अब ये ज़रूरी है कि क्षेत्रीय सहयोग से इन हालात की क़रीबी निगरानी की जाए, ताकि बेघर हुए लोगों के हालात बेहतर हो सकें.
अगस्त महीने में बांग्लादेश और म्यांमार को उन रोहिंग्या मुसलमानों की वतन वापसी की प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी थी, जो म्यांमार के रखाइन सूबे से हिंसा की वजह से भागे थे. 22 अगस्त को पूरी दुनिया बड़ी आस से ये देख रही थी कि रोहिंग्या मुसलमान अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर लौटेंगे. लेकिन, एक भी रोहिंग्या मुसलमान अपने देश नहीं लौटा. जबकि, पिछले हफ़्ते 27 पुरुषों, महिलाओं और बच्चों वाले 14 परिवार रखाइन सूबे के मौंगटा स्थित नगा खु या आब्रजन कैंप पहुंचे थे. म्यांमार की सरकार ने कुल 3,540 लोगों में इतने ही लोगों को वापस लेने को मंज़ूरी दी थी. हालांकि रोहिंग्या मुसलमानों के दूसरे समूह के अपने देश वापसी की प्रक्रिया फिर से शुरू हुई है. ये प्रक्रिया धीमी ज़रूर है, लेकिन सही दिशा में जा रही है. हालांकि इस दौरान अपने घर लौटने वाले रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या बहुत कम है. ऐसे में ये ज़रूरी हो जाता है कि हम इस बात की समीक्षा करें कि आख़िर बांग्लादेश और म्यांमार की सरकारों के प्रयासों में क्या ख़ामियां हैं कि वो बेघर हुए रोहिंग्या मुसलमानों को उनकी पुश्तैनी ज़मीन पर नहीं लौटा पा रही हैं.
बांग्लादेश की सरकार लगातार रोहिंग्या मुसलमानों को उनके देश वापस भेजने की मांग करती रही है. बांग्लादेश के पास जगह और सुविधाओं के अलावा पैसे की भी कमी है. जिसकी वजह से वो इन शरणार्थियों की उचित व्यवस्था नहीं कर पा रही है. इस वक़्त बांग्लादेश में क़रीब 9 लाख रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे हैं. शरणार्थी शिविरों में उनकी क्षमता से ज़्यादा भीड़ है. इस वजह से यहां तमाम तरह के अपराध पनप रहे हैं. मानव तस्करी से लेकर ड्रग तस्करी, चोरी, हिंसा और क़त्ल जैसी घटनाओं की तादाद इन शरणार्थी शिविरों में बहुत ज़्यादा हो रही हैं. हालांकि उनके हालात तो बदतर हैं. लेकिन, इन रोहिंग्या मुसलमानों की घर वापसी की राह में दो बड़े सवाल हैं, जिनके जवाब तलाशे जाने चाहिए. पहला सवाल ये कि अगर वो दोबारा म्यांमार जाते हैं, तो क्या उन्हें अपने देश के बाक़ी नागरिकों की तरह बराबरी के अधिकार मिलेंगे? और दूसरा सवाल ये कि इन बेघर लोगों को उनके वतन भेजा जाना कितना सुरक्षित है?
