Author : Avni Arora

Published on Oct 18, 2022 Updated 24 Days ago

सपना बताती हैं कि मोबाइल टेक्नोलॉजी से जुड़ने के शुरुआती दौर में उनके मन में जिज्ञासा होने के साथ-साथ डर का भी भाव था. हालांकि बचपन से ही धुन की पक्की सपना ने इस चुनौती से भी पार पाने का दृढ़ निश्चय कर लिया. उन्होंने इसे अपनी क्षमताओं को मज़बूत बनाने के मौक़े के तौर पर देखा

सपना झा: ललितपुर में डिजिटल साक्षरता की इबारत लिखने वाली सशक्त महिला!

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सपना झा ने उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले के छोटे से गांव खेड़ा के बेहद साधारण परिवार में जन्म लिया. परिवार के लोग गुज़र-बसर के लिए अपनी खेतीबाड़ी वाली ज़मीन पर निर्भर थे, लिहाज़ा उनके पास बच्चों की शिक्षा पर ख़र्च करने के लिए मुट्ठी भर रकम बचती थी. पांच भाई-बहनों में चौथे नंबर वाली सपना पढ़ना चाहती थीं. साथ ही ये भी सुनिश्चित करना चाहती थीं कि उनका छोटा भाई भी पढ़-लिख सके. दरअसल सपना के बड़े भाई-बहन शिक्षित नहीं थे. ऐसे में सपना ने अपने गांव के स्कूल से कक्षा 5 तक की पढ़ाई की और पड़ोस के गांव अमरोहा से 8वीं पास की. इससे आगे की पढ़ाई जारी रखने देने के लिए सपना को अपने पिता से काफ़ी मिन्नतें करनी पड़ीं, तब जाकर उन्हें अपने छोटे भाई के साथ महरौनी गांव (खेड़ा से तक़रीबन 16 किमी दूर) के स्कूल में दाख़िला लेने की इजाज़त मिली. यहीं से उन्होंने 10वीं की पढ़ाई पूरी की. हालांकि, जल्द ही सामाजिक दबाव के चलते उनकी पढ़ाई रुक गई. सपना बताती हैं कि क़रीब 14 साल की उम्र में उनका ब्याह कर दिया गया था.

मई 2020 में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के साथ हाथ मिलाकर उत्तर प्रदेश बिजली सखी योजना की शुरुआत की. इस स्कीम का मक़सद बिजली-पानी से जुड़ी मौजूदा योजनाओं को डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के साथ जोड़ना है ताकि महिलाओं को प्रशिक्षित किए जाने के बाद उनके लिए रोज़गार के अवसर पैदा किए जा सकें.

ललितपुर ज़िले में महज़ 23.8 प्रतिशत महिलाओं[i] को ही 10 साल से ज़्यादा की स्कूली शिक्षा नसीब हो पाई है. ऐसे में 10वीं तक की पढ़ाई कर पाना सपना के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है. ये शिक्षा आज भी उनके काम आ रही है.

मई 2020 में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के साथ हाथ मिलाकर उत्तर प्रदेश बिजली सखी योजना की शुरुआत की. इस स्कीम का मक़सद बिजली-पानी से जुड़ी मौजूदा योजनाओं (utility plans) को डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के साथ जोड़ना है ताकि महिलाओं को प्रशिक्षित किए जाने के बाद उनके लिए रोज़गार के अवसर पैदा किए जा सकें. रोज़गार से जुड़ी इस ख़ास योजना के तहत स्वयं-सहायता समूहों (SHGs) की महिला सदस्यों को विद्युत सखी के तौर पर प्रशिक्षित किया जाता है. इस कड़ी में उन्हें घर-घर जाकर बिजली बिल के भुगतान हासिल करने का प्रशिक्षण दिया जाता है. योजना के आग़ाज़ से लेकर अबतक विद्युत सखियों ने साझा तौर पर लगभग 6.25 करोड़ रु के बिजली भुगतान जमा किए हैं.

