Author : Debosmita Sarkar

Occasional PapersPublished on Dec 21, 2023
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पानी से जुड़े मुद्दों पर लैंगिक भेदभाव: भारत के श्रम बाज़ारों में आर्थिक हलचल पैदा करना!

  • Debosmita Sarkar

    यह शोध पत्र पारिवारिक स्तर की घरेलू सेवा गतिविधियों के लिए जेंडर श्रम विभाजन का आकलन करता है, जिसमें से जल प्रबंधन एक प्राथमिक घटक है, पूरे भारत में और जेंडर (लिंग) के विभिन्न आयामों को लेकर जो इस संदर्भ में प्रासंगिक हैं. महिलाओं ने परंपरागत रूप से घरेलू स्तर पर जल प्रबंधन में एक आवश्यक भूमिका निभाई है और वे अपने दिन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवा कार्यों में लगाती हैं. इस तरह के कामों के परिणामस्वरूप अक्सर महिलाओं के पास 'समय की गरीबी' आ जाती है, जिसकी वजह से उनके लिए अवसरों की कमी होती है जो (क) श्रम बल में महिला भागीदारी दर कम होने, (ख) श्रम बाज़ारों के जेंडर आधारित विभाजन और (ग) जेंडर के आधार पर वेतन में अंतर लगातार बने रहने के रूप में सामने आते हैं. भारतीय संदर्भ में, जिन राज्यों में महिलाएं जल प्रबंधन और संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवा गतिविधियों पर अधिक समय खर्च करती हैं, उनमें महिला-पुरुष श्रम बल भागीदारी का अनुपात कम होने की संभावना है. महिलाओं को तुलनात्मक रूप से अधिक मेहनताना देकर अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी को बढ़ावा दिए जाने के विपरीत, भारत के श्रम बाज़ारों में मांग-पक्षीय विभाजन अक्सर महिलाओं को पुरुषों की तुलना में काफ़ी कम आय वाले 'संवेदनशील रोज़गार' क्षेत्रों में हाशिए पर डाल देता है. विभिन्न परिदृश्यों के तहत भारतीय राज्यों में अतिरिक्त आय के अनुमान के आधार पर, यह शोध पत्र घरेलू स्तर के जल प्रबंधन में लैंगिक असमानताओं को दूर करने की आवश्यकता और निहितार्थों को उजागर करता है.

Attribution:

देबोस्मिता सरकार, “पानी से जुड़े मुद्दों पर लैंगिक भेदभाव: भारत के श्रम बाज़ारों में आर्थिक हलचल पैदा करना”, ओआरएफ़ सामयिक पत्र संख्या 423, दिसंबर 2023, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन.

भूमिका

जल या पानी एक मौलिक प्राकृतिक संसाधन है जो सभी जीवित प्राणियों के ज़िंदा रहने के लिए महत्वपूर्ण है. इतिहास के दौरान, इस संसाधन तक पहुंच को लेकर कई संघर्ष हुए हैं क्योंकि इसका वितरण और उपलब्धता भूगोल, जलवायु, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और राजनीति जैसे विभिन्न कारकों से प्रभावित होती है. जैसे कि दुनिया भर के समाज जल प्रबंधन से संबंधित विशिष्ट चुनौतियों से जूझ रहे हैं, कई ने अपनी स्थितियों के आधार पर जल शासन के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए हैं. ज़मीनी और संस्थागत स्तर पर जल प्रबंधन समुदायों के भीतर सामाजिक संबंधों और अंतःक्रियाओं को आकार देने के लिए महत्वपूर्ण है. इसमें जल संसाधनों को इकट्ठा करने और आवंटित करने से लेकर जल उपयोग की देखरेख करने वाली नीतियों और शासन संरचनाओं को विकसित करने तक गतिविधियों की एक व्यापक श्रेणी शामिल है.

विशेष रूप से, विकसित और विकासशील क्षेत्रों के बीच जल प्रबंधन और शासन के तरीके काफ़ी अलग होते हैं; यहां तक ​​कि विकासशील देशों के भीतर, वे स्थानीय परिस्थितियों और परंपराओं के आधार पर काफ़ी भिन्न हो सकते हैं.[i] अपने मूल में, जल प्रबंधन उन क्षेत्रों के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ताने-बाने के साथ गहराई से जुड़ा हुआ होता है, जहां यह होना है. विशिष्ट संदर्भों में, जबकि जल प्रबंधन का विकेंद्रीकरण और/या पानी का निजीकरण प्रभावी हो सकता है, इस तरह के उपक्रम अक्सर परिवार के जीवन सहित संस्कृति, मूल्यों और संस्थानों के मौजूदा प्रतिमानों से निरुद्ध होते हैं.[ii],[iii] उदाहरण के लिए, भारत में पंचायती राज के शुभारंभ के साथ आम संसाधनों जैसे गांव के कुओं पर अधिकार के विकेंद्रीकरण का प्रभाव विभिन्न स्थानीय समुदायों पर अलग-अलग पड़ा है. विशिष्ट मामले के अध्ययनों से पता चला है कि सामुदायिक नेतृत्व वाला जल, सफ़ाई व्यवस्थता और स्वच्छता (वॉश- WASH) का ढांचा मौजूदा सामाजिक असमानताओं से मुक्त नहीं हो सकता है, जिसमें सबसे गरीब और निम्न जाति के घरों की महिलाएं स्वच्छ पानी तक पहुंचने के लिए बड़ी बाधाओं का सामना करती हैं.[iv] विश्व बैंक जल संसाधन प्रबंधन को एक समग्र प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करता है जिसमें मात्रा और गुणवत्ता का ध्यान रखते हुए हुए जल संसाधनों की योजना, विकास और संरक्षण शामिल हैं, जिसका संस्थानों, बुनियादी ढांचे, प्रोत्साहनों और सूचना प्रणालियां साथ देती हैं.[v] महत्वपूर्ण रूप से, समाज अपने जल संसाधनों को संचालित कैसे करती हैं, यह सीधे उनके निवासियों के जीवन पर प्रभाव डालता है. जल प्रबंधन को विभिन्न स्तरों पर देखा जा सकता है: ग्रामीण, शहरी और सीमा पार. ग्रामीण क्षेत्र आमतौर पर देसी ज्ञान में निहित पारंपरिक, सामुदायिक नेतृत्व वाली जल प्रबंधन प्रथाओं पर निर्भर करते हैं. इस बीच, शहरी क्षेत्र अपनी जल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए टैंकों और नल जैसी अधिक उन्नत तकनीकों और बुनियादी ढांचे का उपयोग करते हैं. जल प्रबंधन सीमाओं के पार बेसिनों में साझा संसाधनों के रूप में भी प्रकट होता है जहां एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन और जल कूटनीति सामुदायिक जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं.

हालांकि, स्थान चाहे कोई भी हो, सभी जल प्रबंधन प्रथाओं के केंद्र में एक आम और अक्सर अनदेखी वास्तविकता है - महिलाएं और कम उम्र की लड़कियां घरों के भीतर पानी को उपलब्ध करने और प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं. उनके पास स्थानीय जल संसाधनों, उनके स्थानों और उनकी गुणवत्ता के बारे में गहन समझ है. महिलाएं पीने, नहाने, भोजन तैयार करने और सफ़ाई व्यवस्था सहित विभिन्न घरेलू कार्यों के लिए पानी इकट्ठा करने, भंडारण करने, पुनर्चक्रण और वितरण करने जैसे कार्यों में शामिल हैं. दुनिया भर में, महिलाएं प्रतिदिन जल प्रबंधन से संबंधित गतिविधियों पर 200 मिलियन तक श्रम घंटे खर्च करती हैं.[vi]

जल प्रबंधन में उनकी अनिवार्य भूमिका के बावजूद, महिलाओं को अक्सर जल शासन से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से बाहर रखा जाता है.[vii] इस बहिष्कार के परिणामस्वरूप जल शासन रणनीतियां और नीतियां अप्रभावी बनती हैं. साथ ही, घर के भीतर श्रम का विभाजन और उत्पादन के व्यवस्थापन को जल शासन के लिए ज़िम्मेदार संस्थान ठीक से समझ ही नहीं पाते. नतीजतन, योजना और डिज़ाइन चरणों के दौरान जेंडर गतिशीलता पर विचार करने में विफलता की वजह से अन्य स्थिति में अच्छे इरादों वाली नीतियों की प्रभावशीलता कम हो जाती है. उदाहरण के लिए, एशियाई विकास बैंक के एक अध्ययन में दिखाया गया है कि एशिया और प्रशांत में जेंडर-उत्तरदायी बुनियादी ढांचा विकास संभावित रूप से श्रम के जेंडर विभाजन से निपट सकता है और महिलाओं के समय की गरीबी को काफ़ी कम कर सकता है, जिस समय का उपयोग उत्पादक कार्य के लिए किया जा सकता है जो उनकी उपभोग की गरीबी को कम करता है.[viii]

परिवर्तन की आवश्यकता को पहचानते हुए, 1992 के रियो अर्थ समिट में अपनाए गए डबलिन-रियो सिद्धांतों ने दुनिया भर में जल प्रबंधन में जेंडर-उत्तरदायी हस्तक्षेपों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी महिलाओं के जल प्रबंधन में व्यापक जुड़ाव के प्रभाव को उजागर करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं.[ix] इन प्रयासों में महिलाओं को पानी के पंपों के संचालन और रखरखाव का प्रशिक्षण देना शामिल है, जिससे पहुंच में सुधार होता है और उन्हें पेयजल उपयोगकर्ता संघों के भीतर नेतृत्व की भूमिका लेने के लिए सशक्त बनाया जाता है ताकि संस्थागत स्तर पर जेंडर-उत्तरदायी समाधान तैयार किए जा सकें.