हाल ही में प्रकाशित ऑस्ट्रेलिया की स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट कहती हैं कि म्यांमार, लगातार उन इलाक़ों को तबाह कर रहा है, जहां कभी रोहिंग्या मुसलमानों की रिहाइश हुआ करती थी. ये सिलसिला पिछले कई सालों से जारी है
इस साल जुलाई के आख़िरी हफ़्ते में आसियान देशों और म्यांमार के एक प्रतिनिधि मंडल ने बांग्लादेश में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों के शरणार्थी शिविरों का दौरा किया था. उम्मीद थी कि इस दौरे से इन सवालों के जवाब मिलने में आसानी होगी. इस प्रतिनिधि मंडल ने कई माझियों यानी रोहिंग्या मुसलमानों के समूहों के मुखियाओं से मुलाक़ात की थी. ताकि उन्हें ये बताया जा सके कि घर वापस जाने पर उन्हें कितनी जगह मिलेगी और उनके खाने-पीने का क्या इंतज़ाम होगा. लेकिन, इन रोहिंग्या मुसलमानों के मूल सवाल यानी उनकी नागरिकता के मसले पर ये प्रतिनिधि मंडल ख़ामोश रहा था, जो कि इन शरणार्थियों के लिए निराशाजनक रहा. म्यांमार की सरकार ये कह चुकी है कि रोहिंग्या मुसलमानों को वो विदेशी नागरिक मानती है और अपने देश के नागरिक नहीं मानती. म्यांमार के 1982 के सिटिज़नशिप एक्ट के मुताबिक़, जो व्यक्ति पिछली तीन पीढ़ियों से म्यांमार में रह रहा है उसे अपने आप ही उस देश की नागरिकता मिल जाएगी. इसीलिए, इस नागरिकता क़ानून के मुताबिक़, अगर रोहिंग्या मुसलमान सीधे तौर पर म्यांमार के बाशिंदे नहीं भी हैं, तो उन्हें वैधानिक रूप से म्यांमार में विदेशी नागरिकों के तौर पर रहने की इजाज़त मिल जाएगी. म्यांमार की सरकार ने ये भी कहा था कि इस प्रक्रिया से रोहिंग्या मुसलमानों को राष्ट्रीय पहचान पत्र मिल जाएगा.
इस तरह म्यांमार की सरकार ने हज़ारों शरणार्थियों की वतन वापसी का रास्ता तो खोला था. लेकिन, म्यांमार सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को ऐसा पहचान पत्र स्वीकार करने के लिए मज़बूर कर दिया है, जो उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित करता है. ऐसे में ये पहचान पत्र ऐसा दस्तावेज़ बन जाएगा, जिससे इन रोहिंग्या मुसलमानों के नागरिकता के दावे को ख़ारिज किया जा सकता है. इसके अलावा, म्यांमार की सरकार इन शरणार्थियों की सुरक्षा के मुद्दे पर भी ख़ामोश रह गई थी.
म्यांमार को हाल ही में एक लोकतांत्रिक देश के तौर पर मान्यता मिली है. ऐसे में उसे चाहिए कि वो तमाम जातीयताओँ और धार्मिक समूहों की विशिष्ट पहचान का सम्मान करे. क्योंकि म्यांमार में इन जैसे किसी भी जातीय या मज़हबी समूह के साथ भेदभाव का लंबा इतिहास रहा है.
म्यांमार लंबे समय से घरेलू हिंसा का शिकार है. पहले काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी ने बग़ावत का बिगुल बजाया. फिर अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी ने विद्रोह कर दिया. और अब अराकान आर्मी ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है. साल 2019 की शुरुआत म्यांमार का रखाइन सूबा इन जातीय हिंसक संघर्षों का केंद्र रहा है. हालांकि शांति बहाली के प्रयास कई बार किए जा चुके हैं. लेकिन, नेशनल सीज़फ़ायर एग्रीमेंट यानी एनसीए के तहत शांति बहाली के ये प्रयास अटका कर रखे गए हैं. नतीजा ये हुआ है कि नेशनल सीज़फ़ायर एग्रीमेंट बेअसर साबित हुआ है. ऐसे हिंसक माहौल का सबसे ज़्यादा असर स्थानीय लोगों पर हुआ है. आज ऐसे बहुत से लोग इंटरनली डिसप्लेस्ड पर्सन्स यानी आईडीपी के नाम से जाने जाते हैं. वो शरणार्थी शिविरों में रहने को मज़बूर हैं. हिंसा प्रभावित लोगों को खाने-पीने के सामान और मेडिकल मदद की सप्लाई पर भी म्यांमार की सेना यानी तत्माडॉ ने रोक लगा रखी है. ख़बरें ऐसी भी हैं कि हिंसा प्रभावित लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. उनके लिए हालात एक क़ैदी की तरह हो गए हैं.