ननोरा गांव में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत संचालित स्वयं-सहायता समूह की सदस्य सपना 10वीं तक की शिक्षा हासिल कर चुकी समूह की इकलौती मेंबर थीं. लिहाज़ा यूपी बिजली सखी योजना शुरू होने पर समूह में उनके दूसरे साथियों ने उन्हें इसके लिए आवेदन करने को प्रेरित किया. आख़िरकार उन्हें विद्युत सखी के रूप में चुन लिया गया, जिसमें उन्हें हर महीने वेतन के तौर पर 6,000 रु मिलते हैं. ये काम पाकर सपना बेहद ख़ुश थीं क्योंकि अब वो अपने बच्चों को पढ़ा सकती थीं. साथ ही अपनी कमाई के ज़रिए अपने पति का हाथ भी बंटा सकती थीं. उनके उनके पति लोहे से तैयार छोटे-छोटे साज़ोसामान बेचने के अपने पुश्तैनी काम में लगे हैं.

उत्तर प्रदेश में महिलाओं (15-49 साल तक की उम्र वाली) का प्रौद्योगिकीय सशक्तिकरण
ख़ुद के प्रयोग के लिए मोबाइल फ़ोन रखने वाली महिलाएं 46.5%
मोबाइल फ़ोन रखने वाली महिलाओं में SMS संदेश पढ़ सकने वाली महिलाएं 65.7%
वित्तीय लेन-देनों के लिए मोबाइल का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं 18.0%
इंटरनेट का प्रयोग कर चुकी महिलाएं 30.6%

स्रोत: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2019-21[ii]

बहरहाल, विद्युत सखी के तौर पर कामयाब होने के लिए सहभागी का डिजिटल तौर पर सशक्त होना ज़रूरी है. इस स्कीम के लिए चुने जाने तक सपना के घर में मौजूद इकलौता फ़ोन उनके पति के पास था. इस तरह प्रौद्योगिकी से सपना का शुरुआती जुड़ाव बेहद सीमित था. सपना बताती हैं कि मोबाइल टेक्नोलॉजी से जुड़ने के शुरुआती दौर में उनके मन में जिज्ञासा होने के साथ-साथ डर का भी भाव था. हालांकि बचपन से ही धुन की पक्की सपना ने इस चुनौती से भी पार पाने का दृढ़ निश्चय कर लिया. उन्होंने इसे अपनी क्षमताओं को मज़बूत बनाने के मौक़े के तौर पर देखा. दरअसल वो घर का चूल्हा-चौका संभालने वाली महिला की अपनी बुनियादी पहचान से आगे निकलना चाहती थीं. जल्द ही ‘डिजिटल साक्षरता’ कार्यक्रम में उनका दाख़िला हो गया. सिविल सोसाइटी संगठन डिजिटल अल्टरनेटिव्स के कार्यक्रम के रूप में इस पहल की अगुवाई डिजिटल साक्षरता प्रशिक्षक बबली दीदी कर रही थीं. डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम को वूमेन कनेक्ट चैलेंज इंडिया के ज़रिए संचालित किया जा रहा है, जो रिलायंस फ़ाउंडेशन और USAID की एक साझा पहल है.

डिजिटल अल्टरनेटिव्स क्षमता-निर्माण की प्रक्रिया के हरेक हिस्से से काफ़ी नज़दीकी से जुड़ा है. इसमें प्रशिक्षण के लिए लक्षित गांवों की पहचान करना, डिजिटल साक्षरता पर अभियान चलाना, प्रशिक्षण कार्यशालाओं के बाद प्रशिक्षुओं का मार्गदर्शन करना और ज़मीनी स्तर की चुनौतियों के लिए टिकाऊ समाधान तैयार करने में मदद करना शामिल हैं.