हालांकि जल शासन में एक सर्वमान्य परिभाषा का अभाव है, यह अनिवार्य रूप से इस सवाल का समाधान करने का प्रयास करता है कि पानी तक पहुंच किसे मिलती है, कब मिलती है और जल संसाधनों पर अधिकार किसका है. हाल के वर्षों में, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और वैश्विक पर्यावरण सुविधा जैसे संगठनों ने सरकारों, नागरिक समाज संगठनों, निजी क्षेत्र और शिक्षा जगत के साथ सहयोग किया है ताकि दुनिया भर में जल शासन के प्रयासों में जेंडर मुख्यधारा को बढ़ाया जा सके.[x] प्रभावी जल शासन मज़बूत जेंडर-उत्तरदायी संस्थागत ढांचे पर निर्भर करता है. भारत में, अपर्याप्त संसाधन प्रबंधन, पुराने ढांचे, अपर्याप्त मानव क्षमता और अप्रभावी संस्थागत व्यवस्थाओं सहित कई चुनौतियां ऐसे ढांचे की स्थापना में बाधा डालती हैं. हालांकि, इन मुद्दों के केंद्र में घरेलू स्तर पर जल संसाधन प्रबंधन में जेंडर भूमिकाओं की बहुत ही सीमित समझ और व्यापक आर्थिक परिणामों पर उनके प्रभाव, जैसे क्षमता निर्माण, महिलाओं के श्रम बल की भागीदारी, रोज़गार दर, उनके आर्थिक सशक्तिकरण और समग्र विकास में जेंडर समानता शामिल हैं.

एक जल-दबाव वाले देश के रूप में भारत जल वितरण में महत्वपूर्ण असमानताओं का सामना करता है, जिसके लिए एक व्यापक जल प्रबंधन और संचालन रणनीति की आवश्यकता है.[xi] वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की गति के साथ, मौजूदा जल उपभोग पैटर्न को मिला लें तो, भारत में 2030 तक अनुमानित मांग और प्रयोग करने योग्य उपलब्ध पानी के बीच 40 प्रतिशत का भारी अंतर आने की संभावना है.[xii] इसके अलावा, 2050 तक अनुमानित कृषि उत्पादन में वृद्धि, जो जनसंख्या वृद्धि की वजह से भी होगी, उपलब्ध जल संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर लेगी, जिससे संकट और बढ़ जाएगा.[xiii]

जल प्रबंधन और शासन के संदर्भ में जेंडर समानता महत्वपूर्ण है और 2030 के सतत विकास के एजेंडे का केंद्र बिंदु बनी हुई है. महिलाएं और लड़कियां - घर के स्तर पर पानी और सफ़ाई व्यवस्था के प्राथमिक उपयोगकर्ता, प्रदाता और प्रबंधक के रूप में - अक्सर पानी के संग्रहण और प्रशोधन का बोझ उठाती हैं. यह बोझ उन्हें कई तरह के जोखिमों, जिनमें बीमारी, उत्पीड़न और हिंसा शामिल है, का सामना करवा सकता है, जिससे शिक्षा और आर्थिक अवसरों में पूरी तरह से भाग लेने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है. जेंडर-उत्तरदायी वॉश नीतियों को बढ़ावा देना 2030 के एजेंडे में व्यापक परिवर्तन के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में पहचाना जाता है, जिनमें स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक विकास से संबंधित लक्ष्य शामिल हैं.

वॉश और लैंगिक समानता के बीच तालमेल को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए जल शासन से संबंधित निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा निवेश, जल आवंटन और जल व्यापार पर निर्णय पारंपरिक रूप से जेंडर-ब्लाइंड (जब लिंग के आधार पर किसी तरह के अंतर को न देखा जाए) रहे हैं. घर के स्तर पर प्राथमिक निर्णयकर्ता होने के बावजूद, महिलाएं प्रमुख जल शासन पदों पर कम प्रतिनिधित्व रखती हैं.[xiv] जल प्रबंधन और शासन में जेंडर दृष्टिकोणों का सीमित समावेश टिकाऊ संसाधन विकास और न्यायपूर्ण जल वितरण की दिशा में प्रगति में बाधा डालता है.

जल प्रबंधन में ऐतिहासिक ज्ञान और विशेषज्ञता की भंडार, महिलाएं सक्रिय रूप से निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में शामिल होने पर आर्थिक विकास और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं. वे पानी के संसाधनों को समान रूप से साझा करने की उल्लेखनीय क्षमता का प्रदर्शन करती हैं, ख़ासकर कमी के समय में.[xv] जल उपयोगकर्ता संघों, सार्वजनिक जल प्रबंधन निकायों और जल समितियों जैसे संस्थानों में महिलाओं की उपस्थिति राष्ट्रीय नीति स्तर पर पहले अनदेखे मुद्दों पर ध्यान देने वाली अधिक समावेशी नीतियों के डिज़ाइन की ओर ले जा सकती हैं.

 

2011 में, युगांडा ने अपने जल क्षेत्र के लिए पांच वर्षीय जेंडर रणनीति लागू की, जिससे महिलाओं को समितियों के भीतर निर्णय लेने की प्रमुख भूमिकाओं में रखा गया. इस पहल ने सिर्फ दो वर्षों में युगांडावासियों की सुरक्षित पानी तक पहुंच को 51 प्रतिशत से बढ़ाकर 61 प्रतिशत कर दिया, जो परिवर्तनकारी परिवर्तन की क्षमता को दर्शाता है.[xvi] 2021 में, भारत ने जल संरक्षण और प्रबंधन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर ज़ोर देते हुए और जल शासन में उनके नेतृत्व को बढ़ावा देते हुए महिला जल चैंपियन पहल शुरू की. इस पहल ने ज़मीनी स्तर पर 41 महिलाओं के समर्पित प्रयासों को प्रदर्शित किया, जिन्होंने जल संकटों का सामना किया और जल प्रबंधन की जटिलताओं से निपटा.[xvii]

यह शोध पत्र भारत में लिंग, जल प्रबंधन और शासन की जटिल गतिशीलता का पता लगाता है, जो महिलाओं के श्रम बाज़ारों में आर्थिक भागीदारी के निहितार्थों की खोज करता है. घर के स्तर पर महिलाओं की जल प्रबंधन में भूमिकाओं की जांच करके, शोध पत्र इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में जेंडर समानता को बढ़ावा देने के लिए चुनौतियों, परिणामों और संभावित रणनीतियों पर प्रकाश डालता है.

भारत में जल प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका

भारत में जल प्रबंधन में जेंडर भूमिकाएं सत्ता की गतिशीलता और संसाधनों तक पहुंच के संदर्भ में गहराई से जुड़ी हुई हैं. राजनीतिक अर्थव्यवस्था के कारक संसाधन के वितरण के साथ जुड़े हुए हैं और सामाजिक संबंधों का ताना-बाना यह निर्धारित करता है कि कोई व्यक्ति या समुदाय हक़ के रूप में कितने पानी पर अपने लिए दावा कर सकता है. इस जटिल जाल में, जेंडर संबंध एक महत्वपूर्ण कारक हैं जो इस बात को आकार देते हैं कि पूरे परिदृश्य में जल संसाधनों का प्रबंधन और संचालन कैसे किया जाता है. हालांकि जल प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका को समझने के लिए कई सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक स्थितियों पर विचार करना आवश्यक है जो उनके अनुभवों को प्रभावित करती हैं, यह भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) में श्रम बाज़ारों पर पड़ने वाले निहितार्थों को उजागर करने में भी मदद करता है, जो जेंडर भूमिकाओं की परस्पर क्रिया और महिलाओं की सापेक्ष समय की गरीबी का परिणाम है.

भारत में जेंडर संबंधों ने ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को एक वंचित स्थिति में रखा है. पारंपरिक भूमिकाओं ने महिलाओं के जल प्रबंधन में शामिल होने को घरेलू क्षेत्र तक सीमित कर दिया है, जहां उन्हें घरेलू जल संसाधनों की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया था. उनकी ज़िम्मेदारियों में विभिन्न सफ़ाई कार्यों और घरेलू कामों के लिए पानी को हासिल करना, प्रबंधन और भंडारण शामिल था. इस प्रकार, महिलाओं ने यह सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है कि उनके द्वारा प्राप्त पानी शुद्ध, प्रदूषण मुक्त और आसानी से उपलब्ध हो. कई कारकों ने उनके निर्णयों को प्रभावित किया, जिनमें जलवायु की स्थिति, जल स्रोतों की दूरी और सुविधा शामिल है. हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये प्रथाएं पूरे भारत में या कुछ ख़ास क्षेत्रों में समान नहीं थीं.

उच्च-जाति की महिलाएं अक्सर खुद को जल प्रबंधन के निर्णय लेने में अक्षम पाती थीं. इसके विपरीत, निम्न जाति की महिलाओं को अधिक गतिशीलता के साथ भूमिकाएं निभानी पड़ीं और दूर के और कभी-कभी अविश्वसनीय स्रोतों से पानी लाने का बोझ उठाना पड़ा.[xviii] जेंडर गतिशीलता को आकार देने में उम्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. वृद्ध महिलाएं, यद्यपि पानी लाने के शारीरिक कार्य में कम शामिल होती हैं, अक्सर निर्णयकर्ताओं की भूमिका लेती हैं.[xix] कृषि क्षेत्र में, निम्न जाति की महिलाएं कार्यबल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में ऐतिहासिक भूमि-स्वामित्व पैटर्न और सामाजिक संबंधों से प्रभावित होती हैं.[xx] फिर भी, सिंचाई तक उनकी पहुंच और भागीदारी सीमित रही है, क्योंकि घर के पुरुष प्रमुखों की अनुपस्थिति में ऊंची जाति की महिलाओं के कृषि भूमि का प्रबंधन करने और संबंधित कृषि प्रथाओं पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने की अधिक संभावना होती है.

महिलाओं के जीवन पर पानी की कमी के गहन प्रभाव को दर्शाने के लिए, पश्चिमी भारत के महाराष्ट्र में एक गांव, देंगामल का उदाहरण लें.[xxi] पानी के पाइपलाइन कनेक्शन की अनुपस्थिति निवासियों को अपनी पानी की जरूरतों के लिए 12 घंटे की दूरी पर स्थित भटसा बांध पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करती है. समय खर्च करने वाली यह जल संग्रह प्रक्रिया महिलाओं को घरेलू कामों का सही ढंग से निपटारा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं देती है. समाधान के रूप में, कुछ घरों ने पर्याप्त पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बहुपत्नीत्व का सहारा लिया है. "जल पत्नियां" की भूमिका लेने वाली महिलाएं अक्सर दूसरी या तीसरी पत्नियां होती हैं, जिनका अपने पतियों पर और घर के भीतर कोई प्रभाव नहीं होता है. इससे 'जल पत्नियों' के पास सामाजिक अधिकार नहीं रह जाते और वे केवल जल संग्रह के दैनिक संघर्ष से जूझती हैं.

