Author : Abhijit Singh

Published on Jun 23, 2022 Updated 29 Days ago

हाल ही में घोषित की गई अग्निपथ स्कीम की ख़ूबियों का ठीक-ठीक विश्लेषण किया जाना ज़रूरी है. सेना भर्ती से जुड़े इस कार्यक्रम के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की पड़ताल होनी चाहिए.

सेना भर्ती की अग्निपथ स्कीम: ख़ूबियों और ख़ामियों पर बहस ज़रूरी

ये लेख निबंध श्रृंखला अग्निपथ योजना: बड़ा सुधार या तर्कहीन? का भाग है. 


फ़ौज में भर्ती की टूर ऑफ़ ड्यूटी (ToD) स्कीम के ख़िलाफ़ देश भर में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. अनेक युवा प्रतियोगी इस स्कीम को लेकर आंदोलित हैं. उन्हें इस नई योजना में ठेके पर रोज़गार की व्यवस्था दिखाई दे रही है, जिसमें स्थायी नौकरी और पेंशन का कोई आश्वासन नहीं है. प्रदर्शनकारियों का ग़ुस्सा शांत करने के लिए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और अर्द्धसैनिक बलों में ‘अग्निवीरों’ के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण की घोषणा की है. इसके बावजूद इन उपद्रवियों की आशंकाओं का निपटारा नहीं हो सका है.

आधुनिकीकरण और सुधार सशस्त्र सेनाओं की वरीयता सूची में शामिल है. ऐसे में इस योजना के समर्थक इसे सही दिशा में उठाया गया क़दम क़रार दे रहे हैं.

इस योजना ने पूर्व फ़ौजियों के बीच भी फूट डाल दी है. कुछ ने ‘अग्निपथ’ का समर्थन करते हुए इसे “मौक़े की नज़ाक़त के हिसाब से बेहतरीन विचार” क़रार दिया है. दरअसल आधुनिकीकरण और सुधार सशस्त्र सेनाओं की वरीयता सूची में शामिल है. ऐसे में इस योजना के समर्थक इसे सही दिशा में उठाया गया क़दम क़रार दे रहे हैं. हालांकि कुछ अन्य भूतपूर्व सैन्यकर्मी इस विचार से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. पूर्व सैनिकों के एक धड़े ने इस स्कीम की आलोचना करते हुए इसे अव्यावहारिक और लागू न करने योग्य क़रार दिया है.

 

एक क्रांतिकारी विचार?

TOD के हिमायती इसे एक परिवर्तनकारी विचार के तौर पर देखते हैं. उनके मुताबिक ये योजना फ़ौज को आधुनिक बनाने के लिए बेहद ज़रूरी सुधार है. इस स्कीम के तहत 17 से 21 साल तक के 45 हज़ार युवाओं को 4 साल के कार्यकाल के लिए सेना में शामिल किए जाने का प्रावधान है. स्कीम के समर्थकों की दलील है कि इससे अत्याधुनिक तकनीक से लैस और भावी ज़रूरतों के हिसाब से तैयार पुरुषों और महिलाओं का रक्षा बल तैयार होगा. इससे उच्च तकनीक वाले जंगी माहौल में प्रशिक्षण और क्षमता से सुसज्जित सेना उभरकर सामने आएगी. इसके साथ ही इस योजना से सेना की औसत उम्र में भी गिरावट आ सकेगी. स्कीम के समर्थक ज़ोर देकर कहते हैं कि इस पूरी क़वायद का मक़सद एक कुशल, अनुशासित और हौसले से भरा सैन्य बल तैयार करना है, जो देश को विकास के रास्ते पर आगे ले जाएगा.

योजना के पक्षधरों का विचार है कि इससे युवाओं को आकर्षक भत्ते और अवसर मुहैया होंगे. इस योजना के तहत तक़रीबन 30 हज़ार रु प्रति माह का वेतन तय किया गया है. इन अग्निवीरों को सालाना वेतन वृद्धि, कठिनाई भत्ता और यात्रा भत्ता का लाभ भी मिलेगा. इस तरह इन जवानों को एक अच्छी-ख़ासी रकम मिलेगी. सेना में अपने पूरे कार्यकाल के दौरान इन रंगरूटों को स्वास्थ्य सुविधाएं, छुट्टियां, कैंटीन से जुड़ी सहूलियतें और 48 लाख रु का जीवन बीमा कवर मिलेगा. कार्यकाल के अंत में उन्हें एक कौशल प्रमाणपत्र दिया जाएगा. इससे रोज़गार बाज़ार में उनकी संभावनाओं और क्षमताओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.

