Author : Manoj Joshi

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 28, 2024 Updated 0 Hours ago

यूक्रेन पर रूस के हमले और नाटो को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के अवहेलना के भाव को देखते हुए यूरोपियन यूनियन अब अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए कई मोर्चों पर काम कर रहा है.

यूक्रेन युद्ध और ट्रंप का उभार: अपनी सुरक्षा के लिए यूरोप कितना तैयार?

2014 में रूस ने जब क्रीमिया पर कब्जा किया था, तभी से ये साफ दिख रहा था कि यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए एकजुट होना होगा. लेकिन फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अब यूरोपीय देशों में भी ये भावना तेज़ हो गई है कि सुरक्षा के मोर्चे पर जल्द कुछ करना होगा. इस साल अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप एक मजबूत उम्मीदवार के तौर पर उभर रहे हैं, उसने भी सुरक्षा को लेकर यूरोप की चिंता और बढ़ा दी है. नाटो (NATO) को लेकर ट्रंप के मन में हमेशा से एक अवहेलना और नफरत का भाव रहा है. नाटो ही अब तक यूरोप के लिए सुरक्षा दीवार का काम करता रहा है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि नाटो के ज़रिए मुफ्तखोरों पर अमेरिकी संसाधनों की बर्बादी होती है. ट्रंप ने इस साल फरवरी में साउथ कैरोलिना की एक रैली में ये कहकर सियासी भूचाल पैदा कर दिया कि उन्होंने एक बड़े देश के नेता से कहा कि अगर रूस उनके देश पर हमला करेगा तो अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर वो उसकी रक्षा नहीं करेंगे. ट्रंप के मुताबिक इस नेता ने उनसे कहा था कि अगर उनका देश नाटो में बने रहने के लिए अपनी जीडीपी की 2 प्रतिशत राशि का भुगतान करने की ज़रूरी शर्त पूरी नहीं कर पाता तो क्या अमेरिका उनके देश के रूस के हमले से बचाएगा. इसी पर ट्रंप ने ने कहा कि मैं आपकी रक्षा नहीं करूंगा बल्कि वो तो रूस से ये कहेंगे कि वो जो करना चाहता है, कर ले.

ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अपने हिस्से का भुगतान करेगा लेकिन बाकी देशों को भी ऐसा करना होगा. अमेरिका किसी दूसरे देश का खर्च नहीं उठाएगा. वैसे नाटो से बाहर होने का फैसला करना ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा. 

इसके बाद ब्रिटेन के जीबी न्यूज़ से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि वो अमेरिका के नाटो में बने रहने के हक में हैं लेकिन इसके लिए यूरोप के देशों को भी नाटो के लिए तय किए गए अपने हिस्से का भुगतान करना होगा. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अपने हिस्से का भुगतान करेगा लेकिन बाकी देशों को भी ऐसा करना होगा. अमेरिका किसी दूसरे देश का खर्च नहीं उठाएगा. वैसे नाटो से बाहर होने का फैसला करना ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा. दिसंबर 2023 में ही अमेरिकी कांग्रेस ने एक विधेयक पास किया, जिसके मुताबिक नाटो से अलग होने के लिए किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को कांग्रेस से मंजूरी लेनी होगी.

ट्रंप के इस बयान का सबसे पहला असर यूक्रेन को लेकर यूरोप की सोच पर पड़ेगा. पिछले 2 साल से नाटो ने यूक्रेन की हर तरह से मदद की है, जिससे वो रूस के हमले का जवाब दे सके. ट्रंप ने कहा था कि अगर वो अमेरिका के राष्ट्रपति होते तो 24 घंटे में युद्ध रुकवा देते. ट्रंप के दावे का क्या मतलब है, ये तो कोई नहीं जानता लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर ट्रंप ने अब तक जो भी बातें कहीं हैं, उनके आधार पर ये कहा जा सकता है कि अगर ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति होते तो वो यूक्रेन का रूस से समझौता करवाते और यूक्रेन से अपने पूर्वी हिस्से को रूस को देने को कहते.