सामाजिक परिणामों के अलावा, जल प्रबंधन में महिलाओं के व्यापक और असमान जुड़ाव के प्रत्यक्ष आर्थिक निहितार्थ हैं. अवैतनिक काम पर बिताया गया समय, विशेष रूप से घरेलू कामों के संदर्भ में, जिसमें स्वयं और परिवार के सदस्यों के उपयोग के लिए पानी और ईंधन को हासिल करना शामिल है, जेंडर असमानताओं का एक महत्वपूर्ण लेकिन आमतौर पर अनदेखा पहलू बना हुआ है. घरेलू उपयोग के लिए पानी इकट्ठा करने और हासिल करने में सीधे जुड़ाव के अलावा, महिलाओं की जल प्रबंधन में भूमिका में कई अन्य संबंधित गतिविधियां शामिल हैं जो एक संसाधन के रूप में पानी के आवंटन और उपयोग-दक्षता पर निर्भर करती हैं. इनमें अक्सर खाद्य पदार्थों और भोजन का प्रबंधन और तैयारी, परिवार के आवास और आसपास की सफ़ाई और रखरखाव, खेत या घरेलू जानवरों के लिए पानी लाना, कपड़ों और जूतों की देखभाल और रखरखाव और अन्य घरेलू प्रबंधन गतिविधियां शामिल हैं. इन गतिविधियों का बोझ असमान रूप से महिलाओं पर पड़ता है, जो समय की गरीबी की व्यापक समस्या को बढ़ाता है.

भारत के लिए 2019 टाइम यूज़ सर्वे (टीयूएस)[xxii] ऐसे अवैतनिक घरेलू सेवा कार्य की सीमा और भारत में जेंडर समानता पर इसके प्रभावों के बारे में मूल्यवान जानकारी प्रदान करता है. इस प्रकार, यद्यपि टीयूएस के गतिविधि समूह 242 और 325 सीधे जल संग्रह से संबंधित गतिविधियों पर किए गए सर्वेक्षण में शामिल व्यक्तियों द्वारा बिताए गए समय को दर्ज करते हैं, यह दर्शाते हुए कि यह काम देश के कई क्षेत्रों में एक प्रमुख गतिविधि बनी हुई है, यह शोध पत्र भारतीय महिलाओं पर जल प्रबंधन-प्रेरित अवैतनिक घरेलू सेवा गतिविधियों के बोझ की खोज करने के लिए एक अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है. टीयूएस गतिविधि वर्गीकरण के प्रमुख विभाजनों के तहत परिभाषित सभी गतिविधियों पर बिताए गए कुल समय[xxiii] को ध्यान में रखते हुए - "स्वयं के अंतिम उपयोग के लिए माल का उत्पादन" (प्रमुख विभाजन 2) और "घरेलू सदस्यों के लिए अवैतनिक घरेलू सेवाएं" (प्रमुख विभाजन 3) - यह लेखक "जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं" के लिए एक प्रॉक्सी चर परिभाषित करती है (टेबल 1 देखें). हालांकि यहां जिन टीयूएस वर्गीकरणों पर विचार किया गया है उनमें कुछ अन्य गतिविधियां शामिल हैं जो स्पष्ट रूप से घरों की जल प्रबंधन प्रथाओं को नहीं दर्शाती हैं, यह माना जाता है कि इस तरह की गतिविधियों पर बिताया गया समय इस संदर्भ में अन्य प्रासंगिक संकेतकों पर श्रम विभाजन के व्यापक रुझानों का ही अनुसरण करता है और इसलिए अध्ययन की अंतर्दृष्टि में कोई पूर्वाग्रह नहीं लाता है.

टेबल 1: जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवा गतिविधियां

गतिविधि

विवरण

जल संग्रहण

घरेलू उपयोग के लिए स्रोतों से पानी एकत्र करना

जल भंडारण

एकत्रित पानी को सुरक्षित और साफ कंटेनरों में संग्रहित करना

जल प्रशोधन

पानी को उपभोग के लिए सुरक्षित बनाने के लिए उसे शुद्ध करना या फ़िल्टर करना

जल वितरण

विभिन्न घरेलू उपयोगों के लिए जल का आवंटन

जल का उपयोग

भोजन, सफ़ाई, वस्त्रों की देखभाल, पालतू जानवरों की देखभाल और अन्य गतिविधियां

जल संरक्षण

जल की बर्बादी को कम करने के उपाय लागू करना

जल प्रणालियों का रखरखाव

यह सुनिश्चित करना कि घरेलू जल प्रणालियां ठीक से काम कर रही हैं

पानी की गुणवत्ता की निगरानी

यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह उपभोग के लिए सुरक्षित है, पानी की गुणवत्ता की जांच करना

वित्तीय प्रबंधन

बिल और मरम्मत सहित पानी से संबंधित खर्चों के लिए बजट बनाना

स्वच्छता और स़फ़ाई व्यवस्था

जलजनित बीमारियों को रोकने के लिए स्वच्छता और स़फ़ाई व्यवस्था सुनिश्चित करना

स्रोत: लेखक का अपना

यह रिपोर्ट अवैतनिक घरेलू सेवा कार्य की जेंडर प्रकृति का एक वास्तविक लेकिन अप्रिय चित्र प्रस्तुत करती है, यह खुलासा करती है कि भारत में महिलाएं इन गतिविधियों पर काफ़ी समय व्यतीत करती हैं, जिन्हें पूरा करने में औसतन लगभग पांच घंटे लगते हैं.[xxiv] इसके विपरीत, पुरुष इन गतिविधियों पर केवल डेढ़ घंटे ही खर्च करते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में, महिलाएं अवैतनिक घरेलू सेवा कार्यों पर औसतन 301 मिनट प्रतिदिन बिताती हैं, जबकि पुरुष 98 मिनट बिताते हैं. शहरी क्षेत्रों में, महिलाएं अवैतनिक घरेलू सेवा कार्यों पर 293 मिनट व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष केवल 94 मिनट ही देते हैं. चित्र 1 घरेलू सेवा कार्यों में भागीदारी दर में मौजूद स्पष्ट जेंडर असमानताओं को रेखांकित करता है, जबकि चित्र 2 घरों में भाग लेने वाले पुरुष और महिलाओं द्वारा इन कामों पर औसतन प्रतिदिन खर्च किए जाने वाले असमान समय को उजागर करता है.

चित्र 1: जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं में भाग लेने वाले परिवार के सदस्यों का प्रतिशत

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा लिया गया है[xxv]

 

चित्र 2: जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं में भाग लेने वाले परिवार के सदस्यों द्वारा प्रतिदिन बिताए गए औसत मिनट

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा लिया गया है[xxvi] 

जल प्रबंधन में जेंडर भूमिकाओं की जटिलताएं ग्रामीण और शहरी भारत में काफ़ी भिन्न हैं. अनुमान बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर, सभी घरों में बिना परिसर में जल सुविधाओं के जल संग्रह से संबंधित गतिविधियों पर प्रत्येक दिन लगभग 66.6 मिलियन घंटे खर्च किए जाते हैं, जिसमें ग्रामीण परिवार, असमान रूप से, कुल समय का 84 प्रतिशत खर्च करते हैं.[xxvii] इसलिए, भारत के उन क्षेत्रों में जहां ग्रामीण आबादी अपेक्षाकृत अधिक है, जल संसाधन सीमित हैं, और जल क्षेत्र में बुनियादी ढांचा अविकसित है, महिलाओं पर जल प्रबंधन भूमिकाओं का बोझ काफ़ी अधिक होने की संभावना है. यहां तक ​​कि शहरी क्षेत्रों में, जहां लगभग 20 प्रतिशत घरों के परिसर के भीतर पेयजल सुविधाओं तक पहुंच नहीं है, महिलाएं घर के जल प्रबंधन की प्राथमिक ज़िम्मेदारी उठाती हैं.

इसका गहरा आर्थिक प्रभाव पड़ता है. टीयूएस रिपोर्ट से पता चलता है कि महिलाओं की जल आपूर्ति और प्रबंधन में असमान भागीदारी के परिणामस्वरूप महिलाओं के लिए "समय की गरीबी" होती है, क्योंकि उनके पास व्यक्तिगत विकास, अवकाश या आय-सृजन गतिविधियों के लिए काफ़ी कम समय बचता है. यह उनकी वेतनभोगी रोज़गार कर पाने या शैक्षिक अवसरों के लिए प्रयास करने की क्षमता से काफ़ी संबंधित है. पानी की उपलब्धता की  कार्यसूची में असंगति महिलाओं के काम के बोझ को बढ़ा देती है. वे अक्सर भारी मात्रा में पानी उठाती हैं और लंबी दूरी तय करती हैं, जबकि समुदाय के पुरुष पानी इकट्ठा करने के लिए बाइक या साइकिल का उपयोग कर सकते हैं. महिलाओं पर यह अनुचित बोझ शैक्षिक कार्यक्रमों में उनके नामांकन और उपस्थिति पर असर डालता है और अन्य भुगतान किए गए आर्थिक प्रयासों में उनकी भागीदारी को सीमित करता है. पानी तक पहुंच, उसके प्रबंधन और जेंडर के बीच संबंध का सीधा प्रभाव व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर पड़ता है और इसीलिए भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रोज़गार परिदृश्य ऐसा दिखता है. चित्र 3, 15-59 आयु वर्ग के परिवार के सदस्यों के लिए घरेलू सदस्यों के लिए जल प्रबंधन से संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवा गतिविधियों में एक व्यक्ति द्वारा प्रतिदिन खर्च किए गए औसत मिनटों का उपयोग करके भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुरुष और महिलाओं के बीच तुलना प्रदान करता है.

चित्र 3: भारत में जल प्रबंधन से संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर व्यतीत किया गया औसत समय

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा लिया गया है[xxviii]

पानी का प्रबंधन और संबंधित गतिविधियों सहित अवैतनिक घरेलू काम महिलाओं पर एक भारी बोझ डालता है. घरेलू ज़िम्मेदारियों के आवंटन में यह असमानता दीर्घकाल में महिलाओं की सार्थक रोज़गार की क्षमता को प्रभावित करती है और शिक्षा के अवसरों को सीमित करती है. इस दोहरे बोझ के परिणामस्वरूप लड़कियों की स्कूल की उपस्थिति कम हो जाती है और यह महिलाओं को लाभकारी रोज़गार पाने के लिए आवश्यक शिक्षा से वंचित कर देता है.[xxix] कार्यबल में महिलाएं अवैतनिक घरेलू काम पर अतिरिक्त समय लगाती हैं, जिससे एक थकाऊ चक्र बनता है जो उनके कल्याण को गंभीर रूप से प्रभावित करता है.