योजना के पक्षधरों का विचार है कि इससे युवाओं को आकर्षक भत्ते और अवसर मुहैया होंगे. इस योजना के तहत तक़रीबन 30 हज़ार रु प्रति माह का वेतन तय किया गया है. इन अग्निवीरों को सालाना वेतन वृद्धि, कठिनाई भत्ता और यात्रा भत्ता का लाभ भी मिलेगा. 

इस सिलसिले में एक नॉन-लैप्सेबल फ़ंड (ऐसा फ़ंड जिसमें आया पैसा साल गुज़र जाने के बाद भी समाप्त नहीं होता बल्कि उसे आगे इस्तेमाल किया जा सकता है) का प्रावधान भी किया गया है. ‘अग्निवीर कॉरपस फ़ंड’ में हरेक अग्निवीर की सैलरी से 30 प्रतिशत का योगदान जाएगा. इससे पब्लिक प्रॉविडेंट फ़ंड के बराबर ब्याज़ जमा होगा. क़रीब 12 लाख रु के कर-रहित “सेवा निधि” पैकेज से अग्निवीरों को सेना से रिटायर होने के बाद ख़ुद को फिर से स्थापित करने में मदद मिलने की उम्मीद है. सरकार ने अग्निवीरों को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) और असम रायफ़ल्स में भर्ती के लिए निर्धारित ऊपरी आयु सीमा में तीन साल की रियायत देने का भी फ़ैसला लिया है. अग्निवीरों के पहले बैच के लिए आयु की ये छूट निर्धारित ऊपरी आयु सीमा से 5 साल के लिए होगी.

 

मौजूदा आशंकाएं

बहरहाल ToD के इर्द गिर्द खड़े सवाल अब भी परेशानी का सबब बने हुए हैं. आलोचकों को संदेह है कि इस कार्यक्रम का अभी पूरी तरह से इम्तिहान होना बाक़ी है. तीनों सेनाओं में भर्ती से जुड़े इस अहम तौर-तरीक़े को लेकर अब तक स्वतंत्र रूप से कोई अध्ययन नहीं किया गया है. सेना के लिए इस स्कीम की व्यावहारिकता की पड़ताल के लिए न तो कोई पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया और न ही किसी अभ्यास कार्यक्रम का ही संचालन किया गया है. आलोचकों के मुताबिक शुरुआती दौर में छोटे पैमाने पर इसका आग़ाज़ किए जाने से इस मॉडल की ख़ामियों की पहचान में मदद मिलती. साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतियोगियों की आशंकाओं के समाधान में भी अधिकारियों को आसानी होती. ग़ौरतलब है कि सेना (ख़ासतौर से भारत की थल सेना में) में ज़्यादातर सैनिक ग्रामीण पृष्ठभूमि से ही आते हैं. फ़िलहाल ऐसा लग रहा है कि ToD को शीर्ष से संचालित किया जा रहा है. इस संदर्भ में इसके तौर-तरीक़ों पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया जा रहा. चिंता की एक और बड़ी वजह है. दरअसल चार साल की छोटी सी मियाद के लिए अग्निवीरों की भर्ती, प्रशिक्षण और उनकी सेवानिवृति के तौर-तरीक़ों के बारे में स्पष्टता का अभाव है. कई लोगों का सवाल है कि आख़िर महज़ छह महीने के प्रशिक्षण के बूते वो युद्धकला में कैसे माहिर हो सकते हैं. बेहद मामूली विशेषज्ञता के साथ अग्निवीरों को जंग के मैदान में कैसे आगे की पंक्ति में तैनात किया जा सकेगा? रोज़गार की बेहद छोटी अवधि को देखते हुए उनके प्रदर्शन के आकलन का तौर-तरीक़ा क्या होगा? क्या सेवानिवृत किए गए अग्निवीरों को दूसरी सरकारी नौकरियों में खपा लिया जाएगा? कई लोग दीर्घकाल में इस स्कीम की व्यावहारिकता और टिकाऊपन को लेकर आशंकाएं जता रहे हैं.

