Author : Mannat Jaspal

Published on Aug 09, 2023 Updated 0 Hours ago

इस वक़्त जलवायु परिवर्तन के मौजूदा इको-सिस्टम से जुड़े अलग अलग संगठन अपनी दुनिया में अलग ही का काम करते रहते हैं. इससे पूंजी का पता लगाकर सही जगह पहुंचा पाना और भी मुश्किल होता है

जलवायु परिवर्तन से जुड़े वित्तीय (finance) प्रणाली में, असमानताओं की पद्धति का पड़ताल!
जलवायु परिवर्तन से जुड़े वित्तीय (finance) प्रणाली में, असमानताओं की पद्धति का पड़ताल!

ये लेख हमारी सीरीज़- रायसीना फाइल्स 2022 का एक हिस्सा है.


आप किसी तूफ़ान में अपना घर गंवा देंगे, किसी बाढ़ में जान गंवा बैठेंगे, या सूखे के कारण आपकी आमदनी को झटका लगेगा. इन बातों का इससे कोई ताल्लुक़ नहीं है कि आपने अपनी ज़िंदगी के लिए कैसे चुनाव किए, बल्कि ये सारा मामला क़िस्मत का है. जलवायु परिवर्तन का असर वैसे तो दुनिया के तमाम हिस्सों में महसूस किया जा रहा है, लेकिन कम आमदनी वाले देशों पर इसका तुलनात्मक रूप से ज़्यादा असर पड़ रहा है. ये हाल तब है जब कुछ मुट्ठी भर विकसित देश ही मोटे तौर पर जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हैं.

उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य हासिल करने और जलवायु परिवर्तन के पहले से ही पड़ रहे बड़े व्यापक असर के हिसाब से ख़ुद को ढालने की लागत बहुत ज़्यादा है. अगर हम, धरती के तापमान में इज़ाफ़े को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना चाहते हैं, तो महज़ ऊर्जा के क्षेत्र में बदलाव के लिए हर साल 830 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी की दरकार है. [1] लेकिन, इस लागत का बोझ कैसे उठाया जाएगा? जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और उसके हिसाब से समुदायों को ढालने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूंजी जुटाने और उसे सही जगह इस्तेमाल करने का एक ढांचा पिछले तीन दशकों के दौरान उभरकर सामने आया है. जलवायु वित्त या फाइनेंस की कामयाब व्यवस्था को न केवल भारी मात्रा में पूंजी को व्यापक स्तर पर जुटाना होगा, बल्कि इस पूंजी के प्रवाह की दिशा पर भी ज़ोर देना होगा. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ज़रूरी एक न्यायोचित वित्त व्यवस्था बनाने के लिए इस बात की भी बड़ी अहमियत है कि इस पूंजी निवेश के साथ किस तरह की शर्तें जोड़ी जा रही हैं. इस वित्तीय ढांचे से सबसे ज़्यादा किसे फ़ायदा हो रहा है? कौन से देश मदद जुटाने में पीछे रह जा रहे हैं और ये वित्त व्यवस्था किस तरह देशों के बीच असमानता को बढ़ा रही है? इस पेपर में हम ख़ास तौर से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पूंजी निवेश के प्रवाह की जलवायु इंसाफ़ के नज़रिए से पड़ताल करेंगे और उन ख़ास पहलुओं पर नज़र डालेंगे जो देशों के बीच असमानता की खाई को और चौड़ा करने और इसे बनाए रखने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और उसके हिसाब से समुदायों को ढालने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूंजी जुटाने और उसे सही जगह इस्तेमाल करने का एक ढांचा पिछले तीन दशकों के दौरान उभरकर सामने आया है. जलवायु वित्त या फाइनेंस की कामयाब व्यवस्था को न केवल भारी मात्रा में पूंजी को व्यापक स्तर पर जुटाना होगा, बल्कि इस पूंजी के प्रवाह की दिशा पर भी ज़ोर देना होगा. 