भारतीय श्रम बाज़ारों और घरेलू आय के लिए मायने

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के संदर्भ में, महिलाओं की समय की गरीबी का भारतीय श्रम बाज़ारों और संबंधित लागत पर प्रभाव पड़ता है. हाल के वर्षों में, भारत में महिला श्रम शक्ति की घटती भागीदारी दर पर काफ़ी ध्यान दिया गया है.[xxx] इस प्रवृत्ति के लिए कई कारकों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है, जिसमें बढ़ती घरेलू आय (आय प्रभाव) और महिलाओं के लिए रोज़गार के अवसरों से संबंधित चुनौतियां (मांग विभाजन) शामिल हैं. हालांकि, नीति मंडलियों में एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखा पहलू महिलाओं पर अवैतनिक घरेलू सेवा कार्यों का बोझ है, जैसे जल प्रबंधन से संबंधित कार्य और महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर को आकार देने में इसकी भूमिका है. हालांकि देखभाल कार्य और देखभाल के बुनियादी ढांचे की आवश्यकता ने व्यक्तियों, व्यवसायों, शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं सहित हितधारकों का कुछ ध्यान आकर्षित किया है, घरेलू सेवा गतिविधियों और व्यक्तियों के श्रम बाज़ारों या आर्थिक भागीदारी को प्रभावित करने में उनकी भूमिका बातचीत में केवल एक अतिरिक्त घटक बनी हुई है. ऐसा इसलिए है क्योंकि घरेलू सेवाओं के विश्लेषण के लिए ऊर्जा, भोजन, पानी और स्वच्छता और आजीविका जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में अधिक सूक्ष्म समझ की भी आवश्यकता होती है.[xxxi]

घरेलू देखभाल कार्य और घरेलू सेवा गतिविधियों के बीच मान्यता और भेद के अलावा, यह भी महत्वपूर्ण है कि संबंधित गतिविधियों की प्रत्येक श्रेणी पर व्यतीत समय में जेंडर असमानताएं भी स्पष्ट रूप से भिन्न हैं. नीचे चित्र 4 दिखाता है कि एक औसत भारतीय पुरुष और एक महिला द्वारा एक दिन में अवैतनिक घरेलू देखभाल कार्यों से संबंधित गतिविधियों पर बिताए गए समय का सापेक्ष हिस्सा, अवैतनिक घरेलू सेवाओं की तुलना में काफ़ी अधिक है. यह घरेलू सेवा गतिविधियों पर विशेष रूप से ध्यान दिए जाने के महत्व को और उजागर करता है; यह अध्ययन मुख्य रूप से जल क्षेत्र और उसके घरेलू स्तर के प्रभावों पर केंद्रित है.

चित्र 4: पूरे भारत में अवैतनिक देखभालऔर  घरेलू सेवाओं पर बिताए गए समय में सापेक्ष अंशधारिता

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा लिया गया है[xxxii]

 

समय की गरीबी और आर्थिक भागीदारी: सैद्धांतिक पृष्ठभूमि और अनुभव जनित साक्ष्य

समय की कमी से जूझने वाली महिलाएं अक्सर काम पर लगा सकने वाले समय को लेकर मजबूर होती हैं और इसका परिणाम उनके नौकरी के अवसरों या आर्थिक रिटर्न के साथ आजीविका गतिविधियों को चुनने पर भी नज़र आता है. चित्र 5 भारतीय श्रम बाज़ार में महिला श्रम भागीदारी दरों के संबंध में महिलाओं के समय-गरीबी-चालित निर्णयों के पीछे के आर्थिक तर्क को समझाने में मदद करता है.

 

चित्र 5: पुरुष और महिलाओं के लिए श्रम आपूर्ति वक्र

स्रोत: लेखक का अपना

किसी भी सामाजिक पूर्वाग्रह को अलग रखते हुए, भारतीय पुरुष और महिलाओं को तर्कसंगत व्यक्तियों के रूप में जाना जाता है जो अपने अवशिष्ट समय का इष्टतम उपयोग करना चाहते हैं (अपनी संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं की ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के बाद) आर्थिक गतिविधियों जैसे कि श्रम (एल) और अन्य कार्य श्रेणी के बीच, जिन्हें यहां अवकाश (एक्स) के रूप में संदर्भित किया जाता है.[xxxiii] इस संदर्भ में दोनों श्रम और अवकाश को सामान्य वस्तुओं के रूप में माना जाता है - जबकि श्रम आय सृजन के माध्यम से आर्थिक कल्याण में योगदान देता है, अवकाश व्यक्ति के सामाजिक कल्याण में योगदान देता है.[xxxiv] चूंकि पुरुष और महिलाएं श्रम और अवकाश में शामिल होकर अपने समग्र कल्याण को अधिकतम करना चाहते हैं, वे अंततः अपने समय को दो वैकल्पिक गतिविधियों के बीच इस तरह से आवंटित करते हैं कि एक दिन में उनके लिए उपलब्ध संपूर्ण अवशिष्ट समय समाप्त हो जाता है.[xxxv] इस प्रकार, व्यक्ति अपने-अपने अवशिष्ट समय बजट (चित्र 5 में पुरुष के लिए और महिलाओं के लिए मज़दूरी दर पर दर्शाए गए) पर अपने समग्र कल्याण को अधिकतम करते हैं. महिलाओं के लिए अवशिष्ट समय बजट पुरुष की तुलना में काफ़ी कम है. ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय महिलाओं का एक बड़ा प्रतिशत अपने समय का काफ़ी बड़ा हिस्सा अवैतनिक घरेलू सेवा कार्यों पर खर्च करता है और इसलिए समय की गरीबी से ग्रस्त है. यहां, महिलाओं की समय की गरीबी को गरीब घरों में आय की सापेक्ष गरीबी के समानार्थी माना जाता है, जहां उपभोग व्यय के लिए कम बजट होता है. तदनुसार, इस संदर्भ में, समान वरीयताओं के बावजूद उपयोगिता वक्रों (महिलाओं के लिए यूएफ़ और पुरुष के लिए यूएम द्वारा दर्शाए गए),के अनुसार महिलाएं अक्सर श्रम और अवकाश दोनों पर कम समय आवंटित करती हैं (पुरुष की तुलना में) और इसलिए इन गतिविधियों से कम कल्याण स्तर प्राप्त करती हैं.

विशुद्ध आर्थिक दृष्टिकोण से अवकाश गतिविधियों पर बिताए गए समय की अवसर लागत का प्रतिनिधित्व यहां दर्शाया गया है. जैसे ही श्रम बाज़ारों में मज़दूरी दर गिरती है, व्यक्तियों के लिए अपने समग्र कल्याण को अधिकतम करने के लिए अवकाश के बजाय श्रम का विकल्प चुनने की संभावना सबसे अधिक होती है. इसलिए, कम मज़दूरी दर पर, अवशिष्ट समय बजट चित्र 5 में पुरुष के लिए और महिलाओं के लिए दर्शाए गए हैं. जैसे-जैसे मज़दूरी दर गिरती है, पुरुष और महिलाओं दोनों के लिए श्रम आपूर्ति में गिरावट आती है. यह इनपुट बाज़ारों में श्रम आपूर्ति के पारंपरिक सिद्धांत के अनुरूप है.[xxxvi] यहां फिर से, महिलाओं के लिए अवशिष्ट समय बजट पुरुष की तुलना में काफ़ी कम है और महिलाएं अक्सर श्रम और अवकाश दोनों गतिविधियों पर कम समय आवंटित करती हैं. चित्र 5 में दूसरा ग्राफ, विभिन्न मज़दूरी दरों पर इनपुट बाज़ारों में श्रम आपूर्ति का प्रतिनिधित्व करता है. किसी भी दी गई मज़दूरी दर पर, महिला श्रम आपूर्ति, जो चिन्हित की गई है, पुरुष की तुलना में कम है (पदावनत की गई है).

संकेत रूप से, महिलाओं द्वारा अपने और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए अवैतनिक घरेलू सेवा गतिविधियों पर बिताया गया समय श्रम बाज़ारों में महिला श्रम शक्ति की भागीदारी दर में गिरावट और पुरुष की तुलना में कम महिला श्रम आपूर्ति की ओर जाता है. चित्र 6 नीचे 15-59 आयु वर्ग की महिलाओं द्वारा जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर प्रतिदिन बिताए गए मिनट दिखाता है और वर्ष 2019 के लिए भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में महिला-से-पुरुष श्रम शक्ति भागीदारी दर का अनुपात दिखाता है.

चित्र 6: भारत में जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर महिलाओं द्वारा बिताया गया समय और श्रम शक्ति भागीदारी (2019)

 

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा लिया गया है[xxxvii]

प्रस्ताव: जिन क्षेत्रों में महिलाएं इन गतिविधियों पर काफ़ी अधिक समय व्यतीत करती हैं, वहां महिला-से-पुरुष श्रम शक्ति भागीदारी दर का अनुपात कम होने की संभावना है.

भारत के संदर्भ में यह सच है. चित्र 7 भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2019 में स्वयं और परिवार के अन्य सदस्यों (महिला, 15-59 वर्ष) के लिए जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर प्रति व्यक्ति औसतन एक दिन में खर्च किए गए मिनटों और महिला-से-पुरुष श्रम शक्ति भागीदारी दर (15-59 वर्ष) के बीच एक साधारण संबंध के परिणामों को दर्शाता है. मध्यम नकारात्मक सहसंबंध के साथ, जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं में महिलाओं के काम में उतार-चढ़ाव भारत भर में श्रम शक्ति भागीदारी अनुपात में 17 प्रतिशत तक उतार-चढ़ाव की वजह बनता है (5 प्रतिशत महत्व स्तर पर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण).

चित्र 7: भारत में महिलाओं द्वारा जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर बिताए गए समय और श्रम शक्ति भागीदारी दर के बीच सह-संबंध

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा का उपयोग करके एटीएटीए 14 पर गणना की गई[xxxviii]

उप-सिद्धांत 1: पुरुष की तुलना में कम महिला श्रम शक्ति भागीदारी के बावजूद रोज़गार दरों में जेंडर समानता सुनिश्चित करने और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए, महिलाओं के श्रम बाज़ारों में प्रवेश को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है कि उन्हें पुरुष की तुलना में उच्च मज़दूरी दर दी जाए.

