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वैश्विक चलन के मुताबिक़, भारत में भी स्वास्थ्य सेवाओं में AI के इस्तेमाल का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है. लेकिन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सेहत में बेहतरी आए, उससे पहले बहुत सी चुनौतियों से निपटने के साथ साथ सामने खड़े अवसरों का फ़ायदा उठाने की मेहनत करनी होगी.
ये निबंध, हमारी सीरीज़, वर्ल्ड हेल्थ डे 2024: मेरी सेहत, मेरा अधिकार का एक भाग है
स्वास्थ्य के क्षेत्र में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल बड़ी तेज़ी से बढ़ता जा रहा है, और अगले एक दशक के दौरान ये स्वास्थ्य के मामले में पूरी दुनिया में बड़ी क्रांति ला सकता है. जैसा कि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने कहा है कि, AI से स्वास्थ्य की कुछ मुख्य चुनौतियों से निपटा जा सकता है. इनमें कामगारों की घटती तादाद, उम्रदराज़ लोगों की बढ़ती संख्या, भयंकर बीमारियों के बढ़ते बोझ की वजह से पेचीदगियों में इज़ाफ़े और दुनिया में आम लोगों की सेहत के लिए उभरते नए नए ख़तरों जैसी समस्याएं शामिल हैं. दुनिया भर का स्वास्थ्य उद्योग लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर या फिर दुनिया की GDP के 11 प्रतिशत के बराबर है. ऐसे में आने वाले समय में होने वाले इन परिवर्तनों का एक बड़ा आर्थिक प्रभाव भी देखने को मिलेगा.
पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग (ML), बीमारियों की जांच और इलाज में तरह तरह से मदद करना शुरू कर चुके हैं. कई मामलों में तो, सेहत से जुड़े आंकड़ों का एल्गोरिद्म के आधार पर विश्लेषण होने से अधिक सटीक जांच और फिर ज़्यादा केंद्रीकृत इलाज करने में मदद मिली है. सेहत का पूर्वानुमान लगाने वाले मॉडल भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं. हालांकि, बीमारियों का पैटर्न पता करने में इनका उपयोग अभी बहुत सावधानी के साथ किया जा रहा है, ताकि बीमारी होने से पहले ही उसे रोकने के उपाय और हर व्यक्ति की ख़ास ज़रूरत के मुताबिक़ इलाज की योजना विकसित की जा सके. मिसाल के तौर पर अमेरिकन नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़, AI ने 25 मरीज़ों की सेहत से जुड़े आंकड़ों में से कोविड-19 के 68 प्रतिशत पॉज़िटिव मामलों का पता लगाया था. जबकि, पेशेवर स्वास्थ्य कर्मचारी उन्हें पहले ही कोविड-19 से नेगेटिव की रिपोर्ट दे चुके थे.
दुनिया भर का स्वास्थ्य उद्योग लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर या फिर दुनिया की GDP के 11 प्रतिशत के बराबर है. ऐसे में आने वाले समय में होने वाले इन परिवर्तनों का एक बड़ा आर्थिक प्रभाव भी देखने को मिलेगा.
आज जब सरकारें और तकनीकी कंपनियां स्वास्थ्य पर केंद्रित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अपना निवेश बढ़ा रही हैं, तब स्वास्थ्य के क्षेत्र में AI का बाज़ार 2030 तक 188 अरब डॉलर पहुंचने की उम्मीद है. यानी 2022 से 2030 के दौरान इसकी वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर (CAGR) 37 प्रतिशत रहेगी.
वैश्विक चलन के मुताबिक़ स्वास्थ्य के क्षेत्र में AI का भारतीय बाज़ार भी बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है और 2025 तक इसके 1.6 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान है. जबकि 2020 से 2025 के बीच इसकी वार्षिक चक्रवृद्धि विकास दर (CAGR) 40.5 फ़ीसद रहने का अनुमान है. इस क्षेत्र में लाखों नए रोज़गार पैदा होने की भी उम्मीद है. ख़बरें इशारा करती हैं कि 2028 तक भारत के हेल्थकेयर सेक्टर में 23 प्रतिशत नौकरियों की जगह AI ले लेगा. हालांकि, इस क्षेत्र में कुल भर्ती में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होने की संभावना है, जिसमें से ज़्यादातर नौकरियां AI के समाधान विकसित करने वालों, डेटा वैज्ञानिकों और दूसरे तकनीकी पेशेवरों की होंगी.
