Published on Jun 08, 2023 Updated 0 Hours ago
असमंजस की स्थिति बनी रहेगी, जब तक अमेरिकी ऋण संकट समाप्त नहीं हो जाता!

संयुक्त राज्य अमेरिका (US) की अपने कर्ज़ के भुगतान में चूक की संभावना गंभीर चिंता का मुद्दा है, क्योंकि इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है. दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका द्वारा कोई भी अस्थिरता या डिफॉल्ट वैश्विक स्तर पर एक विनाशकारी श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया की शुरुआत कर सकती है. इतना ही नहीं अमेरिका की आर्थिक अस्थिरता, पूरी दुनिया में  आर्थिक स्थिरता को डांवाडोल कर सकती है और वैश्विक भरोसे के वातावरण को भी नुक़सान पहुंचा सकती है. उल्लेखनीय है कि एक संभावित अमेरिकी ऋण चूक की छाया वैश्विक स्तर पर इसके दुष्प्रभावों को लेकर चिंताओं को बढ़ा रही है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसके नतीज़े केवल आर्थिक प्रभाव तक ही सीमित नहीं होंगे, बल्कि उससे भी कहीं अधिक होंगे.

ज़ोख़िमों की जानकारी के बावज़ूद कुछ नहीं किया

वर्तमान में अमेरिका एक बहुत बड़े राष्ट्रीय ऋण का सामना कर रहा है. अमेरिकी ऋण का आंकड़ा 28 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है और यह तेज़ी के साथ बढ़ रहा है. यह चौंका देने वाला आंकड़ा देखा जाए तो ऋण-से-जीडीपी अनुपात के 130 प्रतिशत से अधिक के बराबर है और यह स्पष्ट तौर पर दिखाता है कि अमेरिका में ऋण का बोझ आर्थिक विकास को पीछे छोड़ रहा है. राष्ट्रीय ऋण पर लगने वाला ब्याज भी अमेरिकी सरकार के लिए लगातार भारी ख़र्च की वजह बनता जा रहा है. अकेले वित्त वर्ष 2021 में ही अमेरिका ने ब्याज भुगतान पर 378 बिलियन यूएस डॉलर से अधिक का ख़र्च किया था. यह राशि अमेरिका के संघीय बजट का एक अहम हिस्सा है, जिसे ज़रूरी सार्वजनिक सेवाओं, बुनियादी ढांचे के विकास, या फिर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में निवेश के लिए आवंटित किया जा सकता था. अमेरिका में वित्तीय वर्ष 2020 में कोरोना महामारी से जुड़े राहत पैकेजों और आर्थिक मंदी के कारण 3.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का बजट घाटा देखा गया था. हालांकि, उस मुश्किल घड़ी के दौरान प्रोत्साहन उपाय ज़रूरी थे, लेकिन यह भी सच्चाई है कि इसके कारण पहले से ही ऋण के बोझ तले दबे अमेरिका को और ज़्यादा दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा.

सच्चाई यह है कि अमेरिका एक बड़ी ऋण-आधारित अर्थव्यवस्था या देश रहा है और यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है, लंबे वक़्त से सभी को पता है. एक वित्तीय नियामक या अर्थशास्त्री के लिए, वर्तमान आंकड़ों ने खुद ही एक बड़े ज़ोख़िम की ओर संकेत कर दिया होगा. ज़ाहिर है कि अमेरिका एक ऐसा देश है, जो अपने इकोनॉमिक ट्रैक को आगे बढ़ाने के लिए वैधानिक तरीक़ों का विभिन्न आर्थिक युक्तियों के माध्यम से इस्तेमाल करके अपने ऋण के लक्ष्य को बदलता रहता है.

