Published on Dec 09, 2017 Updated 0 Hours ago

आधार और इसके क्रियान्वयन को लेकर होने वाले विमर्श में भोजन के अधिकार के सवाल को जोरदार तरीके से रखा जाए।

आधार बनाम भोजन का अधिकार
स्त्रोत: पीटीआई

1969 में ब्रिटिश टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक कैदी (द प्रिज़नर) में एक जासूस है जो इस्तीफा दे चुका है और उसे हमेशा छह नम्बर कह कर पुकारा जाता है। उसकी जद्दोजहद अपनी पहचान को नम्बर के बजाय एक ‘आजाद व्यक्ति’ के रूप में स्थापित करने की है। वह उस गांव से कई बार भागने की असफल कोशिशें भी कर चुका है, जहां उसे कैद करके रखा गया है। ऐसा ही कुछ भारतीय नागरिकों के साथ घटित हो रहा है। अचानक हम सभी एक खास नम्बर में तब्दील हो गए हैं और हम सब केवल उस नम्बर के प्रति चिंतित हो गए हैं। हम राज्य द्वारा दिये गए 12 अंकों के एक विशेष नम्बर के जरिये परिभाषित होने लगे हैं, जिसकी पहुंच लगभग हरेक चीज तक हो गई है-चाहे बैंक खाता खोलवाना हो या उसे चालू रखना अथवा मोबाइल फोन कनेक्शन लेना हो या उसे जारी रखना। सभी के उपयोग में आधार को आवश्यक बना दिया गया है। लेकिन इसके नतीजे गरीबों और उम्रदराज लोगों के लिए विध्वंसकारी हो रहे हैं। आधार आधारित बायोमीट्रिक अभिप्रमाणन (एबीबीए),यानी हर तरह की खरीदारी या विनिमय पर सेल मशीन पर इलेक्ट्रानिक प्वाइंट का उपयोग करने की बाध्यता ने तो गरीब परिवारों के लिए सस्ती दरों पर मिलने वाले खाद्यान्न के रास्ते में कई मुश्किलें पैदा कर दी हैं।


आधार आधारित बायोमीट्रिक पहचान (एबीबीए),यानी हर तरह की खरीदारी या विनिमय पर सेल मशीन पर इलेक्ट्रानिक प्वाइंट का उपयोग करने की बाध्यता ने तो गरीब परिवारों के लिए सस्ती दरों पर मिलने वाले खाद्यान्न के रास्ते में कई मुश्किलें पैदा कर दी हैं।


गरीब परिवारों के लिए तो पहली बाधा राशन कार्ड पर परिवार के एक-एक सदस्य का आधार नम्बर दर्ज कराने में(इस प्रक्रिया को ‘सीडिंग’ भी कहा जाता है) आती है। ऐसे में बहुत लोग अपने आधार का विवरण दर्ज नहीं करा पाते हैं। ऐसे में शत-प्रतिशत आधार नम्बर दर्ज कराने के अपने लक्ष्य को पूरा करने की जल्दबाजी में सरकारी अधिकारी कई-कई मामलों में उन नामों को ही ‘फर्जी’ बता कर खारिज कर देते हैं। इस तरह उनके मद में खर्च होने वाला सरकार का करोड़ों रुपया बचाया जा रहा है। यह समझा जाना बेहद जरूरी है कि ऐसे सारे के सारे राशन कार्ड वास्तव में फर्जी नहीं हैं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से गरीबों या हाशिये पर पड़े लोगों को बाहर करके सरकारी धन बचा लेना नहीं माना जा सकता; क्योंकि कई उदाहरणों में यह पाया गया है कि लोग आधार के लिए जरूरी चीजों से वाकिफ नहीं हैं या उनके बारे में बिचौलिये गलत ब्योरा दर्ज कराये होते हैं। यहां इसकी बात की सराहना किया जाना महत्त्वपूर्ण है कि एबीबीए केवल फर्जी नामों की शिनाख्त में कारगर है। लेकिन वह परिणामात्मक धोखाधड़ी रोकने के सक्षम नहीं है। वस्तुओं के परिणामात्मक बिक्री में किये जाने वाले घपले को आधार सीडिंग या एबीबीए के जरिये नहीं रोका जा सकता। यह भी कि बुजुर्ग और दूसरों पर आश्रित अशक्त लोगों के लिए अपने राशन कार्ड पर आधार नम्बर दर्ज कराना दुष्कर कार्य है। अत: इतने बड़े पैमाने किये जाने वाले क्रियान्वयन में थोड़ी-सी संवेदनशीलता अवश्य सुनिश्चित की जानी चाहिए।

