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भारत भी शुरुआत में इस तरह के ढांचे का निश्चित रूप से फ़ायदा उठा सकता है जिसमें IT मंत्रालय तालमेल, सुविधा मुहैया कराने और निगरानी की प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है.
दुष्प्रचार का ख़तरा कोई नया नहीं है. मार्च की शुरुआत में वो झूठ जिसने “कोरोना जिहाद” के विवाद को भड़काने से लेकर वो फ़र्ज़ी ख़बर जिसके मुताबिक़ कोविड-19 को फैलाने में चीन ने जानबूझकर भूमिका निभाई, इस तरह की मनगढ़ंत कहानियां लोगों की भावनाओं को भड़काती हैं, लोगों में नकारात्मक पूर्वाग्रह पैदा कर ऑनलाइन हेट स्पीच को बढ़ावा देती हैं.
महामारी के फैलने की तरह इस साल ‘फ़र्ज़ी ख़बरें’ भी बड़ी तेज़ी से बढ़ी हैं. दोनों लगभग एक-दूसरे पर निर्भर हो गई हैं. महामारी जहां ऑनलाइन झूठ को फैलाने का अवसर मुहैया करा रही है वहीं फ़र्ज़ी ख़बर महामारी से जुड़े झूठ, अविश्वास और संदेह का माहौल बना रही है जिससे ऐसा लगता है मानो इस लड़ाई में महामारी हमेशा आगे रहेगी. भारत के प्रमुख फैक्ट चेकर्स के मुताबिक़ जनवरी 2020 के आख़िर में यानी जब भारत में वायरस का प्रवेश हुआ, तब से ग़लत जानकारी की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है. भारत के लोग फ़र्ज़ी ख़बरों से सबसे आसानी से प्रभावित होते हैं (जैसा कि माइक्रोसॉफ्ट के डिजिटल सिविलिटी इंडेक्स 2019 से पता चला है). ऐसे में हमने देखा है कि ग़लत जानकारी अलग तरह का रंग ले लेती है- सांप्रदायिक, अंजान डर, मेडिकल जानकारी को तोड़ना-मरोड़ना, यहां तक कि सरकार की आवाज़ को संक्रमित करना. इनका नतीजा विनाशकारी रहा है जिनमें सांप्रदायिक संघर्ष में बढ़ोतरी से लेकर लोगों के भरोसे और विश्वसनीयता में अलगाव तक शामिल हैं.
फ़र्ज़ी ख़बरों पर नियंत्रण के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है बल्कि कई अस्पष्ट क़ानून हैं जो इससे जुड़ी घटनाओं के संपूर्ण पहलू यानी मानहानि, देशद्रोह, अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा से लेकर शरारत को भड़काने के मामलों को भारतीय दंड संहिता और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट, 2000 के तहत देखते हैं. इस तरह भारत फ़र्ज़ी ख़बरों पर लगाम के लिए क़ानूनी तौर पर पूरी तरह तैयार नहीं है क्योंकि रोज़ झूठ फैलाने का नया तरीक़ा सामने आ जाता है. तकनीकी क्षमता और जानकारी में कमी की वजह से दुष्प्रचार पर रोक लगाने के तौर-तरीक़ों को लेकर भी भारत कुख्यात है. यहां तुरंत इंटरनेट बंद कर दिया जाता है, वेबसाइट ब्लॉक कर दी जाती हैं. इससे तुरंत राहत तो मिलती है लेकिन लंबे वक़्त में सामाजिक, आर्थिक और मानवीय नुक़सान इतना ज़्यादा होता है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है.
महामारी जहां ऑनलाइन झूठ को फैलाने का अवसर मुहैया करा रही है वहीं फ़र्ज़ी ख़बर महामारी से जुड़े झूठ, अविश्वास और संदेह का माहौल बना रही है जिससे ऐसा लगता है मानो इस लड़ाई में महामारी हमेशा आगे रहेगी.