कई लोगों का विचार है कि ये योजना सरकार पर वेतन और पेंशन का बोझ कम करने के लक्ष्य से लागत में कटौती करने की व्यवस्था है. फ़ौज के आधुनिकीकरण के लिए रकम इकट्ठा करने के मक़सद से इस क़वायद को अंजाम दिया जा रहा है. उनका कहना है कि सैन्य बलों के आधुनिकीकरण का बोझ सैनिकों के कंधों पर नहीं आना चाहिए. नौसेना के एक रिटायर्ड अधिकारी के मुताबिक “जवान और अफ़सर के नीचे की रैंक वाले सैन्यकर्मी 2 वजहों से सेवा से जुड़ी कठिनाइयां झेलते हैं: पहली वजह है वफ़ादारी (अच्छे नेतृत्व के मातहत काम करने की) और दूसरी वजह है पेंशन और मेडिकल कवर से जुड़े क़रार. पहली व्यवस्था उनके लिए विपरीत परिस्थितियों में दोबारा जुड़ने का अवसर ढूंढने में मददगार साबित होती है. जबकि दूसरी क़वायद उन्हें भुखमरी या ज़िल्लत भरी ज़िंदगी से बचाती है. TOD में इन दोनों ही व्यवस्थाओं को बाहर कर दिया गया है.” केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में “आगे चलकर शामिल करने” के वादे को पूरा करना कठिनाइयों भरा सबब साबित होने वाला है. दरअसल फ़ौज की नौकरी से मुक्त कर दिए गए सैनिकों को अर्द्धसैनिक बलों में शामिल किए जाने को लेकर CAPFs का प्रतिरोध जगज़ाहिर है.

चिंता की एक और बड़ी वजह है. दरअसल चार साल की छोटी सी मियाद के लिए अग्निवीरों की भर्ती, प्रशिक्षण और उनकी सेवानिवृति के तौर-तरीक़ों के बारे में स्पष्टता का अभाव है. कई लोगों का सवाल है कि आख़िर महज़ छह महीने के प्रशिक्षण के बूते वो युद्धकला में कैसे माहिर हो सकते हैं

कई लोग ‘अग्निपथ’ कार्यक्रम के चलते समाज का सैन्यीकरण होने की आशंका जता रहे हैं. सेना में पूरे 15 साल सेवा देने का मंसूबा पाल रहे और अग्निवीर के रूप में अपना 4 साल का कार्यकाल पूरा कर सेना से हटाए जा चुके कुंठित और बेरोज़गार युवा अपराधी गिरोहों और अतिवादी सियासी समूहों के हाथों की कठपुतली बन सकते हैं. कुछ नौजवान सीमा पार के किराए के जंगी गुटों और निजी लड़ाका समूहों से भी जुड़ सकते हैं. हो सकता है कि इस तरह की आशंकाएं थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही हों लेकिन ये पूरी तरह से बेबुनियाद भी नहीं हैं.

ToD से सेना की सामाजिक बनावट को भी नुक़सान पहुंचने का ख़तरा है. इस स्कीम के तहत भारतीय सेना की जांची-परखी रेजिमेंट वाली व्यवस्था को ख़त्म कर उसकी जगह अखिल भारतीय, सभी श्रेणियों की मिश्रित इकाइयों (AIAC) की शुरुआत करने की योजना है. इससे कुल मिलाकर सेना की सैन्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का ख़तरा है. फ़ौजी इकाइयों के भीतर के आपसी दोस्ताना रिश्तों, भाईचारा और मेलजोल पर भी विपरीत असर पड़ सकता है. इस योजना के तहत रोज़गार के लिए राज्यों का कोटा समाप्त किए जाने से सेना के रैंक में उत्तरी राज्यों का दबदबा क़ायम हो जाने की आशंका है. इससे फ़ौज के भीतर क्षेत्रीय संतुलन भी बिगड़ सकता है.