यहां तक ​​कि भारतीय श्रम बाज़ारों में बिना किसी जेंडर पूर्वाग्रह के समरूप मांग की शर्तों के तहत, यह रोज़गार दरों में जेंडर असमानता में बदल जाएगा, जिसमें पर्याप्त महिलाएं बाज़ार में प्रचलित मज़दूरी पर प्रदान किए गए रोज़गार या आजीविका के अवसर नहीं हासिल कर पाएंगी, जैसा कि चित्र 8 में देखा गया है (श्रम मांग द्वारा दर्शाया गया है). केवल अपेक्षाकृत उच्च मजदूरी दरों के ज़रिये ही, महिलाओं के निर्णय लेने की प्रक्रिया में आय का प्रभाव, उन्हें श्रम बल में प्रवेश के लिए प्रेरित कर सकता है, भले ही यह अवकाश (एक्स) के रूप में चिह्नित अन्य गतिविधियों के लिए आवंटित समय की कीमत पर हो. जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं में असमान भागीदारी के कारण समय की गरीबी भारत में पुरुष की तुलना में महिलाओं की उच्च बेरोज़गारी दर के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है, भले ही देश में महिला रोज़गार योग्यता दर पुरुषों की तुलना में महिलाओं की लगातार अधिक हो.[xxxix]

चित्र 8: भारतीय श्रम बाज़ारों में प्रतिनिधि रोज़गार परिदृश्य (मांग विभाजन के बिना)

स्रोत: लेखक का अपना

इसके अलावा, यह सुझाव देता है कि कार्यरत महिलाओं के लिए औसत वेतन दर पुरुष की तुलना में अधिक होनी चाहिए. हालांकि, वास्तविकता इसके विपरीत है. भारतीय राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं का प्रतिनिधित्व अक्सर अवैतनिक स्वरोज़गार और अस्थायी कामों में अधिक दिखाया जाता है, जो अक्सर कम मज़दूरी और उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में काम करने की अनिश्चित स्थितियों में अधिक होती हैं.[xl] अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ऐसी स्थितियों को "असुरक्षित रोज़गार" के रूप में संदर्भित करता है, जो सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच के बिना और आर्थिक मंदी के प्रति अधिक संवेदनशीलता के साथ अनिश्चित काम को दर्शाता है.[xli] महिलाओं के लिए यह आर्थिक कमजोरी का चक्र बनाए रखता है. "सीमांत कार्य" में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व भुगतान किए गए और अवैतनिक श्रम के विभिन्न रूपों के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है, जो काम के लंबे घंटे, काम के लचीले समय और छाया कार्य की विशेषता है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय श्रम बाज़ारों में जेंडर-प्रेरित वेतन असमानता का एक विषम मूल्य वितरण होता है.[xlii] इसलिए, महिलाओं के रोज़गार के मुद्दे मात्रात्मक और गुणात्मक रूप से उनके पुरुष समकक्षों के मुद्दों से भिन्न हैं. हालांकि समय की गरीबी से कम महिला श्रम शक्ति भागीदारी और कम रोज़गार दरों तक संचरण के चैनल अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, भारत में कार्यरत महिला श्रम बल को कम वेतन वाली नौकरियों में हाशिए पर डालने से यह भी संकेत मिलता है कि भारतीय बाज़ारों में श्रम की मांग में जेंडर-प्रेरित विभाजन भी महत्वपूर्ण है. चित्र 9 नीचे 15-59 वर्ष की आयु की महिलाओं द्वारा जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर प्रतिदिन बिताए गए मिनट और वर्ष 2019 के लिए भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में महिला-से-पुरुष वेतन दर का अनुपात दिखाता है.

चित्र 9: भारत में जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर महिलाओं द्वारा बिताया गया समय और वेतन अनुपात (2019)

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा लिया गया है[xliii]

जैसा कि भारत के मामले में देखा गया, जिन क्षेत्रों में महिलाएं इन कामों पर काफ़ी अधिक समय व्यतीत करती हैं, वहां भी औसतन महिला-से-पुरुष वेतन अनुपात कम होता है. नीचे चित्र 10 भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2019 में नियमित मज़दूरी/वेतनभोगी के बीच महिलाओं द्वारा जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं (महिला, 15-59 वर्ष) पर प्रतिदिन औसत एक व्यक्ति द्वारा बिताए गए मिनटों और महिला-से-पुरुष औसत मज़दूरी/वेतन आय प्राप्त करने के बीच एक साधारण संबंध के परिणाम दिखाता है. मध्यम नकारात्मक सहसंबंध के साथ, भारत में जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं में महिलाओं के जुड़ाव में उतार-चढ़ाव महिला-से-पुरुष वेतन अनुपात में 23 प्रतिशत तक उतार-चढ़ाव की वजह बनता है (1 प्रतिशत महत्व स्तर पर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण).

चित्र 10: भारत में महिलाओं द्वारा जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर बिताए गए समय और वेतन अनुपात के बीच संबंध

स्रोत: लेखक का अपना, भारत समय उपयोग सर्वेक्षण 2019 से डाटा का उपयोग करके एसटीएटीए 14 पर गणना की गई[xliv]

उप-सिद्धांत 2: आपूर्ति-पक्ष विभाजन (जहां महिलाओं के पास तर्कसंगत व्यक्तियों के रूप में अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय निर्णय लेने की भूमिका होती है) से अधिक होने पर श्रम बाज़ार का जेंडर-प्रेरित मांग विभाजन महिलाओं के वेतन को कम करता है और महिला रोज़गार दर को कम करता है.

चित्र 11 दिखाता है कि ऐसी स्थितियों में जहां पुरुष की तुलना में समग्र महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर कम है, जेंडर संदर्भों और वास्तविकताओं के आधार पर एक समान मांग विभाजन (पुरुष श्रमिकों की मांग को दर्शाता है और महिला श्रमिकों की मांग दर्शाता है) से जेंडर के आधार पर वेतन में कोई अंतर नहीं होता है. हालांकि, जब मांग विभाजन श्रम आपूर्ति में असमानताओं से अधिक होता है (फिर भी महिला श्रमिकों की कम मांग द्वारा पदावनत किया जाता है), तो इसके परिणामस्वरूप पुरुष और महिलाओं के बीच एक महत्वपूर्ण वेतन अंतर और भारत में महिला आबादी के लिए कुल मिलाकर कम आय होती है.

चित्र 11: भारतीय श्रम बाज़ारों में प्रतिनिधि रोज़गार परिदृश्य (मांग विभाजन के साथ)

स्रोत: लेखक का अपना

यद्यपि विशिष्ट क्षेत्रों में लचीले या अंशकालिक काम के घंटे और नौकरियों के बढ़ते आकस्मिकिकरण जैसी रणनीतियां महिलाओं को नौकरी बाज़ार में बने रहने की अनुमति देती हैं लेकिन साथ ही वे भेदभावपूर्ण वेतन और जेंडर वेतन अंतर को मज़बूत करती हैं, जिससे महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की स्थिति ख़राब हो जाती है.[xlv],[xlvi] असमान रूप से वितरित अवैतनिक काम, नौकरी बाज़ार की चुनौतियों के साथ मिलकर, रोज़गार और आय में जेंडर असमानताओं को बनाए रखता है. महिला श्रम का कम मूल्यांकन और अमानवीय कामकाजी स्थितियां भी विभिन्न समय और आय गरीबी से जुड़े मार्गों के माध्यम से सतत विकास ढांचे के तहत निहित विभिन्न अन्य लक्ष्यों की प्रगति में लगातार लैंगिक असमानताओं को बढ़ाती हैं.[xlvii],[xlviii] यह सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, विशेषकर एसडीजी-1 (गरीबी मुक्ति), एसडीजी-2 (भूख समाप्त करना), एसडीजी-3 (स्वास्थ्य और कल्याण), एसडीजी-4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा), एसडीजी-5 (जेंडर समानता), एसडीजी-8 (सभ्य काम और आर्थिक विकास), और एसडीजी-10 (असमानता को कम करना).

महिलाओं के निजी समय की कमी के कारण, ‘उनसे छिन जाने वाले मौकों की लागत का अनुमान लगाना’

घरेलू स्तर पर जल प्रबंधन के अतिरिक्त बोझ को कम करना और उसके परिणामस्वरूप आने वाली समय की गरीबी महिलाओं के रोज़गार और आय में योगदान करने वाले कारकों के जटिल जाल पर ध्यान देने की दिशा में प्रगति को तेज़ कर सकती है. निम्नलिखित अभ्यास विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रति व्यक्ति अतिरिक्त वार्षिक आय का अनुमान लगाने का प्रयास करता है, जहां महिलाओं की समय की गरीबी पर दक्षता के विभिन्न स्तरों पर ध्यान दिया जाए जिससे भुगतान किए जाने वाले काम में उनकी भागीदारी को बढ़ाया जा सके. जल प्रबंधन-संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं के बोझ के कारण खोई हुई आय के रूप में महिलाएं जिस अवसर लागत को गंवाती हैं उसका एक संकेत मूल्यांकन प्रदान करने के लिए, यह शोध पत्र अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मज़दूरी दर का उपयोग करके, इन गतिविधियों पर महिलाओं द्वारा बिताए गए दैनिक घंटों में 10 प्रतिशत, 20 प्रतिशत, 30 प्रतिशत, 40 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की कमी के तहत विभिन्न परिदृश्यों में प्रति व्यक्ति वार्षिक अतिरिक्त आय का अनुमान लगाता है. टेबल 2 जल क्षेत्र में घरेलू स्तर पर जेंडर असमानताओं को कम करने के चलते भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अनुमानित अतिरिक्त आय की विभिन्न श्रेणियां प्रदान करती है (हर परिदृश्य के तहत अनुमानों के लिए परिशिष्ट देखें).

