Published on Feb 06, 2019 Updated 0 Hours ago

भारत दक्षिण एशिया में नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए द्विपक्षीय और अनेकपक्षीय रणनीतियों का उपयोग कर रहा है, और चीन अनेकपक्षीय ढांचों की बजाय द्विपक्षीय संबंधों पर ज्यादा जोर दे रहा है।

दक्षिण एशिया में बदलती भूराजनैतिक तस्‍वीर

1947 में बंटवारे के बाद से ही भारत और पाकि‍स्‍तान, अलग-अलग विदेशी नीति के रास्‍ते पर चले। भारत ने स्‍वतंत्र और तटस्‍थ विदेश नीति अपनाई और ना तो पश्चिम (अमेरिका) और ना ही पूर्वी (सोवियत संघ) गुट की तरफ हुए, इसकी बजाय अपनी खुद की कूटनीतिक और रणनीतिक स्‍वायत्‍ता पर ध्‍यान दिया। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्‍तान ने पड़ोस के बड़े, मज़बूत भारत से असुरक्षित महसूस कर गठजोड़ को चुना ताकि भारत की तरफ़ से संभावित आक्रामकता से बचा जा सके। पाकिस्‍तान, साउथ ईस्‍ट एशिया ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन और सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (बगदाद संधि) जैसे सैन्‍य गठजोड़ों से जुड़ा। उसने साल दर साल अमेरिका से अपने सैन्‍य रिश्‍ते जारी रखे और अफ़ग़ानिस्‍तान में साम्‍यवाद से लड़ाई में हथियार पहुंचाने के रास्‍ते के रुप में काम करता रहा। पाकिस्‍तान, चीन के क़रीब भी होता गया जबकि दोनों देशों में कुछ भी एक जैसा नहीं था सिर्फ़ एक बात कॉमन थी भारत का दुश्मन होना। इस उपमहाद्वीप में पांच दशक तक यही स्थिति बनी रही।

पिछले कुछ सालों में जो भूराजनैतिक बदलाव हुए उससे साउथ एशिया की नज़ारा बदल गया। जिनके चलते भारत और पाकिस्‍तान दोनों को अपनी विदेश नीति की प्रा‍थमिकताओं में बदलाव करना पड़ा।

सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध के ख़त्‍म होने के साथ-साथ भारत की अर्थव्‍यवस्‍था के खुलने से गुट निरपेक्षता की वजह ही समाप्‍त हो गई। दुनिया में ताक़त के दो केंद्र होने की चुनौती भी ख़त्‍म होने से भारत ने अमेरिका के साथ अपने रिश्‍ते आगे बढ़ाए। परमाणु अप्रसार संधि में दस्‍तख़त किए बिना भारत ने अमेरिका के साथ 2005 में ऐतिहासिक समझौता कि‍या, जिसके तहत भारत अपना सिविल न्‍यूक्लियर प्रोग्राम जारी रख सकता है। इस अनोखे समझौते से नई दिल्‍ली ने दुनिया के साथ कूटनीतिक संबंधों में बदलाव को दिखाया। रूस के साथ भी भारत ने अपने रिश्‍ते कायम रखे, ख़ासतौर से सैन्‍य और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग के मामले में। दक्षिण एशिया में सबसे गहरा असर आक्रामक चीन के उभार से पड़ा है। चीन ने अपने राजनीतिक, आर्थिक और सैन्‍य उदय को पाकिस्‍तान के साथ जहां शांतिपूर्ण संबंधों के तौर पर पेश किया है वहीं दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में वो दूसरी तरह से ताक़त दिखा रहा है। चीन अपनी आर्थिक ताक़त का इस्‍तेमाल करके श्रीलंका, बांग्‍लादेश, नेपाल और म्‍यांमार जैसे भारत के पड़ोसियों से अपने रिश्‍तों का दायरा बढ़ा रहा है, इसके साथ-साथ पाकिस्‍तान के विकास में भी उसकी मदद कर रहा है। दक्षिण एशिया के राजनीतिक भूगोल को बदलने में उपमहाद्वीप के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्ट्स (बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं) अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन परियोजनाओं में सबसे बड़ी और चर्चित परियोजना है वन बेल्ट वन रोड इनीसिएटिव (BRI), जिसके तहत सड़क और रेल का बड़ा नेटवर्क तैयार किया जाना है। बीआरआई का एक अहम हिस्‍सा है चीन-पाकिस्‍तान इकोनॉमिक कॉरिडोर, जिसे CPEC भी कहते हैं। ये कॉरिडोर चीन के पश्चिमी हिस्‍से को पाकिस्‍तान में बलूचिस्‍तान के ग्‍वादर बंदरगाह तक जोड़ता है। इससे चीन की अरब सागर तक पहुंच आसान हो जाती है। श्रीलंका में विकास के लिए चीनी मदद तेज़ी से बढ़ रही है, चीन ने रणनीतिक अहमियत वाले हम्‍बनटोटा बंदरगाह को विकसित करने के लिए हासिल किया है। श्रीलंका और पाकिस्‍तान में रणनीतिक तौर पर अहम जगहों पर मौजूद ये प्रोजेक्‍ट, चीन को भारत के आसपास के समंदर में रणनीतिक जगहों तक पहुंचने का रास्‍ता देते हैं, जहां भारत का प्रभाव है। बीजिंग ने महसूस किया है कि रणनीतिक फायदे के लिए हिंद-प्रशांत महासागर में समुद्री ताक़त बढ़ानी होगी और इससे ही इस पूरे इलाक़े में वर्चस्‍व कायम किया जा सकता है। इस तरह की विदेश नीतियों की चुनौती के चलते भारत ने नए सिरे से अपनी प्राथमिकताओं और रिश्‍तों को बनाने की कोशिश की है। दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते कदम के मद्देनज़र भारत सतर्क है और महसूस करता है कि ऐसे में इस बड़े उपमहाद्वीप में अपनी छाप छोड़ना बेहद ज़रूरी है। भारत, पूर्व के उपनिवेशों को स्‍वतंत्र करने के हिमायती और तटस्‍थ भूमिका से आगे जा चुका है और आसियान (दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का संगठन) देशों, मध्‍य एशिया और बंगाल की खाड़ी के इलाक़े के पड़ोसी देशों में दिलचस्‍पी दिखा रहा है।