हालांकि अगर यूक्रेन ये युद्ध हारता है तो इसके यूरोप पर व्यापक प्रभाव पडेंगे. इससे इस्टोनिया और लातविया जैसे बाल्टिक देशों में रूस के आक्रमण का ख़तरा बढ़ जाएगा. इस्टोनिया और लातविया की 25 फीसदी आबादी रशियन मूल की है. अगर ऐसा होता है तो इससे अमेरिका की उस छवि को भी नुकसान पहुंचेगा, जिसके तहत अमेरिका दुनिया के कई देशों खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के देशों को सुरक्षा की गारंटी देता है.

यूरोप की सुरक्षा का विस्तार

धीरे-धीरे ही सही लेकिन यूरोप भी अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को दोबारा चुस्त-दुरुस्त बनाने में जुट गया है. फिलहाल नाटो के सदस्य यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा पर सालाना 380 अरब डॉलर खर्च कर रहे हैं. ये राशि रूस के रक्षा बजट के बराबर ही है. लेकिन चूंकि ये रक्षा खर्च कई देशों में बंटा है इसलिए उन देशों पर इसका उतना असर नहीं पड़ता. यूरोपीयन यूनियन के सामने चुनौती सिर्फ इस रकम को खर्च करने की ही नहीं है. उसे ये भी सुनिश्चित करना होता है कि नॉर्वे समेत ईयू के सभी 27 देशों में इसे लेकर एक समानता का भाव आए. नॉर्वे ने ही नाटो के गठन में अहम भूमिका निभाई थी.

हाल ही में यूरोपीय कमीशन ने हथियारों के उत्पादन में मदद करने वाले कानून (ASAP) के तहत यूरोपियन रक्षा उद्योग को 500 मिलियन डॉलर की रकम आवंटित की. इस आर्थिक मदद का मकसद हथियारों के उत्पादन की क्षमता को बढ़ाना है, जिससे अगले साल के आखिर तक इसकी उत्पादन क्षमता में दोगुना बढ़ोतरी हो और 2 मिलियन गोलों का उत्पादन हो सके. यूरोपियन कमीशन ने हथियारों का उत्पादन बढ़ाने के लिए 31 अलग-अलग परियोजनाओं को चुना है. इस बात में कोई शक नहीं कि यूरोपियन कमीशन ने हथियार उत्पादन बढ़ाने का जो ये फैसला लिया, उसकी वजह यूक्रेन में चल रहा युद्ध है. 7 अक्टूबर 2023 को इज़रायल पर हुए हमले के बाद अमेरिका ने अपने हथियारों की सप्लाई यूक्रेन को करने की बजाए इज़रायल को करनी शुरू कर दी है. इससे यूक्रेन और यूरोप को झटका लगा है.

आर्थिक मदद का मकसद हथियारों के उत्पादन की क्षमता को बढ़ाना है, जिससे अगले साल के आखिर तक इसकी उत्पादन क्षमता में दोगुना बढ़ोतरी हो और 2 मिलियन गोलों का उत्पादन हो सके.