कई मामलों में भारत की नेशनल स्ट्रेटेजी फॉर AI (2018) ने मौजूदा बदलावों की भूमिका तैयार कर दी थी. इसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर आधारित समाधानों के इस्तेमाल के मामले में देश के स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र को ‘संभवत: सबसे स्वाभाविक और स्पष्ट इस्तेमाल करने वाला’ माना गया था. इस रणनीति में AI लागू करने के विशेष क्षेत्रों को रेखांकित किया गया था. जैसे कि बीमारी का जल्दी पता लगाना, जांच, निर्णय लेना और इलाज, मेडिकल रिसर्च और ट्रेनिंग और पूरे भारत में लैब और कर्मचारियों की सुविधा में इज़ाफ़ा करना. इसमें से ज़्यादातर बातों को हक़ीक़त में तब्दील करने के प्रयास किए जा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन को ही लीजिए. इसका मक़सद नागरिकों की सेहत के आंकड़ों को देश के हेल्थ इकोसिस्टम के सभी अंगों के बीच उपयोग करना और हर नागरिक की सेहत के क्षैतिज रिकॉर्ड विकसित करना है. अब आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत डेटा की कई रजिस्ट्री विकसित की जा रही है, ताकि अलग अलग जगहों पर जमा किए जा रहे डेटा को एक दूसरे से जोड़ा जा सके. इससे AI और मशीन लर्निंग के समाधान विकसित करके स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना आसान हो सकेगा. आज डेटा जमा करने की प्रक्रिया मज़बूत बनाने, देख-रेख की गुणवत्ता सुधारने और ई-संजीवनी (ये भारत का राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म है) पर डॉक्टर और मरीज़ के बीच बातचीत में सुधार लाने के लिए AI और ML के मॉडलों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके साथ साथ दो राष्ट्रीय सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भी ख़ास तौर से इसीलिए स्थापित किया गया है, ताकि स्वास्थ्य समस्याओं के AI पर आधारित समाधानों का विकास करके उनका उपयोग करने को बढ़ावा दिया जा सके.
आज डेटा जमा करने की प्रक्रिया मज़बूत बनाने, देख-रेख की गुणवत्ता सुधारने और ई-संजीवनी (ये भारत का राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म है) पर डॉक्टर और मरीज़ के बीच बातचीत में सुधार लाने के लिए AI और ML के मॉडलों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
AI के एप्लिकेशन लागू करने को मुख्यधारा में लाने और इस प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी की संभावनाएं भी सक्रियता से तलाशी जा रही हैं. नीति आयोग 2018 से ही माइक्रोसॉफ्ट और फोरस हेल्थ के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि डायबेटिक रेटिनोपैथी का शुरुआत में ही पता लगाया जा सके. इसके लिए AI का जो एल्गोरिदम विकसित किया जा रहा है, उसे बाद में प्राथमिक उपचार की ज़रूरत का पचा लगाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा. इसी तरह, टाटा मेडिकल सेंटर और IIT खड़गपुर द्वारा भारत का बिना पहचान वाला कैंसर की इमेज का बैंक यानी कॉम्प्रिहेंसिव आर्काइव ऑफ इमेजिंग (CHAVI) विकसित किया गया है. ये AI के औज़ारों को कैंसर की तस्वीरों का इस्तेमाल करने की सुविधा मुहैया कराता है, और इस तरह के मशीन लर्निंग के मॉडलों को जैविक संकेत की पहचान करने और कैंसर के रिसर्च में सुधार लाने के मामले में सशक्त बनाता है.
निजी क्षेत्र और बड़े निजी अस्पताल भी स्वास्थ्य के क्षेत्र में AI के उपयोग के बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं. स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी तकनीकी कंपनियां AI से चलने वाले कई तरह के समाधान विकसित कर रही हैं. इनमें लोगों को दवा की दुकानों से जोड़ना और ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआत में पड़ताल करना भी शामिल है. अन्य संस्थानों के अलावा अपोलो हॉस्पिटल्स की श्रृंखला ने प्रोहेल्थ के नाम से स्वास्थ्य की जांच के एक निजी कार्यक्रम को विकसित किया है. ये मेडिकल के विशेषज्ञों के साथ साथ AI की मदद से सेहत के लिए जोखिमों का पूर्वानुमान लगाने, उनसे निपटने के उपायों का सुझाव देने और रहन-सहन की समस्याओं से निपटने में सहायक होता है. प्रोहेल्थ को जांच के 2.5 करोड़ नतीजों से तैयार डेटा बैंक की मदद से तैयार किया गया है.
आज भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित स्वास्थ्य सेवा के मामले में काफ़ी सराहनीय उपलब्धियां हासिल कर रहा है. लेकिन, डेटा तक पहुंच, डेटा की निजता और दुरुपयोग और विनियमन को लेकर अनिश्चितताएं AI के व्यापक उपयोग की राह में बाधाएं खड़ी कर रही हैं.
