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इन घोषणापत्रों को देखने पर एक बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है. राजनीतिक दलों की दिलचस्पी वास्तविक क़दम उठाने से ज़्यादा बड़े-बड़े वादे करके मतदाताओं को लुभाने में है.
पश्चिम बंगाल में इस समय विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. ऐसे में हमें राज्य के चार प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों पर नज़र डालनी चाहिए. ये दल हैं–ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC), भारतीय जनता पार्टी (BJP), लेफ्ट फ्रंट (LF) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC). घोषणापत्रों का अध्ययन करके हम ये पता लगा सकते हैं कि इन चारों पार्टियों ने अपने मतदाताओं के सामने राज्य के विकास का कौन सा दृष्टिकोण पेश किया है.
इस मोर्चे पर, जहां TMC, BJP और कांग्रेस ने पेशेवराना तरीक़े से अपने घोषणापत्र बनाए हैं. वहीं, वाम मोर्चे ने बिल्कुल सादा और अनाकर्षक घोषणापत्र जारी किया. जिसमें वामपंथी विचारधारा के ख़ास पारंपरिक अंदाज़ में केवल विचारों और आरोपों को जमा किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ये घोषणापत्र सिर्फ़ ये बताता है कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस की और केंद्र में बीजेपी सरकार के चलते पश्चिम बंगाल को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. इन समस्याओं के समाधान के तौर पर वाम मोर्चा जो बातें पेश करता है, वो महज़ दिशाहीन अटकलबाज़ी है. उसमें कोई ठोस बात नज़र नहीं आती. आप वाम मोर्चे के घोषणापत्र के बारहवें पन्ने पर नज़र डालें तो लिखा है कि, ‘स्थानीय संसाधनों और क्षेत्रीय ख़ूबियों वाले विकास के लिए उचित योजना बनाने और बुनियादी ढांचे का विकास स्थानीय लोगों की भागीदारी से किया जाएगा…उत्तरी बंगाल, जंगलमहल और सुंदरबन जैसे पिछड़े इलाक़ों के विकास के लिए पहल की जाएगी.’ बड़ी–बड़ी बातों के बावजूद वाम मोर्चे ने नीतियों के मामले में कोई ठोस बात नहीं की है, जिससे प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने की कोई दिशा दिखे. इसके बजाय, लेफ्ट फ्रंट के घोषणापत्र में ज़्यादा ज़ोरदार तरीक़े से विरोधियों को ख़ारिज करने की बात नज़र आती है. जैसे कि, ‘केंद्र सरकार जन विरोधी नीतियों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष जारी रखा जाएगा…केंद्र द्वारा राज्यों के संवैधानिक अधिकारों के हनन का जो प्रयास किया जा रहा है, हम उसके ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखेंगे’ (पेज 11). घोषणापत्र की ये बातें, वामपंथी पार्टियों के उसी रूप को पेश करती हैं, जैसी वो पारंपरिक रूप से रही हैं: एक विध्वंसकारी और विकास की राह में बाधक ताक़त. केंद्र और राज्य के संबंध पिछले 44 साल से ‘टकराव वाले संघवाद’ के रूप में ही दिखे हैं, जिनसे किसी भी राज्य का भला नहीं हुआ है. ऐसी टकराव वाली सोच राज्य के लोगों के हितों के ख़िलाफ़ ही जाएगी. घोषणापत्र की ये बातें वामपंथी मोर्चे के प्रचंड राजनीतिक सिद्धांतों पर चलने का संकेत देती हैं. जबकि विचारधारा पर अड़े रहने की ये ज़िद वामपंथ के लिए बहुत घातक साबित हुई है. वैचारिक दृढ़ता के चलते वामपंथी राजनीति ऐसे पतन की शिकार है कि वो आज राज्य और केंद्र की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुकी है.
बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद वाम मोर्चे ने नीतियों के मामले में कोई ठोस बात नहीं की है, जिससे प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने की कोई दिशा दिखे. इसके बजाय, लेफ्ट फ्रंट के घोषणापत्र में ज़्यादा ज़ोरदार तरीक़े से विरोधियों को ख़ारिज करने की बात नज़र आती है.
