पूर्व जेनेरल मैटिस ने भारत और ASEAN के सहयोगियों के साथ विचारों के सहयोग की बात कही लेकिन ये भी साफ़ किया कि वाशिंगटन एक ऐसा हिन्द प्रशांत क्षेत्र चाहता है जहाँ सभी देशों के क्षेत्रीय सीमा की रक्षा हो और समुद्री रास्ते सबके लिए खुले हों।
अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन और अमेरिकी राजनीती के दिग्गजों ने बार बार एक कहावत का इस्तेमाल किया है — “यूनाइटेड वी स्टैंड एंड डिवाइडेड वी फॉल।” यानी हमारी एकता हमें खड़ा करेगी, हमारी फूट हमें गिरा देगी। और ये मुहावरा अमेरिकी सियासत में एक कानून की तरह दर्ज हो गया है। इसी अमेरिकी एकता की याद ११ सितम्बर के हमले के बाद एक घायल अमेरिका के ज़ख्म भरने के लिए इस्तेमाल किया गया।
फिर भी २०१८ में सिंगापुर शहर में इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज के द्वारा आयोजित शांगरी ला डायलाग में ऐसा लगा की अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस इस अमेरिकी एकता की भाषा भूल गए।
मैटिस ने ट्रम्प प्रशासन कि इंडो पसिफ़िक रणनीति को दोहराया जो एक ऐसे इंडो पसिफ़िक क्षेत्र की बात करता है जिस पर किसी का क़ब्ज़ा न हो, जो सबके लिए खुला हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक साझा आदर्श की बात की थी जिस पर एक साझा भविष्य बनाया जा सके। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री मोदी के इसी आह्वाहन के इर्द गिर्द अपने भाषण की शुरुआत की।
मैटिस ने इस बात को ढके छुपे लफ़्ज़ों में नहीं बल्कि साफ़ शब्दों में कहा कि अमेरिका हिन्द प्रशांत क्षेत्र को छोड़ कर जाने वाला नहीं। और ऐसा कह कर अमेरिका ने चीन को चुनौती दी जो लम्बे समय से दक्षिण चीनी सागर में अमेरिका की मौजूदगी को एक खुल्लम खुल्ला दुश्मनी के तौर पर देखता रहा है।
पूर्व जेनेरल मैटिस ने भारत और ASEAN के सहयोगियों के साथ विचारों के सहयोग की बात कही लेकिन ये भी साफ़ किया कि वाशिंगटन एक ऐसा हिन्द प्रशांत क्षेत्र चाहता है जहाँ सभी देशों के क्षेत्रीय सीमा की रक्षा हो और समुद्री रास्ते सबके लिए खुले हों।
NATO के पूर्व कमांडर ने कमरे में मौजूद ड्रैगन यानी चीन को संबोधित करते हुए कहा — “हमें मालूम है कि आने वाले दिनों में चीन के सामने कई चुनौतियाँ होंगी, कई मौके भी आयेंगे, चीन जो भी चुनता है हम उसमें चीन की मदद के लिए तैयार हैं लेकिन शर्त ये है कि ये क़दम इस क्षेत्र में लम्बे समय के लिए शान्ति बनाये रखने में मदद करे और इस क्षेत्र में सभी देशों की खुशहाली के लिए जगह बने।”
समुद्री सुरक्षा के लिए अब वाशिंगटन पूरे हिन्द महासागर पर नज़र रखे हुए है। पहले वाशिंगटन की चिंता सिर्फ दक्षिण चीनी सागर में चीन के फैलाव और बढ़ते मंसूबे की थी। लेकिन अब अमेरिका की इंडो पसिफ़िक रणनीति, इस शब्द का इस्तेमाल पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने किया था, दिखाता है कि भारत और अमेरिका के हिन्द महासागर के पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के साझा मुद्दे हैं।
चीन की स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स नीति से साउथ ब्लाक को पहले ही चिंता है, जिस के तहत चीन ने श्री लंका, मालदीव और पाकिस्तान में अपनी नौसेना के बेस तैयार कर लिए हैं। इस के साथ ही अब समुद्र के अलावा ज़मीन पर भी एक मज़बूत चाइना पाकिस्तान इकनोमिक कोरिडोर इस फ़िक्र को और बढ़ता है।
कुछ लोगों को ये लगता है कि वाशिंगटन अब नई दिल्ली की फ़िक्र को सामने ला रहा है। अमेरिकी रक्षा मंत्री मैटिस ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ तालमेल की बात करते हुए एक मज़बूत भारत अमेरिका गठजोड़ की बात दोहराई। साथ ही इंडो पसिफ़िक क्षेत्र में भारत को एक ज़िम्मेदार लीडर बताया।