इसके अलावा, हाल ही में प्रकाशित ऑस्ट्रेलिया की स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट कहती हैं कि म्यांमार, लगातार उन इलाक़ों को तबाह कर रहा है, जहां कभी रोहिंग्या मुसलमानों की रिहाइश हुआ करती थी. ये सिलसिला पिछले कई सालों से जारी है और 2019 में भी अबाध गति से चल रहा है. सैटेलाइट से मिली तस्वीरें बताती हैं कि रोहिंग्या विरोधी अभियानों में रखाइन के 40 प्रतिशत से ज़्यादा गांव पूरी तरह तबाह किए जा चुके हैं. विदेश भाग कर गए रोहिंग्या मुसलमानों जब अपने देश लौटेंगे, तो उन्हें उन्हीं शरणार्थी कैंपों में रहना पड़ेगा, जो स्थानीय लोगों के लिए बनाए गए हैं. ऐसे में म्यांमार के उस दावे पर सवाल उठते हैं जिस में वो रोहिंग्या मुसलमानों की ससम्मान और सुरक्षित वतन वापसी का दावा कर रहा है. म्यांमार ने बांग्लादेश में रह रहे इन शरणार्थियों को इकट्ठा करने के लिए जो आब्रजन केंद्र या ट्रांज़िट कैंप बनाए हैं, उन्हें कंटीले तारों से घेरा गया है और उन पर तगड़ी निगरानी का इंतज़ाम है. ये मध्य रखाइन राज्य में बने नज़रबंदी शिविरों जैसे ही हैं, जिन्हें अंदरूनी तौर पर विस्थापित लोगों के लिए बनाया गया है. ऐसे में अपना घर-बार छोड़ कर भागे लोगों को इन नज़रबंदी शिविरों में वापस जाने की कोई वजह नहीं दिखती. फिर इन शिविरों में उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी भी नहीं है.
आसियान के सभी देशों के बीच सहमति बनाई जानी चाहिए, ताकि ऐसी जातीय हिंसा की स्थिति में किन्हीं दो देशों के बीच मसला आसानी से सुलझे और तनाव न पैदा हो.
इन बातों के मद्देनज़र ये ज़रूरी हो जाता है कि ये बताया जाए कि इन रोहिंग्या मुसलमानों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी और उनके अधिकारों के प्रति जवाबदेही म्यांमार की सरकार की बनती है. म्यांमार की सरकार ये कह कर इन ज़िम्मेदारियों से नहीं मुकर सकती है कि इन शरणार्थीयों को रोहिंग्या न कहा जाए क्योंकि ये विवादित नाम है. इसीलिए, आज सबसे ज़रूरी बात ये है कि सरकार अपनी रोहिंग्या मुसलमान आबादी की वापसी की राह में रोड़े अटकाना बंद करे, ताकि वो बेघर इंसान न बनें. क्योंकि किसी भी देश की नागरिकता न होने की वजह से रोहिंग्या मुसलमान आज शोषण और भेदभाव के शिकार हो रहे हैं. म्यांमार को हाल ही में एक लोकतांत्रिक देश के तौर पर मान्यता मिली है. ऐसे में उसे चाहिए कि वो तमाम जातीयताओँ और धार्मिक समूहों की विशिष्ट पहचान का सम्मान करे. क्योंकि म्यांमार में इन जैसे किसी भी जातीय या मज़हबी समूह के साथ भेदभाव का लंबा इतिहास रहा है. म्यांमार के रखाइन स्टेट में कई बरस से जातीय हिंसा और संघर्ष चल रहा है. आज दुनिया भर में इसकी चर्चा हो रही है. जबकि म्यांमार की सरकार ने यहां बाहरी लोगों को घुसने से रोकने के लिए पूरी ताक़त लगा दी है. इससे म्यांमार के प्रति जो अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति थी, वो ख़त्म हो गई है. चूंकि म्यांमार में हिंसा की वजह से रोहिंग्या मुसलमान, भाग कर पड़ोसी देशों में जा रहे हैं, ऐसे में म्यांमार ये तर्क नहीं दे सकता है कि ये उसका अंदरूनी मामला है. ऐसे में उसे ऐसी बहानेबाज़ी छोड़ कर बांग्लादेश और दूसरे आसियान देशों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, ताकि इस चुनौती का सामना कर सके. 