यूरोपियन कमीशन ने एक और फैसला किया है. अभी यूरोप का रक्षा उद्योग अलग-अलग देशों में बिखरा है लेकिन अब इसे एक जगह केंद्रित करने की तैयारी है. हथियारों की साझा खरीद के ज़रिए यूरोपियन रक्षा उद्योग को प्रोत्साहित (EDIRPA) करने की योजना है. इसके लिए एक साझा यूरोप डिफेंस फंड (EDF) बनाया गया है. इस फंड का बजट फिलहाल 2 अरब डॉलर का है और इसकी मदद से यूरोप में मरणासन्न पड़े रक्षा उद्योग को दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश की जा रही है. 310 मिलियन बजट के सहारे EDIRPA तीन क्षेत्रों में हथियारों की साझा खरीद करेगा. 1) छोटे हथियार, आर्टिलरी, मोर्टार और रॉकेट. 2) एयर और मिसाइल डिफेंस. 3) पुराने टैंकों को बदलना, बख्तरबंद गाड़ियां, ड्रोन और सपोर्ट सिस्टम. EDIRPA को उम्मीद है कि इस साल जुलाई तक सदस्य देश इस बारे में अपने प्रस्ताव दे देंगे. उसका मानना है कि अगर ईयू के सदस्य देश हथियारों की साझा खरीद करते हैं तो यूरोप की रक्षा क्षमता में बढ़ोतरी होगी.

रक्षा तकनीकी के क्षेत्र में यूरोप की क्षमता बढ़ाने के लिए यूरोप डिफेंस फंड ने प्रस्ताव मांगे थे. इसके बाद 1.1 अरब डॉलर आवंटित किए गए. इसमें वो स्टार्टअप भी शामिल हैं. जो यूरोपियन यूनियन डिफेंस इनोवेशन सिस्टम (EUDIS) के तहत काम कर रहे हैं

EDF के ज़रिए यूरोपियन कमीशन अपना यहां रक्षा उद्योग के क्षेत्र में शोध और विकास को बढ़ावा देना चाहता है. छोटी और बड़ी रक्षा कंपनियों को इस योजना में शामिल किया गया है. इस काम के लिए उसने 2021 से 2027 के लिए 8 अरब डॉलर का फंड आवंटित किया है, जिससे रक्षा तकनीकी के क्षेत्र में शोध को तेज़ किया जाए. यूरोपियन कमीशन की तरफ से उठाए जा रहे इन सारे कदमों को यूरोपियन डिफेंस इंडस्ट्री प्रोग्राम (EDIP) के तहत सूचीबद्ध किया गया है. इसका मकसद यूरोप के रक्षा उद्योग को किसी भी आपातकालीन स्थिति के लिए तैयार रखना है. इसी साल मार्च की शुरूआत में यूरोपियन डिफेंस इंडस्ट्रियल स्ट्रेटजी को मंजूरी दी गई. यूरोप में रक्षा उद्योग की स्थापना के लिए ये एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है.

अपनी इसी योजना पर काम करते हुए EDIP ने अब यूरोपियन डिफेंस इनोवेशन सिस्टम के तहत ठोस उपाय अपनाने शुरू कर दिए हैं. इसके तहत यूरोप के रक्षा उद्योग को आर्थिक मदद दी जाएगी. इतना ही नहीं इसका मकसद यूरोप के रक्षा उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाना भी है. यूरोपियन यूनियन ने ये भी फैसला किया है कि वो युद्ध से बर्बाद यूक्रेन के पुनर्निर्माण और आधुनिकीकरण के लिए भी मदद देगा. यूक्रेन को नियमित तौर पर हथियारों की आपूर्ति भी की जाती रहेगी. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ईयू अब अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए एक साथ कई मोर्चों पर काम कर रहा है. इस योजना में सबसे अहम है रक्षा पर खर्च बढ़ाना. अगर भविष्य में कोई आकस्मिक खर्च होता है तो उसे संभालने की जिम्मेदारी भी यूरोप डिफेंस फंड की होगी. इसके अलावा EDIP के ज़रिए साझा खरीद की बात इसलिए कही जा रही है कि इसमें दोहराव ना हो. ईयू अब अपने सदस्य देशों के बीच सैनिक सहयोग बढ़ाने, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और हथियारों की आपूर्ति को भी सुनिश्चित करने पर ध्यान दे रहा है.

