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Published on Feb 05, 2024 Updated 0 Hours ago

ऊर्जा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच एक बुनियादी संबंध है. सेहत को आगे बढ़ाने में ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण है.

स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए ऊर्जा-सेहत के संबंध में मज़बूती

परिचय

ऊर्जा एक तेज़ी से बढ़ती हुई सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता का विषय बनती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र के एक साझेदार संगठन सस्टेनेबल एनर्जी फॉर ऑल (हर किसी के लिए सतत ऊर्जा) ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि “सतत ऊर्जा के बिना सतत विकास संभव नहीं है”. दुनिया भर में लगभग 2.3 अरब लोग अभी भी ठोस ईंधन (जिसे जलाकर ऊर्जा मिलती है) से खाना बनाते हैं और एक अनुमान के मुताबिक केवल 2020 में 32 लाख लोगों की मौत घरेलू वायु प्रदूषण की वजह से हुई है. इनमें पांच वर्ष से कम उम्र के 2,37,000 बच्चों की मौत शामिल है. जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल ने महिलाओं पर अधिक असर डाला है. विद्वानों ने लंबे समय से ऊर्जा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संबंध के महत्व पर चर्चा की है. तेज़ी से तकनीकी प्रगति और जलवायु परिवर्तन एवं सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के व्यापक संदर्भ में सेहत के लिए ऊर्जा सुरक्षित करने की वैश्विक सोच को बढ़ावा मिल रहा है. इच्छित परिणामों की निगरानी के लिए स्पष्ट निर्देश और मापने योग्य संकेतकों के बिना परिवर्तन और स्वास्थ्य सुरक्षित करने की सोच और गतिशीलता अधूरी होगी. सेहत को आगे बढ़ाने में ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण है. 

इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 26 जनवरी को “अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा दिवस” के तौर पर घोषित किया है (प्रस्ताव A/77/327) ताकि स्वच्छ ऊर्जा की तरफ एक न्यायसंगत और समावेशी बदलाव के लिए जागरूकता बढ़ाई जा सके और कदम तेज़ किया जा सके. 

जब हम स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों (सोशल डेटर्मिनेन्ट्स) की चर्चा कर रहे हैं तो ऊर्जा सुरक्षा और सेहत के ऊर्जा निर्धारकों को भी शामिल करना अनिवार्य और अब महत्वपूर्ण है. ऊर्जा को सुरक्षित करना न केवल स्वास्थ्य को प्रभावित करेगा बल्कि दूसरे SDG जैसे कि SDG 1 (ग़रीबी को ख़त्म करना), SDG 5 (लैंगिक समानता हासिल करना), SDG 6 (स्वच्छ पानी की उपलब्धता), SDG 8 (रोज़गार की सुरक्षा और आर्थिक विकास), SDG 13 (जलवायु परिवर्तन से मुकाबला) और SDG 17 (लक्ष्यों के लिए साझेदारी) को प्राप्त करना भी. सुरक्षित, सुगम, किफायती और सतत ऊर्जा सुरक्षित करके SDG को हासिल करने से स्वास्थ्य सुरक्षा मिलेगी. इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 26 जनवरी को “अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा दिवस” के तौर पर घोषित किया है (प्रस्ताव A/77/327) ताकि स्वच्छ ऊर्जा की तरफ एक न्यायसंगत और समावेशी बदलाव के लिए जागरूकता बढ़ाई जा सके और कदम तेज़ किया जा सके. 

