Author : Sohini Bose

Occasional PapersPublished on Jan 24, 2024
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बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत से जुड़े नज़रिये में निरंतरता और परिवर्तन: चुनाव के बाद उपजे हालातों का विस्तृत विश्लेषण

  • Sohini Bose

    बांग्लादेश का इंडो-पैसिफिक आउटलुक यानी हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण अप्रैल 2023 में जारी किया गया था. बांग्लादेश के इस दृष्टिकोण में जहां एक तरफ हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बारे में उसका आकलन और पूर्वानुमान दिखाई देता है, वहीं राजनीतिक तौर पर गुटनिरपेक्षता यानी राजनीतिक तटस्थता और आर्थिक प्रगति को लेकर उसकी प्रतिबद्धता भी ज़ाहिर होती है. बांग्लादेश का क़ानून का शासन बरक़रार रखने का संकल्प और क्षेत्रीय स्थिरता क़ायम रखने के लिए उसकी इच्छाशक्ति न केवल उसे पड़ोसी देशों के मध्य, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के ताक़तवर देशों के बीच एक सहायक, अनुकूल और फायदेमंद भागीदार के रूप में स्थापित करती है. एक तरफ बांग्लादेश के चीन, जापान और अमेरिका के साथ प्रगाढ़ संबंध हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत के साथ भी उसके विशिष्ट संबंध हैं, जो पारस्परिक लाभ पर आधारित हैं. हालांकि, 7 जनवरी को होने वाले आम चुनाव के बाद बांग्लादेश के जो चुनाव परिणाम सामने आएंगे, संभावना जताई गई है कि उसके बाद ढाका पर सत्तासीन सरकार के कारण पूरे क्षेत्र में अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है. इसकी वजह यह हो सकती है कि नई सरकार अनिश्चित परिस्थितियों में अपनी पहले से चली आ रही नीतियों और साझेदारियों को जारी रखने में असहज हो सकती है. इस पेपर में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बांग्लादेश की मौज़ूदा विदेश नीति की प्राथमिकताओं का विस्तृत आकलन किया गया है, साथ ही सरकार में संभावित बदलाव के प्रभाव का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है.

Attribution:

एट्रब्यूशन:  सोहिनी बोस, बांग्लादेश के इंडो-पैसिफिक आउटलुक में निरंतरता और बदलाव: चुनाव के बाद उपजे हालातों का विस्तृत विश्लेषणओआरएफ़ समसामयिक पेपर संख्या 424, जनवरी 2024, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन.

प्रस्तावना

बांग्लादेश में 7 जनवरी 2024 को संसदीय चुनाव होने हैं और इन चुनावों के पहले ही इसके नतीज़ों का देश की घरेलू राजनीति पड़ने वाले प्रभाव एवं दुनिया के दूसरे देशों के साथ बांग्लादेश के संबंधों पर पड़ने वाले असर को लेकर चर्चा-परिचर्चा का दौर चल रहा है. वर्तमान में बांग्लादेश सरकार का नेतृत्व अवामी लीग पार्टी की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना कर रही हैं. शेख़ हसीना वर्ष 2008, 2014 और 2018 में लगातार तीन बार जीत दर्ज़ कर चुकी हैं और लगातार तीन बार से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी हुई हैं.[1] शेख़ हसीना के पिता बंगबंधु शेख़ मुजीबुर रहमान ने बेहद चर्चित बात कही थी, 'सभी के साथ मित्रता, किसी के प्रति द्वेष नहीं.,[2] शेख़ हसीना ने अपने पिता की इस बात पर अक्षरश: अमल किया है और इसीलिए उनकी सरकार ने विदेशी निवेश एवं विकासात्मक सहयोग के ज़रिये बांग्लादेश के विकास पर ध्यान केंद्रित किया है. इसी का परिणाम है कि वर्ष 2021 में सभी दक्षिण एशियाई देशों के बीच बांग्लादेश ने सबसे ज़्यादा आधिकारिक विकास सहायता (ODA) यानी कुल 4.93 बिलियन अमेरिकी डालर की विकास सहायता हासिल की थी.[i]

 हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भू-रणनीतिक महत्व बढ़ने के साथ-साथ, बांग्लादेश इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण देश बन गया है, साथ ही एक ऐसा देश बन गया है, जिसके साथ दूसरे देश कई कारणों से सहयोगी संबंध बनाना चाहते हैं.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भू-रणनीतिक महत्व बढ़ने के साथ-साथ, बांग्लादेश इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण देश बन गया है, साथ ही एक ऐसा देश बन गया है, जिसके साथ दूसरे देश कई कारणों से सहयोगी संबंध बनाना चाहते हैं. सबसे अहम बात है बांग्लादेश का रणनीतिक स्थान. यह देश बंगाल की खाड़ी के उत्तर में मौज़ूद है (मानचित्र 1 देखें) और उस जगह के नज़दीक है, जहां हिंद महासागर और प्रशांत महासागर का मिलन होता है, जो मिलकर इंडो-पैसिफिक का निर्माण करते हैं. बांग्लादेश की यह रणनीतिक उपस्थिति, उसे उन महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स और शिपिंग मार्गों की निगरानी करने और चौकसी करने में सहज बनाती है, जिनके ज़रिये ऊर्जा और अन्य ज़रूरी सामानों से लदे जहाजों को मलक्का जलडमरूमध्य में ले जाने से पहले बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर में लाया जाता है. देखा जाए तो, ऐसे में बंगाल की खाड़ी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी मौज़ूदगी सुनिश्चित करने के इच्छुक देशों के लिए बांग्लादेश रणनीतिक तौर पर बेहद उपयुक्त स्थिति में है. इतना ही नहीं, अगर भौगोलिक लिहाज़ से भी देखा जाए, तो बांग्लादेश अपने लैंडलॉक्ड क्षेत्रों यानी ज़मीन से घिरे भीतरी इलाक़ों (हिंद के पूर्वोत्तर और नेपाल भूटान जैसे हिमालयी देशों समेत) और चीन जैसे पड़ोसी देशों को समुद्र तक आसान पहुंच प्रदान करने के लिए भी बेहद अनुकूल रणनीतिक स्थिति में है.