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने विकास के दृष्टिकोण से अपना सबसे अच्छा घोषणापत्र प्रस्तुत किया था. हां, व्यवहारिकता के पैमाने पर हम उसकी भी आलोचना कर सकते हैं. फिर भी, इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के उस घोषणापत्र में नयापन था. पार्टी ने उसे तैयार करने में एक व्यापक नज़रिया अपनाया था. उसमें स्वास्थ्य का विषय भी था और हरित बजट तैयार करने की बातें भी थीं, जो भारत के विकास संबंधी दृष्टिकोण से अभूतपूर्व बात थी. अपने उस घोषणापत्र में कांग्रेस ने शिक्षा और जलवायु परिवर्तन पर ज़ोर देने की बात की थी. इस सभी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कांग्रेस ने कुछ नए और ठोस क़दम उठाने का प्रस्ताव रखा था. हालांकि, कांग्रेस के इन प्रस्तावों की अच्छाई भी उसे चुनावी जीत नहीं दिला सकी! दुर्भाग्य की बात है कि कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल के चुनाव में अपना जो घोषणापत्र जारी किया है उसमें महिलाओं की सुरक्षा और पिछड़े वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा की बातें हैं. लेकिन, कांग्रेस के घोषणापत्र में पश्चिम बंगाल के औद्योगिक विकास का कोई स्पष्ट नज़रिया नहीं पेश किया गया है. जबकि पार्टी ने ये माना है कि राज्य में सूक्ष्म, लघु और मध्यम वर्ग के उद्योगों (MSME) के विकास की ज़रूरत है. कांग्रेस ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रस्ताव रखे हैं, वो आधे–अधूरे मन से जारी किए गए लगते हैं. फिर भी, हमें ये तो मानना पड़ेगा कि कांग्रेस का ये घोषणापत्र राज्य का इकलौता ऐसा घोषणापत्र है, जिसमें अपने राजनीतिक विरोधियों पर कोई इल्ज़ाम नहीं लगाया गया है, और न ही मौजूदा सरकार की नाकामियों का कोई ज़िक्र किया गया है.
जहां तक तृणमूल कांग्रेस के घोषणापत्र की बात है, तो साफ़ दिखता है कि ये किसी पेशेवर का काम है. ख़ास तौर से अगर हम इसके डिज़ाइन और तथ्यों की बात करें तो ये 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए बने तृणमूल कांग्रेस के घोषणापत्र की तुलना में काफ़ी बेहतर है. लोकसभा चुनाव के लिए तृणमूल ने जो घोषणापत्र जारी किया था, वो विकास के अपने विज़न और अपने तथ्यों, दोनों ही नज़रियों से एकदम बकवास था. बल्कि, वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों के लिए तृणमल कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कई ठोस प्रस्ताव पेश किए हैं. जैसे कि, ‘…1.6 करोड़ बंगाली परिवारों की महिला प्रमुखों को न्यूनतम मासिक आमदनी देने का प्रस्ताव, जिसके तहत पार्टी ने सामान्य वर्ग के परिवारों को 500 रुपए महीने या साल के 6 हज़ार रुपए देने का प्रस्ताव रखा है. वहीं, अनुसूचित जातियों–जनजाति वाले परिवारों को एक हज़ार रुपए महीने या साल में बारह हज़ार रुपए देने’ का वादा उल्लेखनीय है. लेकिन, इन वादों के पीछे जो बुनियादी सोच है वो यही है कि, ‘…राज्य के हर परिवार का औसत मासिक व्यय 5,249 रुपए ही है.’ इस नज़रिए से देखें, तो तृणमूल कांग्रेस द्वारा किए गए वादे से परिवारों का 10-20 प्रतिशत ख़र्च ही पूरा होगा, वो भी राज्य के बस इतने ही परिवारों का. तृणमूल कांग्रेस के इस वादे से दो सवाल खड़े होते हैं. पहला सवाल आंकड़ों के अनुमानों से जुड़ा है. अगस्त 2018 में NABARD द्वारा जारी किए गए, अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण 2016-17 (NAFIS) के अनुसार, ग्रामीण भारतीय परिवारों की औसत मासिक खपत का ख़र्च 6,646 रुपए था, वो भी वित्तीय वर्ष 2015-16 के दौरान. अगर हम इसमें सालाना आठ प्रतिशत की दर से बढ़ने वाली महंगाई को जोड़ लें, तो वर्ष 2020-21 में किसी औसत ग्रामीण भारतीय परिवार का मासिक ख़र्च लगभग 9,765 रुपए बैठता है. इसीलिए, यहां एक बात ध्यान देने लायक़ है; तृणमूल कांग्रेस का घोषणापत्र ये वादा क़तई नहीं करता कि वो इस सब्सिडी के ज़रिए, राज्य के लोगों की मासिक खपत को राष्ट्रीय स्तर के बराबर पहुंचाएगा. दूसरी बात ये है कि रोजगार सृजन के ज़रिए खपत को बढ़ाने का जो तीसरा तरीक़ा है, उसके लिए बंगाल में निवेश के लिए उचित माहौल बनाने की ज़रूरत होगी. इस मोर्चे पर तृणमूल कांग्रेस का घोषणापत्र उसी तरह बिल्कुल नाकाम नज़र आता है, जैसी पिछले एक दशक के दौरान उसकी सरकार की नीतियां रही हैं.
कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल के चुनाव में अपना जो घोषणापत्र जारी किया है उसमें महिलाओं की सुरक्षा और पिछड़े वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा की बातें हैं. लेकिन, कांग्रेस के घोषणापत्र में पश्चिम बंगाल के औद्योगिक विकास का कोई स्पष्ट नज़रिया नहीं पेश किया गया है.
फिर भी, तृणमूल कांग्रेस के घोषणापत्र में दो–तीन ऐसी बातें हैं, जिनका उल्लेख करना तो बनता है. 15 अप्रैल 2020 को फाइनेंशियल टाइम्स में अपने एक लेख में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने विकास के वितरण में समानता लाने की बात दोहराई थी. प्रोफ़ेसर सेन ने इसके लिए, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इंग्लैंड और वेल्श में लोगों की औसत आयु में हुई वृद्धि की मिसाल दी थी. ऐसा लगता है कि तृणमूल कांग्रेस ने प्रोफ़ेसर सेन के उस लेख से प्रेरणा ली है. इसीलिए, पार्टी ने खाद्य सुरक्षा के आयाम को, ख़ास तौर से भंडारण और वितरण के संदर्भ में घोषणापत्र का हिस्सा बनाया है. पर, यहां भी सवाल वादे से ज़्यादा इसे अमली जामा पहनाने और लागू करने का है. तृणमूल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने और हर स्तर पर संसाधनों को हड़पने के इल्ज़ाम लगे हैं. यही वजह है कि पार्टी के भ्रष्टाचार के शिकार हुए लोगों ने इसके ख़िलाफ़ ज़ोर–शोर से आवाज़ उठाई है. इसके अलावा, तृणमूल कांग्रेस का आपदा प्रबंधन का तरीक़ा भी मोटा–मोटी नाकाम ही रहा है. हमें समुद्री चक्रवात अंफन के दौरान इसकी मिसाल देखने को मिली थी. अब तक सत्ताधारी पार्टी अपने बंगाल की खाड़ी में जलवायु परिवर्तन के सबसे ज़्यादा शिकार तटीय इलाक़ों में इसके दुष्प्रभावों से निपटने के लिए कोई दूरदृष्टि दिखा पाने में नाकाम रही है. पार्टी के घोषणापत्र में भी इस बारे में कोई ठोस बात नहीं कही गई है.
अपनी राष्ट्रीय पहुंच और वित्तीय संसाधनों के बूते पर भारतीय जनता पार्टी ज़रूर बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए ‘एक लोक–लुभावन’ घोषणापत्र सामने रखने में सफल रही है. पार्टी इसे ‘संकल्प पत्र’ कहती है. बीजेपी के घोषणापत्र की सबसे बड़ी सफलता वो आंकड़े हैं, जिन्हें पार्टी हासिल करने का इरादा रखती है. लैंगिक, सामुदायिक और वितरण की दृष्टि से बीजेपी ने घोषणापत्र को समावेशी और समानता का आधार देने की कोशिश की है. बीजेपी के घोषणापत्र में राज्य के औद्योगीकरण और विकास को बेहतर बनाने की बात है. लेकिन, ऐसे घोषणापत्र बनाने में बीजेपी की एक समस्या हर बार देखने को मिलती है. बीजेपी इन वादों को पर्यावरण और स्थायी विकास के नज़रिए से कैसे पूरा करेगी, इसका कोई ज़िक्र नहीं होता है. फिर भी, बंगाल चुनाव के लिए जारी सभी घोषणापत्रों में अकेले बीजेपी का संकल्प पत्र ही है जो, राज्य में कारोबार करने के लिए सहज माहौल बनाने का वादा करती है. पार्टी ने अपने इन्वेस्ट इंडिया के नारे के बदले हुए रूप इन्वेस्ट बांग्ला के ज़रिए पश्चिम बंगाल में निवेश बढ़ाने का वादा किया है. इसके अलावा बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उद्योगों (MSMEs) की अहमियत को भी स्वीकार किया है. लेकिन, जैसा कि हमने ORF के रिसर्च में पहले भी कहा था कि, सरकारें संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास के लक्ष्यों (SDGs) के हिसाब से चलते हुए भी किसी अर्थव्यवस्था में कारोबारी प्रतिद्वंदिता का माहौल बेहतर बना सकती हैं. ऐसे में प्राकृतिक पूंजी को विकास के लक्ष्यों में पर्याप्त रूप से जगह देने में नाकामी से उद्योगों का भला हीं हो सकता है. इसके अलावा, बीजेपी के घोषणापत्र में इस बात का भी ज़िक्र नहीं है कि बंगाल की खाड़ी और सुंदरबन के द्वीप समूहों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए कोई दूरगामी रणनीति बनेगी या नहीं.