इतना सब करने के बावजूद यूरोप पर अतीत का बोझ बना हुआ है. वो अपने रक्षा खर्च के लक्ष्य से 56 अरब डॉलर पीछे हैं. हालांकि अच्छी ख़बर ये है कि पिछले एक दशक में ये कमी आधी रह गई है. नाटो के अधिकारियों के मुताबिक इस साल दो-तिहाई सदस्य अपनी जीडीपी की 2 फीसदी रकम को नाटो को देने का लक्ष्य हासिल कर लेंगे. 2014 में सिर्फ 3 देश ऐसा कर पाए थे.

हालांकि अभी भी यूरोप के कई बड़े देश जीडीपी की 2 फीसदी रकम नाटो को देने के लक्ष्य तक नहीं पहुंचे हैं. इटली, स्पेन और बेल्जियम की अर्थव्यवस्था की हालत ठीक नहीं है. जर्मनी भी 1.39 प्रतिशत ही रकम दे पाया है, जो उसके लक्ष्य से 14 अरब डॉलर कम है. पिछले साल नाटो पर जितना खर्च हुआ, उसका दो-तिहाई हिस्सा यानी 1.2 ट्रिलियन डॉलर अमेरिका ने खर्च किए जबकि ईयू, ब्रिटेन और नॉर्वे ने साझा तौर पर 361 अरब डॉलर की खर्च किए.

अगर अमेरिका नाटो से अलग होता है या फिर यूरोपियन यूनियन अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाते हैं तो इससे भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा.


ऐसा नहीं है कि ये देश कोशिश नहीं कर रहे. पौलेंड अपनी जीडीपी का 4 फीसदी रक्षा पर खर्च करना चाहता है. पौलेंड को हमेशा इस बात का ख़तरा रहता है कि कहीं रूस उस पर हमला कर दे. कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट में कहा गया कि चेक रिपब्लिक ने अलग-अलग जगह से जो हथियार जमा किए हैं, उसमें से करीब एक लाख गोले वो यूक्रेन को देने वाला है. हाल ही में फ्रांस, जर्मनी और पौलेंड के नेताओं ने यूक्रेन की स्थिति को लेकर एक मीटिंग की. इन देशों ने वाइमर ट्रायंगल नाम से संगठन बनाया है. इस मीटिंग में हथियारों की खरीद सिर्फ यूरोप से करने के फ्रांस के सुझाव को खारिज़ किया और कहा कि हथियारों की खरीद दुनियाभर से हो. रक्षा के मोर्चे पर फ्रांस और जर्मनी को यूरोप की अगुवाई करनी होगी. यही दोनों देश फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम  और ज़मीनी आक्रमण पर हमले का जवाब देने की रणनीति में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं. लेकिन एक बात तय है कि अगर अमेरिका अचानक नाटो से अलग होने का फैसला करता है तो इसका यूरोप पर काफी विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. कई ऐसे मुद्दे यूरोप के सामने खड़े हो जाएंगे जिन्हें संभालना उसके लिए बहुत मुश्किल होगा. लेकिन यूरोपियन यूनियन अगर रूस के साथ-साथ अमेरिका को भी ये दिखाने में कामयाब होता कि उसकी रक्षा क्षमता काफी बढ़ गई है तो फिर रूस भी यूरोप के खिलाफ कोई हमलावर कार्रवाई करने से बचेगा.

भारत पर क्या प्रभाव?

अगर अमेरिका नाटो से अलग होता है या फिर यूरोपियन यूनियन अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाते हैं तो इससे भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा. भारत को तो भविष्य में रक्षा सहयोग के लिए एक नया पार्टनर मिल जाएगा. इसका एक पहलू ये भी है कि अगर अमेरिका नाटो से हटा तो हो सकता है यूक्रेन का पतन हो जाए. लेकिन अगर ऐसा हुआ तो दुनियाभर में अमेरिका की जो एक भरोसेमंद देश की छवि है, उसे नुकसान होगा. सिर्फ सहयोगी देशों ही नहीं बल्कि भारत का भी अमेरिका पर भरोसा कम होगा.

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