 

ऐसे में अगर बांग्लादेश की आर्थिक तरक़्क़ी होती है, तो ज़ाहिर तौर पर इससे उसके भू-रणनीतिक लाभों में भी बढ़ोतरी होती है. कभी जिस बांग्लादेश को अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा आर्थिक कठिनाइयों में घिरे और अपना ऋण भुगतान करने में अक्षम राष्ट्र के रूप में चिन्हित किया गया था, [3] , [ii] आज वही बांग्लादेश वर्ष 2026 तक अपने सबसे कम विकसित राष्ट्र के दर्ज़े [4],[iii] से बाहर निकलने के लिए तैयार दिखाई दे रहा है. [iv] वास्तविकता यह है कि बांग्लादेश ने जिस प्रकार से ग़रीबी को समाप्त करने और विकास हासिल करने के लिए अभूतपूर्वकार्य किया है, उसे विश्व बैंक द्वारा भी सराहा गया है. [v] बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, वहां युवा आबादी भी बढ़ रही है और जिस प्रकार वहां बुनियादी ढांचे का विकास एक राजनीतिक एजेंडा बन गया है, इन सबने मिलकर उन प्रमुख देशों के लिए बांग्लादेश को एक ऐसा आकर्षक निवेश गंतव्य बना दिया है, जो इस क्षेत्र में अपना दबदबा क़ायम करना चाहते हैं. इतना ही नहीं, दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया को ज़मीनी रास्ते से जोड़ने वाली कड़ी के रूप में बांग्लादेश ख़ासा महत्वपूर्ण है और व्यापारिक लिहाज़ से भी इसे बेहतर स्थिति में लाता है, क्योंकि यह बांग्लादेश को दोनों क्षेत्रों के देशों के बाज़ारों के लिए प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित करती है.

 

मानचित्र 1: बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश का स्थान


 

स्रोत: भारत की एक स्वतंत्र शोधकर्ता जया ठाकुर द्वारा निर्मित.

 

पिछले कुछ वर्ष व्यापारिक लिहाज़ से बांग्लादेश के लिए काफ़ी उत्साहजनक रहे हैं. चीन, अमेरिका, जापान और पड़ोसी हिंद जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की ओर से बांग्लादेश के साथ व्यापारिक संबंध मज़बूत करने की होड़ सी लग गई है और विकास से जुड़ी परियोजनाओं में बांग्लादेश का सहयोग करने से जुड़े प्रस्तावों की भरमार हो गई है. हालांकि ये जितने भी प्रस्ताव हैं, वे बांग्लादेश के विकास के लिहाज़ से मुफीद हैं और जो भी देश ऐसे सहायता कार्यक्रमों में शामिल हैं, उन सभी के लिए भी फायदेमंद साबित हुए हैं. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ऐसे प्रस्तावों को बिना शर्त के आगे बढ़ाया गया है, यानी बांग्लादेश को कुछ भी दांव पर नहीं लगाना पड़ा है. कई उदाहरण तो ऐसे हैं, जिनमें विकास परियोजनाओं को लेकर सहायता की पेशकश ने बांग्लादेश की सरकार की निष्पक्षता को दांव पर लगाने का काम किया है. ज़ाहिर है कि ऐसे में सियासी आज़ादी को बरक़रार रखने एवं आर्थिक महात्वाकांक्षा हासिल करने के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए बांग्लादेश में एक ऐसी बहुमत वाली सरकार की ज़रूरत है, जो कूटनीतिक तौर पर भी निपुण हो. देखा जाए तो 24 अप्रैल 2023 को बांग्लादेश की ओर से जो इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण [vi] जारी किया गया था, वो उसकी समझबूझ वाली कूटनीत का एक बेहतर उदाहरण प्रस्तुत करता है. बांग्लादेश के दृष्टिकोण से जुड़ा यह दस्तावेज़ देखा जाए तो ही उसके विचारों को स्पष्टता से ज़ाहिर करता है और ही किसी विवादित मुद्दे पर उसके रुख़ के बारे में साफ-साफ बताता है, फिर भी यह दस्तावेज़ कहीं कहीं उसके हितों और प्राथमिकताओं के बारे में एक खाका खींचने का काम करता है. उल्लेखनीय है कि आने वाले वर्षों में बांग्लादेश का यह दृष्टिकोण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे देशों के साथ उसके पारस्परिक रिश्ते कैसे होंगे, उसका मार्गदर्शन करेगा. हालांकि, आगामी 7 जनवरी को बांग्लादेश में होने वाले आम चुनाव उसकी इस स्थिति को संभावित रूप से बदल भी सकते हैं.

 

वर्तमान में बांग्लादेश के राजनातिक माहौल में ज़बरदस्त अशांति और उतार-चढ़ाव का दौर चल रहा है. बांग्लादेश के प्रमुख विपक्षी दलों, यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात--इस्लामी ने पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है. विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के इस्तीफे की मांग कि जा रही है, साथ ही देश में आम चुनाव कराने के लिए एक कार्यवाहक सरकार बनाने की मांग की जा रही है. हालांकि, सत्ताधारी पार्टी ने विपक्ष की मागों को अवैध करार दिया है और चुप्पी साध ली है.[vii] चुनाव आयोग द्वारा बांग्लादेश में 7 जनवरी को मतदान की तारीख का ऐलान करने के बाद,[5] विरोध स्वरूप विपक्षी दलों द्वारा 48 घंटे का देशव्यापी बंद आयोजित किया गया था. इस दौरान चांदपुर, गाज़ीपुर, सिलहट, नोआखाली और बोगुरा जैसे ज़िलों में ज़बरदस्त हंगामा देखने को मिला. कई जगहों पर वाहनों में तोड़फोड़ की गई, साथ ही तंगेल रेलवे स्टेशन पर एक यात्री ट्रेन को आग के हवाले कर दिया गया. [viii] संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय ने अक्टूबर 2023 की एक रिपोर्ट में बांग्लादेश में फैली इस हिंसा और लोगों की मौत को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी.[ix] सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्षी दलों ने धमकी दी कि यदि चुनाव संचालित करने के लिए कार्यवाहक सरकार गठित करने की उनकी मांग नहीं मानी गई, तो वे आम चुनाव का बहिष्कार करेंगे.