मौजूदा समय में ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में दो मुख्य समस्याएं हैं इसकी खपत (जो ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में योगदान देती है) और पहुंच में कमी. पहला रेखाचित्र अलग-अलग देशों की प्रति व्यक्ति GDP की तुलना में प्रति व्यक्ति खपत आधारित CO2 के उत्सर्जन को दिखाता है और ये बताता है कि जिन देशों में प्रति व्यक्ति GDP ज़्यादा है वहां कार्बन उत्सर्जन अधिक है. ये विषमता विकसित, विकासशील, कमज़ोर और संघर्ष प्रभावित परिस्थितियों (FCAS) वाले देशों के बीच ऊर्जा की उपलब्धता में पक्षपात की वजह से भी है. दूसरा रेखाचित्र बिजली तक पहुंच रखने वाले अलग-अलग आय समूहों की आबादी के प्रतिशत में साफ बंटवारा दिखाता है. ये दोनों ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे स्वास्थ्य सेक्टर के लिए चिंता का विषय बन जाते हैं क्योंकि ऊर्जा असुरक्षा वाले विश्व के इलाकों में आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों तक जीवन बचाने वाली सेवाओं की डिलीवरी विश्वव्यापी स्वास्थ्य कवरेज को हासिल करने में रुकावट डालती है. एक अनुमान के मुताबिक विकासशील देशों में लगभग 1 अरब लोगों को स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी सेवाएं ऐसे केंद्रों में दी जाती है जहां या तो भरोसेमंद बिजली की सप्लाई नहीं है या सप्लाई बिल्कुल है ही नहीं. ये स्थिति स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ ऊर्जा में अधिक रिसर्च एवं विकास और SDG 7.2 (नवीकरणीय ऊर्जा के हिस्से में बढ़ोतरी) हासिल करने के लिए ऊर्जा परिवर्तन (एनर्जी ट्रांज़िशन) को तेज़ करने को आवश्यक बनाती है. 

रेखा-चित्र 1: प्रति व्यक्ति खपत आधारित CO2 उत्सर्जन बनाम प्रति व्यक्ति GDP

स्रोत: आवर वर्ल्ड इन डेटा

रेखा-चित्र 2: बिजली की उपलब्धता (जनसंख्या का प्रतिशत)

स्रोत: विश्व बैंक

ऊर्जा परिवर्तन की चुनौतियां

स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के सामने कई बाधाएं हैं. ये स्थिति तब है जब कम-से-कम पिछले दो दशकों से जलवायु परिवर्तन के साथ स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन का संबंध राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है. विश्व युद्ध के बाद के युग में कई भू-राजनीतिक तनाव देखे गए हैं. इनमें निर्यात पर प्रतिबंध से लेकर पूरी तरह से युद्ध तक शामिल हैं. इसकी वजह से अलग-अलग देशों ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित करने पर ध्यान बढ़ाया है. ये भू-राजनीतिक घटनाएं सप्लाई लाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर में रुकावट डालती हैं जिसका ऊर्जा सुरक्षा पर असर होता है. दूसरी तरफ भू-राजनीति को तय करने में ऊर्जा सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि इसमें शक्ति के संतुलन को निर्धारित करने और अलग-अलग देशों की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने की क्षमता है. 

भू-राजनीति को तय करने में ऊर्जा सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि इसमें शक्ति के संतुलन को निर्धारित करने और अलग-अलग देशों की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने की क्षमता है. 

विश्व बैंक में ऊर्जा एवं निष्कर्षण (एनर्जी एंड एक्सट्रैक्टिव्स) के वैश्विक निदेशक ने राय दी कि बिजली की लागत, स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं की उपलब्धता और जीवाश्म ईंधन पर अधिक निर्भरता की वजह से विकासशील देश ऊर्जा परिवर्तन के लिए तीन गुना जुर्माना अदा करते हैं. इसके अलावा ये पाया गया है कि ख़राब शासन व्यवस्था (गवर्नेंस), लक्षित (टारगेटेड) सब्सिडी की कमी, प्रभावहीन योजना और अपर्याप्त क्षमता ने ऊर्जा परिवर्तन को पंगु बना दिया है. इसलिए जब कम कार्बन ऊर्जा की दिशा में नीतियां बनाई जा रही हैं तो अलग-अलग भागीदारों को ऐसे फैसले लेने चाहिए जो समावेशी हों और उतार-चढ़ाव एवं झटकों को रोकते हों ताकि ऊर्जा तक पहुंच को सुनिश्चित किया जा सके. 

