Published on Feb 19, 2024 Updated 0 Hours ago

भारत-अफ्रीका संबंधों की पूरी संभावना को उजागर करने के लिए ये ज़रूरी है कि अधिक तालमेल और सहयोग के माध्यम से पारस्परिक तौर पर लाभकारी साझेदारी को बढ़ावा दिया जाए.  

भारत-अफ्रीका संबंधों में एक नए अध्याय का समय अब आ गया है!

साल 2023 भारत की विदेश नीति के लिए एक अच्छा साल था. भारत ने ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) के लीडर के तौर पर अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए योग्यतापूर्वक अपनी G20 अध्यक्षता का इस्तेमाल किया. G20, ऐसा मंच जहां पारंपरिक तौर पर दुनिया के सबसे ताकतवर देशों का दबदबा रहा है, में अफ्रीकी यूनियन (AU) के लिए स्थायी सदस्यता सुरक्षित करना भारत की अध्यक्षता की विशेषता रही. G20 में अफ्रीका, ऐसा महाद्वीप जो अब तक दुनिया से जुड़े मामलों में हाशिए पर रहा है, को शामिल करने का अर्थ ये है कि अब वो वैश्विक मामलों में योगदान देने और उन्हें तय करने में सक्षम हो सकेगा. G20 के नेताओं को फोन कॉल के ज़रिए प्रधानमंत्री मोदी का तारीफ के लायक व्यक्तिगत दखल उम्मीद के मुताबिक था क्योंकि उन्होंने कई मौक़ों पर अफ्रीका को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया है. 

भारत अब अफ्रीका में पांच बड़े निवेशकों में से एक है और 1996 से 2022 के बीच भारत का कुल निवेश 73.9 अरब अमेरिकी डॉलर हो चुका है. साथ मिलकर भारत और अफ्रीका ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों, ख़ास तौर पर विश्व व्यापार संगठन (WTO), पर विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिए असरदार योगदान भी किया है. 

भारत और अफ्रीका के बीच साझा मूल्यों पर आधारित एक पारंपरिक साझेदारी है और अफ्रीका के भीतर भारत को लेकर काफी सद्भावना है. अफ्रीका के साथ भारत का व्यापार 2011-12 के 68.5 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2022-23 में 90.5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया और भारतीय निवेशकों ने भी अफ्रीका में अपने दायरे का विस्तार किया है. भारत अब अफ्रीका में पांच बड़े निवेशकों में से एक है और 1996 से 2022 के बीच भारत का कुल निवेश 73.9 अरब अमेरिकी डॉलर हो चुका है. साथ मिलकर भारत और अफ्रीका ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों, ख़ास तौर पर विश्व व्यापार संगठन (WTO), पर विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिए असरदार योगदान भी किया है. उन्होंने साझा प्रस्ताव पेश किए हैं जैसे कि कृषि रूप-रेखा का प्रस्ताव और हाल के दिनों में भारत और अफ्रीका ने WTO में कोविड-19 वैक्सीन के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार के छूट का प्रस्ताव पेश किया था.

हालांकि, नौ साल के लंबे इंतज़ार, जो कि असाधारण देरी है, के बाद चौथे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन का आयोजन साझेदारी के लिए अच्छा संकेत नहीं है जबकि पहले तीन शिखर सम्मेलन 2008 (नई दिल्ली), 2011 (आदिस अबाबा) और 2015 (नई दिल्ली) में लगातार आयोजित हुए थे. वैसे तो इस देरी के पीछे महामारी मुख्य वजह है लेकिन AU ने महामारी के बाद दूसरे साझेदारों के साथ कई शिखर सम्मेलनों का आयोजन किया है जैसे कि फोरम ऑन चाइना-अफ्रीका कोऑपरेशन (2021), अमेरिका-अफ्रीका लीडर्स समिट (2022), EU-AU समिट (2022), टोक्यो इंटरनेशनल समिट फॉर अफ्रीकन डेवलपमेंट (2022) और रूस-अफ्रीका समिट (2023). तीसरे भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन, जिसमें अफ्रीका के 54 देशों ने भागीदारी की थी, के बाद अब समिट की मेज़बानी की बारी अफ्रीका की है. इसलिए भारत को जल्द से जल्द भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन के आयोजन के लिए AU के साथ सक्रिय तौर पर जुड़ना चाहिए.

खाद्य सुरक्षा भारत-अफ्रीका साझेदारी की एक अहम बुनियाद रही है और पिछले तीन भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन के दौरान इस पर प्रमुखता से बातचीत हुई है. लेकिन अफ्रीका की मौजूदा कमज़ोरी और खाद्य आयात पर उसकी गंभीर निर्भरता को देखते हुए खाद्य सुरक्षा उसकी प्रमुख चिंता है.

इसके अलावा चौथे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन को G20 शिखर सम्मेलन के दौरान हासिल किए गए फायदों को आगे ले जाना चाहिए और भविष्य के लिए एजेंडा तैयार करना चाहिए. इसकी वजह ये है कि आख़िरी भारत-अफ्रीका फोरम समिट के आयोजन के बाद से बहुत कुछ बदल चुका है. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव अफ्रीकी महाद्वीप की किस्मत में हुआ है. नई सहस्राब्दी (मिलेनियम) में अच्छी शुरुआत के बाद पूरे महाद्वीप में विकास की रफ्तार धीमी हो गई है. 

