Author : Sunaina Kumar

Published on Oct 19, 2023 Updated 22 Days ago

अगर कौशल की कमी को लैंगिक समानता का ख़याल रखते हुए दूर किया जाए, तो महिलाएं, पानी से जुड़े व्यापक स्तर के कार्यक्रमों से पैदा हो रहे रोज़गार के बहुत से अवसरों का लाभ उठा सकती हैं. 

पानी और महिलाएँ: हरित क्षेत्र में नौकरियों के लाभ कैसे उठाएं!

पानी जो हरित अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तन में अहम भूमिका निभाता है, उसमें ख़ास तौर से महिलाएं के लिए रोज़गार के मौक़े पैदा करने की काफ़ी संभावनाएं हैं. दुनिया भर के परिवारों और समुदायों में पानी का उपयोग करने, उसे प्रदान करने और पानी के प्रबंधन का काम प्राथमिक तौर पर महिलाएं ही करती हैं. जल प्रबंधन में महिलाओं का तजुर्बा और उनकी जानकारी के संसाधन का सम्मान और उपयोग कम ही किया जाता है.

पानी के संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ी नौकरियों को हरित क्षेत्र का रोज़गार कहा जाता है, क्योंकि ये काम पर्यावरण के संरक्षण या उसकी गुणवत्ता फिर से बहाल करने में योगदान देते हैं. भारत में हरित और संबंधित क्षेत्र से जुड़े सेक्टरों में रोज़गार के मौक़ों का निर्माण बढ़ना तय है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक आकलन के मुताबिक़ भारत में 2020 के मुक़ाबले 2030 तक जल के प्रबंधन के क्षेत्र में सामूहिक अवसर कुल मिलाकर तीस लाख से बढ़कर 1.9 करोड़ तक पहुंच जाएंगे. आंकड़ों के अभाव में ये अध्ययन, इस क्षेत्र में महिलाओं के लिए मौजूदा और भविष्य में रोज़गार के अवसरों की संभावनाओं का सटीक पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका है.

पानी के संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ी नौकरियों को हरित क्षेत्र का रोज़गार कहा जाता है, क्योंकि ये काम पर्यावरण के संरक्षण या उसकी गुणवत्ता फिर से बहाल करने में योगदान देते हैं.

पानी और रोज़गार के बीच का संबंध एक स्थापित सत्य है. 2016 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनिया भर के कुल कामगारों के तीन चौथाई लोग या तो बहुत अधिक या काफ़ी हद तक पानी पर निर्भर हैं. लगभग 1.5 अरब लोग या फिर दुनिया भर के आधे कामगार, पानी से जुड़े सेक्टरों में काम करते हैं.

जल से दोनों तरह के यानी सीधा और अप्रत्यक्ष रोज़गार पैदा होते हैं. पानी के सेक्टर में सीधे रोज़गार के तहत जल संसाधनों का प्रबंधन, मूलभूत ढांचे का निर्माण और जल सेवाओं को मुहैया कराना, जैसे पानी की आपूर्ति, सीवर और कचरे का प्रबंधन आते हैं. पानी की बढ़ती क़िल्लत और प्रदूषण में बढ़ोत्तरी को देखते हुए ये अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि डिसैलिनेशन, गंदे पानी को साफ़ करके फिर इस्तेमाल करने और छतों पर बारिश के पानी को इकट्ठा करने जैसी तकनीकों में रोज़गार के काफ़ी नए मौक़े पैदा होने की संभावना है.

महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व, जल प्रबंधन की प्रक्रियाओं में कुशलता बढ़ाने का अभिन्न अंग है. विश्व बैंक द्वारा किए गए 122 जल परियोजनाओं के प्रभाव के मूल्यांकन में पाया गया कि जिन परियोजनाओं में महिलाएं भागीदार थीं, वो उन प्रोजेक्ट्स की तुलना में छह से सात गुना अधिक प्रभावी थीं, जिनमें महिलाएं शामिल नहीं थीं. इस सबूत के बावुजूद, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में पानी, साफ़ सफ़ाई और स्वच्छता के कामों में वेतन पाने वाले कामगारों में महिलाओं की भागीदारी 17 प्रतिशत से भी कम है. जल क्षेत्र में तकनीकी विशेषज्ञों के तौर पर रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी, पुरुषों से काफ़ी कम है. 