जलवायु परिवर्तन से निपटने में इंसाफ़

आज ग्रीनहाउस (GHG) गैसों के ज़्यादातर उत्सर्जन के लिए कुछ गिने चुने देश ही ज़िम्मेदार है. इनमें से ही तरक़्क़ी कर चुकीं अर्थव्यवस्थाएं, कम और मध्यम आमदनी वाले देशों की तुलना में प्रति व्यक्ति कहीं ज़्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कर रही हैं. इसके अलावा, ऐतिहासिक रूप से भी इन उत्सर्जनों में देशों के योगदान में बहुत फ़र्क़ रहा है. विकसित देशों ने दुनिया की साझा आब-ओ-हवा का ज़्यादा शोषण किया है. इससे भी बड़ी बात तो ये है कि जहां जलवायु परिवर्तन का असर सभी महाद्वीपों पर महसूस किया जा रहा है. लेकिन, तुलना करें तो पता ये चलता है कि कम आमदनी वाले देश और सबसे कम सुविधाओं वाले लोगों पर ही इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ रहा है. विकासशील देशों ने इन असमानताओं को स्वीकार किया है और वो कई दशकों से जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में इंसाफ़ की मांग करते रहे हैं. [2] वैसे तो पेरिस जलवायु समझौते में देशों के बीच अलग अलग जवाबदेही और उनकी क्षमताओं में फ़र्क़ की बात तो मानी है. ये भी माना है कि जब यही पैमाना वित्तीय मामले में लागू किया जाता है, तो असमानता और ज़्यादा दिखती है. [3]

इस वक़्त प्रति व्यक्ति उत्सर्जन

जलवायु परिवर्तन का कारण मानवीय गतिविधियां यानी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है. कौन सा देश कितना कार्बन उत्सर्जन कर रहा है, इसमें भारी अंतर देखा जाता रहा है. दुनिया के सात सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश कुल उत्सर्जन के 60 फ़ीसद हिस्से के लिए ज़िम्मेदार हैं. [4]  दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन के लगभग एक तिहाई हिस्से के लिए चीन (26.1 प्रतिशत) ज़िम्मेदार है. इसके बाद अमेरिका (13.4 प्रतिशत) का नंबर आता है और फिर यूरोपीय संघ (7.6 फ़ीसद), भारत (6.5 प्रतिशत), रूस (5.6 फ़ीसद), जापान (2.6 प्रतिशत) और ब्राज़ील (2.1 प्रतिशत) के नंबर आते हैं. [5]

कम और मध्यम आमदनी वाले देशों की तुलना में प्रति व्यक्ति कहीं ज़्यादा कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कर रही हैं. इसके अलावा, ऐतिहासिक रूप से भी इन उत्सर्जनों में देशों के योगदान में बहुत फ़र्क़ रहा है. विकसित देशों ने दुनिया की साझा आब-ओ-हवा का ज़्यादा शोषण किया है.

लेकिन, उत्सर्जन को किसी देश के पैमाने से देखें, तो किसी देश के आकार की अहमियत जताने वाली तस्वीर छुप जाती है. मिसाल के तौर पर, अगर कुल उत्सर्जन की बात करें, तो भारत बड़ा उत्सर्जक देश दिखाई देता है, क्योंकि ये चौथी पायदान पर है. वहीं, अगर हम इस बात को प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के पैमाने पर कसें, तो उत्सर्जन के मामले में भारत 104वें नंबर पर आता है. [6] भारत में अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनके पास बिजली की सुविधा नहीं है. ऐसे में उत्सर्जन में इज़ाफ़े को लेकर भारत की ज़्यादा अमीर देशों से तुलना कर पाना मुश्किल हो जाता है. प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के लिहाज़ से क़तर, न्यू कैलेडोनिया, मंगोलिया, त्रिनिदाद और टोबैगो और ब्रुनेई दारुस्सलाम, क़तार में सबसे आगे खड़े नज़र आते हैं. [7] क़तर में हर व्यक्ति, हर साल औसतन 37.02 टन उत्सर्जन करता है, जो श्रीलंका, ग्वाटेमाला या पराग्वे की तुलना में 30 गुना अधिक है. 50 सबसे कम उत्सर्जन वाले देशों में हर व्यक्ति, साल भर में एक टन से भी कम कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करता है और ये सभी कम व निम्न मध्यम आमदनी वाले देश है. [8]