इसी के तहत सपना ने डिजिटल साक्षरता कक्षाओं में हिस्सा लिया. इन कक्षाओं से जुड़ा अपना अनुभव साझा करते हुए सपना की आंखों में चमक आ जाती है. सपना ने फ़रवरी-मार्च 2022 में महज़ 24 दिनों में ये कोर्स पूरा कर लिया. इस दौरान सपना को स्मार्टफ़ोन चलाने, OTT मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्मों का इस्तेमाल करने, ई-वॉलेट्स के संचालन, सर्च इंजन समेत तमाम दूसरे ऐप्लिकेशंस के प्रयोग के बारे में प्रशिक्षित किया गया. दरअसल, विद्युत सखी के तौर पर अपने कामकाज के निपटारे के लिए सपना को इन तमाम ऐप्लिकेशंस की ज़रूरत पड़ने वाली थी. सपना कहती हैं, “शुरुआत में गांव में इधर-उधर घूमने को लेकर मेरे मन में तरह-तरह की आशंकाएं थीं. लोग क्या कहेंगे, मुझे इस बात का डर रहता था. लेकिन जब अपनी कक्षाओं और बाद में काम के लिए मैंने बाहर आना-जाना शुरू कर दिया तब मैंने ये सारी बातें भुला दीं. मेरा पूरा ध्यान अपने काम पर था और मेरे लिए बस यही बात मायने रखती थी.” इन कक्षाओं से जुड़कर सपना ख़ुद को सशक्त और स्वतंत्र महसूस करने लगी थीं. धीरे-धीरे उन्हें अपने कामकाज और इधर-उधर आने-जाने की ज़रूरत से जुड़ाव का भी एहसास होने लगा. इस तरह आख़िरकार उन्हें ज़िंदगी के तमाम दूसरे पहलुओं पर भी अपना अधिकार लगने लगा.

सपना ने फ़रवरी-मार्च 2022 में महज़ 24 दिनों में ये कोर्स पूरा कर लिया. इस दौरान सपना को स्मार्टफ़ोन चलाने, OTT मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्मों का इस्तेमाल करने, ई-वॉलेट्स के संचालन, सर्च इंजन समेत तमाम दूसरे ऐप्लिकेशंस के प्रयोग के बारे में प्रशिक्षित किया गया. दरअसल, विद्युत सखी के तौर पर अपने कामकाज के निपटारे के लिए सपना को इन तमाम ऐप्लिकेशंस की ज़रूरत पड़ने वाली थी. 

सपना बताती हैं कि किस प्रकार अपने नए-नवेले कौशल के ज़रिए उन्होंने ऑनलाइन तरीक़े से कुर्सी ख़रीदने में अपने पड़ोसी की मदद की. पुरुषों द्वारा इंटरनेट का उपयोग अपनाए जाने के संदर्भ में देखें तो ये घटना बेहद अहम मालूम होती है. दरअसल, महामारी के चलते ज़्यादातर गतिविधियां ऑनलाइन माध्यमों से होने लगीं, ऐसे में 2021 में इंटरनेट का प्रयोग करने वाले पुरुषों की तादाद 45 प्रतिशत से बढ़कर 51 प्रतिशत हो गई[iii] जबकि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की तादाद 30 प्रतिशत पर ही बरक़रार रही. निश्चित रूप से सपना (और उन जैसी तमाम विद्युत सखियों) द्वारा पहुंचाई गई मदद से बाक़ी महिलाओं को काफ़ी सहूलियत हो सकती है. इस तरह वीडियो कॉलिंग करने, ऑनलाइन शॉपिंग करने और मैसेजिंग ऐप्लिकेशंस के ज़रिए दूसरों के साथ संपर्क बनाए रखने जैसी ऑनलाइन गतिविधियों के लिए इन महिलाओं की दूसरों पर निर्भरता घट सकती है.

इससे ‘रोल मॉडल इफ़ेक्ट’[iv] की अहमियत साबित होती है, जो बर्तावों में बदलाव को रफ़्तार देती है. सपना ने तक़रीबन 70 महिलाओं को डिजिटल साक्षर होने के लिए प्रेरित किया है और इन महिलाओं में व्यवहार से जुड़े बदलाव लाने में सपना की ज़बरदस्त भूमिका रही है. अब ये महिलाएं भी समूह बनाकर अपने कौशल दूसरों से साझा कर रही हैं.