वाइट हाउस का सन्देश साफ़ था। वो ASEAN में अपने छोटे सहयोगियों के साथ खड़ा होगा जो लम्बे समय से इस क्षेत्र में चीन की आक्रामक कब्जे वाली नीति को अपनी संप्रभुता पर हमला मानते आये हैं।
मैटिस ने जोर देकर बताया कि अमेरिका की दिलचस्पी इस क्षेत्र के आर्थिक विकास और सुरक्षा में निवेश की है। जिस की वजह से एक सुरक्षित, आज़ाद, हिन्द प्रशांत महासागर क्षेत्र का विकास हो पायेगा जहाँ सभी छोटे बड़े देश एक साझा सिद्धांत के तहत रहेंगे।
इंडो पसिफ़िक क्षेत्र में अमेरिका की नीति के चार मुख्य सिद्धांत हैं। पहला इस समुद्री क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान, दूसरा इस क्षेत्र में तैनात अमेरिकी बेड़ों के बीच भीतरी सहयोग, तीसरा कानून को मज़बूत करना और एक पारदर्शिता लाना,चौथा निजी क्षेत्र के नेतृत्व में इस क्षेत्र का आर्थिक विकास करना।
ट्रम्प के रक्षा मंत्री ने एक सामरिक सहयोग का भरोसा दिलाया है, सामरिक निर्भरता का नहीं। मैटिस ने ASEAN को एक सुर में बात करने को कहा यानी खुले तौर पर तो नहीं लेकिन इशारों में ये ये सन्देश था चीन के कई ऐसे समर्थक देशों के लिए जिनकी नियत डांवाडोल हो सकती है कि वो अब चीन के साथ से पीछे हटें और ASEAN देशों के साथ खड़े हों, ताकि क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत प्रशासन चल सके, जहाँ किसी की दादागिरी ना चले।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शेक्सपियर के जूलियस सीज़र नाटक के किरदार मार्क अन्थोनी के अंदाज़ में सही और ग़लत को सामने रखा। जैसे मार्क अन्थोनी सीज़र के हत्यारों को कोसते हुए भी उनपर सीधा हमला नहीं करते, सीज़र की तारीफ करते कई बार उनका उल्लेख करते और साथ ही ये भी कहते कि सीज़र को मरना ही चाहिए था क्यूंकि षड़यंत्र रचने वाले ऐसा चाहते थे। इस से रोमन ये समझ पाए की असल गुनाहगार कौन है।
मोदी ने गर्व के साथ एक स्वतंत्र और न्यायसंगत इंडो पसिफ़िक क्षेत्र में भारत के नेतृत्व की बात की — “भारत एक स्वतंत्र और निष्पक्ष इंडो पसिफ़िक के नेतृत्व में मदद को तैयार है। इस में एक सहज और दोस्ताना भाषा में एक सन्देश था,चीन और अमेरिका दोनों के लिए कि वो इस क्षेत्र में अपनी भूराजनैतिक असुरक्षा को त्यागें और पारंपरिक तरीके की क्षेत्रीय सुरक्षा पर ध्यान दें।”
विशाल इंडो पसिफ़िक क्षेत्र के लिए भारत का बड़ा विज़न क्या है, भारत इसे लेकर क्या सोचता है इस के लिए मोदी ने SAGAR का इस्तेमाल किया यानी सिक्यूरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल। इस क्षेत्र में सब के लिए सुरक्षा और विकास।
मोदी ने इस में ये भी जोड़ा कि कैसे इंडो पसिफ़िक क्षेत्र की भूराजनीतिक और आर्थिक विकास के पहलु भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी में निहित हैं।
दुनिया की मौजूदा तस्वीर में चीन और अमेरिका व्यापार और सुरक्षा के मामलों में आमने सामने हैं साथ ही कई दुसरे कूटनीतिक मुद्दों पर दोनो के बीच काफी शोर शराबा मचा है। बहरहाल मोदी ने एक ऐसे इंडो पसिफ़िक क्षेत्र के लिए भारत की सोंच साझा की जो सुरक्षित और स्वतंत्र होगा,जहाँ स्थायित्व होगा और आर्थिक तौर पर फलता फूलता होगा।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी ने पूरे वैश्विक समुदाय से अपील की कि सब आपसी टकराव और मतभेद से ऊपर उठ कर एक साथ काम करें। मोदी ने कहा कि ये ASEAN के मॉडल में पहले से ही है जिसमें दुनिया के किसी दुसरे संगठन से ज्यादा संस्कृति, भाषा, धर्म और प्रशासन के मॉडल की विविधता है।