बढ़ता हुआ उत्सर्जन

ग्रीनहाउस गैसों (GHG) के उत्सर्जन का असर सामूहिक होता है. इसका ये मतलब है कि सिर्फ़ आज के नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से होते आ रहे सारे उत्सर्जन ही आज जलवायु पर पड़े परिवर्तन का निर्धारण करेंगे. [9] इसी वजह से, देशों द्वारा ऐतिहासिक रूप से किए गए उत्सर्जन को पैमाना बनाना ज़रूरी है, ताकि जलवायु परिवर्तन से निपटने की ज़िम्मेदारी का बंटवारा भी उसी हिसाब से हो. जलवायु परिवर्तन से निपटने के साझा वैश्विक ‘बजट’ का 86 प्रतिशत हिस्सा तो पहले भी इस्तेमाल किया जा चुका है. [10] ऐतिहासिक रूप से देखें, तो अमेरिका कार्बन का सबसे बड़ा उत्सर्जक रहा है. जो अब तक हुए कुल उत्सर्जन के लगभग 20 फ़ीसद के लिए ज़िम्मेदार है. [11] इसके बाद यूरोपीय संघ (17.3 प्रतिशत), चीन (12.1 फ़ीसद) और रूस (6.2 प्रतिशत) का नंबर आता है. [12] एक और अध्ययन में ऐसे अनुमान लगाए गए हैं, जो इससे पहले के सारे आकलन को बहुत पीछे छोड़ देते हैं. इसके हिसाब से ऐतिहासिक रूप से कार्बन उत्सर्जन देशों की पायदान कुछ इस तरह से बनती है: अमेरिका (40 फ़ीसद), यूरोपीय संघ (29 प्रतिशत), बाक़ी यूरोपीय देश (13 फ़ीसद) और अन्य विकसित देश (10 प्रतिशत). इसकी तुलना में सारे विकासशील देश मिलाकर भी केवल 8 प्रतिशत के उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी हैं. [13]

जलवायु संबंधी प्रभाव के कारण वर्तमान के साथ साथ ऐतिहासिक उत्सर्जन भी हैं- और इसके लिए मोटे तौर पर विकसित देशों का एक छोटा सा समूह ही ज़िम्मेदार है. आज जब विकासशील देश इन प्रभावों के हिसाब से ख़ुद को ढालने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसके लिए वित्त की व्यवस्था एक बड़ा सवाल ही नहीं, इन गतिविधियों का निर्धारण करने की वजह भी है.

कुल मिलाकर ऐतिहासिक और मौजूदा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन हमें इस बात का अंदाज़ा देते हैं कि जलवायु परिवर्तन और इसके असर के लिए कौन से देश ज़िम्मेदार हैं. इस मामले में उन्नत अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के बीच भयंकर असमानता देखने को मिलती है. पिछले तीन दशकों के दौरान इस बात की मांग ने काफ़ी ज़ोर पकड़ लिया है कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ख़ुद को ढालने का ख़र्च विकसित देशों को उठाना चाहिए. क्योंकि आज जलवायु परिवर्तन के बुरे असर का सबसे ज़्यादा खामियाज़ा विकासशील देश भुगत रहे हैं. [14]

जलवायु परिवर्तन के सामाजिक प्रभाव

आज विकासशील देशों में आब-ओ-हवा में बदलाव के साथ तालमेल बिठाने की ज़रूरत कुछ ज़्यादा महसूस की जा रही है. क्योंकि यहां के लोग बार-बार तेज़ तूफ़ानों के हमले झेल रहे हैं. जिनके चलते तेज़ बारिश के झटके, बाढ़ और गर्मी से अहम मूलभूत ढांचे तबाह हो जा रहे हैं. फ़सलें बर्बाद हो रही हैं. पानी के स्रोत सूख रहे हैं. घर तबाह हो रहे हैं. लोगों की आमदनी और उनकी सेहत पर असर पड़ रहा है. मिसाल के तौर पर मार्च 2019 में आए चक्रवात इदाई से अफ्रीकी देश मोज़ांबीक़ 3.9 करोड़ डॉलर की आमदनी का नुक़सान हुआ था और 2,40,000 घरों में तबाही मच गई थी. [15] सितंबर 2017 में आए तूफ़ान मारिया के चलते डोमिनिका में घरों के 90 फ़ीसद सामान बर्बाद हो गए थे. [16]  ऐसी तबाही लाने वाली क़ुदरती आपदाओं और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किए जा रहे प्रयासों की धीमी रफ़्तार के चलते सालाना 70 अरब से 100 अरब डॉलर का ख़र्च बढ़ रहा है, [17]  जो अगले तीन दशकों में और भी इज़ाफ़े के साथ बढ़कर 280 से 500 अरब डॉलर के बीच पहुंच जाएगा. [18]