ऊर्जा परिवर्तन के ख़तरों को लेकर आगे बढ़ते हुए ऊर्जा की मांग और आपूर्ति का निरंतर जोखिम बना रहेगा और बदले में ये वैश्विक राजनीति को प्रभावित करेगा. ऊर्जा प्रणालियों में बदलाव भू-राजनीति को प्रभावित कर सकता है जैसा कि जीवाश्म ईंधन के साथ देखा गया है. तेल के कार्टेल (उत्पादकों का गुट) और संगठनों की तरह जो देश स्वच्छ ऊर्जा की तकनीकों में आगे होंगे वो ताकत और धन के मामले में मज़बूत होंगे क्योंकि ऊर्जा को लेकर निर्भरता ‘जीवाश्म ईंधन’ से ‘स्वच्छ ऊर्जा’ की तरफ हो जाएगी. इसलिए उन सामूहिक कदमों को विकसित करना महत्वपूर्ण है जो स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण सामग्रियों की प्रौद्योगिकी, वित्त और सप्लाई चेन की कमज़ोरियों से जुड़ी चिंताओं का समाधान करते हैं. 

आगे का रास्ता 

अलग-अलग देशों के बीच मौजूदा संघर्ष और प्रतिस्पर्धा स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन की मांग करती हैं. ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए कुछ उल्लेखनीय प्रतिबद्धताएं हैं- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के द्वारा स्वास्थ्य एवं ऊर्जा पर उच्च-स्तरीय गठबंधन एवं हेल्थ एंड एनर्जी प्लैटफॉर्म ऑफ एक्शन (HEPA), वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के द्वारा सस्टेनेबल डेवलपमेंट इंपैक्ट मीटिंग्स, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के द्वारा क्लीन एनर्जी ट्रांज़िशन प्रोग्राम, भारत एवं फ्रांस के द्वारा शुरू इंटरनेशनल सोलर अलायंस और भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस. पिछले दिनों आयोजित COP28 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन) के दौरान जलवायु एवं स्वास्थ्य के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ बदलाव पर चर्चा के समय ‘जीवाश्म ईंधन’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया गया. 

सरकार, निजी संगठनों और NGO के कदमों के साथ ऊर्जा-स्वास्थ्य संबंध की ये वैश्विक पहल प्रभावी सैंपल कलेक्शन और वैक्सीन की डिलीवरी के लिए महत्वपूर्ण रही हैं. उदाहरण के लिए, कोविड-19 के दौरान सौर ऊर्जा से चलने वाले पोर्टेबल रेफ्रिजरेटर ने भारत में दूर-दराज के इलाकों में 1,50,000 से ज़्यादा वैक्सीन लगाने में अहम भूमिका अदा की. ये NGO, प्राइवेट सेक्टर और सरकारी संस्थानों की मदद से संभव हो पाया. NGO ने इस काम के लिए मैनपावर मुहैया कराया, प्राइवेट सेक्टर ने फंडिंग की और सरकारी संस्थानों ने उनके सही इस्तेमाल में सहायता की. ऊर्जा एवं स्वास्थ्य सुरक्षा पर इस तरह की पहल होने के बावजूद वैश्विक प्रतिबद्धता का पालन होना एक चुनौती रही है. इसकी वजह कमज़ोर और संघर्ष प्रभावित परिस्थितियों (FCAS) वाले देशों में राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक अनिश्चितता है. 

ऊर्जा खपत से जुड़े स्वास्थ्य के प्रभाव के समाधान और नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ बदलाव के लिए एक जैसे दृष्टिकोण की जगह संदर्भ पर आधारित विशेष समाधान और परिस्थितियों की आवश्यकता है. जलवायु, ऊर्जा और स्वास्थ्य से जुड़े लक्ष्यों तक लचीले ढंग से पहुंचने के लिए मुद्दा विशिष्ट हल की जगह प्रणाली केंद्रित समाधान की तरफ बदलाव होना चाहिए. रिबाउंड मॉडल ऑफ रिजिलियंस (लचीलेपन का रिबाउंड मॉडल) एक ऐसा दृष्टिकोण है जो ऊर्जा-स्वास्थ्य संबंध से जुड़ी चिंताओं के प्रभावी ढंग से समाधान के लिए उपलब्ध नीतिगत विकल्पों की पहचान, समीक्षा और प्राथमिकता में मदद कर सकता है. ये मॉडल प्रतिबद्धताओं के निर्धारण एवं एकजुटता; क्षमताओं के नियंत्रण एवं चुस्ती; और लचीली प्रणाली होने के लिए पूंजी के संसाधन और नेटवर्क की पड़ताल करता है. तीसरा रेखा-चित्र ख़राब परिस्थितियों में ऊर्जा और स्वास्थ्य सुरक्षा को लचीला बनाने के संदर्भ में अनुकूलित रिबाउंड मॉडल ऑफ रिज़िलियंस को दिखाता है. 