कुल मिलाकर, टुकड़ों में बंटे और अधूरे आंकड़े, भारत में स्वास्थ्य पर केंद्रित AI की राह में रुकावट बन रहे हैं और इससे ग़लत और ठोस प्रतिनिधित्व के अभाव वाले समाधान की दिशा में भटकने की आशंकाएं हैं. सेहत के बिना पहचान वाले आंकड़ों के भंडारण और साझा करने के संस्थागत संगठन की एक मज़बूत संस्कृति को बढ़ावा देना होगा, ताकि AI के रिसर्च और विकास में सहयोग को बढ़ावा दिया जा सके. मिसाल के तौर पर इंडिया डेटासेट प्रोग्राम, दि नेशनल डेटा ऐंड एनालिटिक्स प्लेटफार्म, और ओपेन गवर्नमेंट डेटा प्लेटफॉर्म जैसे मंचों के ज़रिए डेटा के समूहों को बड़ी तादाद में देश के रिसर्च और आविष्कार के इकोसिस्टम से साझा किया जा सकता है. इसके साथ साथ एक तय मानक में डेटा जुटाने का ढांचा और डेटा की सफ़ाई करने के मज़बूत औज़ार न होने से अक्सर आंकड़ों का अलग अलग संगठनों द्वारा इस्तेमाल कर पाने की राह में बाधाएं खड़ी होती हैं. इसके अलावा कई बार सेहत के बेहद बुनियादी ढांचे के बेहद पुराना होने की वजह से डेटा की सुरक्षा और उन्हें बड़ा स्वरूप देना मुश्किल हो जाता है.
अहम बात ये है कि स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों से व्यक्तिगत पहचान ख़त्म करने की क्षमताएं विकसित की जाएं, और ऐसा महफ़ूज़ और सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जाए, ताकि डेटा को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सके.
डेटा की सुरक्षा, निजता और विश्वसनीयता जैसे मसले AI को सशक्त बनाने के लिए ज़रूरी स्वास्थ्य के आंकड़ों के बड़े भंडार जमा करने की राह में सबसे बड़े रोड़े हैं. ये आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं. 2022 में भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर 19 लाख साइबर हमले हुए थे. इनमें से कई मामले डेटा में सेंध लगाने और चोरी करने के भी थे. अक्टूबर 2023 में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के आंकड़ों में भारी सेंध लगी थी. इसकी वजह से 81.5 करोड़ भारतीय नागरिकों की सेहत से जुड़े ऐसे आंकड़े चोरी कर लिए गए थे, जिनकी व्यक्तिगत तौर पर पहचान की जा सकती थी. बाद में इस चोरी किए गए डेटा में से ज़्यादातर को बेचने के लिए डार्क वेब पर डाल दिया गया था.
ज़ाहिर है कि भागीदारों ने AI के विकास के लिए डेटा उपलब्ध कराने को लेकर अपनी अनिच्छा जताई थी. अहम बात ये है कि स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों से व्यक्तिगत पहचान ख़त्म करने की क्षमताएं विकसित की जाएं, और ऐसा महफ़ूज़ और सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जाए, ताकि डेटा को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सके. निश्चित रूप से हमें कॉन्फिडेंशियल क्लीन रूम्स की व्यवस्था से काफ़ी कुछ सीखने की ज़रूरत है. इन्हें डेटा एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन आर्किटेक्चर (DEPA) 2.0 के तहत प्रयोग के तौर पर परखा जा रहा है, जहां संवेदनशील निजी आंकड़ों को ‘मॉडल की ट्रेनिंग के लिए एल्गोरिदम से नियंत्रित तरीक़े से हासिल किया जा सकता है.’
भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 काफ़ी उम्मीदें जगाने वाला है. इस क़ानून के तहत निजी डेटा का प्रबंधन नैतिक रूप से करने और डेटा संरक्षण एवं निजता के सख़्त नियमों का पालन करना सर्वोच्च प्राथमिकता है. जैसे जैसे इस क़ानून को लागू किया जा रहा है, तो इससे स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों को जमा करने, उन्हें एन्क्रिप्ट करने, भंडारण और प्रोसेसिंग की एक मज़बूत व्यवस्था निर्मित की जा सकती है. इन मानकों का पालन करने की ज़रूरत की वजह से साइबर सुरक्षा के मूलभूत ढांचे में निवेश बढ़ने की संभावना है, जिसमें भागीदारों के लिए ऐसी क्षमता का निर्माण भी शामिल होगा, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को साइबर हमलों से बचाया जा सकेगा. डेटा जमा करने और इस्तेमाल करने के लिए मरीज़ों से साफ़ तौर पर सहमति लेना और उनको इस बात की अधिक जानकारी होना कि उनकी सेहत के आंकड़ों का वास्तव में किस मक़सद से इस्तेमाल हो रहा है, इससे सेहत के पूरे इकोसिस्टम में भरोसे को बढ़ावा दिया जा सकता है. कुल मिलाकर इन सभी तत्वों से AI के आविष्कार को प्रेरित किया जा सकेगा. लेकिन डेटा को आविष्कार के लिए उपयोग करने और मरीज़ की निजता को बनाए रखने के बीच एक बारीक़ संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी.