1.6 करोड़ बंगाली परिवारों की महिला प्रमुखों को न्यूनतम मासिक आमदनी देने का प्रस्ताव, जिसके तहत पार्टी ने सामान्य वर्ग के परिवारों को 500 रुपए महीने या साल के 6 हज़ार रुपए देने का प्रस्ताव रखा है. वहीं, अनुसूचित जातियों-जनजाति वाले परिवारों को एक हज़ार रुपए महीने या साल में बारह हज़ार रुपए देने’ का वादा उल्लेखनीय है.
हालांकि, बीजेपी के घोषणापत्र में आपदा प्रबंधन पर लंबा चौड़ा आख्यान लिखा गया है. इसमें मानवीय और भौतिक पूंजी के विकास के लिए ठोस प्रस्तावों का हवाला दिया गया है. इसके अतिरिक्त, बीजेपी के संकल्प पत्र में कोलकाता का ज़िक्र ख़ास तौर से किया गया है. बीजेपी की ‘एक्ट ईस्ट’ की राष्ट्रीय नीति और बंगाल की खाड़ी की बढ़ती अहमियत के तहत–जिसमें विदेश मंत्री द्वारा हाल ही में बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों पर ज़ोर देने की बात शामिल है–बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में कोलकाता को विकास के केंद्र और सांस्कृतिक बदलाव का केंद्र बनाने की बात है. इसके अलावा बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में बंगाल की खाड़ी की ब्लू इकॉनमी की संभावनाओं का दोहन करने की बात भी कही है. केंद्र और राज्य के बीच ‘टकराव वाले संघवाद’ के चलते कोलकाता की ये सामरिक अहमियत पिछले कई दशकों में गंवा दी गई थी.
तो, बंगाल चुनाव के लिए सभी पार्टियों के घोषणापत्रों से क्या पता चलता है? इन घोषणापत्रों में एक बात तो एकदम तय है. राजनीतिक दल, जनता को वास्तविक परिवर्तन की राह दिखाने से ज़्यादा लोक–लुभावन वादे करने में यक़ीन रखते हैं. यही वजह है कि इन घोषणापत्रों में दूरगामी अवधि के लिए एक विकास के एक व्यापक दृष्टिकोण का अभाव दिखता है. जो पार्टियां किसी कम विकसित क्षेत्र को विकसित करने में सफल रही हैं, उन्होंने लंबे समय तक राज किया है. इसका एक उदाहरण, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हैं. पटनायक ने ओडिशा के अविकसित क्षेत्रों में औद्योगीकरण से उनका विकास किया है. इससे उन क्षेत्रों में उग्रवाद को रोकने में भी सफलता मिली है. इसके अलावा नवीन पटनायक के नेतृत्व में देश की सबसे अच्छी आपदा प्रबंधन की नीतियों में से एक का विकास किया गया है. ओडिशा की तुलना में पश्चिम बंगाल में 34 बरस तक ऐसी सरकार रही है, जो एक औद्योगिक राज्य के पतन के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार रही. इसीलिए इस बार पश्चिम बंगाल का चुनाव आने वाले कई दशकों के लिए राज्य का भविष्य तय करने वाला है.
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Dr Nilanjan Ghosh heads Development Studies at the Observer Research Foundation (ORF) and serves as the operational and executive head of ORF’s Kolkata Centre. He ...
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