डिजिटल साक्षरता कक्षाओं के दौरान अपनी सहेली सीमा के साथ बिताए वक़्त को सपना बेहद चाव से याद करती हैं. कक्षाओं के दौरान वो हमेशा साथ-साथ रहतीं. पूरे सत्र में दोनों ने सीखने-समझने में एक दूसरे की भरपूर मदद की. इस तरह दोनों के साथ से एक मज़बूत ‘यारी-दोस्ती वाला प्रभाव’[v] दिखाई दिया. इससे दोनों को डिजिटल कौशल सीखने में मदद मिली. बबली दीदी ने सपना को मोबाइल पत्रकारिता में व्यावसायिक कोर्स के लिए भी नामांकित किया है. इसके तहत सामुदायिक विकास से जुड़े मसलों पर नारीवादी नज़रिए से अनुभवों की रिकॉर्डिंग की जाती है. मोबाइल पत्रकार के तौर पर अपने पहले तजुर्बे के रूप में सपना ने महिलाओं के एक समूह द्वारा ग्राम प्रधान के साथ सड़क और नालों के निर्माण से जुड़े मसलों पर बातचीत की रिकॉर्डिंग की. समूह ने पंचायत समिति के ब्लॉक मैनेजर को भी इस मसले पर तमाम प्रमाण पेश किए. मोबाइल पत्रकार बनीं सपना को दूरदराज़ के गांवों तक जाना पड़ता है. इस तरह उन्होंने पेशेवर रूप से संवाद करने के गुर सीखे हैं. उन्होंने तमाम तरह के लोगों से बातचीत करने और उनसे हासिल जानकारियों को दस्तावेज़ के तौर पर सहेजने का कौशल सीख लिया है. इस पाठ्यक्रम ने उन्हें लोगों के साथ सीधा संवाद करने और सार्थक नतीजों तक पहंचने की प्रेरणा दी है. डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स तो सपना के काम का दायरा और आगे बढ़ाने की जुगत में लगा था और उसने स्थानीय रेडियो स्टेशन में उनके लिए पार्ट-टाइम स्ट्रिंगर की भूमिका भी ढूंढ ली.

टेक्नोलॉजी का प्रयोग सीख लेने के बाद सपना का सामना अनजाने हालातों और अजनबी इलाक़ों से होने लगा. इस तरह उनमें आत्म-निर्भरता की भावना आई, और दुनिया का सामना करने का साहस मिला. साथ ही टेक्नोलॉजी का प्रयोग करने और लोगों से मिलने-जुलने को लेकर उनकी झिझक मिट गई. निश्चित रूप से अपने निजी जीवन में और बाहर साफ़-साफ़ दिखने वाली तमाम रुकावटों से पार पाकर वो उतनी मज़बूत बनकर उभरी हैं जितना उनके परिवार ने भी नहीं सोचा था.

अपने बहुमुखी कामकाज और तजुर्बों की बदौलत सपना अपने समुदाय में सांस्कृतिक बदलाव लाने में कामयाब रही हैं. इस तरह अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी तमाम महिलाओं के लिए डिजिटल युग की शुरुआत हो सकी है. बहरहाल, शिक्षित होने के चलते डिजिटल दायरों की ये यात्रा सपना के लिए अपेक्षाकृत आसान रही है. गांव की दूसरी महिलाएं सपना जैसी पढ़ी-लिखी नहीं हैं, लिहाज़ा उन्हें अभी इन चुनौतियों से पार पाना होगा. सपना फ़िलहाल जिस गांव में रहती हैं वहां महिलाएं ग्राम प्रधान समेत कई अहम पदों की अगुवाई कर रही हैं.

मोबाइल पत्रकार बनीं सपना को दूरदराज़ के गांवों तक जाना पड़ता है. इस तरह उन्होंने पेशेवर रूप से संवाद करने के गुर सीखे हैं. उन्होंने तमाम तरह के लोगों से बातचीत करने और उनसे हासिल जानकारियों को दस्तावेज़ के तौर पर सहेजने का कौशल सीख लिया है. इस पाठ्यक्रम ने उन्हें लोगों के साथ सीधा संवाद करने और सार्थक नतीजों तक पहंचने की प्रेरणा दी है. 