10 देशों वाले संगठन आसियान के लिए भी ये एक बड़ी चुनौती है. इसके संगठनों के सामने ये सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आसियान में इस बात की राजनीतिक और वैधानिक व्यवस्था है कि वो शरणार्थियों की समस्याओं से जूझ सके? आसियान की इस बात के लिए भी आलोचना हो रही है कि वो म्यांमार को इस शरणार्थी समस्या से निपटने और उन्हें वापस लेने के लिए राज़ी नहीं कर सका है. आसियान ने अपने महासचिव लिम जोक की अगुवाई में एक प्रतिनिधि मंडल को मानवाधिकार सहयोग और डिज़ैस्टर मैनेजमेंट के हालात का जायज़ा लेने के लिए म्यांमार के रखाइन राज्य में भेजा था. जिसका मक़सद म्यांमार के साथ शरणार्थियों की चुनौती से निपटना था. इस टीम ने मई महीने में रखाइन स्टेट का दौरा किया था. इससे भी पहले 2018 के दिसंबर महीने में भी आसियान की ये टीम म्यांमार के दौरे पर गई थी. ताकि एक प्राथमिक पड़ताल कर सके. ऐसा इस टीम ने आसियान के निर्देश पर किया था. क्योंकि आसियान की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि वो रोहिंग्या मुसलमानों के नज़रिए से कोई भी क़दम नहीं उठा पा रहा है. आसियान देशों के प्रतिनिधि म्यांमार के अधिकारियों के साथ रोहिंग्या मुसलमानों के शिविरों में गए थे. लेकिन, ये कोशिश भी नाकाम रही थी.
रोहिंग्या मुसलमानों का लगातार चल रहा संकट ये बताता है कि ये क्षेत्र शरणार्थियों की बड़ी तादाद में आवक की चुनौती से निपटने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है. अब ये ज़रूरी है कि क्षेत्रीय सहयोग से इन हालात की क़रीबी निगरानी की जाए, ताकि बेघर हुए लोगों के हालात बेहतर हो सकें. जो बिना मुल्क के लोग हैं उन्हें उनका वतन मिल सके. क्षेत्रीय देशों के बीच एक शरणार्थी नीति पर सहमति बनाने की ज़रूरत है. ताकि जब इतनी बड़ी तादाद में किसी एक देश से लोग दूसरे देश में पनाह लेने के लिए आएं, तो इस चुनौती से किस तरह निपटा जाए. और कब ऐसे मामलों को किसी एक देश का अंदरूनी मामला माना जाए. अगर किसी देश के अंदरूनी हालात की वजह से इतनी बड़ी संख्या में लोग दूसरे देशों में भाग कर जाते हैं, तो ये अंदरूनी मामला नहीं रह जाता. ऐसी एक नीति पर आसियान के सभी देशों के बीच सहमति बनाई जानी चाहिए, ताकि ऐसी जातीय हिंसा की स्थिति में किन्हीं दो देशों के बीच मसला आसानी से सुलझे और तनाव न पैदा हो.
आज रोहिंग्या मुसलमानों की घर वापसी उनकी सुरक्षा की वजह से संदेह के घेरे में है. ऐसे में ये ज़रूरी हो गया है कि ये क्षेत्रीय संगठन एक बड़ा और व्यापक भूमिका निभाए, ताकि ऐसा संकट और बड़े इलाक़े में न फैल सके.
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Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...
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