आज आसियान देश, भारत के चौथे सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर (व्‍यापारिक साझेदार) हैं जिसके साथ फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्‍त व्‍यापार समझौता) है। इस समझौते की वजह से व्‍यापार, काम करने वालों का आना-जाना और निवेश करना आसान हुआ है। इसके अलावा मध्‍य एशिया हमारा विस्‍तारित पड़ोस है, मध्‍य एशिया के देशों से भी कूटनीतिक रिश्‍ते और बेहतर किए गए हैं। इन देशों से आर्थिक, राजनीतिक, सुरक्षा में सहयोग, सूचना तकनीक के साथ-साथ खनन, निर्माण और औद्योगिक उत्‍पादन के क्षेत्र में रिश्‍तों को और विस्‍तार दिया जा रहा है। इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जो जहाज़, सड़क और रेल के ज़रिए भारत, ईरान और रूस को जोड़ेगा और इसके साथ ईरान का चाबहार बंदरगाह, इस इलाके में भारत के ये दो बड़े प्रोजेक्‍ट हैं। पहले जिस बिम्‍सटेक (बे ऑफ़ बंगाल इनीसिएटिव फ़ॉर मल्‍टीसेक्‍टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन) को नज़रंदाज़ किया गया था, अब उसे फि‍र से चालू करने के लिए भारत ने ज़ोर लगाया है ता‍कि खाड़ी के इलाके में आर्थिक और दूसरी तरह की कनेक्‍टविटी (जुड़ाव) को बढ़ाया जा सके। भारत दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय नेतृत्‍व के लिए अलग-अलग कई तरह की द्विपक्षीय और बहुपक्षीय रणनीति का इस्‍तेमाल कर रहा है। वहीं चीन बहुपक्षीय की बजाय द्विपक्षीय यानी दो देशों के बीच के रिश्‍तों पर ज़्यादा ज़ोर दे रहा है। दोनों देशों ने इस पूरे इलाके पर ध्‍यान देने के पारंपरिक तरीके का दायरा बढ़ाया है। चीन दक्षिण एशिया में रिश्‍ते बनाने के मामले में आगे बढ़ रहा है वहीं भारत ने भी पारंपरिक पड़ोस से आगे देखना शुरू कर दिया है। दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्‍य एशिया और यहां तक कि हिंद-प्रशांत महासागर के बड़े इलाके तक पहुंचने की कोशिश ने एशिया में नई दिल्‍ली की अहमियत बढ़ा दी है। भारत दक्षिण एशिया में अपनी छाप छोड़ रहा है। ये फ़ैक्‍टर (कारक) दक्षिण एशिया की जिओपॉलिटिक्‍स (भूराजनीति) को आकार देंगे।


यह Foreign Policy Research Institute की पत्रिका Orbis के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक लेख का संक्षिप्त संस्करण है। पूरा लेख यहाँ एक्सेस किया जा सकता है।

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Authors

Harsh V. Pant

Harsh V. Pant

Professor Harsh V. Pant is Vice President – Studies and Foreign Policy at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations ...

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Kriti M. Shah

Kriti M. Shah

Kriti M. Shah was Associate Fellow with the Strategic Studies Programme at ORF. Her research primarily focusses on Afghanistan and Pakistan where she studies their ...

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