टेबल-2: महिलाओं की समय की गरीबी में 10-50 प्रतिशत की कमी के साथ अनुमानित वार्षिक अतिरिक्त आय

राज्य/केंद्र शासित प्रदेश

जल प्रबंधन से संबंधित अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर खर्च किए जाने वाले दैनिक घंटे (महिला, 15-59 वर्ष)

अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी दर (प्रति घंटा, रुपये में)

महिलाओं की समय गरीबी में 10% - 50% की कमी के साथ प्रति व्यक्ति अनुमानित वार्षिक अतिरिक्त आय (रुपये में)

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

4.4

67.25

9,162 - 45,811

आंध्र प्रदेश

4.2

59.35

7,746 - 38,729

अरुपयेणाचल प्रदेश

6.3

31.73

6,204 - 31,020

असम

6.3

44.45

8,668 - 43,341

बिहार

6.3

48.50

9,483 - 47,414

चंडीगढ़

3.8

60.69

7,100 - 35,502

छत्तीसगढ़

5.0

50.38

7,886 - 39,431

दादरा और नगर हवेली

5.7

44.41

7,852 - 39,261

दमन और दीव

5.7

44.41

7,852 - 39,261

दिल्ली

4.9

82.86

12,581 - 62,904

गोवा

4.2

51.88

6,825 - 34,123

गुजरात

5.2

56.50

9,225 - 46,127

हरियाणा

5.0

50.64

7,873 - 39,366

हिमाचल प्रदेश

5.9

54.09

9,956 - 49,781

जम्मू और कश्मीर

5.4

38.88

6,570 - 32,849

झारखंड

6.2

43.25

8,299 - 41,496

कर्नाटक

5.1

69.35

11,071 - 55,355

केरल

4.6

57.77

8,291 - 41,455

लक्षद्वीप

4.8

50.13

7,481 - 37,403

मध्य प्रदेश

5.5

46.39

7,889 - 39,444

महाराष्ट्र

4.9

61.05

9,270 - 46,351

मणिपुर

4.8

32.45

4,809 - 24,047

मेघालय

4.7

47.63

7,033 - 35,166

मिजोरम

4.4

52.50

7,235 - 36,173

नागालैंड

5.3

25.38

4,184 - 20,922

ओडिशा

5.8

43.13

7,826 - 39,132

पुडुचेरी

4.2

33.41

4,361 - 21,806

पंजाब

5.6

49.78

8,620 - 43,098

राजस्थान

5.6

32.38

5,673 - 28,367

सिक्किम

4.7

62.50

9,133 - 45,663

तमिलनाडु

4.0

49.87

6,275 - 31,375

तेलंगाना

3.7

59.46

6,802 - 34,012

त्रिपुरा

5.9

34.99

6,386 - 31,928

उत्तर प्रदेश

5.6

48.50

8,424 - 42,122

उत्तराखंड

6.1

47.55

9,075 - 45,375

पश्चिम बंगाल

5.6

47.04

8,194 - 40,971

टेबल 2 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अतिरिक्त आय सृजन की क्षमता का रूढ़िवादी अनुमान प्रदान करती है. उच्च कौशल स्तरों और प्रचलित बाज़ार मज़दूरी में न्यूनतम वेतन दरों को शामिल करने से उच्च मूल्यांकन हो सकता है. घरेलू सेवाओं में सभी परिवार के सदस्यों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यूनतम जुड़ाव आवश्यक है, इस मान्यता के तहत इन गतिविधियों में महिलाओं के जुड़ाव में संभावित कमी में केवल दक्षता के निचले पांच दशमांशों पर विचार किया जाता है. हालांकि, आगे के सुधारों के लिए इस विश्लेषण को आसानी से विस्तारित किया जा सकता है. घरेलू स्तर पर अतिरिक्त आय सृजन उपभोग व्यय (अल्प और मध्यम अवधि में)[li] और बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करने में अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जिसे अक्सर महिलाओं द्वारा प्राथमिकता दी जाती है.[lii],[liii] बदले में इससे, संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में टिकाऊ आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है.[liv]

हालांकि, घरेलू स्तर पर जल प्रबंधन में जेंडर असमानताओं को दूर करने के लिए, शुरू में, सामाजिक और आर्थिक कारकों की एक समग्र समझ की आवश्यकता होती है जो ऐसी गतिविधियों में महिलाओं के व्यापक जुड़ाव को बनाए रखते हैं और उनके आर्थिक और सामाजिक कल्याण पर इसका प्रभाव पड़ता है. नीतिगत ढांचे को घर के जल क्षेत्र में महिलाओं के अवैतनिक कार्य के बहुआयामी प्रभाव को पहचानना और स्वीकार करना चाहिए और इन विचारों को समग्र ढांचे में जेंडर मुख्यधारा बनाने के लिए रणनीतियां अपनानी चाहिएं. एक लागत-लाभ विश्लेषण जो जल संसाधन प्रबंधन में जेंडर को मुख्यधारा में लाने से संबंधित निवेश और योजना से जुड़ी आर्थिक लागतों की तुलना करता है और दक्षता की अलग-अलग डिग्री के साथ मौजूदा जेंडर असमानताओं को संबोधित करने के ठोस आर्थिक लाभों की तुलना करता है, वह सरकारों, नागरिक समाज संगठन, निजी क्षेत्र, समुदाय और व्यक्तियों  सहित शासन के विभिन्न स्तरों पर हितधारकों को सक्षम कर सकता है और नीतियों, कार्यक्रमों और प्रथाओं के अधिक प्रभावी डिज़ाइन, कार्यान्वयन, निगरानी और मूल्यांकन में और जल क्षेत्र से उत्पन्न होने वाली लैंगिक असमानताओं को कम करने की गुंजाइश बनाता है.

जल संसाधन प्रबंधन को समावेशी बनाना

बाधाओं को दूर करने और जल संसाधन प्रबंधन में जेंडर समावेश को बढ़ावा देने की प्रभावी रणनीतियों में बहुआयामी दृष्टिकोण शामिल होना चाहिए, जो संस्थागत, सामुदायिक और नीतिगत स्तरों पर ध्यान देकर न्यायपूर्ण और टिकाऊ जल शासन सुनिश्चित करे.

·       संस्थागत स्तर पर जल शासन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देना: 2012 तक भारत की जल नीतियां काफ़ी हद तक जेंडर विभाजन को लेकर आंखें मूदें हुई थीं. इसलिए, जेंडर-उत्तरदायी जल संसाधन प्रबंधन प्राप्त करने में एक मूलभूत रणनीति संस्थागत स्तर पर जेंडर मुख्यधारा को सक्षम करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देना है. इसमें जल प्रबंधन समितियों और बोर्डों में शामिल होने के लिए महिलाओं के लिए अवसर पैदा करना, जल नीतियों और परियोजनाओं के नियोजन और कार्यान्वयन में उनकी आवाज़ सुना जाना सुनिश्चित करना और जल क्षेत्र के सार्वजनिक निवेश के लिए जेंडर बजटिंग के लिए जगह बनाना शामिल है.[lv]

·       ज़मीनी स्तर के जल प्रबंधन में निर्णय-कर्ताओं के रूप में महिलाओं को सशक्त बनाना: यह सुनिश्चित करने के लिए कि जेंडर समावेश बोर्डरूम से आगे बढ़े, ज़मीनी स्तर पर महिलाओं को निर्णय-कर्ताओं के रूप में सशक्त बनाना आवश्यक है. स्थानीय जल प्रबंधन पहलों में नेतृत्व की भूमिका लेने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित करना उनके साधनों को बढ़ाता है और मंच पर नए दृष्टिकोण और समाधान लाता है.[lvi]

·       क्षमता निर्माण, जागरूकता और नीतिगत समर्थन: महिलाओं के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए क्षमता निर्माण कार्यक्रम जल प्रबंधन में उनकी प्रभावशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये कार्यक्रम जल-उपयोग दक्षता में प्रशिक्षण प्रदान करते हैं, महिलाओं को उपलब्ध संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सक्षम बनाने के लिए आवश्यक कौशल और ज्ञान के साथ सशक्त करते हैं. महिलाओं के लिए विशेष रूप से तैयार प्रशिक्षण कार्यक्रमों को कम से कम समय या अवसर लागत के साथ कुशल जल प्रबंधन के लिए कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. इन कार्यक्रमों को महिलाओं को अपने जल-संबंधित कार्यों को अनुकूलित करने के लिए आवश्यक उपकरण और ज्ञान से लैस करना चाहिए, जिससे अंततः उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा. साथ ही, समुदाय और नीति मंडलियों में महिलाओं की जल संसाधन प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका और इसके आर्थिक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाया जाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इस क्षेत्र में जेंडर गतिशीलता की व्यापक समझ को बढ़ावा देता है. इन जेंडर असमानताओं को स्वीकार करने वाली और उन पर ध्यान देने वाली सहायक नीतियां इन प्रयासों को और मज़बूत कर सकती हैं.

·       एक जेंडर-उत्तरदायी लेंस से जल प्रबंधन प्रथाओं की निगरानी और मूल्यांकन: प्रगति पर नज़र रखने और जेंडर-जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, निगरानी और मूल्यांकन तंत्र लागू करना अनिवार्य है. जेंडर के दृष्टिकोण से नियमित मूल्यांकन जल प्रबंधन प्रथाओं में सुधार के लिए अंतराल और अवसरों की पहचान कर सकते हैं. महिलाओं की भागीदारी को समझने के लिए जेंडर-विच्छेदित डाटा एकत्रित करना और उसका विश्लेषण करना घरेलू और सामुदायिक स्तर पर जल संसाधन प्रबंधन में महत्वपूर्ण है.[lvii] ऐसा डाटा विशिष्ट चुनौतियों और असमानताओं की पहचान करने में मदद करता है, जिससे लक्षित हस्तक्षेपों का मार्ग प्रशस्त होता है.

·       जेंडर-संतुलित भागीदारी के लिए अनुदान और सब्सिडी: समुदाय-संचालित संगठनों को, जो जल संसाधन प्रबंधन में जेंडर संतुलन को प्राथमिकता देते हैं, उन्हें अनुदान और सब्सिडी के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. ये वित्तीय तंत्र महिलाओं पर बोझ कम करते हैं और समय की गरीबी को कम कर देते हैं, जिससे अधिक न्यायपूर्ण भागीदारी संभव हो पाती है.