 

बांग्लादेश में विपक्ष की ताक़त (एक दशक तक प्रतिबंधित रहने के बाद जमात--इस्लामी पार्टी चुनावी राजनीति में वापसी कर रही है) बढ़ रही है, साथ ही मीडिया में इस प्रकार की ख़बरें हैं कि देश में 'लोकतंत्र को बनाए रखने' के लिए बाहरी देशों द्वारा हस्तक्षेप किया जा रहा है [6],[x]. उल्लेखनीय है कि इन हालातों में बांग्लादेश का भविष्य अप्रत्याशित नज़र रहा है. अगर चुनाव के बाद बांग्लादेश में सरकार बदलती है, तो ऐसे हालात में बांग्लादेश की इंडो-पैसिफिक विदेश नीति से जुड़े सिद्धांतों में संभावित रूप से बदलाव हो सकता है. ऐसा होने पर केवल प्रमुख देशों के साथ बांग्लादेश के रिश्तों पर असर पड़ेगा, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता भी प्रभावित होगी. इन परिस्थितियों में बांग्लादेश में चुनावों से पहले उसके इंडो-पैसिफिक साझीदारों के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है, साथ ही इसका आकलन करने की भी ज़रूरत है कि अगर ढाका में सत्तासीन होने वाले राजनीतिक दल में बदलाव होता है, तो तमाम देशों के साथ उसके संबंध किस हद तक प्रभावित हो सकते हैं.

 

इस पेपर में बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण का विस्तार से विश्लेषण करने की कोशिश की गई है, साथ ही इस दृष्टिकोण में निहित प्राथमिकताओं को गहराई से समझने एवं इंडो-पैसिफिक रीजन के ताक़तवर देशों के साथ उसके मौज़ूदा संबंधों की पड़तास करने का भी प्रयास किया गया है. इसके साथ ही इस पेपर में यह भी परखने की कोशिश की गई है कि अगर बांग्लादेश की सत्ता में परिवर्तन होता है, तो इस क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ इसके द्विपक्षीय संबंधों में किस प्रकार का संभावित बदलाव हो सकता है. इसके अलावा, इस पेपर में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की प्रमुख ताक़तों के साथ, ख़ास तौर पर चीन, भारत, अमेरिका और जापान के साथ बांग्लादेश के संबंधों पर विचार-विमर्श किया गया है, क्योंकि यही वे देश हैं, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. इतना ही नहीं, ये चारों देश वर्ष 2024 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज़ से दुनिया भर की चोटी की पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं. [xi] पेपर में इन चारों देशों के साथ बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों के अलावा ऑस्ट्रेलिया के साथ उसके प्रगाढ़ होते रिश्तों को लेकर भी संक्षेप में चर्चा की गई है, ज़ाहिर है कि वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक ताक़त के रूप में उभर रहा है.

 

बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण की वास्तविकता 

 

बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित बांग्लादेश ने विज़न 2041 योजना [xii] तैयार की है. इस विज़न के अंतर्गत बांग्लादेश ने वर्ष 2041 तक एक आधुनिक और ज्ञान-संचालित विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है. बांग्लादेश को बखूबी मालुम है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए इंडो-पैसिफिक रीजन में स्थिरता और समृद्धि बनाए रखना बेहद आवश्यक है. बांग्लादेश के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता का तात्पर्य इस रीजन के ताक़तवर देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को सशक्त बनाए रखना है. यानी चीन और अमेरिका जैसे प्रमुख देशों के साथ अपने द्विपक्षीय रिश्तों को प्रगाढ़ बनाना है, जो एक दूसरे के साथ तो होड़ करते हैं, लेकिन बांग्लादेश की आर्थिक तरक़्क़ी में अहम योगदान देते हैं. हाल के वर्षों में बांग्लादेश के घरेलू आर्थिक हालातों में गिरावट और ढाका से समक्ष तमाम आर्थिक चुनौतियां पैदा होने के बाद से इन देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को मज़बूत करने की आवश्यकता ख़ासतौर पर महसूस की गई है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जो बांग्लादेश पिछले कुछ वर्षों से, "उच्च आर्थिक विकास, कम मुद्रास्फ़ीति और व्यापक स्तर पर विदेशी मुद्रा भंडार के साथ कुछ हद तक बेहतर आर्थिक स्थित का अनुभव कर रहा था", लेकिन ख़राब नीतियों की वजह से और यूक्रेन युद्ध के बाद उपजे हालातों के कारण अब यह सकारात्क आर्थिक परिस्थितियां उलट गई हैं. [xiii]  यानी कि वर्तमान में बांग्लादेश में मुद्रास्फ़ीति बढ़ गई है, विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट हो गई है और ऋण भुगतान की दर में भी कमी आई है. [xiv] निस्संदेह तौर पर विदेशी राजस्व या कहा जाए कि विदेश से मिलने वाली आर्थिक मदद पर ढाका की अत्यधिक निर्भरता है. उल्लेखनीय है कि ऐसे हालातों में बांग्लादेश को अपने साझीदार देशों के साथ संबंधों को सशक्त करना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि संबंध मज़बूत होने पर ही सहयोगी देश ज़रूरत पड़ने पर बांग्लादेश को आर्थिक संकट से बाहर निकाल सकते हैं.