इलेक्ट्रॉनिक्स और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय (MeitY) के संशोधित दिशानिर्देश सोशल मीडिया कंपनियों को हासिल सुरक्षा को ख़तरे में डाल सकते हैं. इसमें “ग़ैर-क़ानूनी कंटेंट” की निगरानी और प्राइवेट, एंड टू एंड एन्क्रिप्शन का पता लगाने की इजाज़त दी गई है. इन प्रावधानों पर सवाल उठाए गए हैं. कई वैश्विक डिजिटल अधिकार समूह और उद्योगों के गठबंधन ने “ज़रूरत से ज़्यादा सेंसर, भारतीय यूज़र के प्राइवेसी के मौलिक अधिकार पर चोट और इंटरनेट की सुरक्षा पर गंभीर असर” के आधार पर इसकी आलोचना की है. इस तरह भारत के डिजिटल भविष्य को ख़तरे में डाल दिया गया है. इसके अलावा ये भी व्यापक तौर पर मान लिया गया है कि सरकार की तरफ़ से ज़्यादा क़ानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ख़तरे में डालते हैं क्योंकि इससे अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता पर “डरावना असर” पड़ता है. ये भी ध्यान देने योग्य है कि दुष्प्रचार फैलाने वालों को सज़ा दिलाने वाले इकलौते प्रावधान IT एक्ट की धारा 66(A) को सुप्रीम कोर्ट ने 2015 के ऐतिहासिक श्रेया सिंघल फ़ैसले में असंवैधानिक ठहराते हुए हटा दिया था.
कंटेंट हटाने को लेकर सरकार के दबाव के बीच सोशल मीडिया कंपनी लगातार अभिव्यक्ति की सुविधा मुहैया कराने और उस पर नियंत्रण के बीच संतुलन बैठाने की समस्या का सामना कर रही हैं. सोशल मीडिया कंपनी ख़ुद से दुष्प्रचार की भरमार से निपटने में नाकाम रही हैं. सोशल मीडिया कंपनी अपने दिशानिर्देश के आधार पर काम करती हैं जो सूचनाओं को साझा करने में रोड़े अटकाते हैं. इससे पूरे उद्योग की तरफ़ से एक वायरल दुष्प्रचार के ख़िलाफ़ सामूहिक जवाब की रफ़्तार धीमी होती है.
कई वैश्विक डिजिटल अधिकार समूह और उद्योगों के गठबंधन ने “ज़रूरत से ज़्यादा सेंसर, भारतीय यूज़र के प्राइवेसी के मौलिक अधिकार पर चोट और इंटरनेट की सुरक्षा पर गंभीर असर” के आधार पर इसकी आलोचना की है. इस तरह भारत के डिजिटल भविष्य को ख़तरे में डाल दिया गया है.
इसके अलावा फ़ेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वैचारिक पक्षपात को बढ़ावा देने जैसे आरोपों का सामना कर रहे हैं और इस वजह से उन पर सरकार की नज़र है. सरकार की निगरानी के कारण कुछ वक़्त के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही भले ही बन जाए लेकिन हमें इसकी वजह से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को होने वाले दूसरे नुक़सान को नहीं भूलना चाहिए. संवैधानिक निष्पक्ष सिद्धांतों के आधार पर कंटेंट पर सामान्य निगरानी की आदत की जगह निर्वाचित लोगों और राजनीतिक पार्टियों को ख़ुश रखने का नज़रिया ठीक नहीं है.