·       सार्वजनिक निवेश और प्रगतिशील कर संरचना: घरेलू स्तर पर नियमित जल पहुंच में सुधार लाने का लक्ष्य रखने वाले सार्वजनिक निवेश महत्वपूर्ण हैं. एक प्रगतिशील कर संरचना के साथ मिलकर, जो टिकाऊ जल उपभोग को प्रोत्साहित करता है, ये उपाय उस असंगत ज़िम्मेदारी को कम करते हैं जो अक्सर महिलाओं पर जल संग्रह और प्रबंधन के लिए डाली जाती है. ओडिशा सरकार द्वारा 2020 में शुरू किया गया नल से जल मिशन (मीटर वाला 24x7 पानी का स्रोत) शहरी निवासियों को सुरक्षित और निरंतर पेयजल उपलब्ध कराने का एक उदाहरण है कि कैसे निम्नतम प्रभावी सरकारी स्तर पर सार्वजनिक निवेश को घटकों की जवाबदेही से जोड़ा जा सकता है.[lviii]

·       जल क्षेत्र में महिलाओं के रोज़गार को बढ़ावा देना: जल क्षेत्र में महिलाओं के लिए व्यवहार्य रोज़गार के अवसरों का निर्माण उनके आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ाता है और एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन में जेंडर मुख्यधारा को बढ़ावा देता है. यह दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि महिलाओं का जल संसाधन प्रबंधन में अन्यथा अवैतनिक जुड़ाव को व्यवहार्य रोज़गार या आजीविका के अवसरों में बदल दिया जाता है, जिससे उनके आर्थिक सशक्तिकरण और सतत विकास की संभावना बनती है. जल क्षेत्र में महिला पेशेवर मुख्य रूप से स्टेम (STEM) क्षेत्रों में मौजूदा जेंडर अंतर के कारण दुर्लभ हैं. इस अंतर को खत्म करने से महिलाओं को इस क्षेत्र में प्रवेश करने में सुविधा मिल सकती है, जिससे वे जल उद्यमी जैसी भूमिकाएं निभा सकती हैं.

·       जेंडर-उत्तरदायी परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक-निजी साझेदारी: जेंडर-उत्तरदायी जल प्रबंधन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में सार्वजनिक-निजी साझेदारी का लाभ उठाना महत्वपूर्ण हो सकता है. सरकारी एजेंसियों, निजी क्षेत्र की इकाइयों या नागरिक समाज संगठनों के बीच सहयोग से अभिनव समाधान, बढ़ा हुआ निवेश, परियोजना डिज़ाइन और कार्यान्वयन में स्थानीयकरण और परियोजना की स्थिरता बढ़ सकती है.[lix]

यहां बताई गई रणनीतियां जल संसाधन प्रबंधन में बाधाओं को दूर करने और जेंडर समावेश को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं. इन उपायों को लागू करने से भारत की जल प्रबंधन प्रथाओं में अंशधारिता, स्थिरता और लचीलेपन को बढ़ावा दिया जा सकता है, जबकि यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि देश में महिलाएं अब दोहरा बोझ नहीं उठाती हैं और अपनी व्यापक जल प्रबंधन ज़िम्मेदारियों की वजह से महत्वपूर्ण अवसरों को गंवाती नहीं हैं.

निष्कर्ष

भारत में जल प्रबंधन में जेंडर भूमिकाओं और व्यापक आर्थिक परिदृश्य के बीच जटिल अंतर्क्रिया निर्विवाद है. जल प्रबंधन में जेंडर असंतुलन भारतीय श्रम बाज़ार पर श्रृंखलाबद्ध प्रभाव डालते हैं. समय की गरीबी से जूझ रही महिलाएं, जो घरेलू ज़िम्मेदारियों और रोज़गार के बोझ से दबी होती हैं, अक्सर श्रम बाज़ार में सीमित क्षमता में भाग लेती हैं. इसके परिणामस्वरूप समान वेतन दरों पर भी पुरुष की तुलना में महिला श्रम आपूर्ति कम हो जाती है, जिससे निश्चित रूप से महिलाओं की रोज़गार दर कम हो जाती है. इसके अलावा, भारतीय श्रम बाज़ार में जेंडर आधारित वेतन अंतर महिलाओं की समय की गरीबी के आर्थिक परिणामों को और उजागर करता है. यह बताता है कि महिलाओं की पूर्णकालिक रोज़गार के लिए सीमित उपलब्धता से मांग विभाजन होता है, जिससे नियोक्ता महिलाओं को कम वेतन देते हैं. यह वेतन अंतर भारतीय परिदृश्य में जेंडर-आधारित असमानताओं को और बढ़ाता है. संक्षेप में, जल प्रबंधन में जेंडर असमानताओं को दूर करना सामाजिक समानता का मामला है और एक आर्थिक अनिवार्यता है. इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने से जल परियोजनाओं की दक्षता में वृद्धि हो सकती है, अंततः आर्थिक विकास में योगदान हो सकता है और समय की गरीबी को कम किया जा सकता है, जो श्रम बाज़ार में जेंडर समानता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. इन मुद्दों को उनके मूल में पहचानना और उन पर ध्यान देना भारत को न्यायपूर्ण और आर्थिक रूप से जीवंत बनाने के लिए आवश्यक है.

इसके अलावा, जब तक जल प्रबंधन में प्रणालीगत चुनौतियां और जेंडर असंतुलन बने रहते हैं, ये महिलाओं की आर्थिक क्षमताओं के पूरे इस्तेमाल को रोकते हैं, जल पेशेवर महिलाओं और इस क्षेत्र में शासन के उच्च स्तरों पर प्रतिनिधित्व- सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों, सीमित शैक्षिक अवसरों और सामाजिक मानदंडों की वजह से आकारबद्ध- की कमी नीतिगत ढांचे में जेंडर मुख्यधारा की एक महत्वपूर्ण बाधा बना हुआ है. जल शासन में महिलाओं को सशक्त बनाना केवल सामाजिक या आर्थिक न्याय का मामला नहीं है; यह जल परियोजनाओं की दक्षता और प्रभावशीलता को सुधारने की दिशा में एक रणनीतिक कदम हो सकता है. घरेलू जल प्रबंधन में उनका गहरा ज्ञान और महत्वपूर्ण भूमिका उन्हें समुदाय-आधारित पहलों और जल शासन के विभिन्न स्तरों पर अपरिहार्य हितधारक बनाती है. अटल भूजल योजना और उत्तराखंड ग्रामीण जल आपूर्ति और स्वच्छता परियोजना जैसे कार्यक्रमों की सफलता जल प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी के परिवर्तनकारी प्रभाव को रेखांकित करती है और भारत के जल क्षेत्र में जेंडर मुख्यधारा और जेंडर प्रतिनिधित्व की वकालत करने के लिए एक मज़बूत मामला बनाती है.[lx]

परिशिष्ट: महिलाओं की समय की गरीबी में कमी के विभिन्न परिदृश्यों के तहत प्रति व्यक्ति अनुमानित अतिरिक्त आय

राज्य/केंद्र शासित प्रदेश समय की गरीबी में 10% कमी के साथ उत्पन्न प्रति व्यक्ति अतिरिक्त आय (रुपये में) समय की गरीबी में 20% कमी के साथ उत्पन्न प्रति व्यक्ति अतिरिक्त आय (रुपये में) समय की गरीबी में 30% कमी के साथ उत्पन्न प्रति व्यक्ति अतिरिक्त आय (रुपये में) समय की गरीबी में 40% कमी के साथ उत्पन्न प्रति व्यक्ति अतिरिक्त आय (रुपये में) समय की गरीबी में 50% कमी के साथ उत्पन्न प्रति व्यक्ति अतिरिक्त आय (रुपये में)
अंडमान व नोकोबार द्वीप समूह 9162 18324 27486 36649 45811
आंध्र प्रदेश 7746 15492 23238 30983 38729
अरुपयेणाचल प्रदेश 6204 12408 18612 24816 31020
असम 8668 17336 26005 34673 43341
बिहार 9483 18965 28448 37931 47414
चंडीगढ़ 7100 14201 21301 28402 35502
छत्तीसगढ 7886 15772 23659 31545 39431
दादरा और नगर हवेली 7852 15704 23556 31409 39261
दमन और दीव 7852 15704 23556 31409 39261
दिल्ली 12581 25162 37742 50323 62904
गोवा 6825 13649 20474 27299 34123
गुजरात 9225 18451 27676 36901 46127
हरयाणा 7873 15747 23620 31493 39366
हिमाचल प्रदेश 9956 19913 29869 39825 49781
जम्मू और कश्मीर 6570 13140 19710 26280 32849
झारखंड 8299 16598 24897 33196 41496
कर्नाटक 11071 22142 33213 44284 55355
केरल 8291 16582 24873 33164 41455
लक्षद्वीप 7481 14961 22442 29923 37403
मध्य प्रदेश 7889 15778 23667 31556 39444
महाराष्ट्र 9270 18541 27811 37081 46351
मणिपुर 4809 9619 14428 19238 24047
मेघालय 7033 14067 21100 28133 35166
मिजोरम 7235 14469 21704 28938 36173
नगालैंड 4184 8369 12553 16738 20922
ओडिशा 7826 15653 23479 31305 39132
पुदुचेरी 4361 8722 13083 17445 21806
पंजाब 8620 17239 25859 34478 43098
राजस्थान 5673 11347 17020 22694 28367
सिक्किम 9133 18265 27398 36530 45663
तमिलनाडु 6275 12550 18825 25100 31375
तेलंगाना 6802 13605 20407 27210 34012
त्रिपुरा 6386 12771 19157 25542 31928
उत्तर प्रदेश 8424 16849 25273 33697 42122
उत्तराखंड 9075 18150 27225 36300 45375
पश्चिम बंगाल 8194 16388 24582 32776 40971

स्रोतः लेखिका की अपनी गणना

Endnotes

[i] A.K. Biswas and C. Tortajada, "Changing Global Water Management Landscape," in Water Management in 2020 and Beyond, Water Resources Development and Management, eds. A.K. Biswas, C. Tortajada, and R. Izquierdo, Berlin, Heidelberg: Springer, 2009, https://doi.org/10.1007/978-3-540-89346-2_1.

 

[ii] Seema Kulkarni, “Women and Decentralised Water Governance: Issues, Challenges and the Way Forward,” Economic & Political Weekly, 46 (18): 64–72, April 2011,

https://genderandsecurity.org/projects-resources/research/women-and-decentralized-water-governance-issues-challenges-and-way.

 

[iii] Maithreyi Krishnaraj, “Women and Water: Issues of Gender, Caste, Class and Institutions,” Economic & Political Weekly, 46 (18): 64–72, April 2011, https://www.indiawaterportal.org/articles/women-and-water-collection-papers-economic-and-political-weekly-volume-xlvi-number-18-0.