 

जिस प्रकार से बांग्लादेश की चीन के साथ घनिष्टता बढ़ रही है, ख़ास तौर पर वाणिज्यिक और रक्षा उद्यमों के माध्यम से दोनों के बीच जो प्रगाढ़ता रही है, उसको लेकर अमेरिका कहीं कहीं बेहद चिंतित है. इसके साथ ही चीन की अगुवाई वाली क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी [xv] या फिर अमेरिका के हिंद-प्रशांत आर्थिक फोरम [xvi] में शामिल होने को लेकर बांग्लादेश की अनिर्णय की स्थिति ने भी अमेरिका के विचारों में बदलाव लाने का काम किया है. [xvii]अमेरिका को लगता है कि बांग्लादेश पर बीजिंग का दबदबा बढ़ता जा रहा है और इसी आशंका की वजह से वाशिंगटन डी.सी. बांग्लादेश में मानवाधिकारों की अलोचना के ज़रिये और चुनावी अनियमितिताओं का आरोप लगाते हुए ढाका की घरेलू राजनीति में दख़ल दे रहा है, साथ ही वह बांग्लादेश में लोकतांत्रित तरीक़े से चुनाव सुनिश्चित कराने में जुटा हुआ है. अमेरिका की ओर से की जा रही इन सभी कोशिशों का उद्देश्य देखा जाए तो बांग्लादेश में सरकार को प्रभावित करना है. [xviii] यहां एक बात यह भी है कि बांग्लादेश अगर अमेरिका को आश्वस्त करना चाहता है, तो वो खुलेआम ऐसा नहीं कर सकता है, क्योंकि अगर वह ऐसा करता है, तो यह उसकी चीन से दूरी की वजह बन सकता है. ऐसे में बांग्लादेश के लिए बीच का रास्ता निकालना अत्यंत आवश्यक है, जिससे वह चीन और अमेरिका दोनों को संतुष्ट कर सके और साथ ही यह भी सुनिश्चित कर सके कि विदेश नीति कारगर बनी रही रहे, किसी एक तरफ झुकी हुई दिखाई दे. बांग्लादेश द्वारा जारी किए गए इंडो-पैसिफिक आउटलुक में इसी तरह की बातें सामने आई हैं.

 बांग्लादेश ने हिंद-प्रशांत पर भरोसा जताने से पहले लंबे दौर तक देखो और इंतज़ार करोकी रणनीति अपनाईऔर आखिरकार अपने इंडो-पैसिफिक आउटलुक के माध्यम से बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत समूह में शामिल होकर अमेरिकी उम्मीदों को पूरा करने का काम किया है.

बांग्लादेश ने हिंद-प्रशांत पर भरोसा जताने से पहले लंबे दौर तक देखो और इंतज़ार करोकी रणनीति अपनाई, [7] और आखिरकार अपने इंडो-पैसिफिक आउटलुक के माध्यम से बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत समूह में शामिल होकर अमेरिकी उम्मीदों को पूरा करने का काम किया है. अमेरिका का मानना है कि बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण और उसकी अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति के बीच उल्लेखनीय रूप से कई समानताएं हैं. जैसे कि दोनों में ही "नेविगेशन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे शामिल हैं, साथ ही खुली, पारदर्शी और नियम-क़ानून पर आधारित बहुपक्षीय प्रणालिया एवं पर्यावरण को लेकर लचीलापन जैसे मसले भी शामिल हैं." [xix] बांग्लादेश के दृष्टकोण दस्तावेज़ में जिस प्रकार से सभी की साझा समृद्धि के लिए स्वतंत्र, खुले, शांतिपूर्ण, सुरक्षित और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की कल्पना की गई है और इसके लिए जिन शब्दों का उपयोग किया गया है, कमोबेश वे बांग्लादेश और अमेरिका द्वारा वर्ष 2022 में उच्च स्तरीय आर्थिक परामर्श की बैठक के बाद जारी किए संयुक्त वक्तव्य में इस्तेमाल किए गए वाक्यांश के समान हैं. [xx] इतना ही नहीं बांग्लादेश के आउटलुक में क्वॉड का नाम तो नहीं लिया गया है [8], लेकिन इसमें इस क्वॉड समूह की आपदा से जुड़े ख़तरों में कमी लाना और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसी कई प्राथमिकताओं को भी शामिल किया गया है. [xxi] बांग्लादेश द्वारा हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण जारी किए जाने के एक दिन बाद जिस प्रकार से प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने जापान, अमेरिका और ब्रिटेन [9]का दौरा किया था, [xxii] वो भी कहीं कहीं अमेरिका को आश्वस्त करने की कोशिशों का ही संकेत था, हालांकि यह अलग बात है कि हसीना अपने अमेरिकी दौरे के दौरान वहां किसी भी सरकारी अधिकारी से नहीं मिलीं थीं. [10], [xxiii]

 

जहां तक बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण की बात है, तो इसमें ख़ास तौर पर चार मार्गदर्शक सिद्धांतों और 15 उद्देश्यों को समाहित किया गया है, साथ ही यह बेहद कुशलता के साथ चीन को उकसाने से भी बचता हुई दिखता है. ज़ाहिर है कि चीन इंडो-पैसिफिक को अमेरिकी पर लगाम लगाने की रणनीति के रूप में इस्तेमाल करता है. [xxiv] बांग्लादेश का कहना है कि "हम किसी का अनुसरण नहीं कर रहे हैं. हमारा आईपीओ यानी इंडो-पैसिफिक आउटलुक स्वतंत्र है." [xxv] कहने का तात्पर्य यह है कि बांग्लादेश का हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण उसकी अपनी क्षेत्रीय स्थिति को मज़बूत करने का एक प्रयास है, [xxvi]  जो कहीं कहीं इंडो-पैसिफिक में उसके अपने हितों, प्राथमिकताओं और कूटनीतिक नज़रिये के बारे में बताता है और क्षेत्र के ताक़तवर देशों के साथ उसके जुड़ाव को सशक्त करने का काम करता है. बांग्लादेश के आउटलुक में पांच मुद्दे विशेष रूप से शामिल हैं, जो यह स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर करते हैं कि ढाका किस प्रकार से अपनी संतुलन की कूटनीति के ज़रिये बेहद कुशलता के साथ प्रमुख देशों की राजनीति का उपयोग कर अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास कर रहा है.