2015 के पेरिस समझौते में ये माना गया था कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुक़सान और घाटे की भरपाई पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है. हालांकि, भारी आमदनी वाले देश लगातार ऐसी बातों का समझौतों में ज़िक्र करने का विरोध करते हैं, जिससे उन्हें इस नुक़सान की भरपाई के लिए ज़िम्मेदार बनाया जाए. इसके अलावा, उत्सर्जन को औद्योगिक विकास के व्यापक नज़रिए से भी देखने की ज़रूरत है. विकसित देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं और आमदनी का विकास जलवायु पर पड़ने वाले असर से बेफ़िक्र होकर किया था. आज विकासशील देशों के सामने यही चुनौती और ख़्वाहिश है कि वो अपनी अर्थव्यवस्थाओं का विकास करें और अपने नागरिकों के रहन सहन को सुधारें. मगर उनके पास ये रियायत नहीं है कि वो कार्बन उत्सर्जन की चिंता न करें.

जलवायु संबंधी प्रभाव के कारण वर्तमान के साथ साथ ऐतिहासिक उत्सर्जन भी हैं- और इसके लिए मोटे तौर पर विकसित देशों का एक छोटा सा समूह ही ज़िम्मेदार है. आज जब विकासशील देश इन प्रभावों के हिसाब से ख़ुद को ढालने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसके लिए वित्त की व्यवस्था एक बड़ा सवाल ही नहीं, इन गतिविधियों का निर्धारण करने की वजह भी है. लेख के हिस्से में हमने इस बात को सामने रखा है कि अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन वित्त के संदर्भ में हमें न्यायोचित पैमाना भी लागू करने की ज़रूरत है. इसमें ये तथ्य भी शामिल है कि आज भी ज़्यादा आमदनी वाले देशों में ही उत्सर्जन ज़्यादा है; प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के औसत में बहुत बड़ा अंतर है. आज कम और मध्यम आमदनी वाले देशों की तुलना में विकसित देश कहीं ज़्यादा मात्रा में प्रति व्यक्ति कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कर रहे हैं; इतिहास में हुए ज़्यादातर उत्सर्जन के लिए कुछ मुट्ठी भर देश ही ज़िम्मेदार हैं. इससे अन्य देशों के लिए विकास की कोई ख़ास गुंजाइश ही नहीं बची है; और, जो देश जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हैं, उनकी तुलना में ग़रीब देशों पर इसका बुरा असर ज़्यादा महसूस किया जा रहा है. इस संदर्भ में पेपर के अगले भाग में हम जलवायु परिवर्तन से जुड़ी पूंजी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवाह पर एक नज़र डालेंगे और ये देखेंगे वो कौन सी ख़ास वजहें हैं जिनसे इस मामले में देशों के बीच असमानता पैदा होती है और उसे बढ़ावा मिलता है.

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्त की व्यवस्था

वर्ष 2019/2020 में सभी स्रोतों से क्लाइमेट फाइनेंस 632 अरब डॉलर तक पहुंच गया था. [19] वैसे तो, साल 2011 से जलवायु वित्त में अब तक लगभग 74 प्रतिशत तक बढ़ चुका है. फिर भी हम धरती के तापमान में इज़ाफ़े को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना चाहते हैं, तो उस लिहाज़ से हम अभी भी लक्ष्य से बहुत दूर हैं. कहा जा रहा है कि अगर साल 2030 तक जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विश्व स्तर पर तय किए गए महत्वपूर्ण लक्ष्यों को हासिल करना है, तो इसके लिए हर साल जलवायु वित्त में 588 प्रतिशत या 4.35 ख़रब डॉलर का इज़ाफ़ा करना होगा. [20] एक तरफ़ तो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी में बढ़ोत्तरी की दरकार है. वहीं, उन परिस्थितियों और शर्तों का मूल्यांकन करके उसे नए सिरे से ढालने की ज़रूरत है, जिससे पूंजी के मामले में और भी समानता लायी जा सके.