कर्ज़ लेने की सीमा (Debt Ceiling) को लेकर बार-बार होने वाली बहसें हालात की जटिलता को और भी बढ़ाने का काम करती हैं. कर्ज़ लेने की सीमा उस ऋण की राशि पर एक वैधानिक लिमिट है, जिसे अमेरिकी सरकार अपने ऑपरेशन को वित्तपोषित करने के लिए जारी कर सकती है. ऋण लेने की सीमा को बढ़ाने और ऋण दायित्वों को पूरा करने में नाक़ामी एक डिफॉल्ट यानी ऋण चूक को सामने लाती है. हाल के वर्षों में, कर्ज़ लेने की सीमा को बढ़ाने के मुद्दे पर राजनीतिक टकरावों ने न केवल चिंताओं को बढ़ा दिया है, बल्कि संभावित ऋण चूक जैसी परिस्थितियों की संभावना को भी बढ़ा दिया है. ऋण लेने की सीमा निर्धारित करने और संशोधित करने का अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास है. विशेष रूप से कर्ज़ लेने की सीमा को बढ़ाने या रोकने के लिए क़ानून पास करने की ज़िम्मेदारी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट की है.

आगे का रास्ता

अमेरिकी ऋण डिफॉल्ट न केवल वित्तीय बाज़ारों में गंभीर मुश्किलों को सामने लाने का काम करेगा, बल्कि निवेशकों के विश्वास को अस्थिर करेगा और वैश्विक वित्तीय प्रणाली को बाधित करेगा. लंबे वक़्त से वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड को निवेश का एक सुरक्षित ठिकाना माना जाता है, जिसमें अन्य राष्ट्र भी शामिल हैं, जो इस तरह के ऋण पत्र रखते हैं. अमेरिकी ऋण भुगतान को लेकर फैली अनिश्चितता, जहां निवेशकों के विश्वास को कम कर देगी, वहीं यह कर्ज़ लेने की लागत और मार्केट में अस्थिरता को बढ़ाएगी. इतना ही नहीं, यह अनिश्चितता संभावित रूप से अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में दूरगामी प्रभावों को तेज़ कर रही है. इस तरह की आर्थिक अस्थिरता के प्रभाव दुनिया भर में व्यापार, निवेश और आर्थिक प्रगति को प्रभावित करते हुए अमेरिका की सीमाओं से बहुत दूर तक अनुभव किए जाएंगे. इसकी वजह से आने वाले दिनों में ऋण लेने की लागत में बढ़ोतरी हो सकती है, साथ ही यह अस्थिरता बढ़ाने और बाद में वैश्विक स्तर पर पैसों और संपत्ति के नुक़सान का भी कारण बन सकता है.

ऋण के भुगतान के मामले में अगर अमेरिका डिफॉल्ट करता है, तो इससे एक विश्वसनीय कर्ज़ लेने वाले के तौर पर अमेरिका की प्रतिष्ठा धूमिल होगी, साथ ही अमेरिका के वैश्विक रुतबे में भी कमी आएगी. ऐसी हालत में दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में अमेरिकी डॉलर की स्थिति को ख़तरा पैदा हो जाएगा और संभावित रूप से डॉलर के मूल्य में कमी आएगी, साथ ही मुद्रास्फ़ीति के दबाव में बढ़ोतरी होगी. जैसा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया के इकोनॉमिक सिस्टम के साथ नज़दीकी से जुड़ी हुई है, ऐसे में अमेरिका के ऋण डिफ़ॉल्ट के नतीज़े सभी सेक्टरों में दिखाई देंगे और ग्रोथ, रोज़गार सृजन एवं चौतरफा समृद्धि में रुकावट पैदा करेंगे.

अमेरिका के इस ऋण डिफ़ॉल्ट के वैश्विक गवर्नेंस वाले संस्थानों की विश्वसनीयता और भरोसे के लिए गंभीर निहितार्थ होंगे. एक ऐसा देश, जो वर्ल्ड बैंक के मुखिया को नियुक्त करता है, उसके ऋण चूक करने वाला राष्ट्र बनने के कई नकारात्मक प्रभाव होंगे. सरकारी संस्थानों और संसदीय हितधारकों की एक आम सहमति तक पहुंचने की क्षमता और अपनी वित्तीय जिम्मेदारी को बरक़रार रखना, जनता के विश्वास एवं लोकतांत्रिक शासन में भरोसा बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. बजटीय मुद्दों को संबोधित करने में नाक़ामी और ऋण भुगतान में डिफॉल्ट रोकने में विफलता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों में जनता के विश्वास को कम कर सकती है, साथ ही एक कार्यशील लोकतंत्र की नींव को भी कमज़ोर कर सकती है. अमेरिकी ऋण डिफॉल्ट नाज़ुक वैश्विक आर्थिक सुधार के लिए एक गंभीर झटके की तरह होगा. दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के पारस्परिक तौर पर जुड़े होने का अर्थ है, विश्‍व के एक हिस्‍से में आर्थिक अफरा-तफरी तेज़ी से दूसरे हिस्से में फैल सकती है. अमेरिकी वित्तीय प्रणाली में विश्वास की कमी एक श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया को भड़का सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर मंदी, रोज़गार समाप्त होने और ग़रीबी के स्तर में बढ़ोतरी हो सकती है. यह परिस्थिति जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और असमानता जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के प्रयासों में रुकावट पैदा करेगी.