 

आर्थिक अहमियत: बांग्लादेश के लोगों ने हाल के वर्षों में तीव्र गति वाले आर्थिक विकास का अनुभव किया है, इसके साथ ही पिछले दशक में देश की जीडीपी तीन गुना से अधिक हो गई है. वर्ष 2012 में बांग्लादेश की जीडीपी 133.36 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी, जो वर्ष 2022 में बढ़कर 460.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई. [xxvii] इसी अवधि के दौरान बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति जीडीपी में लगभग 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, अर्थात वर्ष 2012 में प्रति व्यक्ति जीडीपी जो 1070.6 अमेरिकी डॉलर थी वो वर्ष 2022 में बढ़कर 1784.7 अमेरिकी डॉलर हो गई. [xxviii] बांग्लादेश में हुई इसी आर्थिक प्रगति का नतीज़ा है कि देश की ग़रीबी दर में कमी (2010 में 11.8 प्रतिशत से घटकर 2022 में 5 प्रतिशत) दर्ज की गई. [11], [xxix] इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक 2021-2022 में बांग्लादेश की स्थित में सुधार हुआ है.[12], [xxx] इसने कहीं कहीं बांग्लादेश के नागरिकों को अपने भविष्य को लेकर आशावान और आकांक्षी बना दिया है. [xxxi] कहने का मतलब यह है कि वर्तमान में बांग्लादेश के लोग व्यापार की बेहतर सुविधाओं, सशक्त कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के ज़रिये आज ज़्यादा आर्थिक प्रगति करना चाहते हैं. बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण पर गहनता से नज़र डाली जाए तो, स्पष्ट रूप से पता  चलता है कि आर्थिक प्रगति में निरंतरता इसकी शीर्ष प्राथमिकताओं में से एक है. यही वजह है कि बांग्लादेश द्वारा हर सेक्टर में कनेक्टिविटी का विस्तार करने का प्रयास किया जा रहा है, फिर चाहे वो वस्तुओं, सेवाओं और लोगों की निर्बाध आवाजाही के लिए कनेक्टिविटी बढ़ाना हो, या फिर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मामले में हो. बांग्लादेश के आउटलुक में कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से पैदा हुए हालातों से भी सीख ली गई है और यही वजह है कि उसके इस दृष्टिकोण में, “भविष्य में आने वाले संकटों एवं अवरोधों को बेहतर तरीक़े से संभालने के लिए और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में व्यापार के निर्बाध और मुक्त प्रवाह को प्रोत्साहित करने के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर लचीली मूल्य श्रृंखला बनानेपर ज़ोर दिया गया है. [xxxii]

 

राजनीतिक गुटनिरपेक्षता: बांग्लादेश की आर्थिक तरक़्क़ी और संपन्नता देखा जाए तो काफ़ी हद तक विदेशी निवेश पर निर्भर है. यही वजह है कि बांग्लादेश किसी भी सूरत में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के ताक़तवर देशों के साथ अपने संबंधों पर आंच नहीं आने देना चाहता है और रिश्तों में संतुलन बनाए रखना चाहता है. ज़ाहिर है कि यह बड़े देश बांग्लादेश की इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं में व्यापक स्तर पर निवेश करते हैं. [xxxiii] इसी कारण से बांग्लादेश के इंडो-पैसिफिक आउटलुक में तो खुलकर चीन का समर्थन किया गया है और ही अमेरिका की ओर झुकाव दिखाया गया है. बल्कि अपने दृष्टिकोण के इस दस्तावेज़ में बांग्लादेश द्वारा अपने चार मार्गदर्शक सिद्धांतों में से पहले सिद्धांत के रूप में "सभी से दोस्ती, किसी से दुश्मनी नहीं" के विचार का अनुसरण किया गया है. [xxxiv] इसके अलावा, इस आउटलुक में बांग्लादेश की तरफ से इंडो-पैसिफिक के भविष्य को लेकर अपनी विचारधारा में 'समावेशी' शब्द पर ज़ोर दिया गया है. बांग्लादेश का यह दृष्टिकोण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बराबरी वाले एवं सतत विकास के लिए क्वॉड समूह के पसंदीदा परिभाषिक शब्द नियम-क़ानून पर आधारित व्यवस्थाके बाजए नियम-क़ानून पर आधारित बहुपक्षीय प्रणालीको बढ़ावा देने की भी वक़ालत करता है. [xxxv]

 

शांति और स्थिरता बनाए रखने की इच्छा: बांग्लादेश की आर्थिक सफलता और संपन्नता के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता क़ायम रहना बेहद आवश्यक है. क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य के लिए बांग्लादेश के इस आउटलुक में किसी भी रक्षा सहयोग या सैन्य समझौते का जिक्र नहीं किया गया है. हालांकि यह ज़रूर है कि इसके लिए इस दस्तावेज़ में ख़ास तौर पर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मुताबिक़ मंज़ूर किए गए अंतर्राष्ट्रीय नियमों और संधियों का पालन करने की बात कही गई है. [xxxvi]  ज़ाहिर है कि ऐसा करके बांग्लादेश द्वारा किसी भी देश का पक्ष लेने से बचा गया है. इतना ही नहीं ऐसा करके क्षेत्र में सुरक्षा और शांति सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त मानदंडों पर ध्यान केंद्रित किया गया है. यानी उन सभी मानदंडों को मान्यता दी गई है कि अगर जिनका उल्लंघन किया जाता है, तो ऐसा करने वाले देश को वैश्विक स्तर पर नाराज़गी का सामना करना पड़ सकता है. इसके अतिरिक्त बांग्लादेश के इंडो-पैसिफिक आउटलुक में ट्रैक-2 राजनयिक प्रक्रियाओं यानी बैक चैनल कूटनीतिक गतिविधियों पर ज़ोर दिया गया है. जैसे कि पारस्परिक विवादों को सुलझाने और क्षेत्र में शांति सुनिश्चित करने के लिए साझेदारी, सहयोग और बातचीत के माध्यम से आपसी विश्वास को सशक्त करना. इस प्रकार से इस दृष्टिकोण में संयुक्त राष्ट्र के 'शांति की संस्कृति' के घोषणापत्र में निहित विचारों का अनुसरण किया गया है, उल्लेखनीय है कि इस घोषणापत्र का मसौदा तैयार करने में वर्ष 1997 में बांग्लादेश ने अहम भूमिका निभाई थी. [xxxvii]

 

