Author : Sunjoy Joshi

Published on Oct 08, 2021 Updated 0 Hours ago

AUKUS समझौता अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी फ़ौज की शर्मनाक विदाई के बीच हुआ.

AUKUS बनाम क्वॉड: हिन्द-प्रशांत के बदलते चेहरे

ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच AUKUS संधि ठीक QUAD की  बैठक के पहले हो गयी. कई देश नाराज़ भी हो गए.  क्या इस समझौते का क्वॉड पर भी कोई असर पड़ा है? अगर हां, तो किस हद तक?

AUKUS हो या क्वॉड, दोनों ही गठबंधन अभी आवरण मात्र हैं, छिलके हैं. घोषणाएँ हैं, लेकिन इनमें कौन कब कितना रस भरेगा यह तो समय ही बताएगा. दोनों गठबंधनों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा, वो तो आने वाले वक़्त में ही पता चलेगा. लेकिन जिस समय AUKUS की घोषणा हुई उसका अपना महत्व है. AUKUS समझौता अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी फ़ौज की शर्मनाक विदाई के बीच हुआ. वहाँ फाइली अफ़रा-तफ़री के बीच कई हृदय विदारक दृश्य सबकी टीवी स्क्रीन पर छाए हुए थे . बाइडेन पर दबाव था की अपनी साख सुधारें. इसलिए कई जानकारों की नज़र में अमेरिका ने इस समझौते से अपने सहयोगी देशों का आश्वस्त करने का प्रयास किया कि वह आज भी महाशक्ति के रूप में मौजूद है. हिंद प्रशांत क्षेत्र में एक नए गठबंधन का बिगुल बजा,  विरोधियों को जताया गया कि अमेरिका अभी हटा नहीं.

पर मेरे विचार में ऐसा नहीं कि AUKUS संधि इस मौके पर एकाएक हो गयी हो. इसके पीछे सोच थी, सिर्फ़ घोषणा भर एक मौका परस्त थी. जहां तक QUAD से प्रतिद्वंद्ता का प्रश्न है, QUAD संगठन की अपनी सीमाएं थीं. यह संगठन ASEAN को केंद्र रख बनाया गया था, हालांकि- ASEAN देश इस के सदस्य नहीं थे. ASEAN के अधिकांश देश किसी भी सामरिक-सुरक्षा आधारित गठबंधन का विरोध करते आ रहे थे खासकर ऐसे किसी गठबंधन का जो कि चीन के खिलाफ़ बनाया गया हो. भारत भी लगातार यही ज़ोर देता आया है कि QUAD किसी देश विशेष के विरोध में बना संगठन नहीं है. इस प्रकार यह अच्छा ही हुआ कि सुरक्षा-केन्द्रित गठबंधन की बागडोर AUKUS के हाथ सौंप दी गयी. इस प्रकार सुरक्षा केन्द्रित नहीं रहने के कारण QUAD अब पहले से अधिक मजबूत हुआ है ना कि कमजोर.

ASEAN देशों के लिए QUAD के कार्यक्रमों में हिस्सा ले और हिस्सेदारी निभाने में अब आसानी होगी.

भारत के लिए भी अब मौका है कि वह अपनी हिंद प्रशांत नीति का और विस्तार कर, उसे क्षेत्र कि जटिलताओं के अनुरूप अधिक सुगढ़ रूप प्रदान करे. खासतौर पर अफ़गानिस्तान कि घटनाओं के बाद यह कार्य अब और प्रमुख़ हो जाता है. भारत को अपने विकल्पों का पुनः आकलन का अवसर मिल जाता है, खासतौर पर अपने पश्चिमी छोर की सुरक्षा की दृष्टि से.

तो, AUKUS से हिंद प्रशांत क्षेत्र के शक्ति संतुलन पर क्या असर पड़ेगा? क्या भारत भी प्रभावित होगा?

पिछल कुछ वर्षों में QUAD सदस्यों के अलावा कई अन्य देशों ने भी दस्तक देनी प्रारम्भ कर दी थी. फ़्रांस ने 2018 में अपनी हिन्द-प्रशांत नीति की घोषणा कर ऐसा करने वाला पहला यूरोपीय देश बन गया. यहाँ तक की हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को लेकर फ़्रांस, औस्ट्रालिया और भारत के एक त्रिपक्षीय मंच का भी गठन हो गया. दुर्भाग्यवश इस गठन की एक ही बैठक हो पायी है कि AUKUS संधि बीच में आ गयी. AUKUS के आधार पर स्थित पनडुब्बी सौदे और फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया की तूतू मैंमैं ऐसी ठनी की UNGA के बीच होने वाली इस तिकड़ी की अगली बैठक ही खटाई में पड़ गयी. AUKUS संधि की आंच ने फ्रांस और अमेरिका के रिश्तों को झुलसाया और इसका असर अमेरिका और यूरोप की गाढ़ी Trans-Atlantic मैत्री पर भी पड़ सकता है.