सरकार के सामर्थ्य और प्लेटफॉर्म की ज़िम्मेदारी में अंतर, भरोसे की कमी और शामिल समूहों के बीच तालमेल में कमी के बीच ये मुद्दा साफ़तौर पर कुशल और सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण की ज़रूरत की तरफ़ इशारा करता है. सहभागिता, विचार और उसे लागू करने की ज़रूरत है. इस मामले में भारत को उद्योग के नेतृत्व वाले स्व-नियमन ढांचे से फ़ायदा हो सकता है जहां सरकार के पास इसके समन्वय और प्रशासन की ज़िम्मेदारी हो. यहां यूरोपियन कमीशन के मॉडल को अपनाकर ऑनलाइन दुष्प्रचार का मुक़ाबला किया जा सकता है.
सरकार के सामर्थ्य और प्लेटफॉर्म की ज़िम्मेदारी में अंतर, भरोसे की कमी और शामिल समूहों के बीच तालमेल में कमी के बीच ये मुद्दा साफ़तौर पर कुशल और सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण की ज़रूरत की तरफ़ इशारा करता है.
इस बात को मानते हुए कि दुष्प्रचार की कोशिशों से संस्थानों पर भरोसा कम होता है, चुनाव प्रणाली कमज़ोर होती है और सामाजिक तनाव बढ़ता है, यूरोपियन यूनियन (EU) ने कई सहयोगपूर्ण कार्य योजना लागू की है. इन योजनाओं को कठोर क़ानूनों से मदद मिली है जहां प्लेटफॉर्म को इस लड़ाई के मोर्चे में सबसे आगे रखा गया है. दुनिया में सबसे पहले 2018 में EU ने दुष्प्रचार को लेकर आचार संहिता की शुरुआत की. ये तकनीकी कंपनियों और विज्ञापनदाताओं के लिए स्वैच्छिक और स्व-नियमित मानक थे ताकि फ़र्ज़ी ख़बरों को फैलने से रोका जा सके. जाली यूज़र, फ़र्ज़ी खाते और बोट्स, राजनीतिक विज्ञापन और दुष्प्रचार फैलाने वाली वेबसाइट/पेज की विज्ञापन आमदनी में खलल जैसे मुद्दों पर इसमें ध्यान दिया गया. आचार संहिता में सोशल मीडिया कंपनियों को झूठ के मामलों पर नियंत्रण के लिए तकनीकी और नीतिगत रणनीति बनाने के लिए कहा गया. आचार संहिता में यूज़र और रिसर्च कम्युनिटी को ज़्यादा अधिकार देने की बात भी कही गई. इसके लिए उन्हें दुष्प्रचार की पहचान करने और उसे समझने की क्षमता में बढ़ोतरी के लिए समर्थन देने की बात थी. कमीशन ने एक बोर्ड की भी स्थापना की जिसमें सिविल सोसायटी, मीडिया, उपभोक्ता संगठनों और शैक्षणिक समुदाय के नुमाइंदे थे जो अपनी चिंता को ज़ाहिर कर सकें.
गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर, मोज़िला और हाल के दिनों में हस्ताक्षर करने वाले टिकटॉक (जून 2020) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए ज़रूरी है कि वो आचार संहिता का पालन करने के लिए उठाए गए क़दमों की जानकारी दें. इसके अलावा हस्ताक्षर करने वालों को सालाना ख़ुद से बनाई एक रिपोर्ट भी देनी होगी जिसमें आचार संहिता के असर को आंका गया हो. कमीशन का कहना है कि आचार संहिता की वजह से दुष्प्रचार को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की नीतियों में “ज़्यादा पारदर्शिता के साथ-साथ उसकी निगरानी, बेहतरी और असरदार ढंग से उसे लागू करने” का अवसर मिला है.
