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पिछले दिनों पीएम नरेंद्र मोदी का भूटान दौरा महज़ एक राजनयिक कार्यक्रम नहीं बल्कि हिमालय की घाटियों में भरोसे और साझेदारी का नया घोषणापत्र था. आर्थिक बदलावों और चीन के बढ़ते दबाव के बीच यह यात्रा बताती है कि भारत-भूटान की दोस्ती अब भविष्य की महत्वपूर्ण रणनीति बनती जा रही है.
Image Source: @MEAIndia
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले सप्ताह दो दिन की यात्रा पर भूटान पहुँचे. हिमालय की पर्वतमालाओं के बीच यह पड़ाव सिर्फ कूटनीति का औपचारिक अध्याय नहीं था बल्कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल में भारत-भूटान मित्रता के एक नए युग का आह्वान था. भारत ने इस यात्रा के ज़रिए स्पष्ट संकेत दिया कि भूटान के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के इस दौर में, वह उसके साथ खड़ा है- एक सहयोगी, एक पड़ोसी और एक संबल की तरह.
भूटान इन दिनों इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. वर्षों से सुलझने की प्रतीक्षा में पड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ अब एक नई तात्कालिकता के साथ सामने है. सीमित आर्थिक विविधीकरण और बदलती आकांक्षाओं ने युवाओं में बेरोजगारी को 17.8 प्रतिशत तक पहुंचा दिया है. नौ प्रतिशत से अधिक आबादी का पलायन देश के प्रशासनिक ढाँचे और श्रमबल को भीतर से खोखला कर रहा है और 2027 तक भूटान वृद्ध समाज की दहलीज पर होगा. इन सबके बीच चीन की सीमा-घुसपैठ और लगातार दबाव भूटान को अनिच्छा के बावजूद सीमांकन और कूटनीतिक संवाद को तेज़ करने पर मजबूर कर रहे हैं.
इन परिस्थितियों में भूटान अपने अस्तित्व की नई कहानी लिख रहा है. पंचम राजा, जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक के नेतृत्व में भविष्य का एक ऐसा भूटान आकार ले रहा है, जो तकनीक, दक्षता और सुशासन का नया मॉडल बना सके. 18 वर्ष के युवाओं के लिए ग्यालसुंग नामक अनिवार्य राष्ट्रीय सेवा को लागू करके वह नागरिकता और राष्ट्रवाद की एक नई सामाजिक धारा तैयार कर रहा है. वहीं गेलफु माइंडफुलनेस सिटी (GMC)- असम की सीमा से सटा एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र—भूटान की नई आर्थिक कल्पना का केंद्र बनने जा रहा है, जहाँ नवाचार, निवेश और आधुनिकता के बीज बोए जाएंगे.
भारत इन दोनों पहलों में भूटान के साथ कदमताल कर रहा है और विशेषकर कनेक्टिविटी को शक्ति देकर भविष्य के भूटान की नींव मजबूत कर रहा है.
भारत-भूटान संबंधों में यह ऊर्जा नई नहीं लेकिन हाल के वर्षों में यह और अधिक सघन हुई है. केवल जनवरी 2024 से ही भूटान के प्रधानमंत्री त्सेरिंग टोबगे भारत के छह दौरे कर चुके हैं, भूटान के राजा चार बार भारत आए और पीएम मोदी दो बार भूटान जा चुके हैं. 2024 में दर्रंगा चेक पोस्ट का उद्घाटन हुआ, जोगीघोपा मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क तक भूटान की पहुँच सुनिश्चित हुई और सामत्से–बनरहाट तथा गेलफु–कोकराझार के बीच दो नई रेल परियोजनाओं के लिए भारत ने वित्त उपलब्ध कराने का निर्णय लिया. भारत जल्द ही गेलफु में एक इमिग्रेशन चेक पोस्ट भी खोलेगा.
यात्रा का एक बड़ा पड़ाव ऊर्जा सहयोग रहा. भारत और भूटान ने 1,020 मेगावाट पनतसांगचू-2 जलविद्युत परियोजना का उद्घाटन किया- एक ऐसी उपलब्धि, जो अकेले भूटान की बिजली उत्पादन क्षमता का 40 प्रतिशत बढ़ा देगी. पनतसांगचू-1 को पुनः आरंभ करने पर भी सहमति बनी. ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने भूटान को पहली बार 4,000 करोड़ रुपये की लाइन ऑफ क्रेडिट दी और इसके अलावा 10,000 करोड़ रुपये की सहायता भूटान की पंचवर्षीय योजना और आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज के लिए पहले ही घोषित की जा चुकी है.
दौरे के सांस्कृतिक आयाम उतने ही महत्त्वपूर्ण थे जितनी उसकी रणनीतिक गहराई. यात्रा भूटान के चौथे राजा के 70वें जन्मोत्सव के साथ संयोग में हुई-एक ऐसे राजा के, जिसने भारत-भूटान संबंधों की आधुनिक नींव रखी और 2003 में भारतीय उग्रवादियों के विरुद्ध ऑपरेशन ऑल-क्लियर का नेतृत्व किया. इसी दौरान ग्लोबल पीस प्रेयर फेस्टिवल भी चल रहा था और भारत से भगवान बुद्ध के पवित्र पिपराहवा अवशेष भूटान ले जाए गए. भारत ने वाराणसी में भूटानी बौद्ध मंदिर निर्माण हेतु भूमि उपलब्ध कराने की घोषणा की, जो नालंदा में स्थापित भूटानी मंदिर की सांस्कृतिक कड़ी को और गहरा करेगी.
मोदी का जन्मोत्सव में उपस्थित होना केवल कूटनीति नहीं बल्कि Himalayan fraternity की एक भावनात्मक पुनर्पुष्टि थी.
भारत और भूटान ने सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर भी विस्तृत बातचीत की. चीन और भूटान के बीच सीमा वार्ता के 25 दौर हो चुके हैं, कुछ प्रगति भी हुई है लेकिन घुसपैठ जारी है. भूटान अब डोकलाम के जटिल त्रि–संयोग पर त्रिपक्षीय बातचीत की वकालत कर रहा है जबकि भारत और चीन सिक्किम सेक्टर को सीमा-निर्धारण के लिए “प्रारंभिक समाधान” के रूप में देख रहे हैं. ऐसे माहौल में भूटान भारतीय सुरक्षा सहयोग और तकनीक चाहता है. यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की मौजूदगी और दिल्ली में धमाका होने के बाद भी यात्रा न टालना, यह संकेत देता है कि सुरक्षा अब संबंधों के केंद्र में है.
कहा जा सकता है कि यह यात्रा प्रतीक और सार—दोनों का संगम थी. कनेक्टिविटी, विकास, संस्कृति, ऊर्जा, रक्षा और सुरक्षा—हर स्तर पर भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि बदलते भू-राजनीतिक समय में भूटान अकेला नहीं है. भारत उसका विश्वसनीय, स्थिर और दीर्घकालिक साझेदार बना रहेगा, जब वह अपने भविष्य की नई पटकथा लिख रहा है.
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