भारत के लिए भी अब मौका है कि वह अपनी हिंद प्रशांत नीति का और विस्तार कर, उसे क्षेत्र कि जटिलताओं के अनुरूप अधिक सुगढ़ रूप प्रदान करे. खासतौर पर अफ़गानिस्तान कि घटनाओं के बाद यह कार्य अब और प्रमुख़ हो जाता है. भारत को अपने विकल्पों का पुनः आकलन का अवसर मिल जाता है, खासतौर पर अपने पश्चिमी छोर की सुरक्षा की दृष्टि से.

कहने को तो यह मात्र एक सौदा था जो एक के हाथ से निकल दूसरे के हाथ चला गया. लेकिन हाँ मौका पाकर जैसे अमेरिका ने पनडुब्बी सौदे में टांग अड़ा फ्रांस को बाहर कर दिया फ्रांस ने कहा कि उसके पीठ में छुरा भौंका गया. सच तो यह है कि जिस पनडुब्बी को फ्रांस ऑस्ट्रेलिया को बेच रहा था वह वास्तव में परमाणु पनडुब्बी थी जिसको ऑस्ट्रेलिया के आग्रह पर परिवर्तित कर गैर-परमाणु बनाया जा रहा था. परिवर्तन इसलिए मांगा गया क्योंकि ऑस्ट्रेलिया नहीं चाहता है कि, वह हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अभी परमाणु होड़ का हिस्सा बने. लेकिन ऑस्ट्रेलिया को प्रस्तुत की गयी जर्मन और जापानी पण्डुब्बियों के मुक़ाबले फ्रांसिसी पनडुब्बी लेने के पीछे एक प्रमुख कारण यह था कि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर इन्हीं पण्डुब्बियों को परमाणु लैस किया जा सकता था.[1]

सच तो यह है कि सुरक्षा संधियों का सीधा-सीधा और प्रगाढ़ संबंध वास्तव मे  सुरक्षा-व्यापार से होता है. संधियों का एक बड़ा उदेश्य अस्त्र शस्त्र बेचना होता है.

तो क्या, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के बीच टकराव का असर भारत पर भी पड़ेगा? क्या इससे भारत को कोई फ़ायदा हो सकता है?

भारत खुद भी परमाणु पनडुब्बी कि टेक्नोलॉजी हासिल करने को इच्छुक है. ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच इस टेक्नोलॉजी के प्रदान को लेकर हुए समझौते के बाद भारत के विकल्प बढ़ जाते हैं. अमेरिका इस टेक्नोलॉजी को अन्य देशों को देने पर हमेशा आना-कानी करता आया है. अब अमेरिका ये तकनीक अपने नए साझीदारों के साथ साझा करने को प्रतिबद्ध हो चुका है. ऑस्ट्रेलिया के साथ सिर्फ़ परमाणु पनडुब्बी बल्कि quantum computing और अन्य क्षेत्रों में भी टेक्नोलॉजी प्रदाय कि बात इस संधि में की गयी है.  ऐसे में भारत को भी अपने विकल्पों का दायरा बढ़ाना पड़ेगा.

वास्ता में यह अभी सिर्फ़ समझौते के आवरण मात्र है. इनके फलस्वरूप कैसी और कितनी टेक्नोलॉजी वास्तव में हस्तांतरित्त होगी यह समय बताएगा.

अभी तो 18 महीने क बातचीत के बाद यह निर्णय होना है कि परमाणु शक्ति से लैस कौन सी पनडुब्बी विशेष ऑस्ट्रेलिया को मुहैया कराई जाए. ऑस्ट्रेलिया भी चाहता है की पनुब्बी जब आ ही रही है तो वो made in Australia क्यों न हो. तो ऑस्ट्रेलिया में परमाणु पनडुब्बी निर्मित करने के लिए सरंचना खड़ी करने में एक दशक तो लग ही जाएगा. उसके बाद निर्माण का समय भी जोड़ लीजिये. अंततः ऑस्ट्रेलियाई परमाणु पनडुब्बी आएगी भी तो हो सकता है 2030 के दशक के अंत तक. तब किस राजा का राज ऑस्ट्रेलिया में होगा और किसका अमेरिका में और कौन राज कर रहा होगा चीन पर अभी कहना मुश्किल है.