अमेरिकी ऋण संकट के नतीज़े न केवल उसकी अपनी अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाएंगे, बल्कि आगे चलकर ये वित्तीय प्रभाव की सीमाओं से भी आगे बढ़ेंगे. अमेरिका में एक लंबे समय तक चलने वाला वित्तीय संकट इनकम की असमानता को बढ़ा सकता है, बेरोज़गारी दर में बढ़ोतरी कर सकता है और सामाजिक सुरक्षा तंत्र को तनाव में डाल सकता है. इसके अलावा, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं समेत विभिन्न ज़रूरी सेवाओं के लिए पैसों की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर अमेरिकी नागरिकों के ख़ुशहाल जीवन पर पड़ सकता है. इस तरह की ज़बरदस्त उथल-पुथल और झटकों का गहरा सामाजिक एवं मानवीय नतीज़ा होगा, जो समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग के लोगों को विशेष रूप से प्रभावित करेगा.

अमेरिकी ऋण चूक के भू-राजनीतिक प्रभावों को किसी भी प्रकार से कम करके नहीं आंका जा सकता है. वैश्विक महाशक्ति के रूप में अमेरिका वैश्विक स्थिरता और सुरक्षा को बनाए रखने में एक अहम भूमिका निभाता है. अमेरिका में डिफॉल्ट की स्थिति, महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से फोकस और संसाधनों दोनों को दूर कर देगी. इतना ही नहीं यह स्थिति संभावित रूप से गठबंधनों को कम कर देगी, अमेरिका की राजनयिक ताक़त को कमज़ोर कर देगी और भू-राजनीति पावर वैक्यूम पैदा कर देगी, जिसका प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रों या फिर गैर सरकारी किरदारों द्वारा फायदा उठाया जा सकता है. अमेरिका द्वारा ऋण चूक ग्लोबल ऑर्डर यानी वैश्विक व्यवस्था में चल रहे बदलाव को तेज़ कर सकता है. अमेरिकी कर्ज़ संकट पश्चिमी लोकतंत्रों की कथित स्थिरता को कमज़ोर कर सकता है, उनकी सॉफ्ट पावर को कमज़ोर कर सकता है और लोकतांत्रिक शासन की प्रभावशीलता को चुनौती देने वाले नैरेटिव में तेज़ी ला सकता है. यह संभावित रूप से अंतरराष्ट्रीय मंच पर शक्ति संतुलन को फिर से निर्धारित करने में भी तीव्रता ला सकता है.

सुरक्षा की निराधार भावना?

अत्यधिक और निरंतर बढ़ते ऋण के व्यवस्थागत मुद्दों को संबोधित किए बगैर, संकट को संभालने के लिए प्रबंधन की बनावटी तकनीक़, जैसे कि कर्ज़ के भुगतान में देरी या ऋण लेने की सीमा में बढ़ोतरी, केवल अस्थाई राहत प्रदान करती हैं, लेकिन राजकोषीय चुनौतियों की मूलभूत वजहों को दूर करने में नाक़ाम रहती हैं. ऐसा होने पर ज़्यादातर वैश्विक निवेशक को यही लगेगा कि इस बार भी यह संकट निकल जाएगा और आख़िर में, अमेरिका अपनी ऋण लेने की सीमा बढ़ाने के लिए राज़ी हो जाएगा और फिर आम जन-जीवन सामान्य रूप से इसी प्रकार से चलता रहेगा.