इन क़ानूनी क़दमों का साथ देते हुए कमीशन ने एक डिजिटल मीडिया ऑब्ज़र्वेटरी की भी स्थापना की है जो फैक्ट चेकर्स और मीडिया संगठनों के लिए एक “यूरोपियन केंद्र” का निर्माण कर दुष्प्रचार के ख़िलाफ़ काम करे. इसका काम रिसर्च की क्षमता को मज़बूत करना, शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के डाटा तक प्राइवेसी प्रोटेक्टेड पहुंच सुनिश्चित करना, लोगों की जानकारी के लिए पोर्टल का निर्माण और फ़र्ज़ी ख़बरों के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कोशिशों की निगरानी में सरकारी विभागों को समर्थन मुहैया कराना है. महामारी के बाद झूठ की भरमार को देखते हुए कमीशन ने एक साझा बयान भी जारी किया है जिसमें पारदर्शी सूचना के ज़रिए “दृढ़ता से दुष्प्रचार का जवाब देना”, ख़ासतौर पर दुष्प्रचार को लेकर रैपिड अलर्ट सिस्टम तैयार करना और मासिक रिपोर्ट के ज़रिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कड़ी छानबीन शामिल है. नतीजे बताते हैं कि गूगल के यूट्यूब ने 1,00,000 से ज़्यादा गुमराह करने वाले कंटेंट की समीक्षा की और उनमें से 15,000 से ज़्यादा को हटाया, फ़ेसबुक ने 2 अरब से ज़्यादा यूज़र्स को सूचना के विश्वसनीय स्रोत जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ़ निर्देशित किया और इस तरह झूठ का मुक़ाबला तथ्यों से किया गया, दुनिया भर में 70 लाख से ज़्यादा कोविड-19 से जुड़ी ग़लत जानकारियां हटाई गईं और ट्विटर ने मशीन लर्निंग जैसे मज़बूत टूल के ज़रिए सूचनाओं की शुद्धता को कायम रखा और कोविड-19 पर झूठ फैलाने वाले 34 लाख से ज़्यादा संदिग्ध खातों को चुनौती दी.
महामारी के बाद झूठ की भरमार को देखते हुए कमीशन ने एक साझा बयान भी जारी किया है जिसमें पारदर्शी सूचना के ज़रिए “दृढ़ता से दुष्प्रचार का जवाब देना”, ख़ासतौर पर दुष्प्रचार को लेकर रैपिड अलर्ट सिस्टम तैयार करना और मासिक रिपोर्ट के ज़रिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कड़ी छानबीन शामिल है.
भारत भी शुरुआत में इस तरह के ढांचे का निश्चित रूप से फ़ायदा उठा सकता है जिसमें IT मंत्रालय तालमेल, सुविधा मुहैया कराने और निगरानी की प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, उद्योगों के मंच और विज्ञापनदाता ऐसी स्वैच्छिक संहिता का पालन करने के लिए तैयार होंगे जो स्व-नियमम को पारदर्शिता के साथ बढ़ावा देती है. ऐसा ही एक मॉडल 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले लागू किया गया था जहां गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर, बाइट डांस/टिकटॉक और शेयरचैट समेत दूसरे प्लेटफॉर्म की नुमाइंदगी करने वाले इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) ने चुनाव आयोग की सलाह पर स्वैच्छिक आचार संहिता का मसौदा तैयार किया था. चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार और तकनीकी उद्योग के बीच सहयोगपूर्ण तालमेल बनाने में काफ़ी हद तक सफल इस मॉडल पर भविष्य के संघीय और राज्य चुनावों के लिए भी नज़र है.
लेकिन इस बात पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुष्प्रचार के ख़िलाफ़ तेज़ी से बदलती इस लड़ाई में एक तरह के समाधान से फ़ायदा नहीं मिलेगा. नीतियों में लगातार समीक्षा की ज़रूरत है और ये तभी संभव होगा जब शुरुआत करते हुए एक प्रक्रिया तय की जाए. ऐसा करने से मौजूदा क़ानूनी कमी को दूर करने में काफ़ी हद तक कामयाबी मिलेगी और एक सहयोगपूर्ण सर्वसम्मति का रास्ता तैयार होगा.
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Siddhant Chatterjee is a Policy Consultant. He's previously worked with the British and Australian Governments and his interests lie in AI Ethics and Platform Governance.
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