यद्यपि गरीब परिवारों के लिए आधार- नम्बर दर्ज करवाना ही एकमात्र बाधा नहीं है। आधार नम्बर दर्ज कराने में बाजी मार ले जाने वाले परिवारों के लिए अगली दिक्कत खरीदारी के वक्त दरपेश होती है। राशन की खरीदारी के समय एबीबीए के उपयोग के लिए बिजली आपूर्ति, सेल मशीन का फंक्शनल प्वाइंट, इंटरनेट कनेक्टिविटी और पहचान के लिए उंगली के निशान का मिलान होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली और इंटरनेट कनेक्टिविटी बड़ी समस्याएं हैं परंतु बायोमीट्रिक पहचान भी बहुधा नहीं मिलती है; क्योंकि प्रणाली (सिस्टम) ठीक हमारी परिकल्पना के मुताबिक ही काम नहीं करती। उसमें गड़बड़ियों की गुंजाइश रहती है। इनके अतिरिक्त, राशन के लाभार्थियों में बहुतेरे लोग उम्रदराज हैं या खुरदुरी अंगुलियों वाले मेहनतकश मजदूर हैं, जिनकी बायोमीट्रिक पहचान ज्यादातर नहीं मिलती। यही वजह है कि बायोमीट्रिक पहचान के बेमेल होने या गड़बड़ होने के मामले काफी मिलते हैं।


यद्यपि गरीब परिवारों के लिए आधार-सीडिंग ही एकमात्र बाधा नहीं है। आधार नम्बर दर्ज कराने में बाजी मार ले जाने वाले परिवारों के लिए अगली दिक्कत खरीदारी के वक्त दरपेश होती है।


लाभार्थियों में खाद्यान्न के और बेहतर तरीके से वितरण तथा जनसाधारणों में कल्याणकारी सेवाओं के समुचित निष्पादन को बढ़ावा देने के लिए आधार की परिकल्पना की गई थी। लेकिन इसने वास्तव में गरीबों एवं बेसहारों को और भी हाशिये पर ढकेलने का काम किया है। हमारे जैसे देश के लिए जहां भोजन का अधिकार पाना कड़ी लड़ाई के बाद हासिल जीत है, वहीं इसकी जटिल प्रक्रिया गरीबों को भोजन पाने तथा जीवन जीने के उनके मौलिक अधिकार से वंचित कर रही है। हालांकि झारखंड की 11 वर्षीया बच्ची के भात के लिए बिलखते-बिलखते हुई मौत समेत भूख से हालिया हुई मौतों के बाद होने वाले विमर्श में भोजन के अधिकार के लिए सरकार को उत्तरदायी ठहराने का प्रयास कम ही हुआ है।

लेकिन वही क्यों? आज के समय और युग में जहां बहुतेरे शिक्षित भारतीयों की इंटरनेट तक आसान पहुंच बन गई है और देश-दुनिया के समाचार भी धड़ल्ले से मिल रहे हैं, तब ये नागरिक अपने देश के गरीबों को भोजन पाने के उनके अधिकार में की जाने वाली कटौती पर सरकार से अपनी जिम्मेदारी निभाने की मांग जोर-शोर से क्यों नहीं करते? इसका उत्तर भारतीय नागरिकों के मन-मस्तिष्क में भोजन के अधिकार को लेकर बनाई गई अवधारणा में है। नाओमी हुसैन, डोल्फ ते लिन्तेलो और अलेक्जेंडर वांजिकू केल्बर्ट भोजन के अधिकार को लेकर सामान्य ज्ञान के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। उनके मुताबिक, भोजन के अधिकार को लेकर लोकप्रिय अवधारणा वैधानिक और मानवाधिकार के ढांचे से बिल्कुल अलग है। इसलिए भोजन के अधिकार को लेकर सरकार को जवाबदेह ठहराये जाने के पहले नागरिकों और राज्य में इसको लेकर समझदारी बनानी आवश्यक है कि भोजन का अधिकार वस्तुत: है क्या। उन विद्वानों ने अपने शोध पत्र में एशिया और अफ्रीका के कुछ चुनिंदा के विकासशील देशों के गरीबों से कुछ सरल सवाल किया है कि भोजन का अधिकार क्या है? और लोगों को यह अधिकार कौन देता है? यह देखना-जानना दिलचस्प है कि केन्या और बांग्लादेश के अधिकतर गरीब लोग कहते हैं कि भोजन का अधिकार भगवान देता है और मौजूदा सरकार उन्हें उनके इस अधिकार से वंचित कर रही है। ऐसे उत्तर हमें अचरजकारी प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन अगर भारत में इसी तरह के अध्ययन कराये जाएं तो कई गरीब-गुरबा, जो राज्य की कल्याणकारी योजनाओं के वास्तविक लाभार्थी हैं, भी लगभग वैसे ही जवाब देंगे। भोजन के अधिकार को लेकर ऐसी अवधारणा उन लोगों की जिंदा वास्तविकताओं को परिलक्षित करती हैं, जो भूख में गुजर-बसर करते हैं न कि भोजन पाने के कानूनन अधिकार दिलाने या सौ फीसद भूख से निजात पाने के लक्ष्य की कोरी सैद्धांतिकी में।