रेखा-चित्र 3: ऊर्जा-स्वास्थ्य संबंध के लचीलेपन के लिए सुझाई गई रूपरेखा

ऑटोमेटिक तैयार लचीलेपन के प्रकार के एक मॉडल का डायग्राम

स्रोत: रिबाउंड मॉडल ऑफ रिजिलियंस से बदला गया

भू-राजनीतिक समीकरण में बदलाव की वजह से वैल्यू चेन की कमज़ोरी के किसी ख़तरे के असर को कम करने के लिए कम एवं मध्यम आमदनी वाले देशों (LMIC), कमज़ोर एवं संघर्ष प्रभावित परिस्थितियों (FCAS) वाले देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SID) का सामर्थ्य बढ़ाने की आवश्यकता है. ये मॉडल प्रतिकूल परिस्थितियों के दौरान सरकारों और अलग-अलग संगठनों के लिए उबरने के साधनों, तरीकों और मानसिकता की तलाश के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है. उदाहरण के लिए, चूंकि कमज़ोर और संघर्ष प्रभावित देशों के लिए नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश को आकर्षित करना मुश्किल है, ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को विकसित करने के लिए फंड और नेटवर्क मुहैया कराने वाली पीस रिन्यूएबल एनर्जी क्रेडिट (P-REC) जैसी पहल को ज़रूर बढ़ावा देना चाहिए. भू-राजनीतिक समीकरण में बदलाव की वजह से वैल्यू चेन की कमज़ोरी के किसी ख़तरे के असर को कम करने के लिए कम एवं मध्यम आमदनी वाले देशों (LMIC), कमज़ोर एवं संघर्ष प्रभावित परिस्थितियों (FCAS) वाले देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SID) का सामर्थ्य बढ़ाने की आवश्यकता है. प्रतिबद्धताओं के प्रति संकल्प और एकजुटता महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि कई विकासशील देशों को संसाधनों से जुड़ी अपनी मजबूरियों के कारण वैश्विक सहयोग की व्यवस्था में नुकसान का सामना करना पड़ता है. अस्थायी मंचों का निर्माण, पहल और सफल उदाहरणों से सीखना वैश्विक भागीदारी की बाधाओं से पार पाने के लिए रणनीतियों को अपनाने और महत्वपूर्ण साझेदारियों की वकालत करने में प्रभावी हो सकता है. ये क्लाइमेट वल्नरेबल फोरम और ग्रीन क्लाइमेट फंड के मामले में देखा गया है. इसलिए ऊर्जा-स्वास्थ्य संबंध का समाधान करने के उद्देश्य से ऊर्जा परिवर्तन को तेज़ करने वाली लचीली प्रणाली का निर्माण करने के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर के अलग-अलग भागीदारों को बढ़ावा देना समय की मांग है. 

संजय एम. पट्टनशेट्टी कर्नाटक के मणिपाल में मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन (MAHE) में प्रसन्ना स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के डिपार्टमेंट ऑफ ग्लोबल हेल्थ गवर्नेंस के प्रमुख हैं.

अनिरुद्ध इनामदार प्रसन्ना स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी में रिसर्च फेलो हैं.

किरण भट्ट मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन में प्रसन्ना स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी में रिसर्च फेलो हैं.

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Authors

Aniruddha Inamdar

Aniruddha Inamdar

Aniruddha Inamdar is a Research Fellow at the Centre for Health Diplomacy, Department of Global Health Governance, Prasanna School of Public Health, Manipal Academy of ...

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Kiran Bhatt

Kiran Bhatt

Kiran Bhatt is a Research Fellow at the Centre for Health Diplomacy, Department of Global Health, Prasanna School of Public Health, Manipal Academy of Higher ...

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