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पूंजी को कई स्रोतों से जुटाया जा सकता है. इसके लिए सरकारी, सरकार के मालिकाना हक़ वाले वित्तीय संस्थान, क्लाइमेट फंड, बहुपक्षीय और द्विपक्षी और राष्ट्रीय विकास के वित्तीय संस्थानों के साथ साथ- निजी क्षेत्र जैसेकि कारोबारी वित्तीय संस्थान, निगम, वेल्थ फंड, संस्थागत निवेशक, सामान्य परिवार और व्यक्तिगत स्तर पर पूंजी जुटाई जा सकती है. [21] अगर बड़े पैमाने पर पूंजी जुटाने की बात करें, तो हर स्रोत से हासिल पूंजी अलग अलग तरह की होती है, और इसका असर पूंजी के बंटवारे और इसके निवेश से अधिकतम लाभ उठाने और पर्यावरण पर गहरा असर पड़ता है.

विकसित देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जुटाई और दी जाने वाली पूंजी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए दिया जाता है. जबकि, लोगों को नई परिस्थितियों के हिसाब से ढालने के लिए कुल रक़म का महज़ 7.4 प्रतिशत हिस्सा ही दिया जाता है.

इसीलिए जलवायु वित्त के प्रवाह को अलग अलग पैमानों पर कसकर उसका विश्लेषण करने की ज़रूरत है. इससे वित्तीय असमानता की हक़ीक़त और उसके कारण सामने आएंगे और उस जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तैयार किए गए उस वित्तीय ढांचे का भी पर्दाफ़ाश होगा, जो विकासशील देशों में ऊर्जा के एक निष्पक्ष और समावेशी परिवर्तन की राह में रोड़ा बनकर खड़ा है.

जलवायु वित्त के प्रवाह को अलग-अलग करना

स्रोत से ही भेदभाव की शुरुआत: साल 2019 में जहां जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र ने 51 फ़ीसद (321 अरब डॉलर) वार्षिक पूंजी उपलब्ध कराई थी. वहीं निजी क्षेत्र ने इन प्रयासों में 49 प्रतिशत का योगदान दिया था. लेकिन, इसमें ध्यान देने वाली दिलचस्प बात ये है कि सबसे ज़्यादा निजी पूंजी, जलवायु परिवर्तन से निपटने की उन परियोजनाओं में लगी, जो पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, कनाडा और अन्य ओशानिया के देशों में चलाई जा रही हैं. वहीं, बाक़ी देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए चलाई जा रही अपनी परियोजनों के लिए पूंजी प्राथमिक रूप से सार्वजनिक स्रोतों से जुटाई. [22] चूंकि ये माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ज़्यादातर पूंजी निजी क्षेत्र से आएगी, तो निवेश के तौर तरीक़ों में बदलाव लाकर, निजी क्षेत्र को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना अहम हो जाता है कि वो उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में पूंजी लगाएं. हालांकि, निजी क्षेत्र से बिना उचित शर्तों वाले समझौते करके हासिल की गई पूंजी से- कम आमदनी वाले सबसे ग़रीब तबक़े के लोगों के विकास के अवसरों से वंचित रह जाने की आशंका है. [23]  इसके अलावा, अगर हम सार्वजनिक क्षेत्र की पूंजी के भरोसे ज़्यादा रहते हैं, तो इससे विकास के लिए ज़रूरी पूंजी, जलवायु वित्त की तरफ़ चली जाएगी. फिर इससे समुदायों और कमज़ोर तबक़े के लोगों के बीच सीमित संसाधन और पूंजी हासिल करने की होड़ लग जाएगी.