ज़ाहिर है कि इस तरह के अल्पकालिक सुधार आर्थिक स्थिरता की झूठी भावना पैदा कर सकते हैं, आवश्यक सुधारों में देरी कर सकते हैं और संभावित रूप से दीर्घकालिक आर्थिक ज़ोख़िमों को बढ़ा सकते हैं.

बुद्धिमानी के साथ और तार्किक ढंग से वित्तीय उपायों को लागू करने से सतत आर्थिक वृद्धि और स्थिरता के लिए एक मज़बूत आधार सुनिश्चित होता है. हालात को कृत्रिम तरीक़े से प्रबंधित करने की तकनीक केवल राजकोषीय चुनौतियों को कुछ समय के लिए टालने का काम करती हैं, जो कि संभावित रूप से भविष्य में मुद्दों को और अधिक पेचीदा बनाने की ओर ले जाती हैं. अमेरिका विवेकपूर्ण वित्तीय उपायों को प्राथमिकता देकर सक्रिय रूप से अपने कर्ज़ के बोझ को कम कर सकता है, ऋण लेने पर अपनी निर्भरता को कम कर सकता है, साथ ही राजकोषीय अनुशासन को बढ़ावा देने वाले संरचनात्मक सुधारों को लागू कर सकता है. अमेरिकी ऋण चूक के विनाशकारी परिणामों से बचने के लिए, वहां के सांसदों को ज़िम्मेदार वित्तीय प्रबंधन को प्राथमिकता देना बेहद ज़रूरी है. इसमें राष्ट्रीय ऋण के मुद्दे को संबोधित करना, सरकारी व्यय को सुव्यवस्थित करना और सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है.

वित्तीय अनुशासन, प्रभावी ऋण प्रबंधन, जिसमें अतिरिक्त ऋण लिए बगैर ऋण स्थितियों का प्रबंधन शामिल है, कम कर राजस्व के अलावा राजस्व का विविधीकरण और उत्पादक इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश जैसी ज़िम्मेदार वित्तीय नीतियां और क़दम लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने एवं सरकारी संस्थानों में जनता का भरोसा क़ायम रखने के लिए ज़रूरी हैं. आवश्यक सुधारों को कार्यान्वित किए बिना कृत्रिम तरीक़े से ऋण का प्रबंधन पारदर्शिता और जवाबदेही को समाप्त करने का काम करता है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमज़ोर करता है. अमेरिका बुद्धिमानी के साथ विभिन्न प्रकार के वित्तीय उपायों को अपनाकर लोकतांत्रिक शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित कर सकता है और एक कार्यशील लोकतंत्र की आधारशिला को मज़बूत कर सकता है.

ऋण की सीमा बढ़ाने की बातचीत का अब तक कोई नतीज़ा नहीं निकला है. राष्ट्रपति जो बाइडेन व्यक्तिगत रूप से इस बातचीत को आगे बढ़ा रहे हैं. ऋण का भुगतान अब से कुछ दिनों बाद, यानी 1 जून 2023 को करना है. यदि अमेरिकी ऋण लेने की सीमा को बढ़ाने के लिए तब तक कोई समझौता नहीं होता है, तो जो ऐसी भयानक और विनाशकारी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

यह भी एक तथ्य है कि अमेरिका द्वारा अपने ऋण भुगतान पर चूक की संभावना नहीं है क्योंकि ऋण संकट के कृत्रिम प्रबंधन को लेकर अमेरिका को महारत हासिल है. लेकिन ऐसे में अन्य राष्ट्रों के जेहन में एक सवाल उठेगा कि जिस प्रकार से वैश्विक स्तर पर बाज़ार और अर्थव्यवस्थाएं पारस्परिक तौर पर जुड़ी हुई हैं, ऐसे में लंबी अवधि में अमेरिका का बढ़ता ऋण डिफॉल्ट कितना टिकाऊ और सुरक्षित है? ख़ास बात यह है कि वैश्विक वित्तीय स्थिरता के संदर्भ में हमें इन्हीं हालातों से रूबरू होते रहना पड़ेगा, जब तक कि अमेरिकी ऋण संकट पूरी तरह से समाप्त नहीं जाए.


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