क्वॉड की चर्चाओं में बार-बार नियमों पर आधारित विश्व व्यवस्था का ज़िक्र आता है. फिर भी, क्वॉड देश खुलकर चीन का नाम लेने से बचते रहे हैं. तो क्या, हम क्वॉड को हिंद प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करने की ‘मूल योजना’ से पीछे हटते हुए देखने वाले हैं?

क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर QUAD की ओर से हमेशा मिश्रित संकेत ही मिले हैं. सुरक्षा इसके घेरे में है भी और नहीं भी है. ASEAN देश और भारत भी खुल्लम-खुल्ला किसी भी सुरक्षा संधि से कतराते रहे हैं. और AUKUS के ऐलान के बाद भी इंडोनेशिया और मलेशिया ने इसका स्वागत न करते इस क्षेत्र में बढ़ते टकराव को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर की है. ASEAN देश नहीं चाहते हैं कि यह इलाका बड़ी ताक़तों की आपसी रस्सा-कशी का अख़ाडा बन जाए. हाँ ऐसी कोई भी पहल जिससे vaccine की उपलब्धता

बढ़े, या जिससे क्षेत्र के infrastructure का विकास हो, आपूर्ति श्रृंखलाओं में लचीलापन आए और निर्माण का विस्तार हो – सब का स्वागत है. और हमने देखा की क्यूयूएडी की शिखर बैठक में इसी एजेंडा पर पूरा ज़ोर दिया गया। ऐसे में क्षेत्र में ऐसे  व्यापक एजेंडे के चलते क्वॉड की स्वीकार्यता निश्चित रूप से बढ़ेगी और इस संगठन को मजबूती प्रदान होगी.

भले ही इस्लामिक स्टेट (IS)को उसकी ख़िलाफ़त से निकाल बाहर कर दिया गया , इस्लामिक स्टेट अभी भी कायम है और  अफ्रीका के साहेल और मध्य अफ्रीकी देशों मेंउसे फलने-फूलने का भ पूर मौक़ा मिल गया है. इससे फ्रांस और यूरोप की चिंताएं निश्चित रूप से बढ़ी ही हैं. 

वास्तव मैं आज बड़ी चिंता AUKUS के क्वॉड पर असर की नहीं है. आशंका, व्यापक हिंद प्रशांत क्षेत्र के बारे में अमेरिका की नीति को लेकर असमंजस को लेकर है. आने वाले समय में भारत के लिए चिंता के क्या कारण हो सकते हैं?

अफ़ग़ानिस्तान के हालात को देखें, तो इस समय अमेरिका द्वारा हमारे पड़ोस से rebalance कर नए क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने की कयावद ही परेशानी का मसला है. और यह परेशानी सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप, मध्य एशिया और क्षेत्र के समस्त अन देशों के लिए भी है.

पश्चिमी एशिया से पाँव समेटने के बाद जिस ‘आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध’ को अपनी पूरी ताकत लगाकर अंजाम अमेरिका ने दिया अब उसका क्या हश्र होने वाला है? इस समापन का कितना और क्या असर इस क्षेत्र की सुरक्षा प पड़ेगा? सच तो ये है कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद, न सिर्फ़ इस इलाक़े में, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी आतंकवाद की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ोतरी हुई है. इस प्रकार ‘आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध’  में अमेरिका हार कर वापस लौट रहा है और इस अभी भी कल के युद्ध में अब उसका क्या योगदान होगा यह स्पष्ट नहीं है.

इस्लामिक स्टेट का बढ़ता प्रसार

भले ही इस्लामिक स्टेट (IS)को उसकी ख़िलाफ़त से निकाल बाहर कर दिया गया , इस्लामिक स्टेट अभी भी कायम है और  अफ्रीका के साहेल और मध्य अफ्रीकी देशों मेंउसे फलने-फूलने का भ पूर मौक़ा मिल गया है. इससे फ्रांस और यूरोप की चिंताएं निश्चित रूप से बढ़ी ही हैं. पश्चिम एशिया से अमेरिका आने पाँव खींच चुका है. फ्रांस अपने पुराने अफ्रीकी साम्राज्यों में कमजोर पड़ वहाँ से हट रहा है. लेकिन इनके हटने से समस्या बढ़ ही रही है. और समस्या बाद रही है यूरोप की. जहां जहां कुशासन फ़ेल रहा है वहाँ से प्रवासी शरणार्थियों का सैलाब सीधे कूच कर रहा है यूरोप की ओर.