भौगोलिक असमानता: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जुटाई जाने वाली ज़्यादातर पूंजी अपने स्रोत वाले देश में ही सीमित रह जाती है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) द्वारा साल 2018 में जलवायु संबंधी वादे पूरी करने के लिए जुटाए गए 291 अरब डॉलर का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा दोबारा OECD देशों में ही निवेश कर दिया गया था. [24] 2019 में भी जलवायु के क्षेत्र में निवेश की गई तीन चौथाई पूंजी अपने घरेलू क्षेत्र में ही लगा दी गई थी. इसका एक बड़ा हिस्सा एशिया और प्रशांत, पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में निवेश किया गया था. इसकी तुलना में अफ्रीका के सहारा क्षेत्र, दक्षिणी एशिया, अन्य ओशानिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों और मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में केवल एक चौथाई रक़म का निवेश किया गया. [25] 2017-18 में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन को जलवायु परिवर्तन में निवेश की गई जितनी रक़म की जानकारी दी गई, उसका औसतन 20.5 फ़ीसद हिस्सा ही सबसे कम विकसित देशों की ओर गया. वहीं छोटे द्वीपों वाले विकासशील देशों में तो महज़ तीन प्रतिशत पूंजी ही लगाई गई. [26] साफ़ है कि पूंजी के प्रवाह का बड़ा हिस्सा और अपने मौजूदा स्वरूप में उसका जिन देशों की तरफ़ रुख़ है, वो इस अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त व्यवस्था में पैबस्त असमानताओं की मिसाल है.

क़र्ज़ का पूर्वाग्रह: जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जो पूंजी मुहैया कराई जा रही है, उसका ज़्यादातर हिस्सा अभी भी क़र्ज़ के पसंदीदा और प्राथमिक रूप में उपलब्ध कराया जा रहा है. 2019-20 में जलवायु वित्त के लिए जुटाई गई रक़म का लगभग 61 फ़ीसद हिस्सा (384 अरब डॉलर) क़र्ज़ के रूप में था. इसमें से भी 75 प्रतिशत रक़म परियोजना के स्तर वाली बाज़ार की दर पर था और केवल 12 प्रतिशत हिस्सा ही सार्वजनिक संस्थानों द्वारा कम लागत वाली परियोजनाओं के स्तर पर उपलब्ध कराया गया था. इसमें से भी लगभग 31 फ़ीसद रक़म कारोबारी वित्तीय संस्थानों ने बैलेंस शीट के माध्यम से जुटाई थी. वहीं, जलवायु वित्त के कुल हिस्से में से 33 प्रतिशत रक़म इक्विटी में निवेश की थी. जबकि कुल रक़म का महज़ 6 प्रतिशत हिस्सा मदद के रूप में दिया गया था. [27] अब चूंकि बहुत से विकासशील देश पहले ही क़र्ज़ के बोझ तले दबे हैं- महामारी के चलते उनकी मुश्किल और भी बढ़ गई है- ऐसे में क़र्ज़ पर आधारित निवेश बहुत अच्छे विकल्प नहीं हैं, क्योंकि ये अक्सर बेहद सख़्त शर्तों (उदाहरण के लिए, सीमित सेक्टर में प्रदर्शन पर केंद्रित नतीजों के आधार) पर दिए जाते हैं और क़र्ज़ की ये शर्तें हमेशा विकासशील देशों या उनके सबसे कमज़ोर समुदायों की ज़रूरत से मेल खाएं, ये भी ज़रूरी नहीं होता.

ढालने के पहलू की अक्सर अनदेखी होती है: विकसित देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जुटाई और दी जाने वाली पूंजी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए दिया जाता है. जबकि, लोगों को नई परिस्थितियों के हिसाब से ढालने के लिए कुल रक़म का महज़ 7.4 प्रतिशत हिस्सा ही दिया जाता है. इसके अलावा 2.5 फ़ीसद रक़म उन वादों को पूरा करने के लिए दी जाती है, जो दोनों ही काम करते हैं. [28] चूंकि ग्लोबल वार्मिंग कम करने की कोशिशों का फ़ायदा पूरी दुनिया को होता है, इसलिए जलवायु परिवर्तन संबंधी वार्ताओं और पूंजी निवेश के केंद्र में यही प्रयास होते हैं. जबकि नए माहौल में ख़ुद को ढालने के प्रयास चूंकि स्थानीय स्तर पर ही फ़ायदेमंद होते हैं, इसलिए इन पर ज़ोर कम होता है. इसका जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जुटाई जाने वाली पूंजी के स्वरूप पर भी असर पड़ता है. मिसाल के तौर पर असर कम करने वाली कोशिशों को क़र्ज़ के ज़रिए फंडिंग दी जाती है, तो ढालने वाले प्रयासों के लिए लगभग सारी पूंजी सार्वजनिक क्षेत्र के स्रोतों (2019-20 में कुल पूंजी प्रवाह का 14 प्रतिशत हिस्सा) से आती है. [29]  चूंकि कम और मध्यम आमदनी वाले देशों को ही नई परिस्थितियों के हिसाब से ढालने के लिए पूंजी की ज़्यादा दरकार है. ऐसे में बड़े पैमाने पर- और ख़ास तौर से निजी क्षेत्र से पूंजी न मिलने के चलते वो भविष्य में जलवायु परिवर्तन के चलते लगने वाले झटकों से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाते हैं.