 

[iv] Maithreyi Krishnaraj, “Women and Water: Issues of Gender, Caste, Class and Institutions”

 

[v] World Bank, "Water Resources Management,"  https://www.worldbank.org/en/topic/waterresourcesmanagement#2.

 

[vi] National Water Mission, "Women Water Compendium," July 2021, https://nwm.gov.in/sites/default/files/Women%20Water%20Compendium_July%2021.pdf.

 

[vii] Varsha Khandker, Vasant P. Gandhi, and Nicky Johnson, "Gender Perspective in Water Management: The Involvement of Women in Participatory Water Institutions of Eastern India," Water 12, no. 1 (2020): 196, https://doi.org/10.3390/w12010196.

[viii] Asian Development Bank, Balancing the Burden? Desk Review of Women’s Time Poverty and Infrastructure in Asia and the Pacific, December 2015, https://www.adb.org/publications/balancing-burden-womens-time-poverty-and-infrastructure.

 

[ix] Food and Agriculture Organization of the United Nations, "Chapter 6: Gender and Food Security: Agriculture," https://www.fao.org/3/x0171e/x0171e06.htm#P424_56349.

 

[x] Sharon B. Medgal, Susanna Eden and Eylon Shamir, “Water Governance, Stakeholder Engagement, and Sustainable Water Resources Management,” Water 2017, no. 3 (2017), https://doi.org/10.3390/w9030190.

 

[xi] Malin Falkenmark, "The Massive Water Scarcity now Threatening Africa: Why isn't it Being Addressed," Ambio 18, no. 2 (1989): 112-118, https://www.jstor.org/stable/4313541.

 

[xii] RiteWater, "Water Management in Rural India: Scope, Challenges, Solutions," https://www.ritewater.in/water-management-in-rural-india-scope-challenges-solutions/.

 

[xiii] RiteWater, "Water Management in Rural India: Scope, Challenges, Solutions”

 

[xiv] UN Women, "Issue Brief: Gender-Responsive Water and Sanitation Systems," https://www.unwomen.org/en/digital-library/publications/2018/6/issue-brief-gender-responsive-water-and-sanitation-systems.

 

[xv] Els Lecoutere, Ben D'Exelle and Bjorn Van Campenhout, “Sharing Common Resources in Patriarchal and Status-Based Societies: Evidence from Tanzania,” Feminist Economics, no. 3 (2015), https://doi.org/10.1080/13545701.2015.1024274

 

[xvi] World Resources Institute, "Women Are Secret Weapon for Better Water Management," https://www.wri.org/insights/women-are-secret-weapon-better-water-management.

 

[xvii] United Nations Development Programme, "Women Water Champions," https://www.undp.org/india/publications/women-water-champions.

 

[xviii] Nandita Singh, “The Changing Role of Women in Water Management: Myths and Realities,” Wagadu: a Journal of Transnational Women's & Gender Studies, no. 3 (2006), https://sh.diva-portal.org/smash/record.jsf?pid=diva2%3A1628434&dswid=-7684

 

[xix] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019," 2019, https://www.mospi.gov.in/sites/default/files/publication_reports/Report_TUS_2019_0.pdf?download=1.

 

[xx] Itishree Pattnaik and Kuntala Lahiri-Dutt, “What determines women's agricultural participation? A comparative study of landholding households in rural India,” Journal of Rural Studies, no. 76 (2020), https://www.sciencedirect.com/science/article/abs/pii/S0743016718305631

 

[xxi] Shweta Sengar, “'Water Wives': How Lack Of Water In This Maharashtra Village Led To Polygamy,” India Times, April 27, 2022, https://www.indiatimes.com/news/india/water-wives-how-lack-of-water-in-this-maharashtra-village-led-to-polygamy-568090.html.

 

[xxii] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxiii] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxiv] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxv] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxvi] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxvii] Puja Das, "Universal Tap Water Coverage Could Save 400,000 Lives, $101 Bn in Costs for India: WHO," LiveMint, June 10, 2023, https://www.livemint.com/news/india/universal-tap-water-coverage-could-save-400-000-lives-101-bn-in-costs-for-india-who-11686378183020.html.

 

[xxviii] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxix] Lan Mercado, Mohammad Naciri, and Yamini Mishra, "Women’s Unpaid and Underpaid Work in Times of COVID-19," Amnesty International, June 01, 2020, https://www.amnesty.org/en/latest/campaigns/2020/06/womens-unpaid-and-underpaid-work-in-times-of-covid19/.

 

[xxx] Syamantak Chattopadhyay and Subhanil Chowdhury, "Female Labour Force Participation in India: An Empirical Study," The Indian Journal of Labour Economics, volume 65, pages59–83 (2022), https://doi.org/10.1007/s41027-022-00362-0.

 

[xxxi] Pushpendra Singh and Falguni Pattanaik, "Unfolding unpaid domestic work in India: women’s constraints, choices, and career," Palgrave Communications, volume 6, Article number: 111 (2020), https://doi.org/10.1057/s41599-020-0488-2.

 

[xxxii] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxxiii] Gary S. Becker, "A Theory of the Allocation of Time," The Economic Journal, 75, no. 299 (1965): 493–517, https://doi.org/10.2307/2228949.

 

[xxxiv] Dan Cui, Xiang Wei, Dianting Wu, Nana Cui, and Peter Nijkamp, "Leisure time and labor productivity: a new economic view rooted from sociological perspective," Economics: The Open-Access, Open-Assessment E-Journal, 13 (2019-36): 1–24, http://dx.doi.org/10.5018/economics-ejournal.ja.2019-36.

 

[xxxv] Gary S. Becker, “A Theory of the Allocation of Time”

 

[xxxvi] Gary S. Becker, “A Theory of the Allocation of Time”

 

[xxxvii] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxxviii] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xxxix] "Indian Women Are More Employable Than Men; Guess How Many Are in the Workforce," Economic Times, December 29, 2022, https://economictimes.indiatimes.com/jobs/indian-women-are-more-employable-than-men-guess-how-many-are-in-the-workforce/articleshow/96596276.cms.

 

[xl] Steven Kapsos, Andrea Silberman, and Evangelia Bourmpoula, "Why is Female Labour Force Participation Declining Sharply in India?" International Labour Office ILO Research Paper No. 10 (August 2014), https://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---dgreports/---stat/documents/publication/wcms_631497.pdf.

 

[xli] Steven Kapsos, Andrea Silberman, and Evangelia Bourmpoula, "Why is Female Labour Force Participation Declining Sharply in India?"

 

[xlii] Praveen Jha, Avinash Kumar and Yamini Mishra, Labouring women: issues and challenges in contemporary India, Hyderabad Orient BlackSwan (2020), https://vslopac.iima.ac.in/cgi-bin/koha/opac-detail.pl?biblionumber=216408

 

[xliii] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xliv] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[xlv] Claudia Goldin, "Hours Flexibility and the Gender Gap in Pay," Center for American Progress, April 15, 2015, https://www.americanprogress.org/article/hours-flexibility-and-the-gender-gap-in-pay-2/.

 

[xlvi] Maria E Canon and  Limor Golan, "Gender Pay Gap May Be Linked to Flexible and Irregular Hours," Federal Reserve Bank of St. Louis, July 14, 2016, https://www.stlouisfed.org/publications/regional-economist/july-2016/gender-pay-gap-may-be-linked-to-flexible-and-irregular-hours.

 

[xlvii] UN Women, Progress on the Sustainable Development Goals: The Gender Snapshot 2021, United Nations (2021), https://www.unwomen.org/en/digital-library/publications/2021/09/progress-on-the-sustainable-development-goals-the-gender-snapshot-2021.

 

[xlviii] International Labour Organization, "Progress and Challenges in Closing the Gender Pay Gap and other Gender-based Gaps within the 2030 Agenda for Sustainable Development Framework," 19th American Regional Meeting, October 2018, https://www.ilo.org/global/docs/WCMS_645428/lang--en/index.htm.

 

[xlix] Ministry of Statistics and Programme Implementation, "Report on Time Use Survey 2019”

 

[l] https://www.simpliance.in/minimum-wages

[li] Perez-Montiel, Jose, and Carles Manera Erbina, "Investment Sustained by Consumption: A Linear and Nonlinear Time Series Analysis," Sustainability, 11, no. 16 (2019): 4381, https://doi.org/10.3390/su11164381

 

[lii] Gary S. Becker and Nigel Tomes, "Human capital and the rise and fall of families," Journal of labor economics, 4, no. 3, Part 2 (1986): S1-S39, https://www.journals.uchicago.edu/doi/abs/10.1086/298118

 

[liii] “Investing in Women and Girls”, The Organisation for Economic Co-operation and Development, https://www.oecd.org/dac/gender-development/investinginwomenandgirls.htm

 

[liv] Perez-Montiel, Jose, and Carles Manera Erbina, "Investment Sustained by Consumption: A Linear and Nonlinear Time Series Analysis"

 

[lv] Imrana Jalal, "Women, Water, and Leadership," ADB Briefs No. 24, Asian Development Bank, December 2014, https://www.adb.org/publications/women-water-and-leadership.

 

[lvi] "Promoting Women's Participation in Water Resource Management in Central Asia," World Bank, January 20, 2021, https://www.worldbank.org/en/news/feature/2021/01/20/promoting-womens-participation-in-water-resource-management-in-central-asia.

 

[lvii] Joni Seager, "Sex-disaggregated indicators for water assessment monitoring and reporting," Technical Paper, Gender and Water Series, WWAP, UNESCO, 2015, https://unesdoc.unesco.org/ark:/48223/pf0000234082.locale=en.

 

[lviii] Government of Odisha, “Drink from Tap Mission: Pure for Sure,” Water Corporation of Odisha, August 2019, https://urban.odisha.gov.in/sites/default/files/2023-03/Drink-From-Tap-Mission.pdf.

 

[lix] World Economic Forum, "Strengthening Public-Private Cooperation with Civil Society," White Paper, January 2023, https://www3.weforum.org/docs/WEF_Strengthening_Public_Private_Cooperation_with_Civil_Society_2022.pdf.

 

[lx] “How is India addressing its water needs?,” World Bank Briefs, February 14, 2023, World Bank, https://www.worldbank.org/en/country/india/brief/world-water-day-2022-how-india-is-addressing-its-water-needs

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Author

Debosmita Sarkar

Debosmita Sarkar

Debosmita Sarkar is a Junior Fellow with the SDGs and Inclusive Growth programme at the Centre for New Economic Diplomacy at Observer Research Foundation, India. ...

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