मानव जाति की सुरक्षा को लेकर संज़ीदगी: बांग्लादेश अपनी गुटनिरपेक्षता की नीति पर अमल करता है और अपनी इसी नीति की वजह से इंडो-पैसिफिक रीजन में विभिन्न देशों के कारण उत्पन्न होने वाले सुरक्षा ख़तरों से दूरी बनाकर रखता है. बांग्लादेश के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण में एक बुनियादी सिंद्धांत के रूप में किसी देश के 'आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने' पर विशेष बल दिया गया है. इससे साफ पता चलता है कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में दख़ल देने की बांग्लादेश की कोई दिलचस्पी नहीं है. बांग्लादेश का मुख्य ध्यान किसी देश के अंदरूरी सुरक्षा मामलों में दख़ल देने के बजाए मानव जाति की सुरक्षा और वैश्विक स्तर पर लोगों के कल्याण एवं सुख-समृद्धि पर है. ढाका ऐसे तमाम वैश्विक मुद्दों पर ख़ास तौर पर ध्यान देता है, जिनके लिए मिलजुल कर कार्य करने की आवश्यकता है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, आपदा से जुड़े ख़तरों को करना, जैव विविधता का नुक़सान, समुद्री प्रदूषण, खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा, ऊर्जा स्थिरता एवं समुद्री सहयोग. इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश महिलाओं के नेतृत्व में होने वाले विकास, अंतर्राष्ट्रीय अप्रसार, शांति की स्थापना, वैश्विक स्तर पर संगठित अपराध का मुक़ाबला करने और आतंकवाद का समाधान तलाशने जैसे वैश्विक मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है. अलग-अलग मुद्दों को लेकर बांग्लादेश का अलग-अलग रुख एक तरफ उसकी कमज़ोरियों को ज़ाहिर करता है और दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर उसके योगदान को भी बताता है. उदाहरण के तौर पर बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र के शांति प्रयासों में सबसे बड़े भागीदारों में से एक है. [xxxviii] इन विशेष क्षेत्रों में हिंद-प्रशांत के देशों के साथ सहयोग करने से ढाका को तिहरा फायदा होता है, यानी समस्या के बेहतर समाधान के लिए सामूहिक कार्रवाई की सुविधा, साझेदार देशों के साथ संबंधों को मजबूत करना और वैश्विक शांति पहल का समर्थन करते हुए मानव सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में बांग्लादेश की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित करना.

 

समुद्री सुरक्षा पर ज़ोर: बांग्लादेश की तटीय रेखा 580 किलोमीटर लंबी है. हिंद और म्यांमार के बाद बांग्लादेश बंगाल की खाड़ी को अपना तीसरा पड़ोसी मानता है. बंगाली की खाड़ी में बांग्लादेश का गैस का अकूत भंडार मौज़ूद है, लेकिन इसके बारे में अभी पता नहीं लगाया जा सका है. इसके साथ ही बांग्लादेश का 90 प्रतिशत से ज़्यादा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समुद्र मार्ग के ज़रिये होता है. यही वजह है कि समुद्री सुरक्षा बांग्लादेश की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि इसके व्यावसायिक हित और प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा समुद्र की सुरक्षा पर उल्लेखनीय रूप से निर्भर है. बांग्लादेश के इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण में यह स्पष्ट रूप से दिखाई भी देता है. इस दृष्टिकोण के मार्गदर्शक सिद्धांतों में समुद्री क़ानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS)-1982 भी शामिल है. बांग्लादेश का उद्देश्य "इंडो-पैसिफिक रीजन में समुद्री सुरक्षा और समुद्री संपदा के संरक्षण के वर्तमान तंत्र" का सशक्तीकरण करना है. इतना ही नहीं UNCLOS सहित अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों एवं संधियों के मुताबिक़ "नेविगेशन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता" से जुड़ी गतिविधियों को बरक़रार रखना है. [xxxix] इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश समुद्र में पैदा होने वाली आपातकालीन परिस्थितियों का समाना करने के लिए और राहत एवं बचाव अभियान चलाने के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भागीदार देशों के साथ सहभागिता चाहता है. ज़ाहिर है कि समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा एक बड़ा मसला है और इसके महत्व के मद्देनज़र बांग्लादेश का आउटलुक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में (सतत विकास लक्ष्य 14 के मुताबिक़) महासागरों एवं समुद्री संसाधनों के संरक्षण, टिकाऊ उपयोग और प्रबंधन पर बल देता है. इसके अलावा यह दृष्टिकोण विकास से संबंधित ऐसे तमाम संकल्पों की ज़रूरत पर भी ध्यान आकर्षित करता है, जिन पर वैश्विक स्तर तमाम देशों द्वारा सहमति जताई जा चुकी है. [xl] यही कारण है कि हिंद-प्रशांत के देशों के साथ बांग्लादेश के संबंधों में समुद्री क्षेत्र में साझेदारी एक अहम मुद्दा है.

 