जल जीवन मिशन और संबंधित कार्यक्रमों में रोज़गार की संभावनाएं

इस समय जल प्रबंधन के क्षेत्र में महिलाएं जो काम करती हैं, वो ज़्यादातर स्वैच्छिक या अंशकालिक भूमिकाओं वाला होता है. परियोजनाओं में महिलाओं की भागीदारी अक्सर बिखरी हुई, असंगठित और आम तौर पर जल प्रबंधन के सबसे निचले स्तर वाली होती है. 

विश्व बैंक द्वारा किए गए 122 जल परियोजनाओं के प्रभाव के मूल्यांकन में पाया गया कि जिन परियोजनाओं में महिलाएं भागीदार थीं, वो उन प्रोजेक्ट्स की तुलना में छह से सात गुना अधिक प्रभावी थीं, जिनमें महिलाएं शामिल नहीं थीं.

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई या विस्तारित योजनाओं जैसे कि जल जीवन मिशन (ग्रामीण क्षेत्रों में नल से पानी पहुंचाने की योजना); अल मिशन फॉर रिजुवनेशन ऐंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (शहरी क्षेत्रों में नल से पानी पहुंचाना); अटल भूजल योजना (सामुदायिक नेतृत्व में भूगर्भ जल का प्रबंधन); और जल शक्ति अभियान (वर्षा के जल को बचाने और संरक्षण की योजना) जैसे कार्यक्रमों ने जल प्रबंधन में कामगारों की तादाद बढ़ाने के नए अवसर पैदा किए हैं, ताकि महिलाओं के लिए सम्मानजनक काम उपलब्ध होना सुनिश्चित किया जा सके. ये कार्यक्रम ज़मीनी स्तर से जुड़े हुए हैं इनको लागू करने के लिए स्थानीय समुदायों के बीच ‘ख़ुद मालिक होने की भावना’ को बढ़ावा मिलता है. इन कार्यक्रमों से सीधे तौर पर और अप्रत्यक्ष रूप से जैसे कि, जल का बजट बनाना, वित्तीय योजना निर्माण, संचार और बर्ताव में बदलाव और अलग अलग योजनाओं के मूल्यांकन और निगरानी जैसे रोज़गार के मौक़े पैदा होते हैं.

जल जीवन मिशन (JJM) में तो रोज़गार की अपार संभावनाएं हैं. भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) बैंगोलर के अंतर्गत सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी द्वारा इस साल जारी किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ अंदाज़ा लगाया गया है कि जल जीवन मिशन से हर साल 59.93 लोगों के लिए सीधा रोज़गार और 2.22 करोड़ लोगों के लिए अप्रत्यक्ष रोज़गार के मौक़े पैदा होने की संभावना है. हालांकि, इस अध्ययन में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग अलग आंकड़े तो नहीं दिए गए हैं और ये भी साफ़ नहीं है कि इनमें से कितने फ़ीसद रोज़गार महिलाओं को मिलेंगे. ग्रामीण भारत में जहां महिलाओं के लिए रोज़गार के सम्मानजनक अवसर का अभाव है, वहां ये कार्यक्रम बड़ा परिवर्तन लाने वाला हो सकता है.

Figure 1: जल जीवन मिशन के अलग अलग स्तरों पर औसत वार्षिक रोज़गार सृजन की संभावनाएं

Source: Indian Institute of Management, Bangalore

कौशल की कमी और महिलाओं के लिए क्षमता का निर्माण

जल प्रबंधन के क्षेत्र में रोज़गार के लिए ख़ास तरह के हुनर और प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है. पानी से जुड़े रोज़गार के मामले में एक बड़ी चुनौती इन कामों के लिए ज़रूरी कौशल और कुशल कामगारों की उपलब्धता के बीच का अंतर है. असल में जल प्रबंधन को अपने आप में कौशल वाले सेक्टर के तौर पर वर्गीकृत ही नहीं किया गया है. जबकि जल क्षेत्र कृषि, कपड़ा, प्लंबिंग, फूड प्रॉसेसिंग और निर्माण क्षेत्र के सहयोगी सेक्टर के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है. पूरे देश में कौशल विकास की ट्रेनिंग देने वाली सेक्टर स्किल्स काउंसिलों में जल प्रबंधन के अंतर्गत सीमित प्रशिक्षण ही दिया जाता है. ये प्रशिक्षण ख़राब पानी के शोधन और जल स्रोतों के मैनेजमेंट के क्षेत्र में दिया जाता है, और जल क्षेत्र में उभरते रोज़गार के नए अवसर, ट्रेनिंग के इन कार्यक्रमों के दायरे में नहीं आते हैं.