उनकी डिजिटल साक्षरता सामाजिक मसलों के हल में कैसे कारगर रही है, ये पूछे जाने पर सपना बताती हैं, “अतीत में लोगों को अपना बिजली बिल जमा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी होती थी, चूंकि ये गांव मुख्य रूप से खेतीबाड़ी पर निर्भर है लिहाज़ा लोगों के पास अक्सर इतनी दूर जाने का वक़्त ही नहीं होता था. इससे उन्हें विलंब शुल्क के रूप में भारी-भरकम रकम जमा करनी पड़ती थी. जबसे मैंने हर महीने घर-घर जाकर लोगों से बिजली शुल्क जमा लेने की ज़िम्मेदारी संभाल ली है, तबसे इस तरह की घटनाएं बंद हो गई हैं. गांव के परिवारों के लिए ये व्यवस्था बेहद सुविधाजनक है, और मुझे लगता है कि मैं अपने छोटे से योगदान से समाज में बदलाव ला पा रही हूं.” सपना के मुताबिक टेक्नोलॉजी की मदद से ही उसे ये रोज़गार मिल पाया है और इसी ने महिलाओं के कामकाज को लेकर गांववालों का नज़रिया भी बदल डाला है. इतना ही नहीं, अब तो गांववालों ने भी टेक्नोलॉजी से अपना रिश्ता जोड़ लिया है.

चित्र1. ख़ुद के इस्तेमाल के लिए मोबाइल फ़ोन रखने वाली महिलाओं का राज्यवार हिस्सा

स्रोत: CNBC[vi]

मुख्य सबक़

  • साथियों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाना एक असाधारण विचार है. इससे स्वयं-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को डिजिटल रूप से सशक्त बनाया जा सकता है.
  • सार्वजनिक क्षेत्र में बिजली-पानी की योजनाओं को डिजिटल कौशल योजना के साथ जोड़े जाने से प्रभावी नतीजे हासिल हो सकते हैं. इससे महिलाओं की आर्थिक क्षमता और गतिशीलता के मोर्चे पर सांस्कृतिक बदलाव लाया जा सकता है.
  • प्रौद्योगिकी पर आधारित ज़मीनी कार्यक्रमों में ‘रोल-मॉडल इफ़ेक्ट’ अमल में लाए जाने महिलाओं को आगे बढ़ने और व्यवहार संबंधी बदलाव लाने के संभावित किरदार बनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है.

NOTES

[i] National Family Health Survey 5 (2019-21), District Fact Sheet – Lalitpur Uttar Pradesh, http://rchiips.org/nfhs/NFHS-5_FCTS/UP/Lalitpur.pdf

[ii] National Family Health Survey 5 (2019-21), “India and State Fact Sheets: Uttar Pradesh”, http://rchiips.org/nfhs/NFHS-5_FCTS/Uttar_Pradesh.pdf

[iii] GSMA, “The Mobile Gender Gap Report 2022,” https://www.gsma.com/r/gender-gap/

[iv] Lori Beaman Esther Duflo Rohini Pande, and Petia Topalova, “Female Leadership Raises Aspirations and Educational Attainment for Girls: A Policy Experiment in India”, Science, Vol. 335, No. 6068, pp. 582-586, January 2021,

https://www.science.org/doi/abs/10.1126/science.1212382?sid=5af5982f-d8c0-45a6-ae78-f016618ec2e9&cookieSet=1

[v] Erica Field, Seema Jayachandran, Rohini Pande, and Natalia Rigol, “Friendship at Work : Can Peer Effects Catalyze Female Entrepreneurship,” American Economic Journal, Vol. 8, No. 2, pp. 125-153, May 2016, https://www.aeaweb.org/articles?id=10.1257/pol.20140215

[vi] “Many Indian women own a mobile phone but don’t use it. Here’s a look at the state-wise data”, CNBC, May 17, 2022, https://www.cnbctv18.com/telecom/world-telecommunication-and-information-society-day-2022-many-indian-women-own-a-mobile-phone-but-dont-use -it-13513542.htm

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