G-20 जैसे मंच- ख़ास तौर से इंडोनेशिया, भारत और ब्राज़ील की बनाई हुई तिकड़ी- को जलवायु वित्त के एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहिए और मिलकर G-20 देशों पर दबाव बनाना चाहिए कि वो समावेशी नीतियां बनाएं और उन्हें लागू करें, ताकि विकासशील और कम विकसित देशों को भी बराबरी का मौक़ा मिले और उनके हित भी सधें, जिससे जलवायु परिवर्तन की एक न्यायोचित और समानता वाली व्यवस्था खड़ी हो सके. 

कुछ ख़ास क्षेत्रों को तरज़ीह: 2019 में जलवायु परिवर्तन के मक़सद से जुटाई गई कुल पूंजी का लगभग आधा हिस्सा ऊर्जा और परिवहन के क्षेत्रों को मिला है. [30] 2019-20 में जलवायु परिवर्तन का असर कम करने के लिए निजी क्षेत्र से दी गई लगभग 54 फ़ीसद रक़म नवीनीकरण योग्य ऊर्जा के क्षेत्र में लगाई थी. इसी दौरान, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने के क्षेत्र में लगाई गई पूंजी का 31 प्रतिशत हिस्सा कम कार्बन उत्सर्जन वाले परिवहन क्षेत्र को मिला था. [31] चूंकि, परिवहन और ऊर्जा की परियोजनाएं कारोबारी तौर पर फ़ायदेमंद बन चुकी हैं, तो उनके लिए निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों को आकर्षित करना आसान हो गया है. वहीं कृषि, वन या ज़मीन के इस्तेमाल वाले क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की तरफ़ से पूंजी जुटाना मुश्किल है. चूंकि ज़्यादातर विकासशील देश काफ़ी हद तक कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर हैं, तो इन उद्योगों में निवेश और इनोवेशन से विश्व और स्थानीय स्तर पर सामूहिक उत्सर्जन कम करने पर गहरा असर पड़ेगा.

100 अरब डॉलर के वादे की स्थिति साफ़ नहीं

COP16 समझौते में इस बात पर बहुत ज़ोर दिया गया था कि विकासशील देशों का पक्ष, विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन संबंधी बदलाव में मदद के लिए अर्थपूर्ण सहयोग का वादा करें. साल 2020 तक हर साल 100 अरब डॉलर की नई और अतिरिक्त पूंजी मिलकर जुटाने के मक़सद से ग्रीन क्लाइमेट फंड बनाया गया था. ये पहल जलवायु परिवर्तन संबंधी न्याय के विचार से मेल खाती थी और अपनी शुरुआत के दौर से ही जलवायु परिवर्तन के लिए अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक पूंजी जुटाने और सहयोग की बुनियाद बन गई है. [32]  हालांकि, जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर सभी देशों के सरकारी पैनल (IPCC) की रिपोर्ट (2018) में अनुमान लगाया गया है अगर विकासशील देशों को ज़रूरी परिवर्तन के लक्ष्य हासिल करने हैं, तो उन्हें वर्ष 2020 से 2050 के दौरान- केवल ऊर्जा के क्षेत्र में ही हर साल 600 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी की दरकार होगी. [33] इसीलिए, पहली बात तो ये है कि 100 अरब डॉलर की रक़म बेहद मामूली और ये परिवर्तन के लिए आवश्यक पूंजी की ज़रूरत के लिहाज़ से बहुत अपर्याप्त रक़म है. और दूसरी बात ये कि इस वादे को पूरा करने का टारगेट कुछ और वर्षों के लिए आगे बढ़ा36 दिया गया है, जिससे ग़रीब देशों को हमेशा की तरह गारंटी के बजाय वादों का झुनझुना पकड़ा दिया गया है.