बांग्लादेश राजनीतिक तौर पर गुटनिरपेक्षता या निष्पक्षता का प्रबल पक्षधर है, लेकिन बांग्लादेश की इस विचारधारा के पीछे अमेरिका या चीन नहीं है, बल्कि उसके इस क़दम के पीछे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी एक मज़बूत स्थित बनाना है और कहीं कहीं उसने स्वयं अपने हितों को पूरा करने के लिए इस विचारधारा को अपनाया है. [xli] साथ ही बांग्लादेश के राजनीतिक निष्पक्षता के रास्ते पर चलने के पीछे दोनों प्रमुख क्षेत्रीय ताक़तों यानी चीन और अमेरिका के साथ इसकी आर्थिक तौर पर नज़दीकी भी है, जो इसके कूटनीतिक संतुलन बनाने की ज़रूरत को ज़ाहिर करती है. हालांकि, इस बात पर ध्यान दिया जाना बेहद अहम है कि बांग्लादेश के इंडो-पैसिफिक आउटलुक में तमाम सारी बातें कही गई हैं, लेकिन उनको मुकम्मल करने के लिए कोई मार्ग नहीं दिखाया गया है. कुछ लोग तो ऐसे हैं, जिन्होंने भविष्य को लेकर एक तस्वीर प्रस्तुत करने वाले इस महत्वपूर्ण दस्तावेज़ को 'आउटलुक' कहे जाने की भी आलोचना की है और कहा है कि इसमें बांग्लादेश की बुनियादी और वास्तविक योजना की कमी दिखाई देती है. [xlii] जबकि कई अन्य लोगों का कहना है कि बांग्लादेश के इस महत्वपूर्ण दस्तावेज़ को 'आउटलुक' कहने से इसके एक लचीले रुख का आभास होता है [xliii] और एक योजना या फिर रणनीति की तुलना में यह लचीला दृष्टिकोण बांग्लादेश के लिए लाभदायक भी है. यानी बांग्लादेश के इस इंडो-पैसिफिक आउटलुक को ढाका के एक ऐसे क़दम के रूप में समझा जा सकता है, जिसका लोग अपने-अपने तरीक़ों से अर्थ निकाल सकते हैं, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य कहीं कहीं आर्थिक संपन्नता को हासिल करना और आकांक्षाओं  की पूर्ति करना है. निसंदेह तौर पर विदेश नीति प्रधानमंत्री शेख़ हसीना सरकार की प्रमुख विशेषताओं में एक रही है. शेख़ हसीना सरकार के दौरान देखा जाए तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र के ताक़तवर देशों के साथ बांग्लादेश के रिश्ते सशक्त हुए हैं और इससे पारस्परिक लाभ का एक सकारात्मक माहौल बना है.[xliv]

 

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में विशेष योगदान देने वाले देश

 

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बांग्लादेश के प्रमुख साझीदार देशों में अमेरिका, जापान, चीन और भारत शामिल हैं, क्योंकि ये देश बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय रूप से अपना योगदान देते हैं. उदाहरण के तौर पर चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है और उसके बाद भारत एवं अमेरिका का नंबर आता है. [xlv] (चित्र 1 देखें)

 

चित्र 1: चीन, हिंद, अमेरिका और जापान के साथ बांग्लादेश का व्यापार (2019-2020, मिलियन अमेरिकी डॉलर में)

 


 

स्रोत: लेखक का अपना, बांग्लादेश ट्रेड पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित [xlvi]

 

बांग्लादेश को विभिन्न देशों के साथ व्यापरिक रिश्तों यानी द्विपक्षीय निर्यात और आयात के अलावा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से भी काफ़ी फायदा होता है. बांग्लादेश में एफडीआई करने वाले चोटी के 15 देशों में चीन, भारत, अमेरिका और जापान शामिल हैं (देखें चित्र 2). इनमें से अमेरिका शीर्ष 5 देशों में शामिल है, जिसका बांग्लादेश में होने वाले कुल एफडीआई में हिस्सा 8.8 प्रतिशत है.[xlvii] ज़ाहिर है कि बांग्लादेश पूंजी के मामले में ग़रीब देश है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से उसे सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों को हासिल करने में मदद मिलती है, जैसे कि यह ग़रीबी को कम करने में सहायक होता है. इसके साथ ही एफडीआई भौतिक पूंजी के निर्माण, रोज़गार के अवसरों को बढ़ाने, उत्पादक की क्षमता को बढ़ाने में मददगार होता है. इसके अलावा एफडीआई प्रौद्योगिकी और प्रबंधकीय ज्ञान के आदान-प्रदान के माध्यम से स्थानीय कामगारों के हुनर को तराशने में भी सहायक सिद्ध हो सकता है, साथ ही घरेलू अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष खड़ा करने में मदद कर सकता है.[xlviii]

 

चित्र 2: चीन, भारत, अमेरिका और जापान से बांग्लादेश में होने वाला एफडीआई (वित्तीय वर्ष 22-23, मिलियन अमेरिकी डॉलर और प्रतिशत में)

 

स्रोत: लेखक का अपना, बांग्लादेश बैंक से मिले आंकड़ों पर आधारित [xlix]

 

बांग्लादेश को विदेशों से पैसा मिलने का जो तीसरा रास्ता है, वो विकास में साझीदार देशों से अनुदान या ऋण के रूप में मिलने वाली विदेशी सहायता और ऑफीशियल डेवलपमेंट असिस्टेंस यानी आधिकारिक विकास सहायता (ODA) है. सभी देशों से मिलने वाली विदेशी सहयाता को देखें तो बांग्लादेश को सबसे अधिक ODA देने वाला देश जापान है. ( देखें चित्र 3) [l]

 

चित्र 3: बांग्लादेश को चीन, भारत, अमेरिका और जापान से हासिल विदेशी मदद (2020/21, मिलियन अमेरिकी डॉलर में)

 

स्रोत: लेखक का अपना, बांग्लादेश सरकार से मिले आंकड़ों पर आधारित [li]

 

बांग्लादेश को मिलने वाली विदेशी सहायता को तीन प्रकारों में बांटा गया है: खाद्य सहायता, वस्तुओं के रूप में सहायता और परियोजना विकास के लिए सहायता. इन तीनों प्रकार की सहयाता में बांग्लादेश के विकास में साझीदार देशों की ओर से परियोजनाओं के निर्माण और विकास के रूप में दी जाने वाली मदद सबसे लोकप्रिय है. इसकी वजह यह भी है कि ढाका के जो भी साझीदार देश हैं, वे बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए तत्पर हैं. [lii] सभी देशों के बीच जापान ऐसा राष्ट्र है, जो बांग्लादेश को परियोजना सहायता उपलब्ध कराने में सबसे आगे है. ( देखें चित्र 4) [liii]

 

चित्र 4: चीन, हिंद, अमेरिका और जापान द्वारा बांग्लादेश को दी जाने वाली कुल परियोजना सहायता और भुगतान (2020-21, मिलियन अमेरिकी डॉलर में)

 


 

स्रोत: लेखक का अपना, बांग्लादेश सरकार से मिले आंकड़ों पर आधारित [liv]

 

उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट ज़ाहिर होता है कि अगर बांग्लादेश को अपनी आर्थिक संपन्नता और प्रगति में निरंतरता बनाए रखनी है, तो उसे हर हाल में चीन, भारत, अमेरिका और जापान के साथ अच्छे रिश्ते क़ायम रखने होंगे.