शांगरी ला डायलाग में ये मोदी की पहली मौजूदगी थी। भूराजनैतिक मामलों के बारे में ख़ास ज्ञान रखने वालों की ये पुरानी इच्छा रही है कि भारत इस वैश्विक प्लेटफार्म पर और बड़ा रोल निभाए।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री ने वहीँ से अपनी बातों का सिरा पकड़ा जहाँ दावोस में वर्ल्ड इकनोमिक फोरम में छोड़ा था। विश्व की नई उदारवादी व्यवस्था में भारत की एक मुख्या खिलाडी के तौर पर अहमियत की बात की। ये बात कुछ वैसी ही है जैसा भाव एलिस्सा आयर की किताब Our Time Has Come: How India is making its Place in the World! में है।
एक आक्रामक ट्रम्प प्रशासन जो अपनी अर्थव्यवस्था को बंद कर रहा है और उदारवाद की जगह एक संरक्षणवाद को बढ़ावा दे रहा है वहां मोदी एक ऐसे दौर से सावधान कर रहे हैं जहाँ दो बड़ी शक्तियों में टकराव की स्थिति बनी रहती है। मोदी ने समानता के साथ विकसित होते एशिया की बात की है न कि एक ऐसे एशिया की जहाँ प्रतिस्पर्धा विकास को ही रोक दे। मोदी के इस वाक्य में बीजिंग और वाशिंगटन दोनों के लिए ही सन्देश छुपा है: “हर देश को खुद से ये सवाल पूछना चाहिए, क्या उसके फैसले दुनिया को जोड़ रहे हैं या नए बंटवारे खड़ा कर रहे हैं।”
Quadrilateral Security Dialogue का भारत एक अहम् सदस्य है। क्वाड के नाम से जाना जाने वाला ये संगठन भारत अमेरिका ऑस्ट्रेलिया और जापान की सेनाओं के बीच एक साझा सुरक्षा की पहल है। इंडो पसिफ़िक में चीन की दादागिरी रोकने के लिए इसे अमेरिका की पहल के तौर पर देखा जाता है।
हालाँकि मोदी शांति के दूत के तौर पर सन्देश दे रहे थे, ये जग ज़ाहिर है की भारत समुद्री क्षेत्र में और भारत की सरहदों के आस पास भी चीनी घेरेबंदी से परेशान रहा है। पिछले साल दोनों देशों के बीच दोकलाम पर टकराव की स्थिति बनी रही थी। इसलिए मोदी ने एशिया के इस बड़ी शक्ति को संबोधित करते हुए कहा कि एक स्थाई और खुशहाल इंडो पसिफ़िक क्षेत्र के लिए सहयोग और साझेदारी में ये एक अहम् स्तम्भ है।
चीन और भारत दोनों ही बड़ी आबादी वाले देश है और दोनों के बीच कई स्तर पर सहयोग है जो बहुत अहम है। व्यापर में भारत और चीन ने अच्छा तालमेल किया है और साथ ही सरहद पर शांति बनाये रखने में दोनों देशों ने समझदारी दिखाई है, इशारा २०१७ में दोकलाम टकराव को आपसी रजामंदी से सुलझाने पर था।
मोदी शी की कूटनीति में हाल ही में अप्रैल में वुहान हुई मुलाक़ात एक अहम् मीटिंग थी जो दोनों के लिए फायदेमंद थी। दो दिनों की अनौपचारिक मीटिंग को चेन और भारत के बीच कूटनीतिक रिश्तों के बैलेंस को दोबारा सही करने की कोशिश के तौर पर देखा गया। मोदी ने जैम कर शी की तारीफ की और कहा कि भारत और चीन एक दुसरे के साथ मिल कर आपसी भरोसे के साथ काम करेंगे तो एशिया का भविष्य और शानदार होगा।
फिर भी मोदी ने इशारों में चीन कि विस्तारवादी नीति को सामने भी लाया और कहा अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत सभी देशों को समुन्द्र और आसमान के इस्तेमाल के बराबर मौके मिलने चाहिए।
जहाँ राष्ट्रपति ट्रम्प व्यापर मके क्षेत्र संरक्षणवाद के काल्पनिक और वास्तविक दीवारों की बात कर रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे गहरे समुन्दरों के आर पार भी पुल बनाने की बात, देशों को जोड़ने की बात की।
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Akshobh Giridharadas was a Visiting Fellow based out of Washington DC. A journalist by profession Akshobh Giridharadas was based out of Singapore as a reporter ...
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