मध्य एशिया से निष्कासन के बाद इस्लामिक स्टेट ने यह नया पैंतरा चुना है. वह एक सुनियोजित ढंग से सारे ग़ैरशासित सूबों में अपनी  पैठ बढ़ाते जा रहा है. कैसे किसी भी देश में पहले असुरक्षा और विघटन की स्थिति कायम कर उसे शासन के योग्य ही नहीं रहने दिया जाए और फिर उसी कुशासन का उपयोग कर अपनी पैठ जमाई जाए यह उसे भली भांति आ गया है. और उसकी इन गतिविधियों का कारगर उत्तर किसी के पास नहीं दिखता.

भारत ने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान को मानवीय आधार पर मदद देने का प्रस्ताव दिया है. लेकिन, जिस स्थिति कि हम चर्चा कर रहे हैं उसे ध्यान में रख, दुनिया को जल्द ही तालिबान के साथ आर्थिक रिश्तों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को लेकर फ़ैसला करना होगा. 

अफ़ग़ानिस्तान में अनिश्चितता के माहौल का उसे भरपूर इंतजार होगा- यदि वहाँ की आर्थिक अराजकता मानवीय त्रासदी का रूप लेती है तो यही अफ़ग़ानिस्तान इस्लामिक स्टेट के फलने-फूलने के लिए मैदान सींच कर तैयार है. क्या अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की विफ़लता एक बार फिर से उस देश को आतंकवाद की प्रयोगशाला बना देगी?

परिस्थितियों ऐसी हैं कि भारत, रूस, मध्य एशियाई देशों-और यहां तक कि चीन के लिए भी ख़तरा बढ़ गया है. यूरोप को अपने यहां अप्रवासियों और शरणार्थियों की नई लहर का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए .

जहां तक भारत का सवाल है, आज भारत के लिए चीन से पैदा हुआ ख़तरा सुदूर प्रशांत क्षेत्र में नहीं, बल्कि उसकी अपनी सीमा पर है; अगर चीन, पाकिस्तान से हाथ मिलाकर, भारत की शांति में ख़लल डालने के लिए कट्टरपंथियों का इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा, तो भारत इससे कैसे निबटे?

क्या इस चुनौती से निपटने के लिए क्वॉड गठबंधन सामने आएगा? या फिर अपने हाथ झुलसा चुका अमेरिका ख़ुद को भारत की इस समस्या से अलग रखेगा? और अगर अमेरिकी प्रशासन चाहे भी मदद करना तो क्या अमेरिका की अपनी अंदरूनी राजनीति किसी भी प्रशासन को दोबारा इस क्षेत्र में दख़ल देने की इजाज़त देगी? विकल्प में क्षेत्रीय ताक़तों को ही अपनी सुरक्षा के लिए ख़ुद ही नई व्यवस्थाएं बनानी पड़ेंगी.

तालिबान के प्रतिनिधि को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में बोलने का मौक़ा नहीं दिया गया. भविष्य के लिहाज़ से इसके क्या मायने हैं?

बदक़िस्मती से दुनिया के ताक़तवर देशों की तरफ़ से इस बारे में हमें मिले-जुले इशारे ही मिल रहे हैं. भारत ने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान को मानवीय आधार पर मदद देने का प्रस्ताव दिया है. लेकिन, जिस स्थिति कि हम चर्चा कर रहे हैं उसे ध्यान में रख, दुनिया को जल्द ही तालिबान के साथ आर्थिक रिश्तों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को लेकर फ़ैसला करना होगा. ऐसे में ज़रूरी ये है कि संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संगठन संवाद करें, ताकि इस क्षेत्र को स्थिर बनाने के साथ-साथ, प्रतिबंध लगाए रखने या फिर हटाने जैसी समस्याओं का समाधान मुहैया कराया जा सके. ऐसे फ़ैसले तमाम देशों द्वारा मिलकर लिए जाने चाहिए और सभी देशों को इस मुद्दे पर आपसी तालमेल से काम करना चाहिए.

बर्बाद और बिख़रे हुए अफ़ग़ानिस्तान को एक बार फिर से कट्टरपंथ की प्रयोगशाला बनने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. वरना हम सभी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ एक और युद्ध हार जाएंगे.


[1] See Ankit Panda https://thediplomat.com/2016/05/the-deceptively-simple-reason-australia-picked-the-shortfin-barracuda/

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.