने स्तर पर तो खर्च किया ही, लेकिन केंद्र सरकार ने 1993-94 में उस वक्त एक उल्लेखनीय कदम उठाया, जब उसने एक केंद्रीय योजना की शुरुआत की.

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नोट: यह लेख NIRANJAN SAHOO और JIBRAN A KHAN द्वारा लिखे गये ओआरएफ़ हिंदी के लॉन्ग फॉर्म सामयिक रिसर्च पेपर “ भारत की न्याय वितरण व्यवस्था (justice delivery system) में सुधार: बुनियादी ढांचा क्यों है महत्वपूर्ण!” से लिया गया एक छोटा सा हिस्सा है. इस पेपर को विस्तार से पढ़ने के लिये आगे दिये गये occasional paper के हिंदी लिंक को क्लिक करें, जिसका शीर्षक है- भारत की न्याय वितरण व्यवस्था (justice delivery system) में सुधार: बुनियादी ढांचा क्यों है महत्वपूर्ण!

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Authors

Niranjan Sahoo

Niranjan Sahoo

Niranjan Sahoo, PhD, is a Senior Fellow with ORF’s Governance and Politics Initiative. With years of expertise in governance and public policy, he now anchors ...

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Jibran A Khan

Jibran A Khan

Jibran A Khan is a graduate of Dr. Ram Manohar Lohia National Law University Lucknow and an Associate with PLR Chambers Delhi.

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