इसके साथ ही अग्निवीरों के लिए भर्ती कार्यक्रम के संचालन को लेकर सेना की क्षमताओं से जुड़े सवाल भी खड़े हो गए हैं. ये बात साफ़ है कि सेना में भर्ती प्रक्रिया का संचालन करने वाले स्टाफ़ की तादाद में कई गुणा बढ़ोतरी करने की ज़रूरत पड़ेगी. इससे फ़ौज की मौजूदा क्षमताओं पर दबाव पड़ेगा. इससे सेना के भीतर टेल-टू-टीथ रेशियो (फ़ौजी भाषा में इस्तेमाल होने वाली शब्दावली, जिसका मतलब होता है सीमा पर तैनात हर सिपाही के लिए आवश्यक सामान पहुंचाने या उसके सहयोग के लिए तैनात अन्य लोगों का अनुपात) भी बढ़ जाएगा. इस तरह फ़ौजी गुर में माहिर ज़्यादा से ज़्यादा सैन्यकर्मी युवा रंगरूटों के प्रशिक्षण के कार्य में जुड़े रहेंगे. साथ ही साल-दर-साल ठेके पर काम करने वाले सैनिकों की तादाद बढ़ती चली जाएगी. सबसे अहम सवाल सेवाओं में अग्निवीरों को बरक़रार रखने की क़वायद से जुड़ा है. बुनियादी फ़ौजी प्रशिक्षण के लिए प्रस्तावित 26 हफ़्ते की ट्रेनिंग इन रंगरूटों को पर्याप्त जानकारी और अनुभव दिलाने के नज़रिए से कतई पर्याप्त नहीं होगी. इस तरह वो अपनी यूनिट्स में सार्थक रूप से योगदान दे पाने में सफल नहीं होंगे. ऐसे में कोई कमांडिंग ऑफ़िसर ये कैसे तय करेगा कि उसे कौन से 25 फ़ीसदी अग्निवीरों को आगे बरक़रार रखना है और कौन से 75 प्रतिशत को वापस घर भेज देना है.

 

कार्यकारी नज़रिए से भी इस स्कीम के कुछ नकारात्मक पहलू हैं, जिनके बारे में सोच-विचार नहीं किया गया है. एक ऐसी फ़ौज, जिसमें रेजिमेंट की मान्यताओं के साथ सैनिकों को दुनिया के सबसे मुश्किल युद्धक्षेत्रों में जंगी मुहिमों और लड़ाइयों के लिए प्रशिक्षित करना ज़रूरी होता है, उसकी भर्ती प्रक्रिया इतनी भारी-भरकम नहीं हो सकती. ऐसी आशंका है कि भारतीय सेना के अग्निवीर जोख़िमों से परहेज़ करने वाले जवान बन जाएंगे. साथ ही उनके द्वारा अपने अनुभवी सहकर्मियों के साथ दोस्ताना रिश्ते विकसित किए जाने के भी बेहद कम आसार होंगे. ग़ौरतलब है कि ऐसे रिश्ते ‘नाम-नमक-निशान’ के सिद्धांत पर फलते-फूलते हैं. अग्निवीरों को जोख़िम भरे कार्यकारी हालातों में मदद और हिफ़ाज़त की ज़रूरत होगी. अगर वो सफलतापूर्वक अपने कार्यकाल के अंत तक पहुंच भी जाते हैं तो भी कई अग्निवीरों को वापस जाने, आगे अध्ययन करने और ख़ुद को दोबारा स्थापित करने की दरकार होगी. जो ऐसा करने में नाकाम रहेंगे उन्हें अपने सीमित कौशल के चलते अपने करियर से जुड़े बेहद सीमित अवसरों से संतोष करना होगा.

कार्यकारी नज़रिए से भी इस स्कीम के कुछ नकारात्मक पहलू हैं, जिनके बारे में सोच-विचार नहीं किया गया है. एक ऐसी फ़ौज, जिसमें रेजिमेंट की मान्यताओं के साथ सैनिकों को दुनिया के सबसे मुश्किल युद्धक्षेत्रों में जंगी मुहिमों और लड़ाइयों के लिए प्रशिक्षित करना ज़रूरी होता है

अपनी परिवर्तनकारी संभावनाओं के बावजूद ToD मक़सद को लेकर पूरी तरह से माकूल नज़र नहीं आती. व्यक्तिगत आकांक्षाओं के साथ फ़ौजी ज़रूरतों का तालमेल बिठाने के लिए इस योजना पर पुनर्विचार किए जाने की ज़रूरत है. प्रमुख रूप से इस योजना के तहत युवा रंगरूटों को नौकरियों और पेंशन की पक्की गारंटी दिया जाना ज़रूरी है. सरहद पर तैनात सैनिकों को पूरा भरोसा दिलाने की दिशा में और क़वायद किए जाने की दरकार है. उसे ये आश्वासन देना होगा कि सेवा काल की समाप्ति के बाद उसे किनारे नहीं लगाया जाएगा. साथ ही ये भरोसा भी देना होगा कि कर्तव्य निभाते हुए मृत्यु हो जाने की सूरत में उसके परिवार की पूरी देखभाल की जाएगी.

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