नीतिगत सुझाव और निष्कर्ष

साफ़ है कि जलवायु परिवर्तन के मौजूदा मानकों के लिहाज़ से पूंजी के आवंटन और बंटवारे के मामले में मौजूदा वित्तय व्यवस्था बेकार है. इसके अलावा, इस निवेश के फ़ैसलों में न्यायोचित मदद का पैमाना बिल्कुल भी नहीं लागू किया जाता है. विकास के लक्ष्य हासिल करने के लिए इन्हीं वित्तीय व्यवस्थाओं के भरोसे रहने से जलवायु परिवर्तन से लड़ने में समानता के लक्ष्य हासिल करने की अपनी सीमाएं हैं और इसीलिए, निवेश के लिए एक नया नज़रिया अपनाने की ज़रूरत है, जिससे कार्बन उत्सर्जन के अधिकतम लक्ष्य हासिल करने के लिए ख़ास तौर से विकासशील और ग़रीब देशों को पूंजी के कुशल आवंटन की ज़रूरत है. चूंकि जलवायु परिवर्तन में पूंजी के न्यायोचित बंटवारे से निजी क्षेत्र को अपना कोई ख़ास फ़ायदा नहीं दिखता है, तो इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिससे मौजूदा वित्तीय व्यवस्था का ढांचा नए सिरे से खड़ा किया जा सके. इसके लिए पहले सार्वजनिक क्षेत्र से पूंजी जुटानी होगी, जिससे आगे चलकर निजी क्षेत्र भी कम और मध्यम आमदनी वाले देशों में अपना निवेश बढ़ा सके. क्योंकि इन देशों में उत्सर्जन कम करने की लागत बहुत कम है, और विकासशील देशों के पर्यावरण पर पड़ने वाले अच्छे असर को बहुत कम लागत में बढ़ाया जा सकता है.

इस वक़्त जलवायु परिवर्तन के मौजूदा इको-सिस्टम से जुड़े अलग अलग संगठन अपनी दुनिया में अलग ही का काम करते रहते हैं. इससे पूंजी का पता लगाकर सही जगह पहुंचा पाना और भी मुश्किल होता है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेंट चेंज जैसी वैश्विक संस्था के निर्देशन में एक ग्रीन बैंक स्थापित किया जाना चाहिए. ये बैंक मिलकर उधार देने, जोख़िम कम करने और क़र्ज़ की सुविधा बढ़ाने (जैसे कि गारंटी, पहले लगाई गई पूंजी के नुक़सान और ग्रीन बॉन्ड) 37 वाले उपाय कर सकता है. इससे विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के असर कम करने और नई परिस्थितियों के हिसाब से ढालने वाली परियोजनाओं के लिए निजी और सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों से पूंजी जुटाने के प्रयासों को और मज़बूती दी जा सकती है. ये ग्रीन बैंक पूंजी निवेश के ढांचों में मानक तय करने, सही जानकारी देने में पारदर्शिता लाने और वित्तीय उपायों व स्थानीय संस्थानों में इनोवेशन को बढ़ावा देने में भी मददगार हो सकता है. G-20 जैसे मंच- ख़ास तौर से इंडोनेशिया, भारत और ब्राज़ील की बनाई हुई तिकड़ी- को जलवायु वित्त के एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहिए और मिलकर G-20 देशों पर दबाव बनाना चाहिए कि वो समावेशी नीतियां बनाएं और उन्हें लागू करें, ताकि विकासशील और कम विकसित देशों को भी बराबरी का मौक़ा मिले और उनके हित भी सधें, जिससे जलवायु परिवर्तन की एक न्यायोचित और समानता वाली व्यवस्था खड़ी हो सके. जलवायु परिवर्तन से जुड़ी पूंजी संबंधी वार्ताओं और लेन-देन में न्याय की धारणा को केंद्र स्थापित करने के लिए नए सिरे से प्रयास करने होंगे. तभी हम कार्बन उत्सर्जन कम करने की रफ़्तार को तेज़ कर सकेंगे, और एक बराबरी वाली टिकाऊ विश्व व्यवस्था क़ायम करने के वादे पर खरे उतर सकेंगे.

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Mannat Jaspal

Mannat Jaspal

Mannat Jaspal is an Associate Fellow with the Geoeconomics Studies Programme at ORF. Mannat is deeply interested in exploring matters on sustainability and development – ...

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