आज के समय और युग में जहां बहुतेरे शिक्षित भारतीयों की इंटरनेट तक आसान पहुंच बन गई है और देश-दुनिया के समाचार भी धड़ल्ले से मिल रहे हैं, तब ये नागरिक अपने देश के गरीबों को भोजन पाने के उनके अधिकार में की जाने वाली कटौती पर सरकार से अपनी जिम्मेदारी निभाने की मांग जोर-शोर से क्यों नहीं करते? इसका उत्तर भारतीय नागरिकों के मन-मस्तिष्क में भोजन के अधिकार को लेकर बनाई गई अवधारणा में है।


हालांकि नाओमी हुसैन, डोल्फ ते लिन्तेलो और अलेक्जेंडर वांजिकू केल्बर्ट ने अपने महत्वपूर्ण अध्ययन में एशिया और अफ्रीका के विकासशील देशों के सरकारी अधिकारियों और शहरी शिक्षित नागरिकों के साक्षात्कार नहीं लिये हैं, लेकिन यह करना महत्वपूर्ण होता क्योंकि भोजन के अधिकार को लेकर उनकी अवधारणा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाले राशन पर निर्भर रहने वाले लोगों की अवधारणा संभवत: बिल्कुल भिन्न होती। शत-प्रतिशत आधार- नंबर दर्ज करवाने का लक्ष्य पाने के अति-उत्साही सरकारी अफसर भोजन के अधिकार की अवधारणा को कैसे व्याख्यायित करते हैं? आधार को क्रियान्वित करने वाली नौकरशाही भोजन पाने के अधिकार की अवधारणा को किस रूप में लेती है? इसकी थाह लगाना भी आवश्यक है कि भारतीय मध्य वर्ग का, जो किसी मसले पर सार्वजनिक राय बनाने में अहम भूमिका निभाता है, भोजन के अधिकार को लेकर नजरिया कैसा है? बेहतर तरीके से जवाबदेही निभाने के लिहाज से मध्य वर्ग की राय जानना महत्त्वपूर्ण है। क्या भारतीय मध्य वर्ग भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली से फर्जी नामों की पहचान कर उन्हें हटा दिये जाने भर से संतुष्ट है या वह अपने बीच के लोगों को भोजन के उनके अधिकार को सुनिश्चित कराने में अपनी सहभागिता को लेकर भी चिंतित है? अगर यह सच है कि मध्य वर्ग को केवल फर्जी नामों को हटा दिये जाने भर से संतोष है, तो फिर सरकार को गरीबों व हाशिये पर पड़े लोगों को भोजन देने के उसके कर्तव्य के प्रति उत्तरदायी बनाना असंभव है।

संक्षेप में, आधार और उसके क्रियान्वयन पर होने वाली बहस में भोजन के अधिकार के सवाल को जोरदार तरीके से रखा जाए। पीडीएस व्यवस्था में दिक्कतें दूर करने में तकनीक की एक प्रभावी भूमिका हो सकती है, लेकिन तकनीक के इस्तेमाल के प्रति अपने अतिशय मोह में हम नागरिकों के भोजन के अधिकार को नहीं तज सकते या उसमें कटौती नहीं कर सकते। अगर यह होता है तो हम सभी वास्तव में नम्बर और अधिकारविहीन नागरिक होकर जाएंगे।

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