सितंबर 2023 में G20 के नेताओं की नई दिल्ली घोषणा जारी हुई थी. इसमें राष्ट्राध्यक्षों ने ‘AI के इस्तेमाल के लिए आविष्कार को बढ़ावा देने वाली प्रशासनिक व्यवस्था लागू करने की अपील की गई थी, जो AI का अधिकतम लाभ उठाने के साथ साथ इससे जुड़े जोखिमों का भी ख़याल रखे.’ स्वास्थ्य के क्षेत्र में AI के प्रशासन से जुड़ा एक अहम मसला ये है कि अगर स्वास्थ्य से जुड़ा कोई समाधान अगर बुरे नतीजे देता है, तो इसके लिए कौन जवाबदेह और क़ानूनी तौर पर उत्तरदायी होगा. AI का विकास बार बार डेटा के प्रसंस्करण और विश्लेषण के ज़रिए किया जाता है, जिसमें बार बार ग़लतियों से सीख ली जाती है. मगर, स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में कोई मामूली सी ग़लती भी जानलेवा साबित हो सकती है. मिसाल के तौर पर जब ये पता चला कि IBM के वाटसन हेल्थ का कैंसर का पता लगाने वाले औज़ार को मरीज़ों के वास्तविक आंकड़ों के ज़रिए प्रशिक्षित नहीं किया गया था, तो एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था. इस औज़ार को मरीज़ों की काल्पनिक केस स्टडी के ज़रिए तैयार किया गया था, और ये केस स्टडी भी एक ही अस्पताल के कुछ डॉक्टरों के गिरोह ने मुहैया कराई थी. इसके सुझावों को ग़लत और असुरक्षित पाया गया था.
भारत में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कौशल के अभाव की कमी को दूर करना होगा. अनुमान है कि इस समय भारत के AI और डेटा साइंस के सेक्टर में लगभग चार लाख 16 हज़ार लोग काम कर रहे हैं.
आज जब भारत के अस्पताल मरीज़ों की जांच और बीमारियों के पूर्वानुमान के विश्लेषण के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं, तो अगर कुछ गड़बड़ होती है, तो इसके लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा? चूंकि, AI का कोई क़ानूनी अस्तित्व नहीं होता और ये केवल काम के नाम पर जाने जाते हैं, तो क्या AI का विकास करने वाले, इन्हें इस्तेमाल करने वाले या फिर ख़ुद AI सिस्टम को ही जवाबदेह ठहराया जाएगा? व्यवहार में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के किसी ‘डेवलपर’ की पहचान कर पाना मुश्किल होगा, क्योंकि कोई भी समाधान कई डेवलपर मिलकर तैयार करते हैं और उन्हें यूज़र तक पहुंचाने का काम भी कई लोग करते हैं. AI के नियमन के भारतीय और वैश्विक प्रशासनिक ढांचों और क़ानूनों को इस दुविधा का समाधान करना होगा कि AI को क़ानूनी हस्ती का दर्जा दिया जाए या नहीं और फिर अगर ऐसा होता है, तो इससे निपटा कैसे जाएगा.
आख़िर में, भारत में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कौशल के अभाव की कमी को दूर करना होगा. अनुमान है कि इस समय भारत के AI और डेटा साइंस के सेक्टर में लगभग चार लाख 16 हज़ार लोग काम कर रहे हैं. लेकिन, कम से कम दो लाख तेरह हज़ार और लोगों की सख़्त आवश्यकता है. भारत में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में तो विशेष रूप से AI और तकनीकी पेशेवरों की मांग बढ़ती हुई देखी जा रही है. आज जब सरकार, तकनीकी कंपनियां और अकादमिक क्षेत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कौशल विकास के कार्यक्रम लागू कर रहे हैं. तो, इन्हें सीखने वालों को उन अवसरों की जानकारी भी दी जानी चाहिए, जिनका वो लाभ उठा सकते हैं. अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में AI को लागू करने की दिलचस्पी को बढ़ावा देने का मज़बूत आधार तैयार किया जाए.
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Anirban Sarma is Director of the Digital Societies Initiative at the Observer Research Foundation. His research explores issues of technology policy, with a focus on ...
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Shrushti Jaybhaye is a Research Intern at the Observer Research Foundation ...
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