Figure 2: 2009-2020 के दौरान चुने हुए राज्यों में वाटरशेड डेवेलपमेंट में पैदा हुए रोज़गार के कुल अवसर

Source: United Nations Development Programme

हुनरमंद कामगारों की ज़रूरत को समझते हुए जल जीवन मिशन और अटल भूजल योजना जैसे कार्यक्रमों में, इन्हें लागू करने के हर चरण के दौरान क्षमता निर्माण और सामुदायिक स्तर के भागीदारों के बीच क्षमता के निर्माण और प्रशिक्षण के स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं. इन दिशा-निर्देशों में महिलाओं की भागीदारी के भी प्रावधान हैं. मिसाल के तौर पर जल जीवन मिशन के तहत हर गांव में ये कार्यक्रम लागू करने के लिए ‘पानी समितियों’ के गठन का प्रावधान है. महिलाओं को जल प्रबंधन की प्राथमिक भागीदार मानते हुए इन समितियों में उनके लिए पचास प्रतिशत जगहें आरक्षित की गई हैं. इस मिशन में पानी के संक्रमण का पता लगाने वाली किट इस्तेमाल करने के लिए हर गांव में पांच लोगों को ट्रेनिंग देने की व्यवस्था है, जिसमें महिलाओं को प्रशिक्षित करने को तरज़ीह दी जाती है.

जल जीवन मिशन में कौशल विकाश की प्रमुख योजनाओं जैसे कि प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के साथ तालमेल बिठाने की बात भी कही गई है, ताकि जल प्रबंधन के क्षेत्र में रोज़गार को बढ़ावा दिया जा सके. प्लंबिंग, राजमिस्त्रीगीरी, इलेक्ट्रिशियन और मोटर मेकैनिक जैसे हुनर के विकास के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है. इस समय हुनरमंद कामगारों का कोई उपलब्ध आंकड़ा या जानकारी नहीं है. लेकिन, इन कौशलों के विकास के लिए पूरे देश में महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

राजस्थान और गुजरात में महिलाओं को ‘भूजल जानकारों’ या फिर पैरा हाइड्रोलॉजिस्ट के रूप में ट्रेनिंग दी गई है, जो अटल भूजल योजना के तहत भू-गर्भ जल के स्तर और पानी की गुणवत्ता की निगरानी करती हैं.

महिलाओं को प्रशिक्षण देने के मामले में समुदाय स्तर पर काम करने वाले संगठनों और राज्यों की सरकारों द्वारा अच्छे काम के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं. मिसाल के तौर पर, उत्तर प्रदेश में पानी की क़िल्लत वाले बुंदेलखंड इलाक़े में, ‘जल सहेलियों’ के रूप में महिला स्वयंसेविकाओं का एक नेटवर्क तैयार किया गया है, जिन्हें हैंडपंपों की मरम्मत से लेकर पानी के पारंपरिक स्रोतों को फिर से जीवित करने जैसे जल प्रबंधन के कामों का प्रशिक्षण दिया गया है. राजस्थान और गुजरात में महिलाओं को भूजल जानकारोंया फिर पैरा हाइड्रोलॉजिस्ट के रूप में ट्रेनिंग दी गई है, जो अटल भूजल योजना के तहत भू-गर्भ जल के स्तर और पानी की गुणवत्ता की निगरानी करती हैं. 

सामुदायिक भागीदारी की अच्छी नीतियों के बावुजूद इन कार्यक्रमों के ज़रिए टिकाऊ रोज़गार पैदा करने में निवेश का अभाव रहा है. महिलाओं को प्रशिक्षण देकर, पूंजी से उनका जुड़ाव करके और स्वयं सहायता समूहों का लाभ उठाकर, जल प्रबंधन में महिलाओं को स्व-रोज़गार मुहैया कराने के मामले में काफ़ी संभावनाएं हैं. इससे ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी.

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