 

इंडो-पैसिफिक के प्रमुख देशों के साथ बांग्लादेश के वर्तमान रिश्ते

 

चीन, भारत, अमेरिका और जापान के अलावा ऑस्ट्रेलिया भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र का एक ताक़तवर देश है. ऑस्ट्रेलिया क्वॉड समूह का हिस्सा है. इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया अपने राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने के लिए बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित देशों के साथ सक्रिय रूप से अपने रिश्तों को सशक्त कर रहा है, ताकि हिंद महासागर में निर्बाध और शांतिपूर्ण आवाजाही क़ायम हो सके. [lv] बंगाल की खाड़ी के अन्य देशों के बीच कैनबरा की ढाका में गहरी दिलचस्पी है और वह तेज़ी के साथ बांग्लादेश में परियोजना विकास में मदद कर रहा है. [lvi] बांग्लादेश के चीन, भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ द्विपक्षीय संबंध मुख्य रूप ने निम्न क्षेत्रों में हैं:

 

ऊर्जा: वैश्विक स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा एक बड़ा मसला बन चुका है और इसको लेकर वैश्विक अनिश्चितिता का माहौल है. इन हालातों में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं ईंधन की निर्बाध आपूर्ति और ऊर्जा के भंडारों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही हैं. बांग्लादेश में व्यापक संख्या में ऐसे हाइड्रोकार्बन भंडार हैं, जिनका इस्तेमाल नहीं किया गया है और एक लिहाज़ से जो अभी तक अछूते हैं. बांग्लादेश मालवाहक जहाजों की आवाजाही के लिए अहम समुद्री मार्गों पर ध्यान नहीं देता है, जो ऊर्जा की आपूर्ति और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं. ऐसे में यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश रणनीतिक रूप से अमेरिका, जापान, चीन और ऑस्ट्रेलिया के लिए बेहद अहम है. [lvii] ढाका में एक चीनी लंगर यानी जहाजों को ठहराने का स्थान है, जो सिर्फ़ बंगाल की खाड़ी में चीन के लिए उसकी दमदार मौज़ूदगी उपलब्ध कराता है, बल्कि बीजिंग को निकट में स्थित मलक्का जलडमरूमध्य पर कड़ी निगरानी की सुविधा भी प्रदान करता है, साथ ही 'मलक्का दुविधा' (इस संकरे जलमार्ग से चीन की ऊर्जा आपूर्ति होती है और यहां से उसका 80 प्रतिशत तेल गुजरता है. इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को लेकर चीन हमेशा आशंकित रहता है.[lviii]) का समाधान तलाशने का भी अवसर उपलब्ध कराता है. ज़ाहिर है कि एक तरफ बांग्लादेश अपनी भौगोलिक स्थिति और अपने अकूत ऊर्जा भंडारों की वजह से दुनिया के प्रमुख राष्ट्रों के लिए एक पसंदीदा देश बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश को तेज़ विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना है और इसके लिए उसे भी इन देशों की ज़रूरत है.

 

यही वजह है कि बांग्लादेश और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भागीदारों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को निर्धारित करने में ऊर्जा सहयोग एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है. अमेरिका की ट्रेडं एंड डेवलपमेंट एजेंसी ने वर्ष 2022 में बांग्लादेश को लगभग 1.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर का तकनीकी सहायता अनुदान दिया था, ताकि वह स्मार्ट ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिये अपने इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड को बेहतर बना सके. [lix] इतना ही नहीं अपने बिजली और ऊर्जा पारेषण एवं वितरण इंफ्रास्ट्रक्चर के नवीनीकरण में निवेश करने के लिए बांग्लादेश ने जापानी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी से भी मदद मांगी थी. इसी के पश्चात जापान की तरफ से बांग्लादेश में सौर, थर्मल और गैस-आधारित कई ऊर्जा परियोजनाओं की शुरुआत की गई है, जिनमें से मातरबारी कोयला आधारित बिजली संयंत्र पूरा होने वाला है. [lx] अगर बांग्लादेश बैंक के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो स्पष्ट होता है कि चीन ने भी बांग्लादेश के ऊर्जा सेक्टर में अच्छा ख़ासा निवेश किया हुआ है. जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली संयंत्रों में एफडीआई के माध्यम से चीन के पास बांग्लादेश के बिजली सेक्टर में 450 मिलियन अमेरिकी डॉलर का स्टॉक है.[lxi] उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश ने वर्ष 2041 तक अपनी 40 प्रतिशत बिजली का उत्पादन स्वच्छ ऊर्जा के माध्यम से करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, इसी के मद्देनज़र चीन ने बांग्लादेश में संचालित होने वाले नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में व्यापक स्तर पर निवेश करना शुरू कर दिया है. [lxii] ऑस्ट्रेलिया भी ऊर्जा सेक्टर में बांग्लादेश का सहयोग कर रहा है. कैनबरा ने ऑस्ट्रेलिया, हिंद और बांग्लादेश के बीच एलएनजी आपूर्ति श्रृंखला बनाने में सहयोग के लिए ढाका को 2 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता देने की बात कही है. [lxiii]

 

जहां तक भारत की बात है, तो उसने भी ऊर्जा सेक्टर में बांग्लादेश का व्यापक सहयोग किया है. मैत्री थर्मल पावर प्रोजेक्ट बांग्लादेश के सबसे बड़े कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में से एक है और इसे भारत एवं बांग्लादेश के बीच 50:50 के संयुक्त उद्यम के रूप में स्थापित किया गया है. भारत और बांग्लादेश के बीच ऊर्जा सेक्टर में प्रगाढ़ होते संबंधों का ताज़ा उदाहरण भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन है, जिसका उद्घाटन मार्च 2023 में किया गया था. [lxiv] ये परियोजनाएं ऐसे समय में चालू की गईं, जब बांग्लादेश को वर्ष 2023 की शुरुआत में बड़े बिजली संकट का सामना करना पड़ा था और इसकी वजह से शेख़ हसीना सरकार को विपक्ष की ओर से ज़बरदस्त आलोचना का सामना