कोविड-19 महामारी और यूक्रेन-रूस संघर्ष के दोहरे झटकों ने अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं को काफी नुकसान पहुंचाया है और महाद्वीप के ज़्यादातर देश वर्तमान में कर्ज़ संकट और खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के एक हालिया दस्तावेज़ के अनुसार DSF (डेट सस्टेनेबिलिटी फ्रेमवर्क यानी कम आमदनी वाले देशों में कर्ज़ लेने के फैसलों को इस तरह से तैयार करना जो उनकी वित्तीय ज़रूरतों और भुगतान करने की क्षमता के साथ मेल खाए) रेटिंग वाले 35 सब-सहारन अफ्रीकी देशों (सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में स्थित देश) में से आधे से अधिक कर्ज़ संकट के बहुत ज़्यादा ख़तरे का सामना कर रहे हैं या पहले से ही कर्ज़ संकट में फंसे हुए हैं. IMF के मुताबिक अफ्रीका में GDP की तुलना में कर्ज का अनुपात 2013 के 30 प्रतिशत से 2022 में दोगुना बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है और राजस्व की तुलना में ब्याज भुगतान का अनुपात, जो कि कर्ज चुकाने की क्षमता का एक महत्वपूर्ण संकेत है, भी 2010 के 5 प्रतिशत के मुकाबले 2022 में 11 प्रतिशत हो गया है. खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के ताज़ा अनुमान इशारा करते हैं कि 2022 में अफ्रीका की लगभग 20 प्रतिशत आबादी (करीब 28.2 करोड़ लोग) कुपोषित थी जो महामारी की शुरुआत के समय की तुलना में लगभग 5.7 करोड़ की बढ़ोतरी है. बहुत ज़्यादा खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे लोगों की संख्या में 150 प्रतिशत की भारी-भरकम बढ़ोतरी हुई है और ये 2019 के 6.1 करोड़ की तुलना में 2023 में 14.9 करोड़ हो गई है. खाद्य असुरक्षा को बढ़ाने में मुख्य भूमिका संघर्ष की है क्योंकि खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे लगभग 80 प्रतिशत लोग संघर्ष से प्रभावित देशों में रहते हैं. इसके अलावा 4 करोड़ से ज़्यादा लोग संघर्ष की वजह से विस्थापित हो गए हैं जो कि 2016 की तुलना में दोगुने से ज़्यादा हैं. 

अफ्रीकी महादेश ने 2020 से 2023 के बीच सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोहों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखी है और सात देशों यानी माली, चाड, गिनी, सूडान, बुर्किना फासो, गैबन और नाइजर में 9 बार सैन्य बग़ावत हो चुकी है (रेखा-चित्र 1). 

चित्र 1:  2000 से 2023 के बीच अफ्रीका में सफल विद्रोहों की संख्या 

स्रोत: https://projects.voanews.com/african-coups/

मौजूदा परिस्थितियां भारत-अफ्रीका संबंधों में एक नए अध्याय की अपील करती हैं. वैसे तो एकजुटता के मूल्य, पारस्परिक सम्मान और प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा युगांडा में बताए गए 10 मार्गदर्शक सिद्धांत भारत-अफ्रीका रिश्तों का मार्गदर्शन करते रहेंगे लेकिन समकालीन आवश्यकताओं, मुख्य तौर पर खाद्य सुरक्षा और कर्ज स्थिरता, पर ध्यान देने की सख़्त ज़रूरत है. खाद्य सुरक्षा भारत-अफ्रीका साझेदारी की एक अहम बुनियाद रही है और पिछले तीन भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन के दौरान इस पर प्रमुखता से बातचीत हुई है. लेकिन अफ्रीका की मौजूदा कमज़ोरी और खाद्य आयात पर उसकी गंभीर निर्भरता को देखते हुए खाद्य सुरक्षा उसकी प्रमुख चिंता है. ऐसे में अफ्रीका की खाद्य सुरक्षा और खेती में कायापलट आने वाले वर्षों में भारत-अफ्रीका के बीच भागीदारी के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होना चाहिए. साथ ही, जैसा कि ORF के विशेषज्ञों सौम्य भौमिक और नीलांजन घोष के द्वारा बताया गया है, अफ्रीका के देशों को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में मौजूद पूर्वाग्रह की वजह से दुनिया के दूसरे क्षेत्रों की तुलना में ज़्यादा ब्याज पर कर्ज़ लेना पड़ता है. इसलिए वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सुधार और अफ्रीका के कर्ज़ के बोझ का समाधान दूसरे प्रमुख लक्ष्य हैं जिनके लिए भारत और अफ्रीका- दोनों को काम करने का प्रयास करना चाहिए. भारत और अफ्रीका को भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन के मंच का उपयोग भविष्य के लिए एक एजेंडा बनाने में करना चाहिए. लेकिन समय तेज़ी से बीत रहा है क्योंकि 2024 भारत के लिए एक चुनावी साल है. क्या कोई सुन रहा है?


मलांचा चक्रबर्ती ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो और डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) हैं.

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Author

Malancha Chakrabarty

Malancha Chakrabarty

Dr Malancha Chakrabarty is Senior Fellow and Deputy Director (Research) at the Observer Research Foundation where she coordinates the research centre Centre for New Economic ...

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